Friday, June 4, 2021

लल्ला पुराण 384 (जेहाद)

 Raj K Mishra हर कम्यूनल प्रोपेगेंडिस्ट की तरह सेक्युलरिज्म को जेहाद का कवर फायर (वह जो भी होता हो) मानना, प्रचारित करना आपकी समस्या है। मैं तो तालबानी और बजरंगी दोनों तरह के जेहाद को इंसानियत का दुश्मन मानता हूं और इस देश में फासीवाद का खतरा तालिबानी जेहाद से नहीं, बजरंगी जेहाद से है। कोई सवर्ण हिंदू जब अपने स्व के परमार्थबोध को तिलांजलि देकर स्वार्थबोध के वशीभूत होता है तो उसे कम्यूनलिज्म समाज का उद्धारक और सेकुलरिज्म विनाशक ही लगता है। लेकिन वास्तविक अर्थों में सुखी वही रहता है जो स्वार्थबोध पर परमार्थबोध को तरजीह देता है। मैं भी यदि स्वार्थबोध के वशीभूत होता तो तमाम अन्य मिश्राओं-शुक्लाओं की ही तरह ब्राह्मणवादी और हिंदुत्ववादी ही होता। और इस ग्रुप में भी गाली खाने की बजाय आप सबकी वाहवाही का आनंद लेता। लेकिन मैं अपने छात्रों को सिखाता आया हूं कि जब भी चुनाव सही होने और लोकप्रयता में हो तो सही होना चुनो, लोकप्रियता या अलोकप्रियता अल्पजीवी होती है। जब भी चुनाव सही होने या कठिनाई का सामना करने में हो तो सही होना चुनो, कठिनाइयां आसान हो जाएंगी या उनसे फर्क नहीं पड़ेगा। (Whenever there is choice between being correct and popularity, choose to be correct, popularity or unpopularity are short-lived. When ever there is choice between being correct or facing difficulty, choose to be correct, difficulties would ease out or would not matter.) And a teacher must teach by example, not by preaching. ( एक शिक्षक को मिशाल से पढ़ाना चाहिए, प्रवचन से नहीं।) मैं न तो एक सवर्ण के स्व के स्वार्थबोध में बजरंगी जेहाद का पक्षधर हूं, न ही तालिबानी जेहाद का पक्षधर हूं क्योंकि अन्याय का जवाब जवाबी अन्याय नहीं होता, बल्कि न्याय होता है। हिंदुत्व सांप्रदायिकता समाधान इस्लामी सांप्रदायिकता नहीं, बल्कि धर्मनिरपेक्षता है। सही कह रहे हैं मैं सबकुछ नहीं जानता, कोई भी सबकुछ नहीं जानता। लेकिन जो जानता हूं बेबात उसका या जेो नहीं जानता उसका भजन गाने का कोई तुक नहीं है क्योंकि मैं किसी भी प्रकार का अंधभक्त नहीं हूं। मैं बेबात वाम वाम भजन गाने वालों को टोकता रहता हूं, इसलिए खुद बेबात भजन गाने का काम नहीं कर सकता।


नाबालिग से शादी आज भी अमानवीय थी और कम उम्र आयशा से उस समय भी गलत ही रही होगी।


Raj K Mishra अंधभक्तों के बेबात वाम वाम अभुआने की तरह सेकुलर आयशा के दर्द के बारे में बेबात क्यों अभुआता रहे। अब आपने पूछा तो बता रहा हूं। ऊपर आयशा की बात लिखने के पहले ही इंटर दब गया और फिर संपादन के पहले चाय बनाने चला गया। वैसे कम उम्र में आयशा का पैगंबर बन चुके मुहम्मद से विवाह के विषय में कुछ कहने का नैतिक अधिकार मेरे पास नहीं है क्योंकि मेरा खुद बाल विवाह हुआ था, मैं 17 साल से कम का था और मेरी पत्नी 15 की। जीवन में एकमात्र कन्यादान मैंने 15 साल की उम्र में अपने से लगभग 5 साल छोटी रिश्ते की भतीजी का किया था। भतीजी के विवाह का मैंने विरोध नहीं किया, क्योंकि उस सांस्कृतिक माहौल में बिना चैतन्य प्रयास के बिना समाजीकरण से बनी सोचने की आदत से निर्मित चेतना का स्वरूप और स्तर ऐसा कि वह विवाह नॉर्मल लगा, जिसमें मैंने बहुत उत्साह से भाग लिया। अपनेने विवाह में बालविवाह की अवैधानिकता से तो नहीं, लेकिन अवांछनीयता से परिचित था और विद्रोह भी किया लेकिन चेतना के उस स्तर पर उसे तार्किक परिणति तक नहीं ले जा सका। विद्रोह और उसकी असफलता की कहानी लंबी है। फिर कभी। लेकिन अब तो यह 1300-1400 पुरानी बाद हो गयी, लेकिन मुहम्मद तो पैगंबर बन चुके थे उन्हें तो नजीर पेश करना था तो यह विवाह निश्चित ही अनुचित था। बर्नी पढ़ाने के लिए इस्लामी राजनैतिक सिद्धांत पर थोड़ा अध्ययन किया था, कभी लिखूंगा।

