Wednesday, June 9, 2021

मार्क्सवाद 246 (ऐतिहासिक भौतिकवाद)

 एक मित्र ने समता और सामूहिकता पर तंज किया कि उसका इंतजार तो 1848 (कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो लिखे जाने का वर्ष) से ही हो रहा है। ऐसा उन्होंने अल्पज्ञता के चलते किया क्योंकि समता-स्वतंत्रता-सामूहिकता के अभियान का इतिहास उतना ही पुराना है जितना पुराना वर्गीय असमानता तथा वर्ग वर्चस्व का है। प्राचीन यूनान में जहां एक तरफ प्लेटो और अरस्तू जैसे असमानता और दासता के पैरोकार थे तो दूसरी तरफ डेमोक्रेटस, स्टोइक्स और इपिक्यूरियस जैसे स्वतंत्रता, समानता और सामूहिकता के भी पैरोकार थे। प्रचीन भारत में जहां एक तरफ वर्णाश्रमी वर्चस्व के पैरोकार थे तो दूसरी तरफ चारवाक और बुद्ध जैसे समानता और सामूहिकता के पैरोकार थे। उनके तंज पर मेरी प्रतिक्रिया:


क्रांति कोई सत्य नारायण की कथा नहीं है कि घंटे भर में पंडित जी समापन कर स्वाहा बोल देंगे। हजारों साल की सामंती उत्पादन पद्धति (भारत के मामले में वर्णाश्रमी या एसियाटिक उत्पादन पद्धति) के बाद 500 साल पहले समानता, स्वतंत्रता, भाईचारे के नारे और सबकी समृद्धि के नारे के साथ पूंजीवादी उत्पादन पद्धति का संक्रमणकाल शुरू हुआ जो अभी भी अधूरा है क्योंकि संभावनाएं शेष हैं। अधिकतम मुनाफा के सिद्धांत पर आधारित पूंजीवाद भी अपने पूर्ववर्ती वर्ग व्यवस्थाओं की तरह, इस मामले में, दोगली व्यवस्था है कि यह जो कहती है, कभी नहीं करती और जो करती है कभी नहीं कहती। इसने सामंतवाद से निपटने के लिए नारा तो समानता, स्वतंत्रता, भाई चारे का दिया लेकिन असमानता, श्रमशक्ति बेचने की गुलामी (वेज स्लेवरी) तथा शोषण दमन मुनाफा कमाने के इसके मौलिक सिद्धांत में ही अंतर्निहित है। 500 सालों में भी अभी तक सामंतवाद के विरुद्ध पूंजीवादी क्रांति अधूरी ही है, भारत में तो पूंजीवाद ने वर्णाश्रमी सामंतवाद से लड़ने की बजाय इसका दामन थामकर अपना क्रोनी (सरकार की मदद से लूट) विकास कर रहा है। पूंजीवाद भूमंडलीय व्यवस्था है तथा उसका भविष्य का विकल्प भी भूमंडलीय ही होगा। छिटपुट-समाजवादी क्रांतियों का इतिहास तो अभी लगभग 100 साल ही पुराना है। सामंतवाद से पूंजीवाद का संक्रमण एक वर्ग समाज से दूसरे वर्ग समाज का संक्रमण है। पूंजीवाद से साम्यवाद का संक्रमण गुणात्मक रूप से भिन्न एक वर्ग समाज से वर्गविहीन समाज का संक्रमण है, जो जाहिर है ज्यादा जटिल होगा। लेकिन प्रकृति का द्वंद्वात्मक नियम है कि जिसका भा अस्तित्व है, उसका अंत निश्चित है तथा पूंजीवाद अपवाद नहीं है। इसका कोई टाइमटेबल नहीं तय किया जा सकता क्योंकि इतिहास की गति ज्योतिष की भविष्यवाणी से नहीं निर्धारित होती, वह (इतिहास)अपने गतिविज्ञान के नियम अपनी यात्रा में खुद विकसित करता है। निराश मत होइए, पूंजीवाद का अंत अवश्यंभावी है तथा भविष्य के समतामूलक समाज की रूपरेखा भविष्य की पीढ़ियां खुद तैयार करेंगी। हमारा काम
भक्तिभाव से मुक्ति के इंसानियत के अभियान में अपना योगदान करते रहना है। सादर।

