Thursday, June 11, 2015

शामे ग़म तेरी कसम

शामे ग़म तेरी कसम ये शाम तुम्हारे नाम 
करता हूं जब भी ग़म-ए-जहां का हिसाब
खुल जाती है तुम्हारी यादों की किताब
याद आती है कही-अनकही बातें बेहिसाब
सोचता हूं जब भी रहबरी यादों की नाव में
कोलाहल मच जाता है सपनों के गांव में 
(इमिः12.06.201

Monday, June 8, 2015

वह भी मर जाता है शनैः शनैंः

पाब्लो नरूद की 1 कालजयी कविता से प्रेरितः

वह भी मर जाता है शनैः शनैंः
खोजता है सुरक्षा जो डरकर जीने में
और समझौता परस्ती में सुख
ईयमआई से त्रस्त धनी नौकरों की तरह
(ईमिः09.06.2015)


Sunday, June 7, 2015

सियासत 14

Mahrukh Jafar आपकी बात कि इंसान अपने कर्मों की सजा इसी दुनिया में काट कर जाता है, संयोगवश कभी सही हो सकती है, अक्सर उल्टा ही होता है. 1990-91 में मनमोहन ने नरसिंह के साथ मिलकर मुल्क बेचना शुरू किया उसके फलस्वरूप 1904 में खुलकर विश्वबैंक की दलाली का मौका मिला जो 10 साल रहा तथा जबतक जियेगा, लुटियन्स दिल्ली में सरकारी खर्च से खाकी सुरक्षा में कई एकड़ जमीन पर काबिज रहेगा. अटल ने मनमोहन द्वारा शुरू मुल्क की नीलामी को तेज कर दिया, वह भी जब तक जियेगा सरकारी पैसे से लुटियन्स दिल्ली में एक सुरक्षित कोठी में काबिज रहेगा. अभूतपूर्व नरसंहार का अायोजन करके मोदी 14 साल गुजरात लुटाता रहा जिससे अब मुल्क की खुलेआम नीलामी का मौका मिल गया. बाजपेयी-मनमोहन-मोदी कैसे भी मरें इनके गुनाहों की सजा मुल्क इंकिलाब आने तक भोगता रहेगा.

सियासत 13

Akshay Bhatt राष्ट्र प्रेम यानि राष्ट्र से प्रेम या किसी से भी प्रेम बुरी बात नहीं है लेकिन अपने प्रेम-पात्र को जानना तो जरूरी है. शुरू से ही यही पूछ रहा हूं, यह राष्ट्रवाद-राष्ट्रप्रेम ठोस शब्दों में क्या है? क्या ठोस रूपरेखा है राष्ट्र-प्रेम या इंसानियत प्रेम से. हिटलर ने राष्ट्रवाद के नाम पर मानवता तथा इतिहास के विरुद्ध भयानकतम अपराध किया. राष्ट्रवाद के नाम पर अंग्रेजी शासक वर्ग दुनिया की तमाम अाबादी पर ज़ुल्म ढाता रहा. करोड़ो यूरोप वासियों, अमरीकियों के व्यापक युद्ध विरोधी प्रदर्शनों के बावजूद, कॉरपेरेटी दलाल अमेरिकी शासन अमेरिकी राष्ट्र के हितों तथा मानवता की रक्षा मे अफगानिस्तान से लेकर लीबिया तक तबाही मचा रहा है. इन अमूर्त, अपरिभाषित नारों पर मौलिकता का अापका दावा या तो बेइमानी है या अनभिज्ञता का परिणाम. अाधुनिक इतिहास के सारे नारेबाज नेता इन्ही अमूर्त, अपरिभाषित नारों की लफ्फाजी से भोले-भाले अामजन को गुमराह करते तथा लड़ाते रहे हैं. यदि वाकई कुछ मौलिक योगदान देना चाहते हैं विचारों तथा कर्म से तो पहली जरूरत है, तथ्यो-तर्कों के आधार पर इतिहास की समझ, तभी अाप बौद्धिक तथा सामाजिक विकास में सार्थक योगदान दे सकेंगे. चेखव ने कहा था कि कला के लिए कला अपराध है, उसी तरह बहस के लिए बहस अपराध है. मेरे पास नष्ट करने के लिए समय नहीं है, समय निवेश करता हूं. हर निवेश लाभकारी नहीं होता तथा अलाभकारी निवेश बंद कर देना चाहिए. पढ़ो, चिंतन-मनन करो, वैज्ञानिक आधार पर समाज को समझने की कोशिस करो. अच्छी नीयत एक सापेक्ष प्रवृत्ति है तथा ईश्वर एक मानव निर्मित अवधारणा औप कमजोर का आलंब है. शुभकामना.

