एक मित्र ने समता और सामूहिकता पर तंज किया कि उसका इंतजार तो 1848 (कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो लिखे जाने का वर्ष) से ही हो रहा है। ऐसा उन्होंने अल्पज्ञता के चलते किया क्योंकि समता-स्वतंत्रता-सामूहिकता के अभियान का इतिहास उतना ही पुराना है जितना पुराना वर्गीय असमानता तथा वर्ग वर्चस्व का है। प्राचीन यूनान में जहां एक तरफ प्लेटो और अरस्तू जैसे असमानता और दासता के पैरोकार थे तो दूसरी तरफ डेमोक्रेटस, स्टोइक्स और इपिक्यूरियस जैसे स्वतंत्रता, समानता और सामूहिकता के भी पैरोकार थे। प्रचीन भारत में जहां एक तरफ वर्णाश्रमी वर्चस्व के पैरोकार थे तो दूसरी तरफ चारवाक और बुद्ध जैसे समानता और सामूहिकता के पैरोकार थे। उनके तंज पर मेरी प्रतिक्रिया:
Wednesday, June 9, 2021
मार्क्सवाद 246 (ऐतिहासिक भौतिकवाद)
मार्क्सवाद 245 ( पुरातन की जगह नवीन)
इतिहास गवाह है कि पुरातन व्यवस्था के खंडहरों पर नवीन का निर्माण होता है, जैसे दास प्रथा के खंडहर पर बना सामंती व्यवस्था का भवन लगभग 2000 साल बाद पूंझीवाद की आंधी में ढह गया जिसके खंडहरों पर खड़ा हुई पूंजीवाद की इमारत 500 साल पुरानी हो गयी है। यह ऐतिहासिक युगों की बाते हैं, जहां तक विध्वंसक लंपटों की बात है वे कुछ नया निर्माण करने में असमर्थ हैं इसलिए निर्मित को तोड़ते हैं वह कहीं भी निर्मित हो चाहे पुराने की जगह चाहे नई जगह। जो नया शहर नहीं बसा सकते वे पहले से बसे का नाम बदलकर रचनाशीलता का पाखंड करते हैं।
Sunday, June 6, 2021
लल्ला पुराम 387 (बाभन से इंसान)
एक मित्र ने पश्चिम अफ्रीका के एक देश में किसी धर्मोंमादी इस्लामी आतंकवादी द्वारा अपने 100 हमवतन, हममजहब इंसाने की निर्मम हत्या की न्यूयॉर्क टाइम्स की खबर का लिंक शेयर किया। उस पोस्ट पर इंसानों की अमूल्य जिंदगी की अपूरणीय क्षति पर नहीं सारा ध्यान कम्युनिस्टों के जेहादी समर्थन की गल्पकथाओं, सेकुलरों के तथाकथित दोहरे मानदंड और इंसानियत की मुहिम की निंदा के रोजमर्रा के रटे भजन पर है। उस पोस्ट पर मेरे कुछ कमेंट:
शिक्षा और ज्ञान 312 (तुलसी)
बाल्मीकि का मकसद बौद्ध संस्कृति के विरुद्ध ब्राह्मणवादी प्रतिक्रांति की बौद्धिक पुष्टि थी, तुलसी का उद्देश्य भक्ति आंदोलन के समतामूलक संदेश का खंडन-मंडन। भारत में शासक जातियां ही शासक वर्ग भी रही हैं, तथा जैसा मार्क्स ने लिखा है शासक वर्ग के विचार शासक विचार भी होते हैं। शासक जातियों द्वारा तुलसी को सिर पर बैठाना तो स्वाभाविक है लेकिन शासित जातियां भी उन विचारों के प्रभामंडल से चकाचौॆध हैँ।
लल्ला पुराण 386 (बाभन से इंसान)
निजी संपत्ति को चोरी और असमानता को मानवता पर मनुष्यनिर्मित अभिशाप मानने वाले 18वीं शताब्दी के दार्शनिक रूसो अपनी कालजयी कृति सोसल कॉनट्रैक्ट की शुरुआत इस वाक्य से करते हैं, "मनुष्य पैदा स्वतंत्र होता है और अपने को बेड़ियों में जकड़ा हुआ होता है"। इन बेड़ियों को तोड़ने के लिए, सामाजिक संविदा के जरिए वह एक ऐसे समाज की रचना करना चाहता था, जिसमें लोग " उतने ही स्वतंत्र हों जितना पहले"। युगांतरकारी सपने भविष्य की पीढ़ियां पूरा करती हैं। उसी तरह हम सब पैदा समान इंसान होते हैं, पैदा होते ही समाज हम पर बाभन-ठाकुर-दलित का विभाजनकारी ठप्पा लगाता है, बाभन से इंसान बनने का मुहावरा एक ऐसे समाज के सपने का रूपक है जिसमें हम समाज के थोपे कृतिम ठप्पे से मुक्त होकर वापस इंसान बन सकें।
