Friday, December 29, 2017

मजहब हमें सिखाता आपस में बैर करना

मजहब हमें सिखाता आपस में बैर करना
पैगंबर-अवतारों के नाम पर लड़ते ही रहना
सारे ही मजहब औरत को जागीर समझते हैं
कुछ पत्थरों से मारते हैं तो कुछ जिंदा जलाते हैं
कुछ नर्क का भय दिखाते हैं तो कुछ दोजख का
कुछ हत्याओं का जश्न मनाते हैं तो कुछ जेहाद का
भय और अज्ञान से पैदा होता है परवरदिगार
धर्म बन जाता है शोषण और दमन का हथियार
(ईमि: 29.12.2017)

Wednesday, December 27, 2017

बेतरतीब 37 (अटलबिहारी)

मैंने अटल जी के दो भाषण सुना है, एक 1969 में और दूसरा 1999 में। पहला जब 'युवा हृदय-सम्राट' थे दूसरा जब वे प्रधानमंत्री थे। 1969 में मैं दसवीं में टीडी कॉलेज जौनपुर में पढ़ता था और हॉस्टल के कुछ सीनियरों के साथ 10-20 बार शाखा भी जा चुका था,और अफवाहजन्य इतिहासबोध के कुछ बौद्धिक भी सुन चुका था। स्कर्ट टाइप का हाफपैंट मुझे बेहूदा लगता था और ड्रिल करने से चिढ़ थी, इसलिए स्वयंसेवक होते-होते बच गया। भूमिका यहीं खत्म करता हूं नहीं तो कहानी रह जाएगी। कई दिनों से रिक्शों पर भोंपू से प्रचार हो रहा था, 'युवाहृदय सम्राट' की सभा का। फूल-मालाओं और नोटों के 100 स्वागत द्वार बने थे। जौनपुर का राजा यादवेंद्र दत्त दूबे यमयलए था। वैसे तो यूपी-बिहार में कोई राज-घराने ही नहीं थे। तनकी भर बड़ियार जमींदार अपने को राजा रहते थे। 1967 में पहली बार जौनपुर से 5 यमयलए जनसंघ के जीते थे। खैर 14 साल के ब्राह्मण बालक (जनेऊ तोड़ चुका था, संस्कार-सोच इतनी जल्दी नहीं टूटते) को लोगों के हास्यबोध पर आश्चर्य हुआ। भीषण सूखा और तबाही मची थी, अमरीका से गेहूं-बजरा मागाया गया था। जिस क्रूर मस्खरी पर सबसे ज्यादा तालियां बजीं वह मुझे शब्दशः याद है। "आपके यहां शूखा पड़ गया..ऐ..। हुआ यों कि ....इंद्रजी और इंदिरा में लड़ाई हो गयी..। इंद्रजी जीत गएएए.. इंदिरा जी हार गईं.. सूखा पड़ गियाआआआ"। 1999 की भंडैती की कहानी फिर कभी।

