Friday, March 6, 2020

लल्ला पुराण 265 (बाभन से इंसान)

जितने भी दो पाया जीव हैं, सब में इंसान बनने की संभावनाएं हैं, उसके लिए मनुष्य की प्रजाति-विशिष्ट प्रवृत्ति विवेक के इस्तेमाल की जरूरत होती है, यही प्रवृत्ति मनुष्य को पशुकुल से अलग करती है। विवेक के इस्तेमाल से पता चल जाता है कि कौन कहां पैदा हो गया (बाभन, भूमिहार, अहीर, दलित, शेख, धुनिया, जुलाहा.... परिवार में) यह महज जीववैज्ञानिक संयोग (दुर्घटना) का परिणाम है, व्यक्तित्व की संरचना इस संयोग का नहीं बल्कि समाजीकरण का परिणाम है। इस जीववैज्ञानिक संयोग की अस्मिता (बाभन, दलित, ... यानि हिंदू; शेख, धुनिया, दर्जी... यानि मुसलमान) से ऊपर उठकर कोई भी विवेकशील इंसान बन सकता है, वरना जातिवाद और सांप्रदायिकता की मिथ्या चेतना में फँसा रहता है। वर्ग विभाजित समाज में व्यक्तित्व भी विभाजित (स्प्लिट) होता है। हर व्यक्ति के अंदर दो बोध होते हैं -- स्स का स्वार्थ-बोध (Self's sense of self interest) और स्व का न्याय-बोध या परमार्थ-बोध (self's sense of right or justice)। स्व के स्वार्थ-बोध पर स्व के न्याय-बोध को तरजीह देने में वास्तविक सुख है तथा स्व के न्याय-बोध पर स्व के स्वार्थ-बोध को तरजीह देने में सुख का भ्रम मिलता है। ब्राह्मण ( फलस्वरूप हिंदू) हित (स्वार्थ-बोध) का पोषण खुशी की खुशफहमी देता है तथा इससे ऊपर उठकर मानवता के हित का पोषण वास्तविक खुशी। मैं अपने औपचारिक अनौपचारिक स्टूडेंट्स को कहता हूं कि यदि स्व-हित का तार्किक आकलन करोगे तो पाओगे कि सिद्धांतनिष्ठ जीवन में भ्रष्ट जीवन की तुलना में ज्यादा फायदा है। ज्यादातर लोग सुख की खुशफहमी के चक्कर में वास्तविक सुख से वंचित रह जाते हैं। मैं यहां ही नहीं, अपने विस्तारित खानदान समेत ज्यादा जगहों पर मिसफिट ही रहता हूं। अल्पमत में होना गलत होना नहीं होता।

लल्ला पुराण 264 (दिल्ली दंगे)

आप के दिमाग में सांप्रदायिक नफरत का इतना जबहर भरा है कि आपकी बर्बर अमानवीय संवेदना पर आश्चर्य नहीं होता, हिंदू को मार कर पोस्ट करें। यह दंगा नहींथा एकतरफा प्रायोजित जनसंहार था, कभी इलाकेमें जाकर देखिए। आप नख-शिख सांप्रदायिक पहले से हैं आपकोऔर सांप्रदायिक कौन बना सकता है? यह जनसत्ता की खबर है जो न मुस्लिम है न वामपंथी। हम हमेशा हर दरिंदगी के खिलाफ लिखते हैं, संघी-मुसंघी दोनों दरिंदे मौसेरे हैं। हिंदू-मुसलमान से ऊपर उठकर इंसान बन कर देखिएतो आपको हमारी बात एकतरफा नहीं लगेगी। जो हम नहीं लिखते उसे आप लिखें। जो लिखा हो उस पर भी कभी दिमाग का इस्तेमाल करें, वही मनुष्य को पशुकुल सेअलग करता है। दफनाने की बजाय एक 85 साल की बुढ़िया को जलाकर उसे मोक्ष दोकर जो उपकार आपने मानवता पर किया है उसे इतिहास याद रखेगा। अब से आपके भजन का संज्ञान लेना बंद।

