Sunday, October 9, 2016

सियासत 21

छल-कपट से हासिल फ़तह का महिमा-मंडन मानव सभ्यता के इतिहास का अभिन्न अंग रहा है जो प्राकांतर से शासक वर्गों द्वारा आत्म महिमामंडन है. सभ्यता यानि वर्ग समाज के राजनैतिक दर्शन का इतिहास सत्ता और वर्चस्व के लिए छल-कपट और उसके प्रत्यक्ष परोक्ष महिमामंडन का इतिहास रहा है. चौथी-तीसरी शताब्दी (ईशा पूर्व) कौटिल्य के अर्थशास्त्र में राजा के लिए इसे अपद्धर्म के रूप में वांछनीय बताया गया है तो यूरोपीय नवजागरण (15वीं-16वीं शताब्दी) के राजनैतिक दार्शनिक मैक्यावली इसे अपरिहार्य रूप से वाछनीय शासकीय सत्-गुण बताते हैं. लोग अपने-अपने नायक चुनते हैं और उनके कृत्य-कुकृत्यों का महिमामंडन करते हैं. दोनों ही युद्ध से सत्ता स्थापित करने वाले राजा को सलाह देते हैं की धार्मिक-रीत-रिवाज, धर्मांधता और अंधविश्वास कितने ही कुतर्कपूर्ण और पाखंडमय क्यों न हों, न सिर्फ उनके साथ छेड़-छाड़ नहीं करना चाहिए, बल्कि उनकी निरंतरता सुनिश्चित करनी चाहिए. कौटिल्य अपद्धर्म के रूप में धार्मिक अंधविश्वासों तथा चमात्कारों और देववाणी मे लोगों की अंध आस्था के राजनैतिक आर्थिक-राजनैतिक दोहन सलाह देते हैं उसकेलिए चाहे कुछ "अविश्वासियों" को चपकाना ही क्यों न पड़े. उन्ही का समकालीन पूर्ववर्ती अरस्तू, विद्रोह रोकने के लिए निरंकुश राजा को अत्यधिक धार्मिकता का ढोंग करने तथा पूजा-पाठ और बलि में सबसे आगे रहने की सलाह देते है. इससे लोगों गलतफहमी होगी कि ईश्वर का इतना बड़ा भक्त बुरा नहीं हो सकता और दूसरे यह कि लोगों को लगेगा कि जब देवतागण उसके साथ हैं तो उसके विरुद्ध विद्रोह कामयाब नहीं हो सकता. मैक्यावली लोगों को संगठित रूप वफादार बनाए रखने के लिए धर्म को एक कारगर राजनैतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की राजा को सलाह देता है. अलग अलग देश-काल के इन दार्शनकों की सलाह आज के राजनेता कितनी तत्परता से मानते हैं, भारत की आधुनिक राजनीति उसका ज्वलंत उदाहरण है. माफी चाहता हूं, लिखना बालि-राम प्रकरण पर 2 लाइनें चाहता था, कलम की आवारगी से विषयांतर हो गया.

Saturday, October 8, 2016

बेतरतीब 12 (पुनश्च 4)