Thursday, June 3, 2021

लल्ला पुराण 383 (सांप्रदायिकता)

 पीयूष मिश्र दृष्टांत देकर बताइए वह उतना ही खतरनाक होता है जितना कम्यूनल। लेकिन सांप्रदायिक अंधभक्तों ने कम्यूनल एजेंडा को शातिराना ढंग से आगे बढ़ाने के लिए बात-बेबात सेकुलरिज्म की निंदा का भजन गाने का ट्रेंड शुरू किया है। वैसे भी फासीवाद का खतरा सदैव बहुसंख्यखक सांप्रदायिकता से होता है अल्पसंख्यक सांप्रदायिकता उसके एजेंट के रूप में पूरक सहायक की भूमिका अदा करती है।


Shalini Mishra सेकुलर के बारे में यह ज्ञान कहां से मिला? मानवीय़ता सेलेक्टिव नहीं होती अपनी पूर्णता में होती है। कोई भी कोई भी काम किसी मकसद से करता है, सेलेक्टिव मानवीयता में मेरा क्या मकसद हो सकता है? मैंने तो पूरी कीमत चुकाकर अभी तक का जीवन गलत को गलत और सच को सच बोलने की सनक में बिता दिया। सांप्रदायिक विद्वेष का जहर फैलाकर समाज को सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के आधार पर बांटने वाले सांप्रदायिक नरपिशाचों के जाल में जो नहीं फंसते उन्हें सेकुलर पर हमला करके तोड़ने की साजिश शुरू किया है। आप जैसे सीधे-शरीफ लोगों के दिमाग में बैठा दिया गया है कि सेकुलरिज्म ने देश का बंटाधार कर दिया है। आपने सोचा नहीं कि सेकुलरिज्म क्या है? कौन सेकुलर है? उसने क्या बंटाधार किया है? लेकिन अनजाने में ही आप जैसे लोग वह रटा भजन गाना शुरू कर देते हैं और अनचाहे ही समाज को सांप्रदायिक विद्वेष से प्रदूषित कर देश के टुकड़ेृ-टुकड़े अभियान का हिस्सा बन जाते हैं? ईमानदारी से बताइए कि सेकुलरिज्म से आप क्या समझती हैं, किन सेकुलरों को जानती हैं जिनमें रत्ती भर भी गलत को गलत बोलने की बात नहीं है और जिनकी मानवीयता सेलेक्टिव होती है? आपको यह भी सोचना पड़ेगा कि मावीयता और सेलेक्टिव मानवीयता से आप क्या समझती हैं? एक सुपर सीनियर और शिक्षक होने के नाते चाहता हूं कि कुछ भी राय बनाने के पहले उसमें शामिल अवधारणाओं पर सवाल करें। किसी भी ज्ञान की कुंजी है सवाल-दर-सवाल तथा कूपमंडूकता का रास्ता है अनुशरण। सवाल की शुरुआत अपने mindset से शुरू करनी पड़ेगी क्योंकि समाजीकरण के दौरान एक खास तरीके से सोचने की हमारी आदत पड़ जाती है, सोचने के तरीके की आदत पर सवाल करना पड़ेगा। बेटी को बेटा कह कर क्यों साबाशी दी जाती है बेटा को बेटी कह कर क्यों नहीं? ज्ञान की प्रक्रिया का जितना महत्वपूर्ण पहलू सीखना (learning) है उतना ही समाजीकरण के दौरान सोच का हिस्सा बनचुके अनचाहे मूल्यों को भूलना (unlearning)है। शुभाशीष एवं ळुभ कामनाएं।


