Wednesday, August 26, 2020

शिक्षा और ज्ञान 296 (बाल विवाह)

 मुसलमानों के डर से बचपन में लड़कियों के विवाह की बात सही नहीं है। यह अपनी कुप्रथाओं पर पर्दा डालने का ब्राह्मणवादी कुप्रचार लगता है। स्त्रियों की आजादी को खतरनाक मानने वली तथा उनको सदैव पिता, पति और पुत्र के अधीस्थ रखने की आचार संहिता की मनुसेमृति बहुत पहले लिखी गयी थी। बहुपत्नी प्रथा बहुत पहले सी थी। बिंदुसार की 100 पत्नियों की बात तो किंवदंती लगती हैं लेकिन कई पत्नियां तो थींं। अशोक अपने तमाम सौतेले भाइयों को मारकर राजा बने थे, उनकी भी कई पत्नियां थीं। बहुपत्नी प्रथा को चुनौती मिली ब्रह्मसमाज आंदोलन से और कानूनी रोक आजाद भारत केसंविधान के प्रवधानों से। राणा प्रताप की 11 पत्नियां थीं। अकबर के साथ तमाम राजपूतों ने स्वेच्छा से अपनी बेटियों के विवाह किए थे। यह सही है कि राणा प्रताप और रानी दुर्गावती के अलावा सारे राजपूत रजवाड़े अकबर के दरबारी बन गए थे। पूरे राजपुताने में अकेले राणा प्रताप अकबर और उसके सहयोगी राजपूतों की संयुक्त शक्ति से आजीवन लोहा लेते रहे, हर पराजय के बाद फिर से शक्ति अर्जित करते और हमला करते। राणा प्रताप के अपने सौतेले भाई जयमाल और शक्ति सिंह अकबर के साथ थे। शक्ति सिंह हल्दीघाटी में चेतक की मृत्यु के बाद राणा प्रताप को अपना घोड़ा दिए। ........... यदि राजपुताने के बाकी रजवाड़े प्रताप के विरुद्ध अकबर का साथ न देते तो राणा प्रताप अजेय रहते। ...........उसी तरह जैसे यदि 1857 में सिंधिया तथा ओरछा, पटियाला, हैदराबाद आदि के रजवाड़े अपनी सेनाओं के साथ 1857 की किसान क्रांति के विरुद्ध अंग्रेजों का साथ न देते तो तभी देश आजाद हो जाता। यहां के सामंती शासकवर्गों ने हमेशा जनता की आजादी के विरुद्ध गद्दारी की है।

मार्क्सवाद 226 (द्वंद्वात्मक भौतिकवाद)

 ऐतिहासिक रूप से द्रव्य विचार के बिना भी रहा है और उसी से विचार की उत्पत्ति हुई। न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण नियम से सेब गिरना नहीं शुरू हुए, वे पहले से गिरते ते, उन्हें देखकर न्यूटन के दिमाग में गिरने के कारण जानने का विचार आया। लेकिन सत्य की समग्रता दोनों के द्वंद्वात्मक मेल से बनती है। सेब का गिरनी संपूर्ण सत्य नहीं है और सेब न गिरते तो न्यूटन का गुरुत्वाकर्षण नियम अस्तित्व में न आता। सवाल पहले मार्क्स या हेगेल का नहीं क्योंकि मार्क्स हेगेल और फॉयरबाक दोनों का संज्ञान लेते हैं और दोनों को ्र्धसत्यों को जोड़कर सत्य की समग्रता रचते हैं। वैसे सवाल होना चाहिए पहले हेगेल या फॉरबाक। ( उपनिषद या चार्वाक जिनका द्वंद्वात्मक मेल बुद्ध में दिखता है।) हेगेल के वास्तविक पूर्ववर्ती प्लेटो हैं।