दूसरे भाषण की बात भी बता दूं। पहले छोटी सी भूमिका। 1998 में जब अटलबिहारी बाजपेयी प्रधान मंत्री हुए, पढ़े-लिखे तमाम लोग कहने लगे, "अंततः भारत को एक युगद्रष्टा (विज़नरी) प्रधानमंत्री मिल गया"। मैं उनसे कहता था कि मैं जुए में विश्वास नहीं करता, न ही मुश्किल से मिली इस नौकरी के अलावा कोई संपत्ति है, लेकिन यह नौकरी दाव पर लगाकर दुनिया के सारे बुद्धिजीवियों को खुली चुनौती देता हूं कि उनके  कृत्यों; कथनों या तुकबंदियों से एक वाक्य या वाकया बता दें जो उनके युगद्रष्टा होने की तस्दीक करते हों। मैं 1942 में क्रांतिकारियों की मुखबिरी से लेकर 2004 में फील-गुड के शगूफे तक अनेकों वाक्य और वाकया उद्धृत कर सकता हूं जो साबित करते हैं कि वे देश और जनता के प्रति गद्दारी करते रहे हैं। 1996 तक वे स्वदेशी जागरण के मंच से एनरॉन का विरोध करते रहे और 1996 में 13 दिन के प्रधानमंत्री के रूप में उन्होने संसदीय नैतिकता को लात मारते हुए बिना विश्वासमत हासिल किए एक ही नीतिगत फैसला किया, एनरॉन को मुनाफे की काउंटर गारंटी देने का। 1992 में उन्होंने अयोध्या में भजन-कीर्तन का हलफनामा दिया और क्या किया, दुनिया जानती है। 1991 में नरसिंह राव और मनमोहन सरकार ने देश की परिसंपत्तियां और सार्वजनिक क्षेत्र को बेचने का काम लुके-छिपे करना शुरू किया था, 1998 में प्रधानमंत्री बनने के बाद खुली बिक्री के लिए विनिवेश मंत्रालय शुरू कर दिया, वैसे ही जैसे शिक्षा मंत्रालय को मानवसंसाधन विकास मंत्रालय बना दिया। भूमिका लंबी हो गयी, अब भाषण की बात पर आता हूं।
1999 हिंदू कॉलेज (दिल्ली विवि) की स्थापना के शताब्दी समारोह में अटल जी मुख्य अतिथि थे। अपना विरोध दर्ज करते हुए एक शिक्षिका, डॉ. त्रिप्ता वाही बांह पर काली पट्टी बांधकर कॉलेज आ रही थीं, उन्हें घर से कॉलेज के रास्ते में पुलिस ने रोक लिया और कार्यक्रम खत्म होने तक थाने में बैठाए रखा। कई बार शर्म की बात पर लोग गर्व करते हैं। हिंदू कॉलेज में छात्रसंघ की जगह संसद है, सारे छात्र जिसके सदस्य हैं। प्रिंसिपल के पास वीटो पावर है तथा उसके दो चहेते शिक्षक क्रमशः स्पीकर और डिप्टी स्पीकर होते हैं। प्रधानमंत्री का सीधे चुनाव होता है, वह अपने मंत्री नियुक्त करता है तथा हारा हुआ उम्मीदवार नेता विपक्ष होता है और साल में 1-2 बार स्पीकर संसद का सत्र बुलाता है और बजट वगैरह पर बहस होती है। छात्र संघ का काम होता है छात्रों की समस्याओं के लिए संघर्ष, लेकिन पीयमओ साल भर में एक ही काम करता है – वार्षिक उत्सव (मक्का) का आयोजन और स्पांसरशिप में दलाली खाना। एक वर्ष (1997 या 1998) पीयम नेता विपक्ष को हिस्सा दिए बिना