पीयूष मिश्र अल्प संख्यक सांप्रदायिकता की प्रतिक्रिया के रूप में बहुसंख्यक सांप्रदायिकता का बचाव का कुतर्क बहुत सोची-समझी साजिश है, आप जैसे शरीफ लोग अनजाने में ही उस साजिश में शरीक हो जाते हैं। हमेशा मंसूबा देखा जाता है, अल्पसंख्यक सांप्रदायिकता का पक्ष लेने में मेरा क्या मकसद हो सकता है? सांप्रदायिक ध्रुवीकरण से किसे फायदा होता है? आरएसएस गिरोह के पास सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के अलावा क्या देशहित का आर्थिक-सामाजिक कार्यक्रम है? फासीवाद का खतरा हमेशा बहुसंख्यक सांप्रदायिकता से होता है तथा बहुसंख्यक समुदाय पर अल्पसंख्यक के खतरेका हव्वा आजमाई फासीवादी चाल है। जर्मनी में हिटलर ने यहूदियों के खिलाफ वैसा ही माहौल बनाया था जैसा संघी गिरोह यहां बना रहा है। सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के जाल में न फंसे हिंदुों पर फर्जी सेकुलर और अल्पसंख्यक तुष्टीकरण का आरोप लगाकर बदनाम कर ट्रोल करो। कौन सेकुलर है जो मुल्ले की हैवानियत की निंदा नहीं कर रहा है? या वह लड़की हिंदू की जगह मुसमान होती तो वह बलात्कार न करता? सोचिए और राय बनाने के पहले खुद से और खुद पर सवाल कीजिए अन्यथा अनजाने में ही देश को सांप्रदायिक फासीवाद के दमनचक्र में फंसाने की साजिश के मुहरे बन जाएंगे। स्व के परमार्थबोध को स्व के स्वार्थबोध पर तरजीह दीजिए और समाज को सांप्रदायिक प्रदूषण से बचाने में योगदान दीजिए।


इस तरह की पोस्ट्स शातिरानामढंग से फासीवादी सांप्रदायिक अपराधों की पक्षधरता है और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के जाल में फंसने से बचे लोगों को बदनाम करने की यह सोची समझी साजिश है। यदि वह जानबूझकर समाज में सांप्रदायिक विद्वेष फैलाकर देश तोड़ने और तबाह करने की सकाजिश में शामिल नहीं है तो किसी विवेकशील व्यक्ति को मालुम हो जाना चाहिए कि मेरे जैसे किसी धर्मनिरपेक्ष व्यक्ति का किसी एक धर्म, खासकर बहुसंख्यक धर्म को लक्ष्य बनाने में क्या मकसद हो सकता है जिसके नामपर सरकार समर्थित सांप्रदायिक फासीवादी तत्व अपराधिक रूप से आक्रामक हों। बहुसंख्यक पर अल्पसंख्यक के खतरे का हव्वा खड़ा करना पुरानी फासीवादी चाल है, जैसे हिटलर के अंधभक्तों ने जर्मनी में किया था और जैसा कि इस पोस्ट के लेखक जैसे छद्म भेषधारी सांप्रदायिक तत्व कर रहे हैं।

Wednesday, June 2, 2021

शिक्षा और ज्ञान 310(स्वतंत्रता, समानता, भाईचारा))

