Wednesday, June 1, 2022

ईश्वर विमर्श 104 (नास्तिकता)

 एक मित्र ने कहा कि इलाहाबाद से दिल्ली जाकर मैं हिंदू धर्म त्यागकर वामपंथी हो गया। उस पर :


एक प्रामाणिक नास्तिक के रूप में मैंने हिंदू धर्म का नहीं, धर्म का त्याग किया और इलाहाबाद से पढ़ कर दिल्ली जाकर नहीं मेरी नास्तिकता की यात्रा इलाहाबाद में पढ़ते हुए ही पूरी हुई। मैं एबीवीपी का जब नेता था तो नास्तिक हो चुका था। सावरकर और जिन्ना की ही तरह मैं धार्मिक नहीं था, सांप्रदायिक था। सांप्रदायिकता धार्मिक नहीं धर्मेन्मादी लामबंदी की राजनैतिक विचारधारा है। पुस्तकों और आंदोलनों में शिरकत के जरिए सांप्रदायिकता से मोहभंग हुआ और सवाल-दर-सवाल की द्वंद्वात्मक पद्धति अपनाने के चलते मार्क्सवादी बना। नास्तिकता में मनुष्य हिंदू-मुसलमान या किसी विशिष्ट धर्म का त्याग नहीं करता बल्कि किसी अलौकिक सर्वशक्तिमान की अवधारणा के निषेध के चलते धर्म का त्याग करता है। मनुष्य ईश्वर की रचना नहीं है, बल्कि ईश्वर की अवधारणा खास ऐतिहासिक संदर्भ में मनुष्य की रचना है, इसीलिए देश-काल के लिहाज से उसका स्वरूप और चरित्र बदलता रहता है। इसीलिए अपनी ऐतिहासिक उत्पत्ति के आधार पर अल्लाह, भगवान और गॉड अलग अलग हैं। पहले ईश्वर असहाय और निर्बल की सहायता करता था अब सोसल डार्विनवाद के सिद्धांत का अनुशरण करते हुए सक्षम की सहायता करता है।(God helps those who help themselves) जनपक्षीय परिवर्तन का हिमायती होने के चलते वामपंथी हूं क्योंकि ऐतिहासिक रूप से जनपक्षीय परिवर्तन की पक्षधरता ही वामपंथ है। सादर।

Saturday, May 28, 2022

 मैंने तो खोमैनी के फतवे और कट्टरपंथियों द्वारा उसके विरोध के चलते सैटनिक वर्सेज के संदर्भ पुस्तकों पर पाबंदी के खिलाफ लिखने के लिए (वह लेख 'अभिव्यक्ति पर सांप्रदायिक घटाटोप', खोजना चाहिए/खोजूंगा) कठिनाई से पुस्तक की फोटोकॉपी का जुगाड़ कर पढ़ा। 'मिड नाइट चिल्ड्रेन' की तुलना में इसकी साहित्यिक स्तरीयता बहुत कम है। मैंने अपने लेख में लिखा था कि लगता है रश्दी और खोमैनी में कोई अनकही मिलीभगत है, प्रतिबंध के चलते पुस्तक की लोकप्रियता बढ़ गयी थी। पुस्तकों पर प्रतिबंध के विरुद्ध हूं, लोगों को पढ़कर खारिज करने दीजिए।


बिना पढ़े किताब और उसके मूल्यांकन-पुरस्कार पर फैसलाकुन राय और लेखक के निराधार चरित्रहनन बौद्धिक अपराध है। अंतर्राष्ट्रीय बुकर्स पुरस्कार से सम्मानित गीतांजलि की रेत की समाधि पढ़ने पर पैसा और समय नहीं खर्च करना चाहते तो बिना पढ़े समीक्षा लिखने से बचिए। पैसा और समय खर्च कर द गॉड ऑफ स्माल थिंग्स पढ़ा था तो उसकी साहित्यिक समीक्षा कीजिए। थोड़ा दिमाग लगाइए तो पाएंगे गॉड ऑफ स्माल थिंग्स भाई-बहन के संबंधों पर नहीं सीपीएम किस्म की राजनीति पर एक आलोचनातात्मक टिप्पणी है।  

Thursday, May 26, 2022

मार्क्सवाद 264 (मंदिर-मस्जिद)

एक मित्र ने कहा कि उनके कोई मित्र लखनऊ में इमामबाड़ा के हिंदू मंदिर के होने के लिए याचिका दाखिल करने वाले हैं और कि अंदर कई जगह उन लोगों ने निशान खोजा है और कहा कि मैं जामा मस्जिद के पीछे पड़ू। उस पर --