मार्क्सवाद 245 ( पुरातन की जगह नवीन)

 इतिहास गवाह है कि पुरातन व्यवस्था के खंडहरों पर नवीन का निर्माण होता है, जैसे दास प्रथा के खंडहर पर बना सामंती व्यवस्था का भवन लगभग 2000 साल बाद पूंझीवाद की आंधी में ढह गया जिसके खंडहरों पर खड़ा हुई पूंजीवाद की इमारत 500 साल पुरानी हो गयी है। यह ऐतिहासिक युगों की बाते हैं, जहां तक विध्वंसक लंपटों की बात है वे कुछ नया निर्माण करने में असमर्थ हैं इसलिए निर्मित को तोड़ते हैं वह कहीं भी निर्मित हो चाहे पुराने की जगह चाहे नई जगह। जो नया शहर नहीं बसा सकते वे पहले से बसे का नाम बदलकर रचनाशीलता का पाखंड करते हैं।

Sunday, June 6, 2021

लल्ला पुराम 387 (बाभन से इंसान)

 एक मित्र ने पश्चिम अफ्रीका के एक देश में किसी धर्मोंमादी इस्लामी आतंकवादी द्वारा अपने 100 हमवतन, हममजहब इंसाने की निर्मम हत्या की न्यूयॉर्क टाइम्स की खबर का लिंक शेयर किया। उस पोस्ट पर इंसानों की अमूल्य जिंदगी की अपूरणीय क्षति पर नहीं सारा ध्यान कम्युनिस्टों के जेहादी समर्थन की गल्पकथाओं, सेकुलरों के तथाकथित दोहरे मानदंड और इंसानियत की मुहिम की निंदा के रोजमर्रा के रटे भजन पर है। उस पोस्ट पर मेरे कुछ कमेंट:

कोन लोग? जिनकी मर्शिया पढ़ते हैं उन्ही से हर बात पर कार्रवाई की उम्मीद में उन्हें गरियाते रहते हैं। आपको अपने से अधिक औरों की चिंता रहती है। मानवता विरोधी ऐसे नरपिशाच सब जगहों पर पाए जाते हैं, धर्मोंमाद हमेशा विनाशकारी ही होता है। इस ग्रुप में बात-बेबात वामपंथ के भजन के आधार पर कोई निष्कर्ष निकाले तो पाएगा कि देश की सबसे बड़ी ताकत वामपंथ है और सबसे अधिक खतरा मुसलमानों से है। नकारात्मकता से निकलिए। दूसरों के काम का लेखाजोखा की बजाय अपने काम देखिए।
इस तरह के धर्मोंमादी कुकृत्य की निंदा से अधिक चिंता लगता है लोगों को बाभन से इंसान बनने के संकट से है। चिंता मत करिए कोई भी जबरदस्ती किसीको इंसान नहीं बना सकता, जब तालिबानी जेहादी इंसान नहीं बन सकते तो आपलोग क्यों पीछे रहें? इस बात से किसी की दाढ़ी में तिनका महसूस हो तो उसीकी जिम्मेदारी है।
हम तो श्रीकृष्ण की तरह न तो त्रिकालदर्शी हैं, न महाभारत के संजय की तरह दिव्य दृष्टि रखते हैं। कोरोना काल की अतिरेक सावधानी से अखबार पढ़ने से भी स्लवैच्छिक रूप से वंचित हैं। आत्मीय जनों समेत तमाम लोगों के बारे त्रासद खबरों से मन इतना उद्वेलित है कि फेसबुक भी 10-12 घंटे बात खोलता हूं, तो हर खबर से भिज्ञ न हो पाना और फौरी प्रतिक्रिया न दे पाना मानवीय विवशता हो सकती है, अपराध नहीं। हर बात पर फैौरी प्रतिक्रिया न दे पाने को सांप्रदायिक मानसिकता के लोगों को सेकुलरिज्म को निशाना बनाने औक समाज में फिरकापरस्ती की नफरत फैलाकर देश तोड़ने केे अपने कम्यूनल एजेंडे को आगे बढ़ाने का बहाना मिल जाता है। इस पोस्ट में आतंकवादियों द्वारा अपने 100 सहधर्मियों की हत्या की चिंता पर सरोकार तो घड़ियाली आंसू सा है, मुख्य एजेंडा इस बहाने इंसानियत की मुहिम को निशाना बनाना है। धर्मोंमादी पातकी सभी समुदायों में पाए जाते हैं, सबकी निंदा औरलविरोध होना चाहिए।
हम तो श्रीकृष्ण की तरह न तो त्रिकालदर्शी हैं, न महाभारत के संजय की तरह दिव्य दृष्टि रखते हैं। कोरोना काल की अतिरेक सावधानी से अखबार पढ़ने से भी स्लवैच्छिक रूप से वंचित हैं। आत्मीय जनों समेत तमाम लोगों के बारे त्रासद खबरों से मन इतना उद्वेलित है कि फेसबुक भी 10-12 घंटे बात खोलता हूं, तो हर खबर से भिज्ञ न हो पाना और फौरी प्रतिक्रिया न दे पाना मानवीय विवशता हो सकती है, अपराध नहीं। हर बात पर फैौरी प्रतिक्रिया न दे पाने को सांप्रदायिक मानसिकता के लोगों को सेकुलरिज्म को निशाना बनाने औक समाज में फिरकापरस्ती की नफरत फैलाकर देश तोड़ने केे अपने कम्यूनल एजेंडे को आगे बढ़ाने का बहाना मिल जाता है। इस पोस्ट में आतंकवादियों द्वारा अपने 100 सहधर्मियों की हत्या की चिंता पर सरोकार तो घड़ियाली आंसू सा है, मुख्य एजेंडा इस बहाने इंसानियत की मुहिम को निशाना बनाना है। धर्मोंमादी पातकी सभी समुदायों में पाए जाते हैं, सबकी निंदा और विरोध होना चाहिए।

शिक्षा और ज्ञान 312 (तुलसी)

 बाल्मीकि का मकसद बौद्ध संस्कृति के विरुद्ध ब्राह्मणवादी प्रतिक्रांति की बौद्धिक पुष्टि थी, तुलसी का उद्देश्य भक्ति आंदोलन के समतामूलक संदेश का खंडन-मंडन। भारत में शासक जातियां ही शासक वर्ग भी रही हैं, तथा जैसा मार्क्स ने लिखा है शासक वर्ग के विचार शासक विचार भी होते हैं। शासक जातियों द्वारा तुलसी को सिर पर बैठाना तो स्वाभाविक है लेकिन शासित जातियां भी उन विचारों के प्रभामंडल से चकाचौॆध हैँ।

लल्ला पुराण 386 (बाभन से इंसान)

 निजी संपत्ति को चोरी और असमानता को मानवता पर मनुष्यनिर्मित अभिशाप मानने वाले 18वीं शताब्दी के दार्शनिक रूसो अपनी कालजयी कृति सोसल कॉनट्रैक्ट की शुरुआत इस वाक्य से करते हैं, "मनुष्य पैदा स्वतंत्र होता है और अपने को बेड़ियों में जकड़ा हुआ होता है"। इन बेड़ियों को तोड़ने के लिए, सामाजिक संविदा के जरिए वह एक ऐसे समाज की रचना करना चाहता था, जिसमें लोग " उतने ही स्वतंत्र हों जितना पहले"। युगांतरकारी सपने भविष्य की पीढ़ियां पूरा करती हैं। उसी तरह हम सब पैदा समान इंसान होते हैं, पैदा होते ही समाज हम पर बाभन-ठाकुर-दलित का विभाजनकारी ठप्पा लगाता है, बाभन से इंसान बनने का मुहावरा एक ऐसे समाज के सपने का रूपक है जिसमें हम समाज के थोपे कृतिम ठप्पे से मुक्त होकर वापस इंसान बन सकें।


