लोहिया ने 1960 के दशक में कहा था, ज़िंदा क़ौमें 5 साल इंतजार नहीं करतीं. लेकिन हम ज़िंदा क़ौम हैं कि नहीं, कई बार शक होने लगता है. जनता की त्राहि-त्राहि के बीच भक्त पंजीरी खाकर भजन गा रहे हैं। जबान फिसल गई 50 हफ्ते को 50 दिन कह गये वज़ीरे-आज़म. अब कहेंगे, 'भाई और बहनों, इंसान की जुबान कभी-कभी फिसलती है कि नहीं?' "फिसलती है". 'मैं, एक लखटकिया सूट वाला फकीर हूं कि नहीं?' "हूं". 'फकीर भी इंसान होता है कि नहीं?' "होता है". 'मैं इंसान हूं कि नहीं' चुप्पी. 'हूं कि नहीं?' चुप्पी 'बोलिए भाइयों और बहनों, मैं इंसान हूं कि नहीं?, फिर चुप्पी. वज़ीर-ए-आज़म ने सशस्त्र सुरक्षाकवच की तरफ इशारा कर ललकार-हुंकार शैली की बुलंद आवाज में उवाचा, 'भाइयों और बहनों मैं इंसान हूं कि नहीं?' सभी बुलंद आवाज में बोल पड़े, "मैं इंसान हूं". वज़ीर-ए-आज़म वाक्य में कर्ता और क्रिया के फर्स्ट-थर्ड परसन के चक्कर में न पड़, जवाब को हां मान लिया. 'तो भाइयों और बहनों, मैं भी इंसान हूं, इंसान की जुबान फिसलती है, तो भाइयों और बहनों मेरी भी फिसल गई. तो भाइयों और बहनों, मैं बेईमानों को छोड़ूंगा नहीं, एक-एक का संहार करूंगा, 50 दिन की बजाय 50 हफ्ते भले लग जाएं. तो भाइयों और बहनों बेईमान राष्ट्र के दुश्मन हैं कि नहीं?' "हैं". उनका संहार होना चाहिए कि नहीं?' "होना चाहिएि" 'तो भाइयों-बहनों नोटबंदी के चलते बैंकों की कतारों में कालाधन सफेद करने के चक्कर में बहुत से बेईमान मरे कि नहीं?' तब तक भूख और भाषण के प्रकोप से श्रोता बेहोश हो गए थे और लाउडस्पीकर से आवाज आने लगी, "मरे, मरे, मरे". 'अभी तो ये शुरुआत है'.
Wednesday, December 28, 2016
नोटबंदी 9
Karan Singh Chauhanआत्महत्याओं पर आंसू बहाते हैं, सोहर की तरह नहीं गाते। मैं आपको व्यक्तिगत रूप से नहीं जानता, आपके लेखों और साहित्यिक मित्रों में आपकी चर्चा से ही जानता हूं. लेकिन अडानी-अंबानियों के 12 लाख करोड़ के बैंको से लूट के कारण बैंकिंग संकट से उबरने के लिए सारे गरीब-गुरबा की मेहनत की कमाई जब्त कर, बैकडोर से रिटेल में यफडीआई का रास्ता तैयार कर मुल्क को गंभीर आर्थिक संकट में ढकेलने की नोटबंदी की साजिश आप की समझ में नहीं आती तो आपकी बौद्धिक ईमानदारी संदेहास्पद दिखती है. छोटे-मुह बड़ी बात हो गयी हो तो मॉफ कीजिएगा. सादर.