पुनश्च 4:
इस चौथे और संभवत: आखिरी पुनश्च के बिना कहानी अधूरी रह जाएगी. तमाम लोग, खासकर ‘बड़े’ लोग एक अज्ञात, अदृश्य, अमूर्त भय से आक्रांत रहते हैं. मेरे लिए यह मानव इतिहास की एक अबूझ  पहेली सी है. विश्वविद्यालय और हॉस्टल से बेदखली के बाद भी मैं परिसर में ही रहता था. जेयनयू में पढ़ते हुए  1981 से मैं डीपीयस (आरकेपुरम्) में पढ़ाता भी था. दोपर में छुट्टी के बाद मैं या तो 620 (बस नं.) लेकर तीनमूर्ति लाइब्रेरी चला जाता था या उल्टी 620 लेकर जेयनयू. कुलपति, प्रोफेसर पीयन श्रीवास्तव के साथ ‘असफल वार्ता’ के कुछ दिनों बाद की बात है. उस दिन मैं संयोग से जेयनयू आ गया था. जाड़े की शुरुआत थी.पुरानी सोसल साइंस बिल्डिंग से सटे फ्रांसिस के ढाबे से खाना खाकर, हम (मैं और चंदू – चंद्रमोहन तिवारी, अल्मोड़ा में वकील) प्रशासनिक ब्लॉक की चाय की दुकान से चाय लेकर फ्ररंट लॉन में बैठ गए. प्रशासनिक ब्लॉक का लॉन होने के नाते ज्यादा हर-भरा रहता था तथा उस वक़्त हरी घास के लंबे टुकड़े पर पड़ते तिरछे धूप के सुनहरे टुकड़ों से और सुंदर हो गया था. हम लोग जेयनयू बस से अगले दिन भीष्म साहनी का नाटक कविरा खड़ा बाजार में देखने श्रीराम सेंटर जाने की योजना बना कर भीष्म साहनी से शुरू कर बंटवारे और मंटो की कहानियों पर बात कर रहे थे. तभी देखा प्रो. श्रीवास्तव बिल्डिंग में प्रवेश कर रहे थे. खड़े होकर सलाम ठोंकने का वक्त नहीं था, से बैठे-बैठे ही ठोंक दिया. वे मन-ही-मन कुछ कहते हुए अंदर चले गए. हमने कल्पना भी न की थी कि वे पुलिस बुला लेंगे. जो कुछ हो रहा था उसमें अदम गोंडवी याद आए, “हमने अदब से हाथ उठाया सलाम को/उनको लगा कि खतरा है निज़ाम को.” हमें अंदाज होता तो पुलिस आने के पहले ही अप कैंपस चले जाते. खैर ये होता तो वो होता निरर्थक आलाप है. मुझे याद है हम उस समय मंटो की टोबा टेक सिंह कहानी के बंटवारे के संदर्भ में टोबा टेक सिंह के चरित्र के निहितार्थ पर बात कर रहे थे. जब 12-15 पुलिस वाले हमारी तरफ आते दिखे.
पता चला कि कुलपति महोदय ने अपने ऑफिस के पास एक खतरनाक नक्सली की मौजूदगी की शिकायत की जिसके ऊपर विवि ने कई मामले दायर कर रखा है. इंस्पेक्टर ने इतना ही बताया था. मुझे समझ नहीं आ रहा था कि उनके रास्ते में दिखने की मेरी जुर्रत उन्हें नागवार लगी और मुझे पाठ पढ़ाने का फैसला किया? या फिर मेरी उपस्थिति से उन्हें कुछ असुरक्षा या खतरे का भय हुआ हो? या फिर सर उठाकर रहने वाले लोगों पर उनका संचित गुस्सा था? जो भी हो, उनकी यह हरकत कायराना और बेवकूफी की थी. कायराना इसलिए कि सत्ता के इस्तेमाल से हमें डराना चाहा. बेवकूफी की इसलिए कि उसे भी मालुम था कि अगले दिन जमानत पर छूट ही जाऊंगा, हम रात भर की पुलिस हिरासत से टूटने वाले तत्व के बने नहीं हैं. इंस्पेक्टर ने कहा कि किसी पुराने मामले में पूछ-ताछ के लिए मुझे थाने चलना पड़ेगा, मैं समझ गया इसका मतलब गिरफ्तारी थी. पर्स-बैग सब चंदू को दिया और पुलिस गाड़ी में बैठकर वसंतविहार पुलिस स्टेसन पहुंचा. 15-20 मिनट में 50-60 स्टूडेंट्स वहां पहुंचे. पुलिसवालों ने बताया कि मुझे गिरफ्तार किया जा चुका था. वसंत विहार थाने में हिरासत की व्यवस्था नहीं थी तो मुझे वहां से विनय नगर थाने ले जाया गया. थाने के लोगों का व्यवहार ठीक था तथा उनमें से कुछ की क्लास भी लेने लगा. तभी अमितसेन गुप्ता (जाने-माने पत्रकार, लेखक, आईआईयमसी के पूर्व प्रोफेसर) चारमिनार गोल्ड की सिगरेट पैकेट लेकर मिलने आया. हिरासत के गार्ड मिसने ही नहीं दे रहे थे. किसी एसीपी को संपर्क किया गया तो गार्ड ने कहा कि वह (अमित) ग्रेटर कैलाश का छंटा हुआ गुंडा है. हा हा. बाद में हमलोग यह बात करके खूब हंसते थे. खैर बाद में उसने मिलने दिया और सीलबंद पैकेट कुछ गड़बड़ चीज न हो सिगरेट की पैकेट खोलकर एक निकाल लिया, मैंने कहा यार सिगरेट चाहिए था तो बताते, एक और लेलो. खैर, अमित का वह जेस्चर मैं कभी नहीं भूलूंगा. 3-4 घंटे हम गप्पें करते रहे. वह 2-3 बजे रात को पैदल ही जेयनयू गया.
अगले दिन हथकड़ी लगाकर पुलिस पटियाला हाउस ले जाने को तैयार हुई. उन्हें बस का ही भत्ता मिलता है. मैंने कहा कि मैं एक सम्मानित विवि का सम्मानित निष्कासिक छात्र हूं, मैं हथकड़ी पहनकर बस में नहीं जा सकता. अंत में टैक्सी मंगाई गई. पटियाला हाउस पहुंचते जाने-माने वकील बीके ओहरी की पूरी टीम के साथ जेयनयू के सैकड़ों लड़के-लड़कियों को देखकर सीना चौड़ा हो गया. डाबर साहब(मिजोरम विवि में इतिहास के प्रोफेसर) और सलिल मिश्र (अंबेडकर विवि में इतिहास का प्रोफेसर) मेरे जमानती थे. ओहरी साहब ने जेयनयू के सभी केस न सिर्फ मुफ्त में किये थे बल्कि हमें कोर्ट फीस भी नहीं देने देते थे. प्रभु (प्रभु महापात्र, दिविवि में इतिहास का प्रोफेसर) ने कोर्ट फीस देने की पेशकश की तो ओहरी सहब ने कहा था, “क्यों शर्मिंदा करते हो”. अदालत मे प्रॉक्टर रामेश्वर सिंह को अच्छा पाठ पढ़ाया था ओहरी साहब ने. जमानत के बाद हम सब मंडी हाउस-बंगाली मार्केट घूमते-खाते-पीते जेयनयू की 7 बजे की बस से कैंपस आ गए.
इलाहाबाद विवि में गिरफ्तारियां होती थीं, तारीखें पड़ती थीं, हम नहीं जाते थे और धीरे धीरे केस ‘मर’ जाता था. यहां भी ऐसा ही हुआ तारीख पड़ी और नहीं गया. पता चला गैर जमानती वारंट जारी हो गया है. सलिल और डाबर साहब को भी नोटिस मिल गया. अगली तारीख पर गया. जिस बस में मैं पटियाला हाउस जा रहा था उसी में एक और व्यक्ति जा रहा था. अदालत में जाकर देखा तो वही, नाम भूल गया, चतुर्वेदी जी मामले के जज थे. ओहरी खुद मेरी तरफ से बहस कर रहे थे. जज ने मुझसे पूछा, पिछली तारीख को क्यों नहीं हाजिर हुआ था? मैंने मासूमियत के साथ बोल दिया, “ध्यान से उतर गया था”. मुझे अपने चैंबर में बुलाया और जेयनयू के बारे में कुछ बात-चीत की और मामला खत्म कर दिया. इतनी देर में उनका सेक्रेटरी फैसले की टाइप्ड कॉपी ओहरी को दे दिया.