 "स्वतंत्रता, समानता और भाईचारा (Liberty, Equality and Fraternity)" के नारे के साथ संपन्न फ्रांसीसी क्रांति (1789) के वैचारिक जनक माने जाने वाले दार्शनिक रूसो की कालजयी पुस्तक 'सामाजिक संविदा (Social Contract)' की शुरुआत इस पंक्ति से होती है, " मनुष्य पैदा तो स्वतंत्र होता है लेकिन हरतरफ बेडियों में जकड़ जाता है (Man is born free but everywhere he is in chains)"। आज के भारत के संदर्भ में इसे इस तरह कहा जा सकता है कि मनुष्य पैदा तो इंसान होता है लेकिन पैदा होते ही उसे जन्म के संयोग से मुसलमान (शेख, सैयद, धुनिया, दर्जी, कुरैशी आदि)-हिंदू (बाभन, ठाकुर, अहिर, पासी, आदि) बना दिया जाता है और आर्थिक परिस्थितियों से अमीर-गरीब। कहने का मतलब इंसान पैदा तो स्वतंत्र होता है लेकिन समाज उसे परतंत्र बना देता है। अपने कृत्य को सुधारने की जिम्मेदारी भी समाज की है। इसका समाधान वह एक ऐसे समाज की रचना में खोजता है जिसमें व्यक्ति पहले जैसा स्वतंत्र हो सके। आर्थिक परिस्थितियों द्वारा निर्मित असमानता का उन्मूलन वर्गचेतना से लैश संगठित सर्वहारा क्रांति से ही संभव है। लेकिन जन्म के संयोग से निर्मित धर्म, जाति, लिंग आधारित असमानता तो हम व्यक्तिगत रूप से भी इस संयोग से समाज द्वारा थोपी गयी अस्मिता से मुक्त होकर पहले (जन्म के समय) जैसे इंसान बन कर खत्म कर सकते हैं, जिसे मुहावरे की भाषा में बाभन से इंसान बनना कहता हूं।

Tuesday, June 1, 2021

लल्ला पुराण 382(ज्ञान)

एक प्रिय मित्र ने कहा कि जो मुसलमान-ईसाई न हो वह हिंदू होता है और जो बाइबिल-कुरान में न हो, वह वेदों में है। उस पर :

जो ईशाई और मुसलमान नहीं है वह बौद्ध हो सकता है, नास्तिक हो सकता है, यह तो बहुत नकारात्मक और कुतर्की परिभाषा हुई। वैसे बाभन हिंदू होता है कि अहिर? दोनों हिंदू हैं तो बवाल क्यों? यदि आरक्षण को भीख और खैरात मानने वाले भी औऱ आरक्षण के संवैधानिक अधिकार वाले भी हिंदू हैं तो इतना आपसी विद्वेष क्यों? वेद तो बाइबिल और कुरान से हजारों साल पहले लिखे गए तो यह कैसे हुआ जो बाइबिल-कुरान से छूट गया वह समय से पीछे जाकर वेदों में लिखा गया? वैसे भी हमारे समतामूलक, प्रकृतिपूजक वैदिक पूर्वजों के हजारों साल बाद भौगोलिक इकाई के रूप में हिंदू शब्द की उत्पत्ति हुई। वेद की ऋचाओं में किसी ब्रह्मा-वि्ुष्णु किस्म के देवी-देवता का जिक्र नहीं है, राम-कृष्ण किस्म के पौराणिक चरित्रों का तो सवाल ही नहीं उठता। यूं ही कुछ भी लिख देने की आपसे उम्मीद नहीं थी। बाकी बुढ़ापे के नजदीक तो आप भी पहुंच ही रही हैं। बचपन और बुढ़ापे में ही नहीं जवानी में भी जानने के लिए लगातार हर बात पर सवाल करता रहा हूं परिणाम स्वरूप नास्तिक हो गया। मैं अपने छात्रों को पहली ही क्लास में बताता हूं, "Key to any knowledge is questioning, question anything and everything, beginning with your own mind set." पहला सवाल होता था कक्षा में खड़े होने को लेकर। किसी के पास संतोषजनक जवाब नहीं होता था, इसलिए मेरी क्लास में कोई खड़ा नहीं होता था। बिना खड़े हुए ही सभी सम्मान करते थे। इज्जत दान-दहेज में नहीं मिलती, कमाई जाती है और पारस्परिक होती है। दूसरी बात उन्हें बताता था कि "Learning is only one aspect of knowledge process, another more important aspect is unlearning. Question and unlearn the socially acquired values independent of your conscious self and replace them with rationally acquired ones with your conscious will." Unlearning की प्रक्रिया की शुरुआत लड़की-लड़के की थोपी हुई सामाजिक परिभाषा से होती थी। मेरी छात्राएं, मेरी बेटियों की तरह बेटा की शाबासी लेने से इंकार कर देती हैं। मेरी एक युवा मित्र ने आंटा गूथते हुए अपनी 4 साल की बेटी का वीडियो शेयर किया था। मैंने फोन करके उनसे ऐसा फिर न करने का आग्रह किया और वे मान गयीं। बच्चे तो कुछ भी नया करने में उत्साहित होते हैं, लेकिन इससे गलत संदेश जाता है कि आंटा गूंथना लड़कियों का काम है। बेटे की तस्वीर कोई आंटा गूंथते हुए नहीं शेयर करता। लगभग 15 साल पहले मेरी छोटी बेटी कक्षा 10 में रही होगी। पड़ोस में रहने वाली मेरी एक पत्रकार मित्र ने सलाह दिया कि बेटियों को किचेन का कुछ काम सिखा देना चाहिए। मेरी बेटी से एक महीने बड़ा उसका बेटा है, मैंने पूछा उसने उसे (अपने बेटे को) सिखा दिया क्या? तत्कालिक रूप से उसे यह बात बुरी लगी थी, लेकिन बाद में उसने इसकी तारीफ की। आप भी बच्चों को ज्ञानी बनाना चाहती हैं तो उन्हें हर बात पर सवाल करना सिखाइए। ज्यादातर मां-बाप और शिक्षक ज्ञान के भ्रम (कुज्ञान) के प्रभाव में बच्चों को लगातार सवाल करने के लिए प्रोत्साहित करने की बजाय हतोत्साहित करके कूप-मंडूकता की तरफ ढकेलते हैं। सादर।

