Thursday, April 28, 2016

 

कहानी

चरित्रहीन
ईश मिश्र
 
आज करीब 30 साल बाद महरसराय चौराहे के चाय के अड्डे पर आया था।  20 साल बाद क्यूब से मिलने की बेताबी न होती तो पता न कब आता, ज़िंदगी के इस मोड़ बिना काम की यात्राएं संभव नहीं हो पाती। चौराहे का इतिहास, भूगोल तथा समाजशास्त्र सब बदल गया था। हम जब स्कूल में थे तो यह चौराहा लगभग सुनसान रहता था। चौराहा अब भीड़ भरी बाजार बन गया था। लेकिन बैरिस्टर तिवारी, यमएबीयफ का चाय का अड्डा जस का तस है। बैरिस्टर तिवारी वैसे ही गद्दी पर बैठे दिखे जैसे इन्हें 30 साल पहले देखा था, बस ताजी हजामत तथा तलवार छाप मूंछों से सुशोभित चिकने चेहरे की जगह नाभि तक विस्तृत बाबा छाप दाढ़ी ने ले ली है। गाड़ी से निकल कर मेरे हाथ जोड़कर अभिवादन के जवाब में गद्दी से नीचे उतर, मोबाइल बंद कर मेरा हाथ दोनों हाथों में लेकर गदगद भाव में बोले, “बहुत बहुत आशिस। का हो डब्बू बाबू तू त गूलर क फूल हो गया, मर्देसामी। तोहार ऊ पंडितवा तीसीपट्टी में ही रहता है लेकिन महरसराय का रास्ता उसे भूल गया है। 2-3 महीना पहले 6-7 शहरी बिटहिनियों(लड़कियों) का साथ आवा रहा,   । तिवारी जी की बात पूरी होती कि तिलवाई की की दिशा से शोर-गुल सुनाई दिया तिवारी जी किसी को वहां जाकर पता करने भेजने के इंतजाम में लग गये मर्देसामी तिवारी जी का शुरू से ही तकियाकलाम है। जब मैं पैदा हुआ था तो बाबूजी कलकत्ता रहते थे. बंगाली नामों के प्रभाव में देबोत्पल रख दिया था। गांव के लोगों को पूरा नाम में दिक्कत होती थी देबू कर दिया और हमउम्र लडकों ने डब्बू। कुछ दिनों बाद यहां बसें रुकने लगीं तथा दिन में रिक्शे-तांगे भी चौराहे की शोभा बढ़ाने लगे। चौराहा 7-8 बजे रात तक गुलजार रहने लगा। वैसे कागज पर तो इस जगह का नाम सराय महरुद्दीन खां है लेकिन सब महरसराय ही कहते हैं। दुद्धी-लुंबिनी रोडवेज की बस तिलवाई रुकती थी। सही-सही तो नहीं याद लेकिन तिवारी जी की दुकान चीन की लड़ाई के कुछ महीनों बाद खुली थी। मैं तथा क्यूब इस दुकान के पहले ग्राहक थे।  मैं 15 साल का रहा होऊंगा तथा क्यूब 13 का। तिवारी जी का मानना था कि हमारी बोहनीं से ही उनकी दुकान फलने-फूलने लगी। इस नाते हम दोनों से कभी चाय का पैसा नहीं लिया। मैंने क्यूब को तब पंडित जी कहता था सो तिवारी जी उसे पंडित कहने लगे। वैसे क्यूब का नाम अजादार अब्बास अंसारी है। दोस्त लोग इसे ए-क्यूब कहने लगे, थोड़े ही दिनों में ए गायब हो गया और इसका नाम क्यूब पड़ गया। हम और क्यूब कक्षा 6 से इंटर तक सहपाठी तथा अभिन्न मित्र थे. मैंने 11 में प्राइमरी पास किया   