Saturday, June 5, 2021
लल्ला पुराण 385 (बाभन से इंसान)
इस ग्रुप के कई जातिवादी सवर्ण मुझसे परेशान रहते हैं वे प्रत्यक्ष-परोक्ष बनाकर 'तमीजदार' भाषा में निजी आक्षेपों से मुझे निशाना बनाकर अपनी जातिवादी कुंठा निकालते हैं। परोक्ष रूप से मुझे निशाना बनाकर बाभन से इंसान बनने के मुहावरे की प्रतिक्रिया में एक सज्जन ने बाभन-ठाकुरों के लिए चुंगी पर अकादमी खोलने की एक पोस्ट डाला और उस पर कई कमेंट्स की भाषा की तमीज से इवि के शिक्षा के स्तर पर दुखद आश्चर्य हुआ। पोस्ट के लेखक का आभारी हूं कि तंज कसने की तर्ज पर ही सही, बाभन से इंसान बनने के मुहावरे को विमर्श का विषय बनाया। अंतिम सत्य नहीं होता, सापेक्ष सत्य वाद-विवाद-संवाद से ही अन्वेषित होता है। उस पोस्ट पर मेरा एक कमेंट:
Friday, June 4, 2021
शिक्षा और ज्ञान 311 (संघी-मुसंघी)
कमेट लंबा हो गया तो बाकी अगले कमेंट बॉक्स में...
15-16 साल की उम्र में बड़े बाबू (ताऊ) जी से लंबी बहस हो गयी थी और मेरी गुड ब्वाय की छवि एकाएक धराशायी हो गयी थी कि बड़ों से सवाल-जवाब करता हूं। लेकिन पते में कौन ठकुरई। दर असल विरासत में मिले जातीय, धार्मिक (सांप्रदायिक), वैचारिक पूर्वाग्रहों की जड़े मन-मष्तिष्तक में इतनी गहरी पैठी होती हैं कि उनसे मुक्ति के लिए, स्व के स्वार्थबोध को त्यागकर बहुत ही कष्टदायक आत्मसंघर्ष से स्व का परमार्थबोध कार्यरूप देना पड़ता है। इंटर में पढ़ता था तो मेरे पिताजी के एक कम्युनिस्ट मित्र थे निहायत ही बेहतरीन इंसान मैंने उनसे पूछा आप इतने अच्छे होकर भी कम्युनिस्ट क्यों हैं? उन्होंने प्रत्यक्ष दृष्टांत से बहुत तार्किक रूप से समझाया, जिस संस्मरण को लिखा हूं, कभी शेयर करूंगा, लेकिन मुझे लगा था कि मुझे बंहका रहे हैं। कर्मकांडी ब्राह्मण से नास्तिकता और संघी प्रतिक्रियावादी से मार्क्सवाद की यात्राएं भी बहुत ही कठिन एवं साहसिक आत्मसंघर्ष की यात्राएं रही हैं। यदि स्व के स्वार्थबोध से मुक्त न हो सका होता तो मैं भी आरक्षण, साम्यवाद और धर्मनिरपेक्षता के विरुद्ध विषवमन कर रही होता। लेकिन मैं रूसो से सहमत हूं कि वास्तविक सुख स्व के स्वार्थबोध (self's sense of self interest) पर स्व के परमार्थबोध ( self's sense of right or justice) को तरजीह देने में है। इतना कमेंट लिखते लिखते अभी हमारे एक सीनियर (इवि और जेएनयू) त्रिनेत्र जोशी जी का फोन आ गया तो यह कमेंट 40-41 साल पहले कही गयी उनकी एक बात से करता हूं। जेएनयू पुराने कैंपस की कैंटीन में मेरे बारे में कुछ बात हो रही थी, त्रिनेत्र भाई ने कहा, 'दर असल ईश ने सत्यम् ब्रूयात, प्रियम् ब्रूयात् .....' वाले श्लोक की पहली लाइन पढ़ा और दूसरी नहीं। तब ध्यान आया था कि अप्रिय सत्य (जाहिर है सापेक्षता सिद्धांत के साथ) बोलने की बचपन से आदत थी। 