Saturday, June 5, 2021

लल्ला पुराण 385 (बाभन से इंसान)

 इस ग्रुप के कई जातिवादी सवर्ण मुझसे परेशान रहते हैं वे प्रत्यक्ष-परोक्ष बनाकर 'तमीजदार' भाषा में निजी आक्षेपों से मुझे निशाना बनाकर अपनी जातिवादी कुंठा निकालते हैं। परोक्ष रूप से मुझे निशाना बनाकर बाभन से इंसान बनने के मुहावरे की प्रतिक्रिया में एक सज्जन ने बाभन-ठाकुरों के लिए चुंगी पर अकादमी खोलने की एक पोस्ट डाला और उस पर कई कमेंट्स की भाषा की तमीज से इवि के शिक्षा के स्तर पर दुखद आश्चर्य हुआ। पोस्ट के लेखक का आभारी हूं कि तंज कसने की तर्ज पर ही सही, बाभन से इंसान बनने के मुहावरे को विमर्श का विषय बनाया। अंतिम सत्य नहीं होता, सापेक्ष सत्य वाद-विवाद-संवाद से ही अन्वेषित होता है। उस पोस्ट पर मेरा एक कमेंट:


वैसे पोस्ट का लेखक लगता है असाहित्यिक व्यक्ति है मुहावरे की भाषा नहीं समझता तथा उनकी शाब्दिक व्याख्या करता है। बाभन से इंसान बनना जातिवादी पूर्वाग्रहों से ऊपर उठकर, सही मायने में एक शिक्षित व्यक्ति की तरह निखालिश विवेकशील इंसान बनने का मुहावरा है। बाभनों की ही तरह ठाकुरों, भूमिहारों, लालाओं, बनियों, अहिरों, कुर्मियों आदि को भी इंसान बनने की जरूरत है। जातिवादी भेदभाव का जवाबी जातिवाद भी इंसानियत के लिए समान रूप से घातक है। औपनिवेशिक शिक्षा-पद्धति का मकसद ज्ञान का प्रसार नहीं सरकारी नीतियों का बौद्धिक आधार और सरकारी मशीन के कल-पुर्जे तैयार करना था। विरासत में मिली औपनिवेशिक शिक्षा पद्धति बिना किसी आमूल बदलाव के उसी उद्देश्य को आगे बढ़ा रही है, वस सरकार का स्वरूप बदल गया है, सार नहीं। शिक्षा संस्थानों में ज्ञान नहीं मिलता वहां छात्रों को व्यवस्था चलाने के लिए जरूरी सूचनाओं (information) और (skills) से लैश किया जाता है। ज्ञान के लिए अलग से प्रयास करना पड़ता है क्योंकि ज्ञान जो पढ़ाया जाता है, उससे नहीं, उस पर सवाल करने सो मिलता है, जिसके लिए स्वयं प्रयास करना पड़ता है। ज्यादा प्रयास करने वालों को जेएनयू, बीएचयू, हैदराबाद के विद्यार्थियों की तरह दमन झेलना पड़ता है। दमन झेलना भी ज्ञान-प्रक्रिया का हिस्सा है। ऐसा क्या ज्ञान जो हमें यह तक नहीं सिखा पाता कि व्यक्तित्व का निर्माण जन्म के संयोग के परिणाम स्वरूप जातीय प्रवृत्तियों से नहीं, समाजीकरण के परिणाम स्वरूप कर्मों और विचारों से होता है? मुहावरे की भाषा में जो हमें बाभन से इंसान नहीं बना पाता? सबसे अधिक अवैज्ञानिक सोच दुर्भाग्य से विज्ञान के विद्यार्थियों की होती है क्योंकि हम विज्ञान विज्ञान की तरह नहीं, दक्षता (skill) की तरह पढ़ाते हैं। मैं हॉस्टल का वार्डन था तो परीक्षा के दिन सुबह हनुमान जी का आशिर्वाद लेने जाते 15 बच्चों में 11-12 विज्ञान को होते और उनमें आधे भौतिकी के, जबकि भौतिकी बुनियादी विज्ञान (basic science) है जो किसी बात का संज्ञान नहीं लेता जिसमें भौतिकता न हो, जो करण-कारण ढांचे से बाहर हो, जो प्रमाणित न की जा सके। बाद में इसे एक लेख के रूप में विकसित करके शेयर करूंगा। अभी नहाकर, नाश्ता कर दवा खाकर, केंद्रीय विश्वविद्यालय तेजपुर (असम) के पीएचडी छात्रों को इसी से संबद्ध विषय 'अस्मिता विमर्श' पर एक ऑनलाइन लेक्चर देना है। लेकिन चिंता न करिए, इस पोस्ट और पर मुझे निशाना बनाते जातिवादी कुंठा से निकले निजी आक्षेप के पोस्ट्स-कमेंट्स की तरह के आक्षेपों को धैर्य की सीमा में झेलते हुए, इंसान बनाने का उपक्रम जारी रखूंगा। कुछ कमेंट्स पढ़कर इवि के स्तर पर आश्चर्य होता है, आप सबसे आग्रह है कि मुझे इस तरह के आश्चर्य से वंचित करें। सादर।

