Tuesday, August 27, 2024

बेतरतीब 184 (जन्मदिन)

 ज़िंदगी की जीवंतता के लिए उत्सव भी जरूरी होते हैं, उत्सव के लिए अवसर चाहिए, उत्सव के अवसर कमते जा रहे हैं, ऐसे में जन्मदिन उत्सव मनाने; मिलने-जुलने का अवसर देता है। हमारे लड़कपन या जवानी में, सामुदायिकता-केंद्रित हमारे गांवों में सामुदायिक/परिवारिक उत्सव तो मनाए जाते थे लेकिन व्यक्तिगत उत्सव माने का चलन नहीं था। लंबे समय तक मुझे तो रोमन कैलंडर का अपना जन्मदिन ही नहीं मालुम था। मां और गांव की स्ियां बड़की बाढ़ के पहले का बताती थीं। बाद में शक संवत (आषाढ़, कष्णपक्ष दसमी, संवत 2012) में जन्मकुंडली मिल गयी, जिसे बाबा की लिखावट के नमूने के तौर पर मैंने सभांलकर रखा है। सोचा थाआषाढ़ का मतलब जून-जुलाई में कभी होना चाहिए। 9 साल की उम्र में,1964 में, प्राइमरी पास किया। बाबू साहब ( हमारे हेडमास्टर, बासुदेव सिंह) ने मेरे भविष्य पर विचार किया और पाया कि न्यूनतम आयु सीमा के नियम के तहत1969 में हाईस्कूल की परीक्षा देने के लिए 1 मार्च को कम-से-कम 15 साल का होना चाहिए तो 1954 की फरवरी की जो भी तारीख मन में आया लिख दिया। अब फरवरी में तो आषाढ़ हो नहीं सकता था। चूंकि जन्मदिन के उत्सव का चलन नहीं था इसलिए पता करने की सोचा ही नहीं। जएएनयू में एमफिल के किसी कोर्स वर्क के एक टर्मपेपर के शोध के लिए 1950-60 के दशकों के कुछ हिंदीअखबार देखने थे। उन दिनों हिंदी अखबारों में रोमन कैलेंडर की तारीख के साथ शक/विक्रम कैलेंडर की भी तारीख होती थी तो जन्म कुंडली के हिसाब से 26 जून 1955 पाया गया और तब से दोस्तों के साथ जन्मदिन मना लेता हूं।

Tuesday, August 20, 2024

बेतरतीब 183 (नाम)

 मेरे लिए किसी का नाम पहचान की एक संज्ञा है, उसके अर्थ का कोई महत्व नहीं होना चाहिए। मेरा पूरा नाम ईश नारायण मिश्र है, पहले पूछने पर पूरा नाम ही बताता था। उस समय हमारे यहां ईश जैसे छोटे नामों का चलन नहीं था। 12 साल की उम्र में कक्षा 9 में पढ़ने शहर (जौनपुर) गया और टीडी (तिलक धारी) सिंह इंटर कॉलेज में में दाखिला लिया। टीडी डिग्री कॉलेज से मेरे सबसे छोटे फूफा, सीताराम पांडेय के सबसे छोटे भाई, संत प्रसाद पांडेय (संतू फूफा) बी. एस्सी कर रहे थे, वे मुझे ईश बुलाते थे, तो मुझे नाम का नारायण अनावश्यक लगा और मैंने व्यवहार में उसे हटा दिया. दस्तावेजों में पूरा नाम ही रहा. English शैक्षणिक लेखों और सरकारी दस्तावेजों में Ish N. Mishra लिखने लगा। अंग्रजी के अखबारी लेख और हिंदी के लेख ईश मिश्र नाम से ही लिखता रहा। उसके बहुत बाद में पढ़ा कि वर्गविहीन समाज में राज्य अनावश्यक होकर बिखर जाएगा। दूसरी अनावश्यक चीज मुझे अपनी चुर्की (चुटिया) लगी उससे भी मुक्ति पा लिया। जनेऊ की अनावश्यकता महसूस करने में एक और साल लग गया। अब कहता हूं कि मैंने तो 13 साल की ही उम्र में जनेऊ से छुटकारा लेकर बाभन से इंसान बनना शुरू कर दिया। इसी लिए Ish Mishra नाम से मेरा पुराना फेसबुक अकाउंट जब अलभ्य हो गया तो नया अकाउंट Ish N. Mishra नाम से खोल लिया।