द्वंद्वात्मक भौतिकवाद यांत्रिक भौतिरवाद को चुनौती देता है तथा तब्दील करता है। चेतना भौतिक परिस्थितियों का परिणाम है और बदली चेतना बदली परिस्थितियों का लेकिन परिस्थितियां अपने आप नहीं बदलती बल्कि मनुष्य का चैतन्य प्रयास उसे बदलता है। अतः सत्य द्वंद्वात्मक है तथा भौतिकता उसका अंश है समग्रता नहीं, समग्रता चेतना के द्वंद्वात्मक मिलन से बनती है।

Monday, August 24, 2020

मार्क्सवाद 225 (वामपंथ)

 कोई वामपंथी मनोवैज्ञानिक कारणों से नहीं, अध्ययन एवं चिंतन-मनन के आधार पर समाज के अंतविरोधों की वैज्ञानिक समझ के आधार पर बनता है क्योंकि उसे शोषण-दमन और भेदभाव की व्यवस्था अनुचित और अमानवीय लगती है। यह उसी तरह है जैसे बहुत से पुलिस मर्दवादी समाज की समुचित समझ के चलते स्त्रीवादी बन जाते हैं। मैंने 1987 में एक पेपर लिखा, "Woman's Question in communal Ideologies: A Study into the ideologies of RSS and Jamat-e-Islami". प्रशंसा के ज्यादातरकर पत्र, खासकर विदेशों से, Dear Ms. Mishra के संबोधन से थे। मैं जवाब "Incidently, I am a man" से शुरू करता था। यदि आप मर्दवादी समाज की विडंबनाएं और स्त्रियों के अधिकारों के तर्क समझ सकते हैं तो बिना स्त्री हुए स्त्रीवादी हो सकते हैं। जहां तक वामपंथी के आर्थिक अस्मिता का सवाल है तो एंगेल्स जैसे अपवादों को छोड़कर, ज्यादातप @मोटे तौर पर श्रमिक वर्ग से ही होते हैं। जो भी श्रम (बोद्धिक या भौतिक) बेचकर आजीविका कमाता है वह श्रमिक ही है। एक प्रोफेसर मजदूर ही होता है। लेखक भी मजदूर होता है, इसलिए नहीं कि वह विचार की रचना करता है, बल्कि इसलिए कि वह प्रकाशक के लिए अतिरिक्त मूल्य (surplus value) पैदा करता है जिसे वह मुनाफे के रूपमें उगाहता है। मैंने लंबे समय तक कलम की मजदूरी से ही घर चलाया। ज्यादा मजदूरी पाने वाले मजदूर शासक वर्ग का हिस्सा होने का मुगालता पालते हैं, उन्हें, लैटिन अमेरिका में साम्रज्यवाद के दलालों के लिए गढ़े एंडी गुंटर फ्रैंक की लंपट बुर्जुआ की कोटि में रखा जा सकता है। मेरी कोई बात बुरी लगी हो तो क्षमाप्रार्थी हूं।

Sunday, August 23, 2020

शिक्षा और ज्ञान 296(बाबर)