अकेले ही दलाली हड़प जाना चाहता था तो ऑडीटोरियम में आग लग गई और उस साल मक्का का आयोजन ही नहीं हो सका। खैर जिन कॉलेजों में छात्रसंघ है और दिल्ली विवि छात्रसंघ (डूसू) भी वही करता है। पिछले 30-35 सालों में डूसू के नेतृत्व में किसी छात्र आंदोलन का कोई इतिहास नहीं है। कभी कभी कुछ हंगामे जरूर करता है, जैसे पिछली साल छात्रसंघ अध्यक्ष (एबीवीपी) ने लॉ फैकल्टी की डीन के साथ कम हाजिरी वाले छात्रों को परीक्षा प्रवेशपत्र न देने के लिए गाली-गलौच किया तथा श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स के एक शिक्षक की इसी कारण पिटाई कर दी। उससे पहले वाली साल डूसू अध्यक्ष, सत्येंद्र अवाना ने श्रीराम कॉलेज के ही फीजिकल एजूकेसन के प्रोफेसक की बाहरी लोगों को मुफ्त में स्वीमिंग पूल के इस्तेमाल की मनाही के चलते 10-12 गुंडों के साथ मिलकर हड्डी-पसली तोड़ दी थी। मुझे कश्मीर पर लिखने और बोलने के लिए गाली-गलौच के साथ फोन पर धमकी दी, बोला तुम्हारी ‘मुझसे मिलने में फटती क्यों है?’ मैंने कहा कि मेरी सारे गुंडे-मवालियों से फटती है। खैर गुंडे कत्तों की तरह कायर होते हैं झुंड में शेर हो जाते हैं, अकेले में पत्थर उठाने के नाटक से दुम दबाकर भाग जाते हैं। एक भूमिका खत्म करके भाषण पर आना चाहता था मगर दूसरी लंबी भूमिका हो गयी। इतने छोटे टेक्स्ट की 2 लंबी भूमिकाएं हो गयीं।
मंच पर कॉलेज का प्रधानमंत्री भी बैठा था। अटलजी के जिस भाषण पर सबसे ज्यादा तालियां बजीं, “यहां दो-दो प्रधानमंत्री बैठे हैं, लेकिन हमारा कोई झगड़ा नहईंईई, मैं वर्तमान हूं, ये भविष्य हैं और कुछ भूत भी बैठे होंगे। .. हमारे यहां नेता विपक्ष को मंत्री का दर्जा प्राप्त है, हम विरोध करने का भी पैसा देते ऐंएए”। और विरोध करने वाली एक शिक्षिका को गिरफ्तार कर लिया गया। उसके बाद टीचर्स असोसिएसन में, मैंने जैसे ही बोलना शुरू किया, “हमारे प्रधानमंत्री ने अपनी भड़ैतीपूर्ण शैली में......” इतना ही बोला था तब तक शोर-गुल के साथ दर्जनें प्वाइंट ऑफ ऑर्डर उठने लगे। मैं आगे बोल नहीं पाया। कुछ लोगों ने कहा मैंने प्रधानमंत्री और फलस्वरूप राष्ट्र का अपमान किया है, अपने शब्द वापस लूं। मैंने कहा कि मुझे नहीं मालुम किस विधा से कहे शब्द वापस लिये जा सकते हैं, कहिए तो अंग्रजी अनुवाद कर दूं, .. कॉमिकल स्टाइल में। लेकिन विरोध के लिए पैसा देने वाले शासन में, मैं शोर-गुल में एक वाक्य भी नहीं पूरा कर पाया। 2 वाक्यों का कमेंट सोचा था, लेकिन कलम आवारगी पर उतर आया। अपने आप से माफी, क्योंकि सुबह-सुबह एक लंबित लेख शुरू करना चाहता था कि अटल जी की भंड़ैती के चक्कर में फंस गया।
28.12.2017।