  

बेतरतीब 12 (पुनश्च 3)

पुनश्च 3:
दर-असल यह पिछले पुनश्च का विषय था लेकिन फुटनोटिंग से विषयांतर के चक्कर में एक पायदान नीचे खिसक गया. जिन लोगों का निष्कासन रद्द हुआ था उनका कहना था कि कुलपति ने स्वतः पुनर्विचार कर उन्हें पंजीकरण की अनुमति दे दी. मैंने सोचा मैं भी एक बार मिल लूं कुलपति महोदय जी से. सो दरवाजा खटखटाकर अंदर चला गया. मुझे देखते ही प्रो. श्रीवास्तव आश्चर्यभाव से मेरी तरफ प्रश्नवाचक मुद्रा में देखने लगे. मैंने यह कर कि “आपसे कुछ बात करने आया हूं”, सामने कि कुर्सी पर बैठ गया. श्रीवास्तवजी मेरे चेहरे को पढ़ने लगे, मैं उनके. उन्हें मेरी जुर्रत पर ताज्जुब हो रहा था. मैं सोचने लगा कि यह आदमी मेरे जैसे सीधे-शरीफ लड़के की शकल देखकर इतना परेशान क्यों हो रहा है. मैं आंदोलन के बारे में सोच रहा था कि हम निर्भय हो एकताबद्ध लड़ते तो जीत सकते थे. मुझे स्पार्टकस उपन्यास में वर्णित, ज़िंदा सलीब पर लटके डैविड और स्पार्टकस के बीच अंतिम संवाद सोच रहा था जब डैविड ने स्पार्टकस से पूछा कि उनसे गलती कहां हुई और स्पार्टकस के गले का फंदा उसके बोलने के पहले ही कस गया. प्रो. श्रीवास्तव मेरी जुर्रत के बारे में सोच रहे होंगे कि मैं मुंह उठाकर उनके पीए से मिले बिना सीधे उनके कमरे में घुस गया. यह भी कि यह डरता क्यों नहीं?