नोटबंदी 8
इतना तवज्जो देने के लिए आभार, कर्ण सिंह चौहान जी. मैंने जगदीश्वर का वह लेख पढ़ा था और मुझे वह व्यंग्य सा लगा था. मैं पॉलिटिकल इकॉनमी का विद्यार्थी हूं और विश्वबैंक पालित 'न्यू पॉलिटिकल इकॉनमी' के अर्थशास्त्रियों द्वारा तीसरी दुनिया में निर्दयता से 'आर्थिक सुधार' लागू करने के सझाए विचारों और रणनीतियों के संदर्भ में इस पर एक लेख लिख रहा हूं. आपके आकलन से मैं अंशतः सहमत हूं कि काफी लोग, खासकर पढ़े-लिखे सवर्ण, सोचते हैं कि इससे अंततः भ्रष्टाचार खत्म हो जाएगा, इसके पीछे उनके पास तर्क नहीं है, मोदीजी की चमत्कारितक क्षमताओं में उनकी आस्था है. ऐतिहासित तथ्यों और दक्षिणपंथी उग्रवाद की अपनी समझ के आधार पर कह सकता हूं कि भक्तिभाव प्रधान इस देश में मोदी गिरोह जीते या हारे लेकिन देश की हार होगी, इसलिए नोटबंदी एक देशद्रोही फैसला है.
Saturday, December 24, 2016
स्वयंभू
ऐसा ही फरेबी एक शख्स था स्वयंभू भगवान
कहते किसी द्वापर युग में
आज भी मानते भगवान उसको इस कलियुग में
था शेर सा खूंखार लोमड़ी सा चालाक
वाक्पटुता से कर देता था लोगों को अवाक
था उसके पास एक अद्वितीय क्षेपक अस्त्र
दूर से ही कर सकता था दुश्मन को त्रस्त
नाम रखा था उसका नरसंहारी सुदर्शन चक्र
पला-बढ़ा वह एक पशुपालक परिवार में
बचपन में करता था गाय बृंदाबन में
चतुराई से खेल खेल-चुटकुलों में
सरमौर बन जाता साथी चरवाहों में
चुराता था दही लगाता था औरों का नाम
कहावत है बद अच्छा बुरा है बदनाम
जैसे जैसे बड़ा होता गया
लड़कियों का चहेता बनता गया
करता था उनके कपड़े चुराने की क्रीड़ा
रचता था उनके साथ रासलीला
सहता था परनारी गमन के आरोप की पीड़ा
अदालत ने शिकायतियों पर लगाया प्रत्यारोप
घोषित किया उसे सब आरोपों से निर्दोष
जवानी तक पूरे गांव का हो गया वह बेत़ाज बादशाह
ख़ाहिश मगर थी उसकी बनने की चक्रवर्ती सम्राट
इसके लिए उसने दूरगामी योजना बनाया
एक छोटे से रजवाड़े को कर्मभूमि बनाया
पहुचते दिखाया कुछ चमत्कारी कारनामें
सर्वज्ञ बन बैठ गया परदेश के चिलमन में
चली फिर उसने एक अचूक चाल
बिछाया राजकुल में फूट का जाल
कराने गया बनकर बिचौलिया दावेदारों में समझौता
दिलाया दोनों से रणभूमि में मिलने का आपसी न्योता
बनाया अपना भक्त था जो सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर
साबित किया था मछली की आंख भेदकर
जंगखोरी जमकर किया गुणगान
युद्ध कर्म को बताया दैविक विधान
कहा खून-खराबे में फायदा ही फायदा है
जीतने पर राज हारने पर स्वर्ग बदा है
करने लगा धनुर्धर युद्ध के प्रलयंकारी परिणामों की बात
दिखाने लगा सगे-संबंधियों से मोह-माया ओ नैतिक जज्बात
देखा स्वघोषित प्रभु ने जब धनुर्धर की भावना युद्ध-विरक्ति की
दिखलाया अपना विराट रूप और माया जादुई शक्ति की
उंगलिओं पर घूमने लगा महान सुदर्शन चक्र
देखा धनुर्धर को करके आंखें थोड़ा वक्र
कहा मैं ही हूं भगवान श्रृष्टि रचने वाला
दुनिया को वर्णाश्रम की सौगात देने वाला
हुआ दोनों पक्षों में खून खराबा घमासान
हुंकार-ललकारों से गूंजा साराआसमान
गिरने लगे धरती पर बड़े-बड़े महारथी ऐसे
आंधी में पेड़ों से से फल गिरते हों जैसे