Tuesday, December 26, 2017

बेतरतीब 36 (गांव-देश 2)

धर्म और सांप्रदायिकता
ईश मिश्र
यह लेख फेसबुक पर अपने गांव बचपन के एक मित्र के बेटे की फेसबुक पर मेरी ‘हिंदू धर्म’ की आलोचना पर कमेंट के जवाब में लिखा गया।  

प्रिय शिव,
तुम्हारा सवाल कि मुसलमान अपने धर्म के बारे में आलोचना नहीं करता और हिंदू धर्म की बुराई से मुल्क के बाहर मुल्क की बदनामी होगी। पहली बात तुम्हारी दुनिया बहुत  छोटी है, कितने मुसलमानों को जानते हो? इतिहासकार प्रो. इर्फान हबीब के घर पर अनेकों बार कठमुल्ले पत्थरबाजी कर चुके हैं, वे मेरी तरह नास्तिक हैं। तुमने पढ़ा होगा पाकिस्तान में मशाल खान नामक तर्कवादी शोधछात्र की हॉस्टल में इस्लामी तालिबानों ने मॉबलिंचिंग कर मार दिया था। हिंदुत्व तालिबान (आरयसयस) और इस्लामी तालिबान का धर्म या धार्मिकता से कुछ नहीं लेना-देना है, इनका काम धर्मिक उंमाद फैलाकर धर्म के नाम पर राजनैतिक लामबंदी है। उत्तर भारत में गोरक्षा के नाम पर हिंदू वाहिनी के लंपट हत्याएं कर रहे हैं और मेघालय का भाजपाई मुख्यमंत्री प्रेस केफरेंस करके लोगों को आश्वस्त करता है कि वह गोमांस रियायती दरों पर उपलब्ध कराएगा। मणिपुर का एक भाजपाई यमयलए चुनाव प्रचार में गोहत्या करते हुए अपनी तस्वीर के साथ पोस्टर चिपकवाया था। गोवा के भजपाई मुख्यनमंत्री पार्रिकर ने भी लोगों को आश्वस्त किया कि राज्य में गोमांस की कमी नहीं होने दी जाएगी। इसलिए हिंदुत्व या तालिबान की आलोचना हिंदू धर्म या इस्लाम की आलोचना नहीं, धर्म के फासीवादी, राजनैतिक इस्तेमाल की आलोचना है। तुम इस खबर से वाकिफ ही हो कि गोंडा जिले में योगी की युवावाहिनी के दीक्षित जी गोहत्या करते पकड़े गए थे, न पकड़े जाते तो क्या होता? आसपास के कितने मुसलमान गांव जलते कितनी हत्याएं होतीं? दीक्षितजी पर गोरक्षकों का खून क्यों नहीं खौला? हैदराबाद में हिंदुत्व के सिपाही गोल टोपी पहनकर पाकिस्तानी झंडा फहराते पकड़े गए थे, हिंदुत्व राष्ट्रवादियों का खून तब भी नहीं खौला? उनका खून मुसलमानों और दलितों (ऊना, सहारनपुर) पर ही क्यों खौलता है?