प्रो. श्रीवास्तव: क्या बात करना है?
ईश: आपने कुछ रस्टीकेटेड लोगों को वापस लिया है, मैंने सोचा................
प्रो. श्रीवास्तव: I have taken back some people, I might take back some more. I will not take back some people and I will never take you back.
ईश: There may be some misunderstandings, so there is no harm in discussing them.
प्रो. श्रीवास्तव: There is no misunderstanding. Things are crystal clear and I do not act in haste.
इसके बाद बिना मुझे बाहर जाने को कहे बगैर, वे उठे और बाहर जाने लगे. मैं भी पीछे निकल पड़ा. प्रो. श्रीवास्तव से यह मेरी अंतिम मुलाकात थी.


Friday, October 7, 2016

युद्धोंमाद 2

Renu Umrao आपने बिना दृष्टांत और संदर्भ के एक गंभीर आरोप लगाते हुए फतवानुमा वक्तव्य दे दिया की मैं गाली-गलौच की भाषा का इस्तेमाल करता हूं, यह अवधारणा भी औरों की अवधारणा से प्रभावित है, मौलिक नहीं. मैं केवल तथ्य-तर्कों पर आधारित वक्तव्य देता हूं, हवाई शगूफेबाजी नहीं करता. शब्दों के चुनाव में सजग रहता हूं. ऊपर कमेंट में कौन सी बात आपको गाली-गलौच लहता है. ऐतिहासिक दृष्टांतों से मैने साबित करने की कोशिस की है कि दोनों तरफ युद्धोंमादी माहौल, अपनी सत्ता बचाने या सत्ता पाने के लिए होता है. कुछ लोग मेरा नाम सुनकर इतना बौखला जाते हैं कि मेरी अंतिम-क्रिया की विधा पूछने लगते हैं. जैसे इन्हें मालुम हो कि ये कितना जिएंगे? उनसे यही पूछ लेता हूं कि भाषा की यह तमीज मां-बाप से सीखा या शाखा में? इसमें कौन सी गाली हो गयी? अगर आपको गाली लगती है तो मतलब आपको (सामान्य रूप से कह रहा हूं, निजी नहीं) खुद अपनी भाषा की तमीज आपत्तिजनक लगती होगी, उसे सुधार लीजिए. वैसे आजकल यह भी पूछना बंद कर दिया हूं, गालियां नजर-अंदाज कर देता हूं. कुछलोग विप्र-प्रवर या पंडित जी जैसी गालियां मना करने पर भी देते रहते हैं, उन्हें भी माफ कर देता हूं. अब कभी ऐसे आरोप लगाओ तो संदर्भ और दृष्टांत के साथ. सादर.