खुशी से नाचने लगे आसमान में चील्ह-बाज
मानव-मांस है जिनके भोजनों में सरताज
चंद दिनों में धरती बन गई सुनसान श्मसान
हो गई कोख उसकी जैसे एक टापू वीरान
प्रलय के बाद शांत था धरती-आसमान
पूरा किया उसने चक्रवर्ती का अरमान
बनाया राजधानी समृद्ध द्वारका नगरी में
करके विवाह एक कुलीन राजकुमारी से
स्थापित किया उसने विशाल यदुबंशी साम्राज्य
लोगों की भक्तिभाव से करता रहा एकक्षत्र राज्य
लेकिन है प्रकृति का एक ऐतिहासिक नियम
टूटता है लोगों का कभी-न-कभी भक्ति से भ्रम
करता रहा वह दिमागों पर तब तलक राज
खुला नहीं जब तक उसकी खुदाई का राज़
सिखाया था जो औरों को कुनबाई रक्तपात
यदुवंशियों ने भी कर लिया आत्मसात
कहावत है मियां के सिर मियां का लात
छिड़ गया भयानक गृहयुद्ध द्वारिका में
छिप गए खुदा घनी राज वाटिका में
जैसे ही हटा खुदा से किलेबंदी का घेरा
बेनकाब हो गया उसकी खुदाई का चेहरा
एक बहेलिए ने उसे मार गिराया
चक्रसुदर्शन किसी काम न आया
(अधूरी. क्या भाई बोधिसत्व जी आपने खुदाई पर ऐसा उकसाया कि डेडलाइन की नैतिकता भूल कर, कलम आवारा हो गया, सठियाए लोगों का कलम भी उन्ही जैसी आवारगी करता है.)
(ईमि: 24.12.2016)
Friday, December 23, 2016
मोदीनामा
मितरों मैं हूं चायवाला नरेंद्र दामोदर मोदी
सामासिक संस्कृति की कब्र हमने खोदी
देते हैं ऐसे-ऐसे दिलफेंक बयान
फेल हो जाते खुदाओं के फरमान
सूली पर चढ़ा देना मुझको ताजशाही के सौ दिन बाद
किया न अगर पंद्रह-पंद्रह पेटी से हर घर को आबाद
मिली न पेटी किसी को हजार दिन बाद
समझना न इससे मुझे महज जुमलेबाज
लटका नहीं सकते वैसे तुम मुझे शूली पे
रहता हूं मैं ज़ेड-प्लस की किलाबंदी में
ले आता मैं विदेश से अपार काला धन
विपक्ष बन गया मगर रास्ते की अड़चन
करता जब तक मुल्क काले धन से आबाद
राष्ट्रवाद पर लगा गुर्राने नापाक आतंकवाद
काले धन पर पलते हैं आतंकवादी और नक्सल
नोटबंदी से ठिकाने लाऊंगा इनकी अकल
मितरों अद्वितीय है राष्ट्र के लिए यह आत्मबलिदान
बैंकों की कतारों में दे रहे लोग देशभक्ति का इम्तहान
नमकहलाली के उसूलों से अटका विदेशीे कालेधन का वादा
अडानी की जहाज में चलने का है कुछ अलग ही फायदा
भूल जाइए मितरों विदेशी काले-पीले धन की बात
पैदा कीजिए काले धन केराष्ट्रवादी स्वदेशी जज्बात
बहुत से काले बाजारिए भेष बदल चीथड़ों में घूमते हैं
रिक्शा या ऑटो चलाकर भोली जनता को लूटते हैं
इसीलिए मितरों मैंने फेंका नोटबंदी का अचूक जाल
भूखे-नंगे ही नहीं मध्यवर्गीय कालाबाजारियों का भी काल
नोटबंदी ने लगा दिया कालाबाजारियों को लंबी लंबी कतारों में
खंघाल कर काले धन की पाई-पाई रख दिया बैंक लॉकरों में
मितरों था देश में बैंकों में नगदी का संकट विकास में बाधा
कुछ देशभक्त पूरा न कर सके बैंकों से कर्ज लौटाने वादा
टल गया फिलहाल देश से बैंकों के दिवालिएपन का संकट
भारतमाता की खातिर झेलिए थोड़ा और भुखमरी का कष्ट
किया था पंद्रह पेटी विदेशी काले धन का वायदा
मिलेगा हर किसी को देशी काले धन का फायदा
विदेशी काले धन के लिए रखा था सौ दिन की मियाद
देशी काले धन का वायदा महज पचास दिन बाद
शूली पर चढ़ाने की तब की थी गुजारिश
ज़िंदा जलाने की करता हूं अबकी सिफारिश