तुम जानते ही हो कि जब भी घर जाता हूं, तुम्हारे घर मौका निकालकर कम-से-कम एक बार जरूर जाता हूं, लालू (तुम्हारे पिताजी) छात्रजीवन से ही मेरे मित्र हैं उनके तंत्र-मंत्र से मतभेदों के बावजूद। तुमसे कभी मुक्तसर बात नहीं हुई। तुम्हारे अग्रज, मुन्नू (आचार्य हर्षवर्धन) से बात होती थी, इसबार (जून, 2017) मैंने एक रात बाग की तुम्हारी गोशाला वाली कुटी पर बिताया, तुम्हारे अग्रज रामानंद ने मेरे मना करने पर भी अपनी मच्छरदानी मेरे विस्तर पर लगा दिया। पहली बार रामानंद से लंबी बात-चीत हुई। फिर वह समकालीन दुनिया में छपा शिक्षा और ज्ञान पर मेरा लंबा लेख पढ़ने लगा, मैं एक पुस्तक।  उपरोक्त पोस्ट एक कमेंट कि हिंदू राष्ट्र को भारतीय राष्ट्र मान लेना चाहिए, पर कमेंट है। हिंदू राष्ट्र का नारे संविधान के प्रक्कथन का उल्लंघन है और संवैधानिक जनतंत्र में संविधान में निष्ठा ही राष्ट्रवाद है इसलिए हिंदू-राष्ट्रवाद राष्ट्र-द्रोह। वैसे हिंदू तो कोई पैदा नहीं होता कोई बाभन पैदा होता है कोई चमार। दोनों एक-दूसरे से रोटी-बेटी का रिश्ता नहीं रखते। अपनी बात 2004 में गांव के एक अनुभव से खत्म करता हूं। गांव से हम और लालू चौराहे पर चाय पीने निकले, योजना सुम्हाडीह या पवई जाने का था, लालू को कुछ खरीदना था। गांव से निकलते ही 2 लोग और साथ हो लिए, 13 साल हो गए, भूल गया कौन? यह इस कहानी में महत्वपूर्ण भी नहीं है। गांव (सुलेमापुर) के चौराहे से पहलें राममिलन सिंह के घर के सामने ये लोग चमरौटी के सुआरथ (तत्कालीन प्रधानपति) से गांव की किसी ‘राजनीति’ पर बातचीत करने लगे। मैं आगे निकल गया और चौराहे पर पहली चाय की दुकान पर 4 चाय का ऑर्डर दे दिया। मुझे पता नहीं था कि दुकान सुआरथ की थी, पता होता तब भी मैं वहीं चाय पीता। लालू ने संध्या-वंदना और एक ने मुंह में गुटका होने के बहाने और एक ने किसी और बहाने वहां चाय पीने से इंकार कर दिया। सुम्हाडीह पहुंच कर हमने तीन-तीन चाय पी। अगले दिन गांव में यह खबर थी। अगली शाम मैं नरवा पे मधुसूदन भाई से मिलने जा रहा था। रास्ते में रामराज भाई के घर कोई कार्यक्रम था, बाहर भट्ठे पर भोजन पक रहा था। उन्होने मुझे रोक कर कहा कि यह सब दिल्ली में चलेगा, यहां नहीं। मैंने कहा क्यों? मै नियमित रहता नहीं लेकिन गांव जितना उनका है, उतना ही मेरा भी। रामराज जी ब्राह्मण होने के बावजूद कितने सच्चरित्र हैं जानते हो? संपत्ति के लिए उनकी विधवा भाभी को किसी मुसलमान ने नहीं, उन्होंने ही संपत्ति के लिए, अपने भांजे (विजय प्रताप तिवारी के भतीजे) त्रिलोकी (शायद यही नाम था, बचपन में ननिहाल आता था तो हम लोग साथ खेलते थे) के साथ मिलकर मार डाला था। सारा गांव जानता है। कुछ दिन उनके यहां लोगों ने खान-पान बंद कर दिया था, बाद में सब पाप मॉफ।  बताओ कौन हिंदू है, सुआरथ या उसकी दुकान पर चाय पीने से अपवित्र हो जाने वाले पंडित महेंद्रनाथ मिश्र? अगर दोनों हिंदू हैं तो यह भेदभाव क्यों? दलित महज वोट के लिए और दंगे करवाने के लिए हिंदू बन जाता है, वरना अछूत ही रहता है। तो बेटा हिंदू- मुसलमान से ऊपर उठकर चिंतनशील इंसान बनो। तालिबान और हिंदुत्व का धर्म से कुछ लाना-देना नहीं है, धर्म उनके लिए धर्मेंमादी राजनैतिक लामबंदी का साधन है। यह लोगों को हिंदू-मुसलमान; मंदिर-मस्जिद के विवाद में फंसाकर समाज के मुख्य अंकविरोध रोटी की समस्या से लोगों का ध्यान बंटाना है। मंदिर बनने से या दलितों और मुसलमानों को प्रताड़ित करने से रोजी-रोटी; गैर-बराबरी; गरीबी; नौकरियों की कटौती; ठेकेदारी आदि समस्याएं हल हो जाएंगी? देश के 1% के पास 99% संपत्ति पर कब्जा है। अडानी-अंबानी का विकास देश का विकास नहीं, विनाश है। लड़ाई गरीबी-अमीरी के बीच है, इसकी धार कुंद करने के लिए मंदिर-मस्जिद का मुद्दा इतना उछाला जाता है कि लोग धर्म की अफीम खाकर मगन रहें, हुक्मरान बेधड़क मुल्क-लूटते बेंचते रहें। बेटा, पढ़ो-लिखो, चिंतनशील इंसान बनो, धर्म को निजी पूजा-पाठ तक रखो, इसका राजनैतिक उपयोग मुल्क/मुल्कों को तबाह कर रहा है। इतिहास गवाह है, जब भी, जहां भी धर्म को राजनैतिक हथियार बनाया गया, वहां तबाही मची।
27.12.2017




लल्ला पुराण 171 (इवि के प्रोफेसरों का जातिवाद)