बहुत ही सीमित देश-दुनिया वाले दूर-दराज के एक गांव के 12-13 साल के लड़के की वैचारिकी और चेतना इतनी विकसित नहीं होती कि वह इसका अंतर्निहित वैचारिक महत्व को समझता। जहां तक मुझे याद है एक दिन बाल कटवाने गया तो चोटी अनावश्यक लगी तो कटवा दिया, वही जनेऊ के साथ भी हुआ और उसके बाद नाम क नारायण के साथ।

शिक्षा और ज्ञान 356 (लेटरल एंट्री)

 सरकार के बिहारी सहयोगियों के असहयोग से देश संघ के बहुत से प्रतिबद्ध स्वयंसेवकों की सेवा से वंचित रह गया। सरकारी आदेश से संघ लोक सेवा आयोग ने नौकरशाही के उच्च पदों पर सीधी भर्ती (लेटरल एंट्री) का विज्ञापन वापस ले लिया। बाल स्वयंसेवक चरण से ही नौकरशाही (सिविल सर्विसेज) में घुसकर राष्ट्रसेवा करने की तमन्ना रखने वाले तरुण स्वयंसेवक अच्छी-से-अच्छी कोचिंग के बावजूद मंडलीय साजिश के चलते संंघ लोक सेवा की परीक्षा में थोडा पीछे रह जाने के चलते अपनी सेवाओं से निजी क्षेत्र को चमकाते रहे। जब देश में राष्ट्रवादी सरकार आयी तो उसने राष्ट्रसेवा में बाल से प्रौढ़ हो चुके स्वयंसेवकों के वांछनीय योगदान की अहमियत समझ, सीधी भर्ती का प्रावधान अपनाया।इससे जो स्वयंसेवक सीधी परीक्षा से राष्ट्रसेवा से वंचित रह गए थे, उन्हें सीधी भर्ती से राष्ट्रसेवा का अवसर प्रदान किया। दूसरे शब्दों में राष्ठ्र को उनकी सेवा से उपकृत होने का अवसर प्रदान किया। बुरा हो सरकार के इन कृतघ्न सहयोगियों का जिन्होंने राष्ट्र को कई प्रतिबद्ध, प्रतिभाशाली स्वयंसेवकों की सेवा से वंचित कर दिया। कहा जाता है कि पहले नेपाल में राजा के प्रति वफादारी प्रदर्शन के कंपटीसन का एक उत्सव होता था, सफल प्रतियोगियों को राजा मनमांगी पदवी/उपाधि देता था।

FB Intro

 An atheist, feminist and Marxist by conviction with optimistic passion for revolutionary reconstruction of the world free from all kinds of jingoism.

Born in a remote, educationally and politically backward; economically and culturally pre-modern; and socially patriarchal, Varnaashramist feudal pocket of Azamgarh district in the eastern UP in India, was the second of the nine children of my parents, both of whom are no more. I began the the journey of life on zig-zag paths of tension between acquired and the rational moralities due to the innate wont of questioning anything and everything and aiming for the impossible from the early childhood, may be learnt from my mother who never questioned anything and derived happiness in suffering for others. The first causality of my this wont was my antina (Chutia) JANEOO (the sacred thread) -- the symbol of my Brahman caste -- at 13 and within 2 years I overcame the fear of the BHOOT (ghost) with the help of Gods(As a child I used to think that BHAGVAN is just another God like Hanuman; Ram; Shiva..) followed by my overcoming of the fear of the God itself. The process of questioning anything and everything always has the risk of turning into an atheist and by the age of 17, I became an authentic atheist, free from the fears of the BHOOT and the BHAGWAN. At 18 with declaring the financial independence from my farmer father (cash was otherwise also rarity in those days' subsistence rural economy), I learnt to enjoy the pleasure of zero balance life while doing seemingly impossible. In the early 1970s, when the revolution semed round the corner, alongwith millions of young men and women across the globe, dreamt of buliding a beautiful world free from exploitation; starvation; and domination-subjugation -- a world of human emancipation and continuing with that dream, contributing my bit towards it.Rousseau showed us in the 18th century that revolution is not only desirable but possible also. I restate that.