मुगल (बाबर का) आक्रमण तो दिल्ली सल्तनत (इब्राहिम लोदी) पर हुआ था तब ज्ञान की संस्कृत और फारसी की दो परंपराएं थीं। विदेशी आक्रमण (मौर्य काल के बाद शक-हूंणों की बात छोड़कर) और शासन तो मुगलों के आने से लगभग 500 साल पहले से शुरू हो गए थे। तब से लेकर अंग्रेज शासकों तक चंद विदेशी विजय से विशाल जनसमुदाय पर सत्ता स्थापित करते रहे जिसके आंतरिक कारण ज्यादा महत्वपूर्ण हैं। मेवाड़ को छोड़कर राजपुताने की सारी रियासतें अकबर की अधीनस्थ सहयोगी थीं। अकबर के बाद जहांगीर अयोग्य शासक था जिसने अकबर के दरबार के सभी विद्वानों एवं रणनीतिकारों को दरकिनार कर दिया और मुगल शासन का पतन शुरू हो गया जो 17वीं शताब्दी तक इतना कमजोर हो गया कि बनियों की एक कंपनी ने यहीं के लूट के संसाधनों से यहीं के लोगों की सेना बनाकर उसे अधीनस्थ बना लिया। यदि प्राचीनकाल से अब तक इतिहास पर नजर डालें तो देखते हैं कि किसी समाज के बौद्धिक, आर्थ्क एवं सामरिक विकास परस्पर समानुपाती होते हैं। 16वीं शताब्दी तक इंगलैंड यूरोप में हाशिए का नगण्य महत्व का देश था। दसवीं-ग्यारहवीं शताब्दी तक हमारा समाज राजनैतिक रूप से बिखंडित तथा बौद्धिक विकास की दृष्टि से कमजोर समाज था जिसमें शिक्षा के जरिए इतिहास एवं ज्ञान के मिथकीकरण की अपनी भूमिका थी। मुगल काल के अंतिम चरण में सामाजिक-बौद्धिक क्षरण के परिणाम स्वरूप अंग्रेज उपनिवेशवादी हमें गुलाम बना सके। शिक्षा के प्रसार से स्वतंत्रता की चेतना का विकास हुआ और परिणाम स्वरूप उपनिवेशवाद का अंत। औपनिवेशिक शासक जाते जाते देश का बंटवारा करने और सांप्रदायिकता का विषवृक्ष रोपने में सफल रहे जिसमें नवउदारवादी गुलामी के फल लगना शुरू हो गए हैं। अशिक्षा और कुशिक्षा के मंसूबों वाला हाल ही में कैबिनेट से मंजूर राष्ट्रीय शिक्षा नीति का दस्तावेज उसी का ब्लूप्रिंट है। 2015 में भारत सरकार ने 1995 के विश्वबैंक के गैट्स के जिस मसौदे पर दस्तखत किया है, उसमें शिक्षा और कृषि को व्यापारिक सेवा (ट्रेडेबल सर्विसेज) के रूप में शामिल किया गया है। अब विवि अनुदान आयोग कि जगह उच्च शिक्षा वित्तीय एजेंसी की स्थापना का प्रावधान है। सरकार अब विश्वविद्यालयों को अनुदान नहीं, उधार देगी जिसे उन्हें किश्तों में लौटाना होगा और विश्वविद्यालय फीस बढ़ाकर ही ऐसा कर सकता है।

बाकी बाद में......