किसी ने एक लिस्ट जारी किया यौन उत्पीड़कों का, जिसमें न शिकायतकर्ता का पता है, न शिकायत का। लिस्टजारी करने वाली अपना काम करके फेसबुक एकाउंट बंद कर गायब हो गई। आप का नाम कोई कहीं छाप दे बिना किसी प्रमाण के, आप कैसे अपने को निर्दोष साबित करेंगे? जो लोग 1972-73 में इवि में थे वे तस्दीक करेंगे। एक दिन विज्ञान संकाय पहुंचते ही, गणित विभाग में क्लास था, गेट में घुसते ही हंगामा हो रहा था। पता चला कि बॉटनी के किसी प्रो. भटनागर ने किसी लड़की को 'उत्पीड़ित' किया है, किसीको पता नहीं। बॉटनी विभाग में तोड़-फोड़ होने लगा। तभी देखा यशपाल सोनी (सोनी छोले-भटूरे के मालिक का बेटा, अब मालिक) और वृंदा मिश्रा (गैंगवार में दिवंगत) 15-20 लोगों के साथ हॉकी लिए विभाग से निकल रहे थे। सोनी इंटर में पढ़ता था। दोनों एबीवीपी के बाहुबलियों में थे। एक शिवेंद्र तिवारी था 1974 में गायब हो गया अब तक पता नही चला। मैं एबीवीपी का प्रकाशनमंत्री था। विभाग में बीच-बीच में जोशी, मिश्र, पंत, पांडे के कमरों को छोड़कर भटनागर, श्रीवास्तव.. के कमरों में तोड़फोड़ और हाथापाई हुई। ठाकुर की पान की दुकान के ऊपर एबीवीपी का कार्यालय था। ऊपर गया तो बहस हो रही थी कि कायस्थों सालों को अभी और पेलना है (शिवेंद्र तिवारी), अगला नंबर प्रो. कृष्णाजी (भौतिकशास्त्र, कायस्थ लॉबी का नेता)। पता चला इसके मास्टर माइंड ब्राह्मण लॉबी के नेता इतिहास के जीआर शर्मा थे। मुझे पहसी बार लपता चला कि भटनागर कायस्थ होते हैं। वह एबीवीपी के राष्ट्रवाद से वितृष्णा की शुरुआत थी और उच्च शिक्षा और ज्ञान के अंतरविरोध से पहला परिचय। मेैं अब्राह्मणीकृत हो चुका था और सोचता था कि जात-पात गांव के अपढ लोगों का मामला है और प्रोफेसर जातिगत आधार पर गोलबंदी की जहालत करते होंगे, यह मेरे लिए कल्चरल शॉक था। एबीवीपी संविधान कहता है कि यह एक स्वतंत्र छात्र संगठन है जबकि संगठन मंत्री से ऊपर इसके सारे 'अधिकारी' आरयसयस के होलटाइमर थे। तभी मुझे पता चला यह आरयसयस की छात्र शाखा है। आरयसयस से जौनपुर में बाल स्वयंसेवक के रूप में वहां के प्रचारक वीरेश्वर जी (विहिप का मौजूदा राष्ट्रीय सचिव वीरेश्वर द्विवेदी) के 'बालप्रेम' से पहले ही वितृष्णा होे चुकी थी। भटनागर की घटना से ही एबीवीपी से मोहभंग शुरू हुआ और जल्दी ही उस नर्क से निकल आया। इस जून में मैं सोनी की दुकान के सामने के होटल में शादी में गया था तो उसके बेटे से मिला, पता चला कि वह शिवेंद्र तिवारी होने से बच गया।

Monday, December 25, 2017

लल्ला पुराण 170 (हिंदू-मुसलमान)