15-16 साल की उम्र में बड़े बाबू (ताऊ) जी से लंबी बहस हो गयी थी और मेरी गुड ब्वाय की छवि एकाएक धराशायी हो गयी थी कि बड़ों से सवाल-जवाब करता हूं। लेकिन पते में कौन ठकुरई। दर असल विरासत में मिले जातीय, धार्मिक (सांप्रदायिक), वैचारिक पूर्वाग्रहों की जड़े मन-मष्तिष्तक में इतनी गहरी पैठी होती हैं कि उनसे मुक्ति के लिए, स्व के स्वार्थबोध को त्यागकर बहुत ही कष्टदायक आत्मसंघर्ष से स्व का परमार्थबोध कार्यरूप देना पड़ता है। इंटर में पढ़ता था तो मेरे पिताजी के एक कम्युनिस्ट मित्र थे निहायत ही बेहतरीन इंसान मैंने उनसे पूछा आप इतने अच्छे होकर भी कम्युनिस्ट क्यों हैं? उन्होंने प्रत्यक्ष दृष्टांत से बहुत तार्किक रूप से समझाया, जिस संस्मरण को लिखा हूं, कभी शेयर करूंगा, लेकिन मुझे लगा था कि मुझे बंहका रहे हैं। कर्मकांडी ब्राह्मण से नास्तिकता और संघी प्रतिक्रियावादी से मार्क्सवाद की यात्राएं भी बहुत ही कठिन एवं साहसिक आत्मसंघर्ष की यात्राएं रही हैं। यदि स्व के स्वार्थबोध से मुक्त न हो सका होता तो मैं भी आरक्षण, साम्यवाद और धर्मनिरपेक्षता के विरुद्ध विषवमन कर रही होता। लेकिन मैं रूसो से सहमत हूं कि वास्तविक सुख स्व के स्वार्थबोध (self's sense of self interest) पर स्व के परमार्थबोध ( self's sense of right or justice) को तरजीह देने में है। इतना कमेंट लिखते लिखते अभी हमारे एक सीनियर (इवि और जेएनयू) त्रिनेत्र जोशी जी का फोन आ गया तो यह कमेंट 40-41 साल पहले कही गयी उनकी एक बात से करता हूं। जेएनयू पुराने कैंपस की कैंटीन में मेरे बारे में कुछ बात हो रही थी, त्रिनेत्र भाई ने कहा, 'दर असल ईश ने सत्यम् ब्रूयात, प्रियम् ब्रूयात् .....' वाले श्लोक की पहली लाइन पढ़ा और दूसरी नहीं। तब ध्यान आया था कि अप्रिय सत्य (जाहिर है सापेक्षता सिद्धांत के साथ) बोलने की बचपन से आदत थी। 15-16 साल की उम्र में बड़े बाबू (ताऊ) जी से लंबी बहस हो गयी थी और मेरी गुड ब्वाय की छवि एकाएक धराशायी हो गयी थी कि बड़ों से सवाल-जवाब करता हूं। लेकिन पते में कौन ठकुरई। दर असल विरासत में मिले जातीय, धार्मिक (सांप्रदायिक), वैचारिक पूर्वाग्रहों की जड़े मन-मष्तिष्तक में इतनी गहरी पैठी होती हैं कि उनसे मुक्ति के लिए, स्व के स्वार्थबोध को त्यागकर बहुत ही कष्टदायक आत्मसंघर्ष से स्व का परमार्थबोध कार्यरूप देना पड़ता है। इंटर में पढ़ता था तो मेरे पिताजी के एक कम्युनिस्ट मित्र थे निहायत ही बेहतरीन इंसान मैंने उनसे पूछा आप इतने अच्छे होकर भी कम्युनिस्ट क्यों हैं? उन्होंने प्रत्यक्ष दृष्टांत से बहुत तार्किक रूप से समझाया, जिस संस्मरण को लिखा हूं, कभी शेयर करूंगा, लेकिन मुझे लगा था कि मुझे बंहका रहे हैं। कर्मकांडी ब्राह्मण से नास्तिकता और संघी प्रतिक्रियावादी से मार्क्सवाद की यात्राएं भी बहुत ही कठिन एवं साहसिक आत्मसंघर्ष की यात्राएं रही हैं। यदि स्व के स्वार्थबोध से मुक्त न हो सका होता तो मैं भी आरक्षण, साम्यवाद और धर्मनिरपेक्षता के विरुद्ध विषवमन कर रही होता। लेकिन मैं रूसो से सहमत हूं कि वास्तविक सुख स्व के स्वार्थबोध (self's sense of self interest) पर स्व के परमार्थबोध ( self's sense of right or justice) को तरजीह देने में है। इतना कमेंट लिखते लिखते अभी हमारे एक सीनियर (इवि और जेएनयू) त्रिनेत्र जोशी जी का फोन आ गया तो यह कमेंट 40-41 साल पहले कही गयी उनकी एक बात से करता हूं। जेएनयू पुराने कैंपस की कैंटीन में मेरे बारे में कुछ बात हो रही थी, त्रिनेत्र भाई ने कहा, 'दर असल ईश ने सत्यम् ब्रूयात, प्रियम् ब्रूयात् .....' वाले श्लोक की पहली लाइन पढ़ा और दूसरी नहीं। तब ध्यान आया था कि अप्रिय सत्य (जाहिर है सापेक्षता सिद्धांत के साथ) बोलने की बचपन से आदत थी।