युद्धोंमाद 1

Arti Srivastavaतुम तो 2-4 राज्य कश्मीर को देने की ऐसी बात कर रही हो कि सब जमीनों पर तुम्हारा पुश्तैनी नअधिकार हो? आधुनिक राज्य का सबसे बड़ा फरेब है कि हर कोई राष्ट्र बन जाता है और बयान राष्ट्र बन बयान देने लगता है. पेप्सी बेचने वाले 11 लड़के क्रिकेट मैच हार जाएं तो वेस्टइंडीज रौद देता है भारत को. ये 11 लड़के भारत बन जाते हैं जैसे कि आज हमारे ढीले-ढाले डाकिए ने कुछ खत देते हुए बोला सर अबकी हम पाकिस्तानियों को बलूचिस्तान तक खदेड़ देंगे. मैंने कहा, ढंग से डाक बांयो हिंदुस्तान बाद में बनना. इतिहास के हर युग में हरामखोर अपना राज कायम रखने के लिए जंगखोरी का सहारा लेते रहे हैं. चांदी के चंद टुकड़ों के लिए गरीब दूसरे गरीब का खून बहाते रहे हैं जिसने उनका कुछ नहीं बिगाड़ा. जंग खुद एक गंभीर मसला है, यह किसी मसले का हल नहीं हो सकता. देश के राजनैतिक दलों में तो जंगखोरी की प्रतिस्पर्धा चल ही रही है, हम भी उसी तरह का युद्धोंमाद न फैलाएं. जंग में सब हारते हैं जीतता कोई नहीं. इसलिए साहिर की पबात माने और मनाएं 'इसलिए ऐ शरीफ इंसानों जंग टलता रहे तो बेहतर है/हमारे आपके सभी के घरों में चिराग जलता रहे तो बेहतर है.' मुझे लगता है, वैसे तो साहिर ने यह बात उन लोगों की तरफ से ज्यादा कहा है, जिनके घर का कोई सेना में नौकरी करता है वे पाकिस्तानी परिवार हों या हिंदुस्तानी कोई युद्ध नहीं चाहता. निर्वाचन आधारित राजनैतिक प्रणाली में शासक वर्गों के पास धर्मोंमादी और युद्धोंमादी राष्ट्रोंमाद कई बार चुनावी लामबंदी में कारगर औजार साबित होता है, हमेशा नहीं. इतने पर ही लोग देशद्रोह की सनद बांटने लगेंगे. वाजपेयी की लाहौर बसयात्रा से सरहद के आर-पार के आवाम में अमन-चैन की उम्मीद जगी थी. युद्ध परराष्ट्रीय से अधिक राष्ट्रीय समस्याओं की उपज है. पूरे प्रतिष्टान में अपने चापलूसों से घिरे नवाज शरीफ मुशर्रफ को सेनाध्यक्ष पद से हटाना चाहते थे, मुशर्रफ ने उन्हें ही हटाने की ठान ली. हिमालय की भयावह ऊंचाई पर बसे कारगिल में मुजाहिद के भेष में पाक सैनिकों की घुसपैठ करा दी और बाजपेयी मुशर्ऱफ में कंगन-चूड़ियां भेजने की प्रतिस्पर्धा. दोनों ही देशों के जंगखोर उन्माद फैलाते रहे, लेकिन दोनों ही देशों के शासक साम्राज्यवाद के सेवक. साम्राज्यवादी आकाओं के आदेश पर दोनों को ही नियंत्रण रेखा की पूर्ववत नियंत्रण रेखा को यथावत करना पड़ा लेकिन दोनों ही तरफ के कई गरीब सिपाहियों की शहादत के बाद, जिनकी यादों में दोनों देशों की सरकारों ने एक दिन का शोक दिवस भी नहीं मनाया. इतना लंबा कमेंट नहीं लिखना चाहता था लेकिन अपेक्षा के प्रतिकूल तुम्हारा यह युद्धोंमादी व्यंग्य मुझे भावुक बना दिया. "भारत को सबक सिखाने" के लिए युगचेतना से प्रभावित सामाजिक चेतना में युद्धोंमादी जननायक बन चुके नवाज शरीफ के सेना की वापसी के आदेश ने उन्हें खलनायक बना दिया और मुशर्रफ का सैनिक तख्तापलट आसान हो गया. लेकिन युद्धोंमाद किसी भी समाज का स्थाई भाव नहीं बन सकता. पाकिस्तानी आवाम पर कुछ सालों के कहर के बाद मुशर्रफ सत्ता से बेदखल होने के बाद चोरों की तरह मुंह छिपाकर विदेशों से युद्धोंमादी शगूफे छोड़ रहे हैं.अमेरिकी दबाव में शरीफ के बयानों और सेनाध्यक्ष के विपरीत बयानों के बाद पाकिस्तान में एक और सैनिक तख्ता पलट से इंकार नहीं किया जा सकता. नव उदारवादी साम्राज्यवाद के लिए तानाशाही सरकारें ज्यादा फायदेमंद हैं. कारगिल की बहादुरी के महिमामंडन और शहीदों के कॉफिन की दलाली तथा चमकते भारत के खरबों के प्रचार के बावजूद यनडीए सरकार सत्ता से बेदखल हो गई. 1965 में अमेरिकी शह पर पाकिस्तानी हमले की धृष्टता को नाकाम करने के बाद लालबहादुर शास्त्री मरणोपरांत नायक बन गए लेकिन उसके बाद में सत्तारूढ़ कांग्रेस कई राज्यों में पहली बार बेदखल हो गयी. 1971 में इंदिरा गांधी की अभूतपूर्व चुनावी विजय के पीछे सिर्फ बांग्लादेश युद्ध की सफलता नहीं थी, गरीबी हटाओ नारे के जादुई असर से उभरा उनका जादुई व्यक्तित्व का भी योगदान था. लेकिन 1977 में इंदिरा गांधी खुद चुनाव हार गयीं. युद्धोंमाद को चुनावी औजार बनाने की प्रक्रिया में सभी राजनैतिक पार्टियां एक-दूसरे से बड़ी जंगखोर होने के दावों की प्रतियोगिता में लगी हैं, क्योंकि मोर्चे पर इनके परिजन नहीं, गरीब किसान-मजदूरों के लड़के हैं जो मामुली तनख्वाह पर जान लेने-देने की नौकरी करते हैं. जरूरत जंगखोरी के खिलाफ अमन-चैन के मोर्चे की है. कमेंट लंबा हो ही गया तो हबीब जालिब के शेर से खत्म करूं. "न मेरा घर है खतरे में, न तेरा घर है खतरे में/वतन को कुछ नहीं खतरा, निज़ाम-ए-जर है खतरे में".
अंत में आग्रह -- देद्रोह की सनद बांटने की बहती गंगा में हाथ धोने की बजाय मेरी बातें गंभीरता से पढ़ना.