Friday, June 4, 2021

शिक्षा और ज्ञान 311 (संघी-मुसंघी)

संघी सांप्रदायिकता का मुस्लिम समतुल्य मुसंघी है। आपको किसी सेकुलर का यह नामकरण न पसंद हो तो कुछ और रख लीजिए, जैसे तालिबानी बजरंगी। वैसे मुसंघी से आपको क्या दिक्कत है? इसमें आप को संघी सांप्रदायिकता का अपमान नजर आता है या मुसंघी सांप्रदायिकता का सम्मान?

पहले तो आप अपने आप को स्पष्ट कीजिए कि आपको परेशानी
धर्मनिरपेक्षता से है कि छद्म धर्मनिरपेक्षता से? यह भी (अपने आप से) स्पष्ट कीजिए कि आपका धर्मनिरपेक्षता की विकृति से है या संघी सांप्रदायिकता की आलोचनासे? तमाम सांप्रदायिक लोग अपने सांप्रदायिक चरित्र को छिपाने के लिए सेकुलरिज्म को टार्गेट करते हैं क्योंकि टार्गेट करने के लिए मुसलमान कम हो गए हैं। उनकी कुंठा यह है कि जब वे सांप्रदायिक बनने से नहीं बच सके तो और कोई कैसेबचान रह सकता है। अपना संघी सांप्रदायिक चरित्र छिपाने के लिए मुसंघी सांप्रदायिकता या धर्मनिरपेक्षता की ओट मत लीजिए। हिम्मत कर कहिए कि इस्लामी सांप्रदायिकता को मुसंघी कहना आपको इसलिए खलता है कि आप संघी सांप्रदायिकता के पक्षधर हैं। अभिव्यक्ति के खतरे उठाने ही पड़ेंगे। अंत में, मुक्तिबोध के ही शब्दों में आपकी पॉलिटिक्स क्या है पार्टनर? इसे अन्यथा न लें संस्कारगत और समाजीकरण से आत्मसात किए पूर्वाग्रहों से मुक्ति बहुत आसान नहीं है, लेकिन आसान काम तो कोई भी कर लेता है।