हर युग का शासकवर्ग अपने आंतरिक, कृतृम या मंदिर मस्जिद जैसे गौड़ अंतर्विरोधों को उछालकर मुख्य (आर्थिक) अंतर्विरोध की धार कुंद करने की कोशिस करता है जिससे जनता अंधभक्त बन बिना चूं किए पेट पर लात प्रसाद समझ कर खाती रहे। हम शासक वर्गों की जनता के विरुद्ध इस साजिश में शामिल होने की बजाय जनता को पेट पर लात मारने वाले शासकवर्ग लके विरुद्ध जागृत करने का प्रयास करेंगे। आप अपने शासक आकाओं की सेवा में लोगों को भजन सुनाकर मदहोश कर प्रसाद समझ पेट पर खाते रहने के लिए भ्रमित करने का अभियान जारी रखें, हम उसे नाकाम करने की खोशिस करते रहेंगे।

Sunday, May 22, 2022

बेतरतीब 129 (नास्तिकता की यात्रा)

 गायत्री मंत्र तो हमें अक्षरज्ञान होने तक कंठस्थ हो गया था और बाबा के साथ बैठक में सोता था और वे ब्राह्ममुहूर्त में ही उनसे रामचरित मानस के दोहे-चौपाइयां सुनते और प्राइमरी में पूरा मानस कई बार पढ़ गया टीका पहले पढ़ता और दोहा-चौपाई बाद में। बहुत दिनों तक महाभारत नहीं पढ़ा क्योंकि किंवदंति थी कि महाभारत पढ़ने से घर में झगड़ा होता है, लेकिन पढ़ने का शौक था और घर में यही सब ग्रंथ थे तो मिडिल स्कूल तक पहुंचते-पहुंचते पढ़ ही डाला। गीता भक्तिभाव से कई बार पढ़ा तथा मिडिल स्कूल पास होने तक गीता के कई श्लोक कंठस्थ हो गए थे, 2015-16 में जब सरकार ने इतिहास के पुर्मिथकीकरण का कार्यक्रम शुरू किया तो उस पर लिखने के लिए आलोचक भाव से पढ़ा। छठीं क्लास (1964-65) में 10 साल से कम उम्र में जनेऊ हो गया जो घुटने के नीचे तक लटकने के चलते अटपटा लगता लेकिन एक अनुशासित कर्मकांडी ब्राह्मण बालक की तरह धार्मिक निष्ठा से सुबह उठते ही "कराग्रे बसते लक्ष्मी, कर मध्ये सरस्वती, करमूले तु गोविंदः, प्रभाते कर दर्शनम्" मंत्र के साथ हथेलियां देखकर दिन की शुरुआत कर दैनिक कर्मकांडो का पालन करता था। मुझे किसी ने बताया नहीं था कि किसी भी ज्ञान की कुंजी सवाल-दर सवाल है, जैसा कि मैं अपने छात्रों को बताता था (Key to any knowledge is questioning, question anything and everything beginning from your own mindset), लेकिन बचपन से ही हर बात पर सवाल करने की आदत थी जिसके चलते छुआछूत से शुरूकर धीरे-धीरे मंत्र-तंत्र तथा कर्मकांडी रवायतों से मोहभंग होने लगा। 13 साल की उम्र तक भूत का भय खत्म हो गया तथा चुटिया ओऔर जनेऊ अनावश्यक लगने लगे और दोनों से छुटकारा पा लिया और उसी उम्र में एक सीनियर खो-कबड्डी खेलने के बहाने शाखा में ले गए और कुछ दिन बाल स्वयंसेवक रहा। संघ के प्रचारकों और अधिकारियों का बालप्रेम देख लगा कि यह भी राष्ट्रप्रेम का हिस्सा होगा। 17 साल की उम्र में इलाहाबाद विवि में दाखिला लेने तक ब्राह्मणीय श्रेष्ठता यानि जातिवाद से मोहभंग हो गया था और हर बात पर सवाल करने की आदत से भगवान के भय से नास्तिक हो गया। विशिष्ट परिस्थिति जन्य कारणों से (जिसका विस्तृत वर्णन फिर कभी) विद्यार्थी परिषद का पदाधिकारी बन गया यानि मैं धार्मिक नहीं था, सांप्रदायिक था। सांप्रदायिकता धार्मिक नहीं राजनैतिक विचारधारा है। विद्यार्थी परिषद के कार्यालय के लगभग नीचे पीपीएच की दुकान थी वहां किताबें पढ़कर और युवा मंच के सीनियरों (रवींद्र उपाध्याय, विभूति ना. राय, डीपी त्रिपाठी आदि) से विमर्श-बहस के चलते मार्क्सवाद की तरफ झुकाव हुआ। 2-4-8 आने में खरीदकर कमरे में काफी मार्क्सवादी साहित्य हो गया। 1974-75 में विद्यार्थी परिषद छोड़ने के बाद कुछ वामपंथी छात्र संगठनों में रहा-छोड़ा। 31-32 सालों से बेदल मार्क्सवादी, रोमिला थापर के शब्दों में दार्शनिक (Philosophical) कम्युनिस्ट हूं। अभी संक्षेप में इतना ही, बाकी बाद में। द्वंद्वात्मक भौतिकवाद के अनुसार मनुष्य की चेतना उसकी भौतिक परिस्थितियों का परिणाम है तथा बदली चेतना बदली परिस्थितियों का, लेकिन परिस्थितियां अपने आप नहीं बदलतीं, मनुष्य के चैतन्य प्रयास से। परिस्थितियां बदलती रहीं और चेतना यानि सोच भी।