Thursday, October 6, 2016

बेतरतीब 12 (पुनश्च 2)

पुनश्च 2:
मेरा और अरुण (हैदराबाद में सुना है किसी कॉलेज/विवि में प्रोफेसर हो गया था) के निष्कासन सबसे बाद में हुए. हम दोनों ने पहले 2 जांच आयोगों का बहिष्कार किया था लेकिन तीसरी बार जब नोटिस मिला कि न हादिर होने से एकतरफा कार्वाई की जाएगी. हम ने सोचा जांच के बाद निष्कासित होने और जांच की मान्यता के साथ निष्कासित होने में महज तकनीकी फर्क़ था, तो सोचा इस बहाने दिल की कुछ भंड़ास ही निकल जाएगा.  के बाद पता चला कि ‘अच्छे चाल-चलन’ के आधार पर त्तकालीन छात्रसंघ के अध्यक्ष समेत 3 लोगों का निष्कासन वापस हो गया और वे पंजीकृत छात्र हो गए. कुछ पोस्टर-वोस्टर लगाने; नाटक-साटक करने; जुलूसों वगैरह में जाने जैसे पुनीत जनतांत्रिक कृत्यों-कुकृत्यों के अलावा हमारा चाल-चलन भी बहुत अच्छा था. जिन प्रोफेसरों को पसंद नहीं करते थे उनसे भी अभिवादन करते थे. निष्कासन के बाद भी परिसर में ही रहता था, पहले अजय मिश्र के कमरे में उनके आईयस बन जाने के बाद सतलज के उसी फ्लोर पर अक़ील के कमरे में अड्डा जमता था. अक़ील गालिब अकेडमी का सचिव है. लेकिन स्थाई अतिथि की रवायत तो परिसरों का स्थाई भाव रहा है, इसलिए इसकी अवैधता महज कानूनी थी. बाद में फ्लैट किराए पर लेने के बाद भी ज्यादातर समय जेयनयू में ही बीतता था. वह तो हमारा घर-देश था. मैं तो आपातकाल में भूमिगत अस्तित्व की तलाश में किसी इलाहाबाद के सीनियर (डीपी त्रिपाठी) को खोजते जेयनयू पहुंचा, जेल में होने के नाते वे तो मिले नहीं इलाहाबाद विवि  के एक अपरिचित सीनियर (सुल्तानपुर के रमाशंकर सिंह) मिल गए, जिनके साथ रहने का जुगाड़ हो गया. उस समय की बहुत सुखद स्मृतियां हैं, जिन पर अलग से  लिखूंगा.