Raj K Mishra मेरी न तो कोई पार्टी है न ही पार्टीगत चेतना है, 32-33 साल पहले पार्टी लाइन को अमार्क्सवादी बताते हुए एक लंबा लेख लिखकर एक पार्टी छोड़ा था। भक्तिभाव हमेशा अधोगामी होता है चाहे वह दक्षिणपंथी हो या वामपंथी। पूर्वाग्रहों से मुक्ति निश्चित ही आसान नहीं है, लेकिन आसान काम तो कोई भी कर सकता है। इसके लिए दुर्लभ साहस के साथ सघन आत्मावलोकन, आत्मालोचना के साथ गहन एवं निरंतर आत्मसंघर्ष की जरूरत होती है। लेकिन सिद्धांतों को जीने (करनी कथनी में एका बैठाने) के लिए उठाया गया कष्ट सुखद होता है। जैसे यदि आप स्त्री-पुरुष समानता में विश्वास रखते हैं तो किचेन में काम करने का कष्ट सुखद होता है। इसके लिए पत्नी को भी प्रथा के विपरीत सोचने की आदत डालना भी कष्टप्रद होता है। लेकिन मुक्तिबोध के शब्दों में अभिव्यक्ति के खतरे उठाने ही पड़ेंगे, तोड़ने ही पड़ेंगे हठ और मठ। किसी को झट से नहीं कह देता कि वह पूर्वाग्रहों से ऊपर नहीं उठ पाया, सोच-विचार कर कहता हूं। मंडलविरोधी उंमाद के दौरान, जातीय पूर्वाग्रह से उबरने के लिए स्व के स्वार्थबोध से ऊपर उठकर स्व के परमार्थबोध के तहत आरक्षण विरोध के विरोध के लिए सघन आत्मसंघर्ष करना पड़ा था। उसी विरोध के चलते अस्थाई नौकरी चली गयी थी। मेरे विभागाध्यक्ष ने कहा था, People don't express their opinions as long as they are temporary but probably, that's not in your personality. मैं तो चाहता हूं आप मेरी पॉलिटिक्स के दूध का दूध पानी का पानी कर दें, लेकिन दुर्भाग्य से आप इसका उल्टा करते हैं क्योंकि आपने unlearning का कष्ट उतनी सिद्दत से उठाया ही नहीं और पूर्वाग्रहों के वशीभूत काम करते हुए उनसे मुक्ति का मुगालता पालते रहे। मैं फन्ने कसाई का हमदर्द नहीं बनता लेकिन वीरेश्वर द्विवेदी के कुकर्मों के भंडाफोड़ में अपने सांप्रदायिक पूर्वाग्रहों के चलते आपको उससे मेरी हमदर्दी दिखती है। आम आदमी का (या आम हिंदू का) एकमात्र प्रवक्ता बनने वाले दुष्टों का पीछा करना ही चाहिए क्योंकि अपनी मुक्ति की लड़ाई आमआदमी (कामगर) वर्गचेतना से सैश हो खुद लड़ेगा, उसे किसी प्रवक्ता की जरूरत नहीं है। मेरा भी कमेंट लंबा हो गया पार्टनर, लेकिन मैं कभी आक्षेप नहीं लगाता, शिक्षक कर्म की आदत से मजबूर निर्ममता से विश्लेषण करता हूं।

कमेट लंबा हो गया तो बाकी अगले कमेंट बॉक्स में... 