Arvind Rai पढ़ाए तो नहीं हैं, सोहबत का कुछ असर पड़ता होगा। हमनेतो अपनी बेटियों को भी नहीं पढ़ाया, 2012 के बलात्कार विरोधी प्रदर्शन में नारे लगाते उसकी तस्वीर हिंदुस्तान टाइम्स समेत कई अखबारों ने छापा था, मैंने शेयर भी किया था। विजय बाजपेयी से शाहीन बाग में मिलकर ज्यादा खुशी हुई कि डीपीएस जैसे स्कूलोंके लड़के भी धरना-प्रदर्शम में जाते हैं। इलाहाबाद की जो लड़की (महिला) मिली उसे तो कक्षा 9-10 में पढ़ाया था, वामपंथ के बारे में भी खास नहीं जानता था समाजीकरण से प्राप्त कही-सुनी बातों के अलावा।

Uday Bhan Dwivedi मेरे सारे छात्र प्रदर्शनकारी तो नहीं है, ये दोनों तो मेरे छात्र जीवन के मेरे गणित के छात्र थे। लेकिन शिक्षक चाहे तो छात्रों पर अच्छी छाप छोड़ सकता है, प्रवचन से नहीं, व्यवहार से। मैं रोब से कहता हूं, my students shall be different among their likes and exceptions only prove the rule. मेरा एक स्टूडेंट यूपी कैडर का आईपीएस है, आजकल नोएडामें पोस्टेड है, उसके पिता राजगीर हैं। कई उप्र न्यायिक और प्रशासनिक एवं अन्य राज्य सेवाओं में हैं।

Thursday, March 5, 2020

International Proletariat 69 (Chavez)

Many brain dead Americans who were taught by the capitalist media to hate him will cheer. Despite being repeatedly elected by the Venezuelan people, the propagandists of U.S. imperialism portrayed Chavez as a dictator. This is just another typical lie of U.S. imperialism.

Hugo Chavez stood up to U.S. imperialism in limited ways that included refusing to privatize Venezuelan oil and spending some of that oil money on the needs Venezuelan people. This cut into imperialist profit. As a result, the United States helped organize a coup in 2002 that installed a capitalist dictatorship and no doubt would have killed Chavez and much of the leftist opposition, as CIA organized coups have a tradition of doing in Latin America. Yet, that didn't happen because the Venezuelan people rose up, splitting the military rank and file from the military brass. In the end, the military brass knew that they had lost their grip on power and that there would have been a revolution if they didn't bring Chavez back. So they did.

The people had won against U.S. imposed tyranny. Yet the fact that Hugo Chavez never tried to abolish the capitalist state or the capitalist system has kept the limited gains won through his leadership in a precarious position. Those gains must be defended against U.S. imperialism and the Venezuelan capitalist class as those enemies of humanity will try to use Chavez's death to push Venezuela backwards.

Yet, Venezuela needs far more than Chavez's reforms of an otherwise capitalist system, Venezuela needs a proletarian revolution that socializes the economy and smashes the capitalist state. A revolution which among other things will include eliminating the abusive capitalist police forces and guaranteeing full employment, housing, education, and health care.

U.S. Hands Off Venezuela!
Defend the Gains Won Under Chavez!
Smash the Capitalist State!
Forward to Workers Power and a Socialist Economy in Venezuela!
End U.S. Imperialism Through Socialist Revolution in the United States!

06.03.2013

शिक्षा और ज्ञान 272 (जेएनयू)

मद्रास आईआईटी में फुले-अंबेडकर स्टडी सर्कल पर प्रतिबंध से शुरू हुआ उच्च शिक्षा संस्थानों पर भगवा हमला सर्वव्यापी होता जा रहा है. हैदराबाद, जेयनयू, इलाहाबाद, बीयचयू......... बीयचयू के 6 छात्रों के निष्कासन की खबर की वहां के एक छात्र की पोस्ट पर अपना कमेंट शेयर कर रहा हूं.