Monday, August 19, 2024

शिक्षा और ज्ञान 355 (उच्च शिक्षा)

 भ्रष्टाचार मुक्त मोदी युग में देशद्रोही मीडिया वाले सुविधा-शुल्क को दलाली कहकर अलग चाल-चरित्र वाली पार्टी के नेताओं का चरित्र हनन कर रहे हैं। यूनिवर्सिटी की नियुक्तियों में प्रोफेसरों की मठाधीशी (गॉडफादरी) हमेशा ही चलती रही है, अच्छेल चाल-चलन-चरित्र वाले कुछ राजनैतिक फेसिलिटेटर कुछ सुविधा-शुल्क भी वसूल ले रहे हैं तो इसमें क्या बुराई है? इतना जरूर है कि धर्मपिताओं (गॉडफादरों) के धर्मपुत्र-पुत्रियों में कुछ पढ़ने-लिखने वाले भी होते थे लेकिन जब लाखों में नौकरी खरीदने वाले पढ़ाने में भी मेहनत क्यों करेंगे? मेरे जैसे नास्तिकों की समस्या यह थी कि ज गडवै नहीं है तो गॉडफदरवा कहां से होगा? मुझसे सहानुभूति जताने वाले लोग जब कहते कि मेरे साथ बहुत नाइंसाफी हुई, नौकरी बहुत देर से मिली। मैं कहता था कि पहली बात यह कि एक अन्यायपूर्ण समाज में निजी अन्याय की शिकायत क्यों? निजी न्याय सुनिश्चित करने के लिए, समाज को न्यायपूर्ण बनाना होगा, निजी आजादी के लिए समाज को आजाद करना पड़ेगा। दूसरी बात यह कि सवाल उल्टा है, देर से ही सही मिल कैसे गयी? कुछ दिनों पहले अग्रज प्रो. रमेश दीक्षित से पेसन रुकी होने की बात हो रही थी, रमेश भाई ने विनोद भाव से कहा कि उन्हें तो अभी तक विश्वास नहीं हो रहा है, कि मुझे नौकरी मिल गयी थी और रिटायरमेंट तक चल गयी। पहले प्रोफेरों की कृपापात्रता के पीछे 'दयाभाव' होता था, ग्लोबलाइजेसन के कॉरपोरेटी युग में कृपापात्रता खरीदनी पड़ती है।श

Friday, August 16, 2024

नारी विमर्श 26 (मर्दवाद)

 कविता भी शेयर कीजिए। मर्दवाद (पुरुषवाद) जीववैज्ञानिक प्रवृत्ति नहीं, विचारधारा है, विचारधारा उत्पीड़क और पीड़ित दोनों को प्रभावित करती है। कई लोग कहते हैं स्त्रियों पर स्त्रियां ही अत्याचार करती हैं, वे ऐसा विचारधारा के वशीभूत करती हैं। विचारधारा सांस्कृतिक वर्चस्व निर्मित करती है जो वैचारिक ही नहीं, भौतिक बल का भी काम करती है। विचारधारा (मिथ्या चेतना) हमारे रोजमर्रा के क्रिया-कलापों; विमर्श, रीति-रिवाजों और कर्मकांडों से निर्मित होती है। बेटी को बेटा कहकर शाबाशी देना भी मर्दवाद की विचारधारा को पुष्ट करता है। सिर्फ पुरुष ही नहीं स्त्रियां भी बेटियों को बेटा कहकर साबाशी देती हैं और बेटियां भी उसे शाबाशी के रप में ही लेती हैं। मेरी बेटियों को कोई बेटा कह देता है तो वे अपना विरोध दर्ज करती हैं। आर्थिक रूप से स्वतंत्र स्त्री भी तथाकथित स्वेच्छा से सामाजिक अधीनता की भूमिका अदा करती हैं। यह 'स्वेच्छा, स्वेच्छा से नहीं सांस्कृतिक वर्चस्व के बल के दबाव में निर्मित कृतिम स्वेच्छा है। लेकिन स्त्री प्रज्ञा और दावेदारी का रथ, धीरे-धीरे ही सही, काफी आगे बढ़ चुका है, वह दिन दूर नहीं जब स्वेच्छा का मतलब अधीनता नहीं, समानता होगा। मेरी बेटी की स्त्रीवाद पर एक फिल्म का शीर्षक है, "F for Equality".

Thursday, August 15, 2024

जय भीम लाल सलाम

 तुकबंदी में एक कमेंट


बिना किए कुछ नहीं होता
बिना लड़े कुछ नहीं मिलता
बिना कुछ किए इंसान ज हो जाता है
बिना लड़े गुलामी ढोता है
हक के एक एक इंच के लिए लड़ना पड़ता है
लड़ने के लिए पढ़ना पड़ता है
जाति के विनाश के लिए क्रांति की जरूत है
क्रांति के लिए जाति के विनाश की
दोनों के लिए सामाजिक चेतना के जनवादीकरण की
जिसके रास्ते के गतिरोधक हैं
जातिवाद और जवाबी जातिवाद
दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं
नया सिक्का ढालने की जरूरत है
जिसके एक तरफ हो सामाजिक न्याय और दसरी तरफ आर्थिक न्याय
जिका संकल्प हो जय भीम लाल सलाम
इंकिलाब जिंदाबाद।