दर-असल अब मेरे गांव में तो कोई नहीं रहता नहीं। बाबूजी जौनपुर में टीचर थे। 33-34 साल पहले, बाबा के मरने के बाद अपने हिस्से का खेत बेचकर शहर से सटे गांव में 5 बीघा जमीन खरीद लिया था। जब गांव शहर में आ गया तो भी बाबूजी ने बिल्डरों को फटकने नहीं दिया. बड़ा से आंगन वाला घर तथा बाकी में नीबू, अनार तथा आंवले का बाग। फल लगते ही एक खटिक को ठेके पर दे दे देते थे। मेरे भाई का खर्च उसी से चलता है, वैसे तो वकील है लेकिन वकालत अच्छी चलती नहीं। बाबूजी के बाद अब गांव के घर में अपना हिस्सा बड़के बाबू के बेटों को दे दिया। तब से गांव जाना हुआ ही नहीं। बनारस की हाई स्कूल-इंटर की पढ़ाई के दौरान घर से गाड़ी पकड़ने के लिए स्टेसन के रास्ते हम तथा क्यूब अपने-अपने गांवों से पैदल चलकर यहीं मिलते थे। गाड़ी के समय से आधा घंटा पहले यहां से निकलते थे. स्टेसन तो बेवजहगंज में था लेकिन इसे तिलवाई स्टेसन कहा जाता था. लोग बताते हैं कि सौ-सवा सौ साल पहले किसी हाजी सैय्यद असगर अली नामक जमींदार ने बसाया था। बेवजह शब्द हाजी साहब का तकिया कलाम सा था. बगल के गांव तिलवाई की बाजार बेवजहगंज से पुरानी तथा बड़ी है. बेवजहगंज की बाजार तो सड़क बनने के बाद हमलोगों के देखते-देखते दो-तीन छप्परों से शुरू होकर इतनी बड़ी हो गयी। चौराहे पर तब तिवारी की पहली पक्की दुकान खुली थी।

बाबा तिवारी जी बासूपुर के नामी गिरामी पंडित जी थे। इलाके में पंचाग के सबसे बड़े ज्ञानी माने जाते थे। दूर दूर से लोग बेटों की जन्मकुंडली बनावाने आते थे। मेरी कुंडली भी उन्होने ही बनायी है। लिखावट की सुंदरता के नाते मेरे पास अबतक सुरक्षित है।  उनका एक बेटा पीसीयस था, दूसरा 2-3 साल हाईस्कूल में फेल होने के बाद पढ़ाई छोड़ चुका था। उनके बेटों के नाम अजीब थे - बैरिस्टर और वकील। वकील साहब पीसीयस हो गये तथा बैरिस्टर साहब यमएबीफ हो गये।

बैरिस्टर तिवीरी, यमएबीयफ के लिए तिवारीजी ने ठीक चौराहे पर एक बीघा जमीन खरीद कर आगे दुकान तथा पीछे मकान बनवा दिया। मिठाई तथा चाय, समोसा पकौड़ी की दुकान खोला तो तिवारी जी की उससे ज्यादा थूथू हुई जितना बड़े बेटे के पीसीयस होने वाहवाही हुई थी। सब यही कह रहे थे कि बड़का पंडिज जी बनते थे। बेटे से हलवाईगीरी करवा रहा है। लेकिन पंडित जी दूरदर्शी थे जानते थे कि थोड़े ही दिनों में गांव में भी प्रतिष्ठा का मानक पैसा हो जायेगा। पंडित जी तो नहीं रहे लेकिन बैरिस्टर तिवारी इलाके के बड़े आदमी माने जाते हैं.