शिक्षा और ज्ञान 369 (कट्टरपंथ)

 जिस तरह इस्लामी कट्टरपंथ के विरोध के लिए तस्लीमा नसरीन को तालिबानी किस्म के जेहादियों की बर्बरता का सामना करना पड़ा है उसी तरह हिंदुत्व कट्टरपंथ के विरोध के लिए दाभोल्कर, पंसारे, कलबुर्गी, गौरी लंकेश को बजरंगी किस्मके जेहादियों की र्बरता का सामना पड़ा। तस्लीमा ने तो तालिबानी जेहादियों से भागकर जान बचाई लेकिन दाभोल्कर, पंसारे, कलबुर्गी, गौरी लंकेश भागे नहीं तथा बजरंगी जेहादियों ने उनको मार डाला। हर तरह के कट्टरपंथी एकसमान अमानवीय और बेहया होते हैं। एक तरह के कट्टरपंथ का विरोध और दूसरे तरह के कट्टरपंथ का समर्थन नैतिक दोगलेपन का परिचायक है।

Saturday, May 21, 2022

शिक्षा और ज्ञान 358 (सभ्यता)

 सभी सभ्यताएं आदिम कबीलों और कुटुंबों से ही निकली हैं और तमाम विभिन्नताओं के बावजूद एक दूसरे से मिलते हुए सामासिक रूप से आगे बढ़ी हैं। भारतीय सभ्यता अनेक आर्य-अनार्य कुटुंबों के वर्चस्व के संघर्ष-समागमों. विभाजन-सामासिकताओं की प्रक्रिया से गुजरकर निर्मित हुई हैं। हर सभ्यता में सदैव दो द्वंद्वात्मक प्रवृत्तियां काम करती हैं -- एक विभिन्नताओं के आधार पर सभ्यता को विघटित करने की और दूसरी विभिन्नताओं को समेकित कर सामासिकता विकसित करने की। पश्चिमी यूरोप में विभिन्नताओं के संघषों में सदियों के भीषण रक्तपात के बाद राष्ट्रीय सीमाएं वीजा-मुक्त बन गयी हैं। भारत में उपनिवेश विरोधी आंदोलन के दौरान जहां एक तरफ राष्ट्रीय आंदोलन की मुख्यधारा विभिन्नताओं को समेकित कर लोगों को भारतीय के रूप में संगठित कर रही थी वहीं दूसरी तरफ औपनिवेशिक शह पर आंदोलन विरोधी ताकतें उन्हें धर्म के नाम पर बांट रही थीं जिसकी परिणति देश के विध्वंसकारी अनैतिहासिक बंटवारे में हुई तथा जिस घाव के नासूर पता नहीं कितनी पीढ़ियों से रिसते रहेंगे। कहने का आशय यह कि किसी समुदाय की उत्पत्ति और विकास के संदर्भ में जन्मगत अस्मिता पर गर्व या शर्म करने की बजाय हमें मनुष्य होने की साझी अस्मिता को रेखांकित करना चाहिए, हमारे आदिम पुरखों ने विवेक के इस्तेमाल से खुद को पशुकुल से अलग करना शुरू किया। बाभन से इंसान बनने के मुहावरे में अहिर से इंसान बनना भी शामिल है। सादर।

मनुष्य अपना इतिहास खुद रचता है

 मनुष्य अपना इतिहास खुद रचता है

 मनुष्य अपना इतिहास खुद रचता है
लेकिन अपने चुने हुए हालात में नहीं
वक्त और हालात तो मिलते हैं उसे विरासत में
उनमें तब्दीली नियम है प्रकृति के गतिविज्ञान का
लेकिन तब्दीली की दशा और दिशा तय करता है
मनुष्य का सुविचारित चैतन्य सतत प्रयास
(ईमि:21.05.2022)