Saturday, August 22, 2020

प्लेटो का कम्यून

 प्लेटो के रिपब्लिक में शासक वर्गों के लिए कम्यून की व्यवस्था का प्रावधान है जिसमें किसी का निजी परिवार नहीं होगा। स्त्री-पुरुष के समागम का उद्देश्य संतानोपत्ति था तथा जोड़े का चुनाव राजा लॉटरी द्वारा करता था। समागम जब-तब नहीं बल्कि शुभ मुहूर्त में होता था। उसका मानना था कि योग्य स्त्री-पुरुष के समागम से योग्य संतानें पैदा होती हैं, इसलिए राजा को सलाह देता है कि लॉटरी में हेरा फेरी करके जोड़ों का चयन इस प्रकार करे कि योग्य स्त्री-पुरुषों का समागम अधिक-ससे अधिक हो और अयोग्य का कम-से-कम। लॉटरी यानि भाग्य का मामला है तो कोई शिकायत नहीं कर सकता। मां का अपने बच्चे से स्तनपान का ही संबंध रहेगा। पैदा होते ही सब बच्चों को राज्य पोषित-नियंत्रित नर्सरी में डाल दिया जाएगा जहां प्रशिक्षित दाइयां उनका देखभाल करेंगी। कोई न किसी का मां/बाप होगी/होगा न कोई किसी का बेटा/बेटी। सारे स्त्री-पुरुष सभी बच्चों के मां-बाप होंगे और सभी बच्चे सबके बेटा-बेटी और आपस में सब भाई-बहन। उसका चेला उसके परिवार के साम्यवाद की आलोचना में कहता है कि सैकड़ों सगे-भाई बहनों से बेहतर है दूर के एकाध-भाई-बहन। मुझे इस व्यवस्था में यदि युगलबंदी राज्य नियंत्रि न हो तो यह वांछनीय लगती है। जो बच्चे राज्य-नियंत्रित समागम से बाहर की पैदाइश होंगे या अयोग्य होंगे उनकी जिम्मेदारी राज्य की नहीं होगी, उन्हें या तो कहीं किसी अंधेरे कोने में गाड़ दिया जाएगा या निम्न वर्गों के परिवारों को दे दिया जाएगा। (परिवार नियोजन की अनूठी तजबीज)। प्लेटो के आदर्श राज्य में श्रमविभाजन वर्णाश्रम व्यवस्था की अनुकृति है। समाजवाद के पहले चरण में बच्चों की देखभाल की जिम्मेदारी समाज की होगी क्यों कि बच्चे समाज की संपदा होते हैं तथा समाज के समुचित विकास के लिए स्त्री-पुरुष दोनों की सर्जक उत्पादकता की आवश्यकता होगी। वैसे प्लेटो का आदर्श राज्य कभी ठोस रूप नहीं ले सका, इसीलिए इसे यूटोपिया कहा जाता है, वैसे भविष्य की आदर्श व्यवस्था की अवधारणा वर्तमान की व्यवहारिक सीमाओं से परे होती है। वैसे फिलहाल परिवार कितनी भी प्रतिक्रियावादी व्यवस्था क्यों न हो लेखिन इसकी समाप्ति अभी अव्यवहारिक है लेकिन इसके जनतांत्रिककरण से इसकी बेहतरी न केवल संभव है बल्कि वांछनीय भी।

Thursday, August 20, 2020

फुटनोट 240 (कलान चौराहा)

 हाईस्कूल और इंटर में पढ़ते हुए ट्रेन पकड़ने बिलवाई स्टेसन के रास्ते में कलान चैराहे पर चाय पीते जाते थे। तब उसे बिलवाई चौराहा ही कहा जाता था। बिलवाई बाजार वहां से एक-डेढ़ किमी उत्तर है और बिलवाई स्टेसन डेढ़-दो किमी पश्चिम।ग्राम-समाज की जमीन में कलान के एक ठाकुर ने चंदे से एक स्कूल बनवाया थो जो अब पीजी कॉलेज बन चुका है।स्कूल के हेड मास्टर हमारे गांव के बगल के गांव के राम सूरत सिंह थे, वे वहां से छोड़कर अपने गांव की ग्रामसमाज की जमीन पर चंदा करके स्कूल बनवाया, तब हम इलाहाबाद पढ़ते थे, स्टेसन जाते समय कभी कभी गणित का एक कलास लेते जाते थे। वह स्कूल भी अब डिग्री कॉलेज बन गया है। संस्थापक राम सूरत सिंह तो अब रहे नहीं, उनके पिताजी के परोक्ष नाम पर कॉलेज अभी भी है। उनके पिताजी का नाम राम सेवक सिंह था, स्कूल का नाम उन्होंने जनसेवक विद्यालय रखा था।

बेतरतीब 78 (बचपन 16)

 बेतरतीब 78 (बचपन 16)

परिचय (भाग 2)