मितरों देख रहा हूं नहीं कमती बैंकों की कतार
देशभक्ति की परीक्षा देनी पड़ती बार बार
पांच दिन बाद हो जाएगी पूरी पचास दिन की मियाद
करूंगा का मुल्क से तब कोई नई राष्ट्रवादी फरियाद
इस बार भी आप ज़िंदा जलाने का अपना फर्ज न निभा पाएंगे
जबतक है सिर पर ताज़ हम ज़ेड-प्लस से बाहर न आएंगे
पांच साल नाकाफी है मिटाने को 70 साल की देशद्रोही दुर्गंध
अगले पांच साल में मितरों फैला दूंगा राष्ट्रवादीे चंदन की सुगंध
मांगता हूं पिछले पांच सालों की भूलचूक की राष्ट्रवादी मॉफी
अगले पांच सालों में लगाऊंगा चिलम में हिंदू राष्ट्र की साफी
(यूं ही)
(ईमि : 24.12.2016)
Wednesday, December 21, 2016
International Proletariat 56
Capitalism has never been national, it uses the ideology of nationalism to rein in the working class. Capital is global in the sense it is no more geo-centric either in terms of its source or investment. I am a worker oppressed by global capital and hence I have no nation. Except the capitalist and professional revolutionaries we all are condemned to do alienated labor, what we ought to keep in mind is the task of minimizing the alienation and eventually end it by overthrowing capitalism, now in its most vulgar form and repalce it with the only alternative, the socialism. My solidarity with a Pakistani or American workers is as intense as my hatred to Indian sharks sucking the blood of workers with state assistance as Wall Mart.
शिक्षा और ज्ञान 95
बोधसत्व की एक पोस्ट पर मेरे एक कमेंट से नाराज होकर एक भक्त ने मेरे घर वालों पर मेरे दिमाग का इलाज न कराने की तोहमत लगाया, उस पर अपना कमेंट शेयर कर रहा हूं.
हमारे परिवार वालों ने यज्ञोपवीत पहनाकर दिमाग को ब्राह्मण-ज्ञान से सिंचित करने की कोशिस की थी लेकिन 13-14 साल की उम्र में 3 धागों को तोड़कर मेरे दिमाग ने मुझे बाभन से इंसान बनने का रास्ता बताया. रास्ता वैसे आसान नहीं है, सोचने का दुस्साहस और अपने विवेक के इस्तेमाल की हिम्मत जुटानी पड़ती है. शाखा का प्रशिक्षण दिमाग कुंद कर देता है. किन हिंदुओं पर किसके अत्याचार की बात कर रहे हैं? कौन है हिंदू, ब्राह्मण या शूद्र? अगर शूद्र भी हिंदू है और ब्राह्मण भी तब तो हिंदू ही हिंदुओं पर हजारों साल अमानवीय अत्याचार करते रहे हैं, उन्हें अछूत और अंत्यज बनाकर. जहां तक मेरे जेयनयू के होने के नाते मेरी निष्पक्षता का सवाल है, तो Sudarshan Pandey जी, निष्पक्षता एक ढोंग है. मैं बिल्कुल पक्षधर हूं, परंपरा और पोंगापंथी के विरुद्ध विवेक और तर्क का; सांप्रदायिक नफरत के विरुद्ध जनवादी सामाजिक चेतना का; कॉरपोरेटी लूट के विरुद्ध उत्पीड़ितों के संघर्ष का. आप ब्राह्मणवादी कुतर्कों से अपनी निष्पक्षता साबित कर रहे हैं. दोगलापन फासीवादी सोच का अभिन्न अंग है. जेयनयू का भूत भक्तों के सिर से अभी नहीं उतरा? ऐडमिशन मिल गया होता तो आप भी बाभन से इंसान बन गए होते, हिदुओं पर अत्याचार का प्रलाप न कर रहे होते.
Subscribe to:
Posts (Atom)