Monday, May 31, 2021

शिक्षा और ज्ञान 309 (विज्ञान की संभावनाएं)

 जगत की ही तरह ज्ञान और विज्ञान की संभावनाएं भी अनंत है, आज जो जगत ज्ञात है कल तक वह अज्ञात था। ध्वनियों और इशारों से भाषा का अन्वेषण हुआ जो कि एक क्रांतिकारी अन्वेषण था, शब्दों के अन्वेषण ने भाषा को समृद्ध किया और ज्ञान की प्रक्रिया आगे बढ़ी। पाषाण युग में विज्ञान की सीमा पाषाण के यांत्रिक उपयोग की थी और पाषाण से अग्नि का अन्वेषण एक क्रांतिकारी अन्वेषण था जिसने नई चेतना विकसित की और ज्ञान की प्रक्रिया आगे बढ़ी। फल-फूल, कंदमूल से आगे शिकार जब आजीविका का साधन बना तो तीर-धनुष का अन्वेषण एक क्रांतिकारी अन्वेषण था। हर पीढ़ी पिछली पीढ़ी की उपलब्धियों को सहेज कर आगे बढ़ाती है तथा निरंतर प्रक्रिया में असीमित जगत को जानने की सीमित विज्ञान की पुरानी सीमाएं टूट कर नई सीमाएं बनती हैं। असीमित जगत का काफी हिस्सा विज्ञान द्वारा ज्ञात है, काफी अभी ज्ञात होना है। असीमित जगत को जानने की निरंतर प्रक्रिया में सीमित ज्ञान-विज्ञान की संभावनाएं अनंत हैं। जगत की ही तरह विज्ञान भी स्थिर नहीं गतिशील है और इतिहास की तरह अपनी यात्रा के गतिविज्ञान के नियम निरंतर विकसित करता रहता है।

बेतरतीब 103 (विवाह पुराण 5)

 सालगिरह की एक पोस्ट पर एक कमेंट का जवाब:

जी वयस्कता या विवाह की वैधानिक उम्र के लिहाज से हमारा बालविवाह था। उस समय भी हमें यह भान था कि बाल विवाह एक सामाजिक कुरीति है। मैं इंटर की परीक्षा दिया था लेकिन आगे की पढ़ाई भी करनी थी। कहीं लिखा है कि हमारा विरोध क्यों असफल हो गया। लेकिन जब विवाह के लिए राजी हो गए, भले ही under protest तो उसे निभाना भी था।
हमने विवाह के समय ही शादी निभाने का फैसला कर लिया था, इपिक्यूरियन दर्शन का प्रकृतिवाद बाद में पढ़ा कि प्रकृतिक नियमों (इस मामले में सामाजिक उत्तरदायित्व) और इच्छाओं की स्वतंत्रता में समन्वय स्थापित करना चाहिए। मेरी जब भी किसी लड़की से घनिष्ठता की गुंजाइश होती तो संदर्भ निर्मित कर उसे अपने वैवाहिक स्थिति और उसे निभाने के फैसले से अवगत करा देता था जिससे उसे भी पता रहे कि प्रेम की गुंजाइश में शादी की गुंजाइश नहीं है। इलाहाबाद में एक बहुत अच्छी दोस्त थी आशिकी की घनिष्ठता की गुंजाइश की मुझे कोई आशंका नहीं थी, इसलिए शादी की बात उसे नहीं बताया था। शादी के तीसरे साल जब गौना आया तो उसे लड्डू का डिब्बा दिया। उसे गौना का मतलब नहीं मालुम था बताने पर बहुत भला-बुरा सुनाया और इतना नाराज हुई कि वह हमारी आखिरी मुलाकात साबित हुई। गौने को सेकंड मैरेज कहने का तुक मुझे भी नहीं समझ में आता।