गीदड़ की मौत आती है तो शहर की तरफ भागता है, फासीवादी विश्वविद्यालय की तरफ. विचारों से भयभीत तानाशाह विश्वविद्यालयों पर हमला करता है.आआईटी, मद्रास, हैदराबाद, जेयनयू, इलाहाबाद,अब बीयचयू. लेकिन जानता नहीं कि युवा उमंगे दबती नहीं, उफान लेती हैं तथा इतिहास रचती हैं. उठो मेरे युवा साथियों, काहिवि की संघर्षों के क्रांतिकारी इतिहास की विरासत को जीवंत करो. निष्कासन परिसर में भय का आलम पैदा करने का तथा व्यक्तिगत प्रशासन का ब्रह्मास्त्र होता है. ज़ुल्म से डरो मत मेरे युवा साथियों, ज़ालिम को डराओ, डरना बंद करके. गोरख पांडे की कविता है कि वे डरते हैं कि निहत्थे लोग डरना न बंद कर दें. जेयनयू के छात्रों ने नया नारा दिया है, पढ़ने के लिए लड़ो, ज़ुल्म से लड़ने के लिए पढ़ो. क्योकि निर्भीकता आजादी की शर्त है, भयभीत व्यक्ति आज़ादी के आनंद का गुरुत्व नहीं समझ सकता. क्या कर लेगा वीसी? निकाल देगा? कितनों को निकालेगा? सर भी बहुत बाजू भी बहुत कटते भी चलो, बढ़ते भी चलो, चलते भी चलो कि अब डेरे मंज़िल पर ही डाले जायेंगे. युवा उमंगों से तूफान खड़ा कर दो, लेकिन एबीवीपी की तरह लंपटता से नहीं, जेयनयू की तरह प्रज्ञा से. नया इतिहास रचने का अवसर है. पूरा मुल्क जेयनयू में तब्दील कर दो. आकाश को जयभीम-लाल सलाम के नारों से भर दो. निष्कासित, बहादुर साथियों को लाल सलाम. मैं भी एक आंदोलन में सिरकत के लिए मॉफी न मांगने के लिए जेयनयू से निष्कासित हुआ था, जिसे मैं तमगा समझता हूं. वे चाहते हैं आप रहें लेकिन मॉफी मांगकर, जियें लेकिन सर झुकाकर. सिर उठा कर जीने की शक्ति तथा सुख निष्कासन के कष्ट पर भारी पड़ा. सभी भेदभाव भूलकर 6 छात्रों के निष्कासन से कैंपस को भयभीत करने की साज़िश को नाकाम करने के लिए युवा उमंगों का सैलाब खड़ा कर दो, इतिहास की धार बदल दो. रोहित बेमुला की शहादत से एक सांस्कृतिक क्रांति शुरू हो चुकी है, विवेक तथा आस्था के बीच; तर्क कुतर्क के बीच; विवेक सम्मत संवैधानिक देशभक्ति तथा सांप्रदायिक राष्ट्रोंमाद के बीच; आपको अपना पक्ष चुनना है. जयभीम-लाल सलाम.

06.03.2016

Wednesday, March 4, 2020

लल्ला पुराण 264 (सीएए)

आपकी डर सेकुलर होने के आरोप लगने को है? कम्यूनल छवि पसंद है आपको? मुसलमानों के अंदर डर राज्य प्रायोजित सांप्रदायिक आतंक से बैठना शुरू हो गया था, जिसे इस राष्ट्रव्यापी आंदोलन ने तोड़ना शुरू किया जिस प्रक्रिया को तोड़ने के लिए दिल्ली के गुजरातीकरण की कोशिस की गयी। कागज का डर मुसलमानों से अधिक गरीबों, मजदूरों और आदिवासियों में है। सीएए का विरोध आसाम से शुरू हुआ. वहां 'क्रांतिवादी' नहीं आम आदमी आंदोलित था और है। सरकार की अनुकंपा से पुलिस ही सबसे बड़ी अतिवादी ताकत बन गयी है।

हमारा समाजीकरण हमारे मन में, अनुभवहीनता के चलते, तमाम तरह के आधारहीन पूर्वाग्रह भर देता है। मुसलमान लड़कों से दोस्ती तो थी, लेकिन खान-पान के बारे में गहरे पूर्वग्रह थे। पता नहीं क्या खाते होंगे। कक्षा 10 में मेरा एक सहपाठी था अरशद मजीद, अच्छा दोस्त था। उसके बड़े भाई रोडवेज में अधिकारी थे, जौनपुर में उन्हीं के सा रहता एक दिन उसके चला गया उसकी भाभी कुच खाने को बनाने गयी। जब तक वह सिंघाड़े की स्वादिस्ट पकौड़ी बनाकर ले आई तब तक मेरी जान ऊपर-नीचे हो रही थी कि ये लोग पता नहीं क्या खाते होंगे। खाकर जान में जान आई कि ये लोग भी हमारी ही तरह खाते-पीते हैं। जातीय-धार्मिक पूर्वाग्रह कटने के ई रोचक अनुभव हैं . कभी शेयर करूंगा।