परिचय की पिछली किश्त में गांव में स्कूल की शिक्षा का जिक्र किया था। मेरा गांव तो आजमगढ़ जिले में पड़ता था, लेकिन आज़मगढ़ शहर से बहुत दूर, यातायात के सीधे संपर्क के बिना। मैं आजमगढ़ शहर पहली बार 1974 में गया था और दूसरी बार 2008 में, यात्राओं के कारणों के विस्तार में जाने की यहां गुंजाइश नहीं है। मेरा गांव एक छोटी सी नदी मझुई के किनारे है जो हमारे बचपन में बारमासी प्रवाहमय थी तथा नहाने के घाटों पर मई-जून में भी बहुत गहराई तक पानी रहता था। 5-6 साल तक पहुंचते-पहुंचते सारे लड़के-लड़कियां तैरना सीख जाते थे। खैर जिन गांवों में नदी नहीं थी वहां के बच्चे तालाब में तैरना सीख लेते थे। सितंबर-अक्टूबर तक नाव चलती थी, उसके बाद बांस के पायों पर चह (कच्चा पुल) बन जाती थी। हम बच्चे कई बार सूर्यास्त के बाद उल्टी धारा में नाव कुछ दूर ले जाते थे और वापस धारा के साथ बहने को छोड़कर गाते-गप्पियाते वापस आते थे। एकाधबार डांट भी खा लेते थे। मझुई 20-25 किमी दूर दुर्बासा नामक तीर्थस्थान पर टौंस नदी में मिल जाती है जो आजमगढ़ होते हुए बलिया (या गाजीपुर) जिले में गंगा में मिलती है। दुर्बासा के बारे में कहा जाता है कि वहीं नदीमें विष्णु के चक्र-सुदर्शन ने क्रोधी दुर्बासा ऋषि के सिर को फाड़ा था। वहां कार्तिक की एकादशी (या पूर्णिमा) को बहुत बड़ा मेला लगता है। मैं उस मेले में पहली और अंतिम बार बचपन में गया था और खो गया था, जो कहानी फिर कभी (मेरे ब्लॉग में है, कमेंट बॉक्स में शेयर करूंगा)। नदी इस पार मेरा गांव आजमगढ़ में पड़ता है और उस पार फैजाबाद (अब अंबेडकर नगर)। नदी पार घना जंगल था हम लोग समूह में शाम को दिशा-मैदान उस पार जाते थे। उस पार वालों से कहते थे कि हम रहते आजमगढ़ में हैं और टट्टी-पेशाब करने फैजाबाद में जाते हैं। गांव से नजदीक दो बाजारें थीं -- 2-3 किमी पश्चिम-दक्खिन मिल्कीपुर (आजमगढ़ जिले में) तथा 2-3 किमी उत्तर-पूर्व परकौली (फैजाबाद जिले में)। 6 मील दूर एक जगह है बिलवाई जो 4 जिलों की सीमा पर पड़ता है। बिलवाई गांव आजमगढ़ में पड़ता है, बाजार जौनपुर में, शिवमंदिर (जहां शिरात्रि को बहुत बड़ा मेला लगता है), फैजाबाद में तथा बिलवाई स्टेसन (बीबीगंज) सुल्तानपुर में। चुनाव के सीजन में मेला पड़ने पर वहां 4 प्रत्याशियों के तंबू लगते हैं। 1967 तक जब संसद-विधानसभा के चुनाव साथ होते थे तब 8 के। सोचा था बचपन के गांव के अर्थव्यवस्था, सांस्कृतिक समाजशास्त्र तथा इतिहास के बारे में बात करूंगा, लेकिन भूगोल पर ज्यादा समय खर्च हो गया, उनके बारे अगले भाग में। यह किश्त इस बात से खत्म करता हूं कि नवीं क्लास में पढ़ने शहर जाने के बाद हर रविवार को अपने गांव से 7 मील दूर बिलवाई स्टेसन पैदल ट्रेन पकड़ने आता था और हर शनिवार रात स्टेसन से घर। वेसे स्टेसन वास्तव में एक दूसरे गांव-बाजार बीबीगंज में पड़ता था लेकिन नाम बिलवाई था। छोटा नाम बड़े में समाहित हो जाता है। स्टेसन से घर तक की शनिवारी रात्रि यात्राओं नामी-गिरामी भूतों से मुठभेड़ और भूत-प्रेत के भय से मुक्ति की कहानी भी अगले भाग में। सादर।