लंबे पुटनोट की बुरी आदत मुद्दे से भटका देती है, लेकिन हर भटकाव शायद बुरा नहीं होता. खैर आंदोलनकारी छात्रसंघ समेत 3 निष्कासित लोगों की वापसी से प्रोत्साहित मैंने सोचा मैं भी प्रयास करूं क्योंकि मेरा पढ़ने का काम पूरा हो चुका था, लिखने की भी शुरुआत लगभग कर चुका था. प्रो. रशीदुद्दीन खान सीपीयस (सेंटर फॉर पोलिटिकल स्टडीज) चेयरपरसन थे. एक बात तब तक थी जेयनयू के प्रोफेसरों और प्रशासकों से मिलना मुश्किल नहीं था. रशीद साहब कांग्रेस सरकार द्वारा मनोनीत राज्य सभा सदस्य थे लेकिन क्लास के प्रति प्रतिबद्ध. थोड़ा तुतलाते थे लेकिन पढ़ाते बहुत ही अच्छा थे. राजनैतिक मतभेदों तथा कई मुद्दों पर विरोध के बावजूद एक बेहतरीन इंसान तथा एक बहुत अच्छे टीचर के रूप में मैं उनका प्रशंसक रहा हूं. मेरे गाइड  प्रो. के शेशाद्री और भी बेहतरीन इंसान थे. खैर, सोसलसाइंस के कई सेंटर नए (ऊपर) परिसर में चले गए थे, सीपीयस समेत कई सेंटर पुराने (नीचे) परिसर में ही थे. प्रशासनिक भवन भी तब तक ऊपर नहीं शिफ्ट हुआ था. लाइब्रेरी का भी कुछ हिस्सा अभी नीचे ही था. लाइब्रेरी कैंटीन में चाय पीते हुए रशीद साहब से मिलने का मन हुआ. चला गया उनके कमरे में, उठकर हाथ मिलाया और बैठने को कहा. आधे घंटे हमलोग राजनीति और धर्मनिरपेक्षता समेत कई सामाजिक सरोकारों पर बात करते रहे. मौका ‘वाज़िब’ देख मैंने सेंटर में 2 निष्कासित लोगों (वापसी वाले तीसरे सज्जन अन्य स्कूल के थे और अब जेयनयू में प्रो. हैं) की वापसी का ज़िक्र कर अपनी बात कर दी. बाप-रे! मैं तो सोचता था रशीद साहब को गुस्सा ही नहीं आता. अचानक परिवर्तन से मैं किंकर्तव्य विमूढ़ सा हो गया. गुस्से में बोले, “You are not supposed to be even around. Instead of expressing regret of your misdeeds of agitation, you have audacity to issue a counter show-cause notice to VC”. मैंने इसके बावजूद मुधसे मिलने के उनके बड़प्पन का शुक्रिया अदा कर वहां से चला गया. वह प्रो. रशीदुद्दीन खान से आखिरी, मुलाकात थी.   


क्षणिकाएं 60 (811-20)