15-16 साल की उम्र में बड़े बाबू (ताऊ) जी से लंबी बहस हो गयी थी और मेरी गुड ब्वाय की छवि एकाएक धराशायी हो गयी थी कि बड़ों से सवाल-जवाब करता हूं। लेकिन पते में कौन ठकुरई। दर असल विरासत में मिले जातीय, धार्मिक (सांप्रदायिक), वैचारिक पूर्वाग्रहों की जड़े मन-मष्तिष्तक में इतनी गहरी पैठी होती हैं कि उनसे मुक्ति के लिए, स्व के स्वार्थबोध को त्यागकर बहुत ही कष्टदायक आत्मसंघर्ष से स्व का परमार्थबोध कार्यरूप देना पड़ता है। इंटर में पढ़ता था तो मेरे पिताजी के एक कम्युनिस्ट मित्र थे निहायत ही बेहतरीन इंसान मैंने उनसे पूछा आप इतने अच्छे होकर भी कम्युनिस्ट क्यों हैं? उन्होंने प्रत्यक्ष दृष्टांत से बहुत तार्किक रूप से समझाया, जिस संस्मरण को लिखा हूं, कभी शेयर करूंगा, लेकिन मुझे लगा था कि मुझे बंहका रहे हैं। कर्मकांडी ब्राह्मण से नास्तिकता और संघी प्रतिक्रियावादी से मार्क्सवाद की यात्राएं भी बहुत ही कठिन एवं साहसिक आत्मसंघर्ष की यात्राएं रही हैं। यदि स्व के स्वार्थबोध से मुक्त न हो सका होता तो मैं भी आरक्षण, साम्यवाद और धर्मनिरपेक्षता के विरुद्ध विषवमन कर रही होता। लेकिन मैं रूसो से सहमत हूं कि वास्तविक सुख स्व के स्वार्थबोध (self's sense of self interest) पर स्व के परमार्थबोध ( self's sense of right or justice) को तरजीह देने में है। इतना कमेंट लिखते लिखते अभी हमारे एक सीनियर (इवि और जेएनयू) त्रिनेत्र जोशी जी का फोन आ गया तो यह कमेंट 40-41 साल पहले कही गयी उनकी एक बात से करता हूं। जेएनयू पुराने कैंपस की कैंटीन में मेरे बारे में कुछ बात हो रही थी, त्रिनेत्र भाई ने कहा, 'दर असल ईश ने सत्यम् ब्रूयात, प्रियम् ब्रूयात् .....' वाले श्लोक की पहली लाइन पढ़ा और दूसरी नहीं। तब ध्यान आया था कि अप्रिय सत्य (जाहिर है सापेक्षता सिद्धांत के साथ) बोलने की बचपन से आदत थी। 15-16 साल की उम्र में बड़े बाबू (ताऊ) जी से लंबी बहस हो गयी थी और मेरी गुड ब्वाय की छवि एकाएक धराशायी हो गयी थी कि बड़ों से सवाल-जवाब करता हूं। लेकिन पते में कौन ठकुरई। दर असल विरासत में मिले जातीय, धार्मिक (सांप्रदायिक), वैचारिक पूर्वाग्रहों की जड़े मन-मष्तिष्तक में इतनी गहरी पैठी होती हैं कि उनसे मुक्ति के लिए, स्व के स्वार्थबोध को त्यागकर बहुत ही कष्टदायक आत्मसंघर्ष से स्व का परमार्थबोध कार्यरूप देना पड़ता है। इंटर में पढ़ता था तो मेरे पिताजी के एक कम्युनिस्ट मित्र थे निहायत ही बेहतरीन इंसान मैंने उनसे पूछा आप इतने अच्छे होकर भी कम्युनिस्ट क्यों हैं? उन्होंने प्रत्यक्ष दृष्टांत से बहुत तार्किक रूप से समझाया, जिस संस्मरण को लिखा हूं, कभी शेयर करूंगा, लेकिन मुझे लगा था कि मुझे बंहका रहे हैं। कर्मकांडी ब्राह्मण से नास्तिकता और संघी प्रतिक्रियावादी से मार्क्सवाद की यात्राएं