हमारा समाजीकरण हमारे मन में, अनुभवहीनता के चलते, तमाम तरह के आधारहीन पूर्वाग्रह भर देता है। मुसलमान लड़कों से दोस्ती तो थी, लेकिन खान-पान के बारे में गहरे पूर्वग्रह थे। पता नहीं क्या खाते होंगे। कक्षा 10 में मेरा एक सहपाठी था अरशद मजीद, अच्छा दोस्त था। उसके बड़े भाई रोडवेज में अधिकारी थे, जौनपुर में उन्हीं के सा रहता एक दिन उसके चला गया उसकी भाभी कुच खाने को बनाने गयी। जब तक वह सिंघाड़े की स्वादिस्ट पकौड़ी बनाकर ले आई तब तक मेरी जान ऊपर-नीचे हो रही थी कि ये लोग पता नहीं क्या खाते होंगे। खाकर जान में जान आई कि ये लोग भी हमारी ही तरह खाते-पीते हैं। जातीय-धार्मिक पूर्वाग्रह कटने के ई रोचक अनुभव हैं . कभी शेयर करूंगा।

Ashish Kumar हम तो जिन शहरों में रहे हैं वहां सारे गुंडे ब्राह्मंण, भूमिहार, राजपूत या यादव ही रहे हैं। आपकेदिमाग में बचपनसे भरा सांप्रदायिक जहर आपकोइस्लामोफोबिया का मरीज बना दिया है। हम जब पढ़तेथे तो पूर्वी उप्र सबसे बड़े गुंडे वीरेंद्र शाही और हरिशंकर तिवारी थे।

लल्ला पुराण 263 (वाम)

Satish Pandey महेंद्र बहुत अछा काम कर रहे हैं, अगर आप के मित्र रहे हैं तो आपको उनपर गर्व होना चाहिए. अगर उनकी मिशाल से आपको उनकी विचारधारा से चिढ़ हो गयी है तो आपका दुर्भाग्य है, और कुछ नहीं कहूंगा। पिछले रविवार को हमारे साथ एक मीटिंग में थे और हम लोग साथ ही शाहीन बाग गए थे। आपके बाकी मित्र तो शायद रोजी-रोटी के अलावा हिंदू-मुसलमान कर रहे होंगे, महेंद्र बहुत महत्वाकांक्षी और राष्ट्रीय महत्व का काम कर रहे हैं, मेरे बहुत ही प्रिय हैं। उनका यह लेख पढ़ें। मैं स्वास्थ्य की वजह से जनचौक के लिए ज्यादा योगदान नहीं दे पा रहा हूं।

Sunday, March 1, 2020

बेतरतीब 61(शाहीन बाग)

आज शाहीन बाग में 4-5 घंटे बहुत अच्छे बीते, धारा 144 की वजह से आज माइक का इस्तेमाल नहीं हो रहा था तो सब क्रांतिकारी गाने गा रही थीं। यह मेरी छठी-सातवीं यात्रा थी। आज आंदोलन से एकजुटता दिखाने इफ्टू तथा कुछ अन्य ट्रेड यूनियनों के लोग लुबह से उनकेसाथ थे। इफ्टू की अध्यक्ष डॉ. अपर्णा, डॉ अनिमेश, डॉ. मृगांक इतिहासकार एवं नारीवादी प्रो. उमा चक्रवर्ती, दिल्ली की पूर्व मंत्री प्रो. किरण वालिया, डूटा की पूर्व अध्यक्ष प्रो. नंदिता नारायण सभी गानों और नारों में इनके साथ ऐसे हिल-मिल कर साथ दे रहे थे कि इनकी सरलता इनकी असाधरणता बन गयी थी। इनकी लाइब्रेरी में समयांतर में छपे शाहीन बाग पर मेरे लेख की दर्जन से अधिक फोटो कॉपियां बुक सेल्फ में लगी थीं। मेरे कई छात्र-छाीत्राएं ( औपचारिक तथा अनौपचारिक) मिले, आंदोलनोंमें अपने बच्चों से मुलाकात सुखद होती है। हम लोग बात कर रहे थे कि आंदोलन वापस होने के बाद इन महिलाओं की चेतना तो अब पीछे नहीं जाएगी। नए नारे, नए गीत, नया नव जागरण। सात्यकी दिवि में फीजिक्स का प्रो. था अब मेघनाथ शाहा इंस्टीट्यूट ऑफ न्यक्लियर फीजिक्स कलकत्ता में है, वहां से आया था। आज की इस यात्रा के बारे में फिर लिखूंगा। लाइब्रेरी में एक नारा लिखाथा, जेएनयू आंदोलन (2016) से निकला नारा, 'लड़ो पढ़ाई करने को, पढ़ो समाज बदलने को'।