तुम हिंदू-मुसलमान का ही फर्क बताओगे। हम सब की प्रथमिक पहचान चिंतनशील इंसान की है, बाकी पहचानें संयोगात हैं। दिमाग का इस्तेमाल ही मनुष्य को पशुकुल से अलग करता है, उसका निलंबन मनुष्य को पशुकुल में वापस भेज देता है, दो पैरों पर चलने के बावजूद। तुम क्या बताओगे इन क्रांतिकारी बच्चों के बारे में मैं इन्हें 10 साल से करीब से जानता हूं। इन दोनों की हिंदू-मुसलमान से नास्तिकता और मार्क्सवाद की यात्रा में सहायक और गवाह रहा हूं। देश के कुछ फीसदी छात्र भी उमर-अनिर्बन से हो जाते तो इंकलाब की राह आसान हो जाती। आपका दिन मंगलमय हो।

लल्ला पुराण 169 (धर्म परिवर्तन)

सहमत। दर-असल शिल्पी और कारीगर तपके आर्थिक रूप से स्वतंत्र थे, लेकिन सामाजिक रूप से नहीं। उन्होंने सोचा इस्लाम में तो सब बराबर हैं और धर्म परिवर्तन कर लिया, लेकिन जाति ने वहां भी उनका साथ नहीं छोड़ा। इसीलिए आप पाएंगे कि मुसलमानों में दर्जी, बढ़ई, लोहार, नाई, धोबी .. ही बहुसंख्यक हैं, शेख, सैयद, पठान... अलिप संख्यक। धर्मांतरण छोटी जातियों ने ही ज्यादा किया। बड़ी जातियां या तो जाति से बहिष्कृत होने पर या राजनैतिक लाभ की लालच में। आजमगढ़ जिले में मेरे गांव के पास में एक गांव है भरचकिया। एक लड़का मिडिल स्कूल में हमारा सीनियर था, एक पांडेय, नाम नहीं याद है, न ही उसके बाद कभी मुलाकात है। ऐसे मामले चर्चित हो जाते हैं, इसलिए जानता हूं। बंबई जाकर उसने कोई कार-बार शुरू किया और एक मुसलमान लड़की से इश्क हो गया शादी कर ली। घर (और संपत्ति) तथा जाति से उसे निकाल दिया गया। बिना धर्म के जीवन उसे अंदाज नहीं था, मुसलमान बन गया (सैयद)। पिता की श्राद्ध में शामिल होने पूरे ताम-झाम के साथ घर आया, उसे श्राद्ध में शामिल नहीं होने दिया गया। आजमगढ़ शहर के संस्थापक, रौतेरा रियासत के रापूत रजवाड़े का राजा थे (नाम दरियाफ्त करके बताऊंगा)। उन्हे मुसलमानों के साथ खान-पान के चलते जाति से निकाल दिया गया और वे मुसलमान बन गए। उनके खानदान और रियासत के ज्यादातर रापूत उन्ही के साथ मुसलमान बन गए। उनके एक बेटे का हिंदू नाम था और दूसरे का आज़म। रौतेरे अपने को मुसलमान कम, रौतेरा ज्यादा कहते हैं और छोटी जाति के मुसलमानों के साथ रोटी का तो रिश्ता रखते हैं, बेटी का नहीं। 'घर वापसी' का रास्ता बंद है क्योंकि वापस किस जाति में शामिल होंगे, क्योंकि हिंदू अपने आप में जातियों के समुच्चय के अलावा कुछ और नहीं है।

लल्ला पुराण 168 (हिंदू-मुलमान)

इस कविता में हिंदू-मुसलमान का कोई जिक्र नहीं है, लेकिन कुछ के मगज में इतना भूसा भरा होता है कि उन्हें हिंदू-मुसलमान से ऊपर इंसान दिखता नहीं। पढ़-लिख कर दिमाग को विषय पर बोलने लायक बनाते नहीं, कोई भी चर्चा हो, विषयांतर से विमर्श विकृत करने के उद्देश्य से या तो हिंदू-मुस्लिम अभुआने लगते हैं या वामी कौमी। मैं भी इन ठस दिमागियों को हिंदू-मुसलमान से इंसान बनाने यानि रेगिस्तान में मोती तलाशने जैसे असंभव काम में लग जाता हूं, लेकिन असंभव महज एक सैद्धांतिक अवधारणा है।