811
गाय हमारी माता है
दिमाग में हमारे गोबर जम जाता है
कभी वह पटेल को फासी पर लटकाता है
भगत सिंह को अंडमान भेजवाता है
गडकरी गोमूत्र पीकर कैंसर से मुक्ति पाता है
देशभक्त खबरनवीश हमको यह बतलाता है
फेरने से हाथ पीठ पर गोमाता के
रक्तचाप ठीक हो जाता है
वैसे ही जैसे एक तोला घी के हवन से
सैकड़ों टन आक्सीजन बन जाता है
वैसे तो ओबामा भी गोमांस खाता है
लेकिन उसका क्या वह तो विश्वभाग्यविधाता है
(बस यूं ही गाय की पीठ पर हाथ फेरने से  रक्तचाप ठीक होने की किसी चैनल की खबर की पोस्ट पर कलम की आवारगी)
(ईमि:25.08.2016)
812
पीठ पर बस्ता और सर पर लकड़ी का बोझ
चेहरे पर साधने को असंभव पर निशाने का बोध
लड़ते हुए पढ़ेगी पढ़ते हुए लड़ेगी
और बूझेगी बचपन पर बोझ का राज़
करेगी हमला ज़ुल्मत के किले पर
बना कलम को औज़ार-ओ-हथियार
बन योद्धा हिरावल दस्ते की
लगाएगी मेहनतकश को गुहार
धसक जाएगी बुनियाद लूट-खसोट के नजाम की
हाथ लहराते हुए साथ होगी जब ज़ुल्म के मातों की कतार
(ईमि: 31.08.2016)
813
यह किस भारत माता का बेटा है
अपने से अधिक ईंटों का भार जो ढोता है?
करता है जिसका बचपन ईंटा-गारा का काम
भारत भाग्य विधाता को क्या मालुम है इसका नाम?
ढोते-ढोते बोझ आजाएगा बुढ़ापा
कर नहीं पाएगा यह जवानी का स्यापा
था सरकार का 10 साला संपूर्ण साक्षरता का मिशन
जिसे हासिल किया चीन ने महज कुछ सालों में
चल रहा है यहां आज भी साक्षरता मिशन
है इसका तो बोझ से दुहरा बदन
और आंखों मे तकलीफ का उमड़ता समंदर
बंदानवाज़ कहेंगे इसे सीखना भारोत्तोलन का हुनर
यह किस भारत माता का बेटा है
जिसका बचपन भूख के आगे लेटा है?
(ईमिः04.09.2016)
814
लिखता ही रहेगा मेरा कलम हरफ-ए-सदाकत
रोक नहीं सकती इसे ज़ुल्मत की कोई भी ताकत
लिख रहे हों जब दानिशमंद सज्दों का अफसाना
लिखना ही है मेरे कलम को बगावत का तराना
बन रही हो ग़र सर झुकाके चलने की रवायत
लाजिम है बचाना सर उठाके चलने की आदत
फिरकापरस्त कहर से बचाना है गर कायनात
रोकना होगा शेख-बिरहमनों की फरेबी खुराफात
अंधेयुग के किलेदार से न होगा मेरा कलम भयभीत
बेख़ौफ लिखता रहेगा इस अंधेयुग के बेबाक गीत
(बस यों ही कलम फिर आवारा हो गया)
(ईमि: 05.09.2016)
815
बेटी की एक तस्वीर पर

ये जो सीधी-सादी दिखती लड़की है

जोर-ज़ुल्म की हो बात अगर 
शेरनी सी दहाड़ती है
चेहरे पर छिटकी है जो विनम्र मुस्कान
छिपा है उसमें फौलादी आत्म सम्मान
देता है बाप अगर कभी बर्दाश्तगी प्रवचन
याद दिलाती उसे नाइंसाफी की मुखालफत का वचन
सिखाओगे ग़र दो साल की बच्ची को जंग-ए-आजादी का गाना
कैसे लिखेगी वो समझौतों का अफसाना?
सिखाओगे बचपन में ग़र मेहनतकश के हक़ का तराना
कैसे लिखेगी वो निज़ाम-ए-ज़र की शेनां?
कहोगे ग़र उससे कि सवाल-दर-सवाल है ज्ञान की कुंजी
कैसे संभाल सकती है वो किसी परंपरा की पूंजी?
सवाल-दर-सवाल की पड़ जाती है जब आदत
कैसे कर सकती है किसी 'ईश' की इबादत?
कर देती बाप को इस बात से लाजवाब
लगाओगे पेड़ बबूल का कहां से फलेगा वो आम जनाब?
(कलम का आवारगी में 'धृतराष्टत्व' का भूत)
(ईमिः 04.09.2016).....
816
सोचे-समझे फैसले पर पुनर्विचार नहीं होता
जाकर वापस आने में एक नया दीदार होता है
(हा हा)
(ईमिः 01.10.2016)
817
दिलों की सफाई तो साथ की बुनियादी शर्त है
सरोकारों की साझी इमारत तो बनती रहती है
हा हा
(ईमिः 01.10.2016)
819
कत्ल की महारत उसकी ऐसी
वसूलता है लाश से
कत्ल में हुई जहमत का हरजाना
और खंज़र पर आए थोड़े से ख़म की भरपाई
(ईमि: 05.10.2016)
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जब देखो दिल टूटने का राग अलापती रहती हो
इतना आरर दिल है तो इश्क क्यों करती हो?
इश्क नहीं है काम मोम से नाज़ुक दिल वालों का
इश्क के सदमात के लिए पत्थर सा दिल चाहिए
(ईमि: 05.10.2016)