भी बहुत ही कठिन एवं साहसिक आत्मसंघर्ष की यात्राएं रही हैं। यदि स्व के स्वार्थबोध से मुक्त न हो सका होता तो मैं भी आरक्षण, साम्यवाद और धर्मनिरपेक्षता के विरुद्ध विषवमन कर रही होता। लेकिन मैं रूसो से सहमत हूं कि वास्तविक सुख स्व के स्वार्थबोध (self's sense of self interest) पर स्व के परमार्थबोध ( self's sense of right or justice) को तरजीह देने में है। इतना कमेंट लिखते लिखते अभी हमारे एक सीनियर (इवि और जेएनयू) त्रिनेत्र जोशी जी का फोन आ गया तो यह कमेंट 40-41 साल पहले कही गयी उनकी एक बात से करता हूं। जेएनयू पुराने कैंपस की कैंटीन में मेरे बारे में कुछ बात हो रही थी, त्रिनेत्र भाई ने कहा, 'दर असल ईश ने सत्यम् ब्रूयात, प्रियम् ब्रूयात् .....' वाले श्लोक की पहली लाइन पढ़ा और दूसरी नहीं। तब ध्यान आया था कि अप्रिय सत्य (जाहिर है सापेक्षता सिद्धांत के साथ) बोलने की बचपन से आदत थी। 15-16 साल की उम्र में बड़े बाबू (ताऊ) जी से लंबी बहस हो गयी थी और मेरी गुड ब्वाय की छवि एकाएक धराशायी हो गयी थी कि बड़ों से सवाल-जवाब करता हूं। लेकिन पते में कौन ठकुरई। दर असल विरासत में मिले जातीय, धार्मिक (सांप्रदायिक), वैचारिक पूर्वाग्रहों की जड़े मन-मष्तिष्तक में इतनी गहरी पैठी होती हैं कि उनसे मुक्ति के लिए, स्व के स्वार्थबोध को त्यागकर बहुत ही कष्टदायक आत्मसंघर्ष से स्व का परमार्थबोध कार्यरूप देना पड़ता है। इंटर में पढ़ता था तो मेरे पिताजी के एक कम्युनिस्ट मित्र थे निहायत ही बेहतरीन इंसान मैंने उनसे पूछा आप इतने अच्छे होकर भी कम्युनिस्ट क्यों हैं? उन्होंने प्रत्यक्ष दृष्टांत से बहुत तार्किक रूप से समझाया, जिस संस्मरण को लिखा हूं, कभी शेयर करूंगा, लेकिन मुझे लगा था कि मुझे बंहका रहे हैं। कर्मकांडी ब्राह्मण से नास्तिकता और संघी प्रतिक्रियावादी से मार्क्सवाद की यात्राएं भी बहुत ही कठिन एवं साहसिक आत्मसंघर्ष की यात्राएं रही हैं। यदि स्व के स्वार्थबोध से मुक्त न हो सका होता तो मैं भी आरक्षण, साम्यवाद और धर्मनिरपेक्षता के विरुद्ध विषवमन कर रही होता। लेकिन मैं रूसो से सहमत हूं कि वास्तविक सुख स्व के स्वार्थबोध (self's sense of self interest) पर स्व के परमार्थबोध ( self's sense of right or justice) को तरजीह देने में है। इतना कमेंट लिखते लिखते अभी हमारे एक सीनियर (इवि और जेएनयू) त्रिनेत्र जोशी जी का फोन आ गया तो यह कमेंट 40-41 साल पहले कही गयी उनकी एक बात से करता हूं। जेएनयू पुराने कैंपस की कैंटीन में मेरे बारे में कुछ बात हो रही थी, त्रिनेत्र भाई ने कहा, 'दर असल ईश ने सत्यम् ब्रूयात, प्रियम् ब्रूयात् .....' वाले श्लोक की पहली लाइन पढ़ा और दूसरी नहीं। तब ध्यान आया था कि अप्रिय सत्य (जाहिर है सापेक्षता सिद्धांत के साथ) बोलने की बचपन से आदत थी।