जेएनयू में पढ़ते हुए एक बार एक क्रांतिकारी संगठन की एक स्त्रीवादी कॉमरेड को मुझसे कुछ संगठनात्मक राजनैतिक डील करनी थी। उसके लिए उन्होंने भावनात्मक रूट पकड़ा। मैं हॉस्टल में married bachelor की तरह रहता था। उन्होंने अंदाज लगाया होगा कि पत्नी से अलग होना चाहता हूंगा, कमजोर नस समझ हाथ रख दिया, "Ish, your is kind of child marriage. You can easily get divorce". उनके स्त्रीवाद पर मेरा माथा ठनका। मैंने कहा, "Com, what is your interest. I have never flirted with or proposed you. In fact we have never shown any non-pollical interest towards each other. And what you are suggesting effectively means that if two people are victims of some regressive social custom, one co-victim should further victimize the more co-victim. And in patriarchy the woman is more co-victim. Great Marxist feminism!!!" झेंपकर सफाई देने लगीं कि मजाक कर रही थीं। खैर एक बात यहां साफ कर दूं कि मेरा नहीं सरोज जी का बड़प्पन है कि मेरे जैसे आवारा के साथ उन्होंने adjust किया। मेरे सभी स्त्री-पुरुष मित्र उनके प्रशंसक हैं।

मार्क्सवाद का एक प्रमुख सिद्धांत है, करनी-कथनी की एका (unity of theory and practice), जिसे मैं उसूलों को जीना (living the principles) कहता हूं। यदि आप पुरुषवादी व्यवस्था के अन्यायपूर्ण चरित्र को समझते हैं या यों कहें, यदि आप स्त्री-पुरुष समानता में विश्वास करते हैं तो वह दादी-मां, पत्नी-बेटियों के साथ आपके व्यवहार में परिलक्षित होना चाहिए। आपके सिद्धांतों की असली परख तभी होती है जब वह आप पर लागू हों।1988 में जब मुझे दूसरी बेटी के पैदा होने की खबर मिली तो मेरी जेब में 10 रु. की नोट थी, लेकिन लगा कि यदि अभी बेटी पैदा होने का तुरंत उत्सव नहीं मनाया तो लोग कहेंगे कि बड़ा स्त्रीवादी बनता है, दूसरी बेटी पैदा होते ही दब गया! तुरंत बाइक स्टार्ट किया और 1 हजार उधार लेने एक दोस्त के ऑफिस पहुंच गया। उस समय 1000 काफी होता था। यह कहानी कहीं लिख चुका हूं, कभी शेयर करूंगा। लंबा कमेंट हल्के-फुल्के नोट पर खत्म करता हूं। जेएनयू में एक बार अपनी एक बहुत अच्छी दोस्त से मजाक में पूछा कि यदि लड़कपन में मेरी शादी न हुई होती तो वह मुझसे शादी करती? उसने पलट कर जवाबी सवाल किया तुमसे दुनिया की कौन लड़की शादी करती?

Sunday, May 30, 2021

लल्ला पुराण 381 (भारतीय राष्ट्रीयता)

 स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान जब साम्राज्यवाद-विरोधी विचारधारा के रूप में भारतीय राष्ट्रवाद आकार ग्रहण कर रहा था तो औपनिवेशिक शासकों की शह पर उनकी बांटो-राज करो की नीति को कार्यरूप देने के लिए उनके दलालों ने हिंदू और मुस्लिम राष्ट्रवाद के नाम पर उसे विकृत और विखंडित करना शुरू कर दिया, जिसकी परिणति देश के विखंडन में हुई।