 बैरिस्टर ने केबिनुमा गद्दी के ऊपर दीवार पर बैरिस्टर तिवीरी यमएबीयफ का साइनबोर्ड टांग दिया जो अभी भी लगा है। यमएबीयफ का मतलब पूछने पर पता चला मेट्रिक अपीअर्ड बट फेल्ड। उस समय हमारे पौस्त में गिने-चुने ग्रेजुएट थे. दीदी की शादी के बाद हमारे रेश्तेदारों में हमारे जीजा जी सबसे पढ़े लिखे रिश्तेदार थे. शादी के समय बाबूजी से कोई पूछता कि लड़का क्या कर रहा है, तपाक से बोलते, यमयस्सी है। शादी के कार्ड पर भी छपवा दिया था, ठाकुर भानुप्रताप, यमयस्सी. बाहरी लोग जो यहां चाय पानी कर अपने गांवों में जाकर बताते कि मेहरपुर चौराहे पर एक यमए पास ब्राह्मण चाय की दुकान चलाते हैं। तीन चाय का आदेश दे लडकपन के दिनों की यादों में इस कदर खो गया कि मालगंज जंक्सन से मेरे साथ टैक्सी शेयर करके आयीं, सामने की बंच पर बैठी दोनों लड़कियों की उपस्थिति ही भूल गया था। पूरे रास्ते मैं उनकी बातें सुनता आ रहा था। बहुत समझदार, संवेदनशील तथा बहादुर दिख रही थी. एक ने अपना नाम कोमल बताया एक ने प्रज्ञा। प्रज्ञा जेयनयू से पीयचडी कर रही थी, कोमल दिल्ली विश्वविद्यालय से। दोनों क्यूब की स्टूडेंट रह चुकी हैं तथा उसी से मिलने जा रही थीं. मैंने अपना परिचय नहीं बताया था जिससे वे उन्मुक्त हो बातें कर सकें।  

कोमल की कर्कश आवाज सुनकर मेरी तंद्रा टूटी। ऐसे क्या आंखे फाड़कर देख रहे हो?  हम तुम्हें अजायबघर से भागे हुए अजूबे दिख रहे हैं? लड़की नहीं देखा है”?  कोमल की कोमलता के बाद प्रज्ञा के प्रबोधन की बारी थी। कुहनी मोड़कर मुट्ठी खोलकर पंजा दिखाती हुई बोली कहो तो दिखा दें कोमल! द्दे त्ताली। ताली देकर दोनों हंसकर उन लड़कों की तरफ देखने लगीं। उन लड़कों की तो छोड़िये, वहां मौजूद सब सकपका गये. आते-जाते लोग कोमल की कर्कश वाणी सुन रुककर अजूबे से उन्हें देखने लगे। लड़कों की तो सिट्टी-पिट्टी गुम। जब हम आये तो तिवारी जी मोबाइल पर लंबी वार्ता में व्यस्त थे इसलिए हाथ उठाकर ही सलाम का जवाब दे दिया था। कोमल की आवाज सुन उन्होने फोन कान से हटाया तथा मातृभाषा में उन लड़कों को दो गालियां दागकर बोले, लफंडरगीरी के लिए मेरी ही दुकान मिली है?, चलो फूटो। मैंने लड़कियों से मुखातिब हो कहा, लडकियां तो देखा है इनने, ऐसी नहीं। साबाश, बेटियों। दोनों ने मेरा शुक्रिया अदा किया। उठकर जाते हुए लड़कों को रोककर कोमल ने तिवारी जी से मुखातिब हो हाथ जोड़कर कहा, बाबाजी इन्हें भगाइये नहीं, इन्हें बस इतना समझा दीजिए कि लड़की इंसान होती है, अजूबा नहीं

लेखक कभी कभी क्षेपकीय रोग का शिकार हो कहानी की कथावस्तु की गहनता क्षीण कर देता है। लेकिन यह रोग असाध्य है। शुरू में ही इतने क्षेपकों ने घेर लिया कि इस कहानी के कारक क्यूब की दाढ़ी के तीन तिनकों की अभी चर्चा ही नहीं हो पाई। और क्षेपकों के चक्कर में नहीं पड़ूंगा लेकिन क्षेपकों के चलते कहानी ने जो मोड़ ले लिया है कि तिनकों को अभी और इंतजार करना पड़ेगा। वैसे भटकने की पुरानी आदतें यूं ही नहीं छूटतीं और न ही अतीत को किसी गर्द की तरह सिगरेट के धुएं में उड़ाया जा सकता है। जरूरी नहीं कि भटकाव लाभप्रद न हो। सोच ही रहा था कहानी अतीत से शुरू




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