Saturday, June 6, 2015

शिक्षा और ज्ञान 58

Akshay Bhatt जैसे धर्म सामंतवाद की विचारधारा था उसी तरह राष्ट्रवाद पूंजीवाद की विचारधारा है जिसकी अवधारणा पूंजीवाद की जरूरतों के अनुसार बदलती रहती है. पूंजी के संकट के समय वह फासीवाद का रूप धारण कर लेती है. किसी भी विचार की शुरुआत परिभाषा से होती है, अमूर्त नारे उछालना लफ्फाजी है जैसा मोदी कर रहा है. अापका राष्ट्रवाद मोदी के राष्ट्रवाद स कैसे अलग है बताना पड़ेगा. मानवतावाद क्या है? तुम्हारा मानवतावाद दीनदयाल के अमानवीय मानवतावाद से कैस भिन्न है?  क्रांति भावनाओं से नहीं, विचारों से आती है, राष्ट्रवाद  क्रांति के रास्ते का सबसे बड़ा अवरोधक है.  Mohinder Pal Vidrohi की राय मान, पहले पढ़ो, खूब पढ़ो अपने को विचारों तथा समझ से लैस करो. अपनी अक्षय ऊर्जा-उत्साह अमूर्त हवाई नारों में मत व्यर्थ करो, उन्हें मूर्तरूप दो. मैंने मार्च में विद्यार्थियों के नाम शहादत के थोड़ा पहले लिखा पत्र पोस्ट किया था नेट पर है. पेरिस कम्यून की कहानी जानते हो? जब जर्मन "राष्ट्र"  ने फ्रांस "राष्ट" पर हमला किया तो फ्रांस "राष्ट" ने पेरिस के मजदूरों को बंदूक थमा दी. जर्मनों को खदेड़ने के बाद पेरिस के मजदूरों ने बंदूकें अपने ही शोषक शासकों पर तान दी तथा कम्यून की स्थापना की. (type Paris Commune on google ) कम्यून के नेता या तो मजदूर थे या उनके प्रामाणिक प्रतिनिधि. फ्रांस "राष्ट" ने कम्यून को कुचलने के लिये जर्मन "राष्ट्र"  को अामंत्रित किया. कम्यून तो दो राष्ट्रों ने मिलकर कुचल दिया लेकिन वह इतिहास में मील का पत्थर बन गया.

शिक्षा और ज्ञान 57

Akshay Bhatt इसीलिये तो कह रहा हूं तुम्हारा राष्ट्रवाद यदि नवोदित पूंजीवाद की राजनैतिक अधिरचना, राष्ट्र राज्य की विचारधारा के रूप में स्थापित राष्ट्रवाद की स्थापित अवधारणा से अलग है तो उसे परिभाषित-सथापित करो, नहीं तो कैसे पता चलेगा कि तुम्हारे राष्ट्रवाद तथा अमित शाह तथा अडानी के राष्ट्रवाद से कैसे भिन्न है? वर्तमान को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में ही समझा जा सकता है तभी बदलाव की रणनीति बन सकती है. पूंजी का चरित्र भूंडलीय है जिसे समझे बिना बदलाव की कामयाब रणनीति नहीं बन सकती. पूंजी  स्रोत तथा निवेश दोनों ही अर्थों में राष्टीय सीमाएं पार कर चुकी है जिसका मौजूदा लक्ष्य तीसरी दुनिया तथा पूर्वी यूरोप की जमीन तथा दिमाग पर कब्जा करना है. यह काम उसके लिये मुश्किल इस लिए नहीं है कि इन सभी देशों में विश्वबैंक की सेवक सरकारें हैं जहां नहीं हैं वहां अार्थिक तथा सैनिक हमलों से तबाही मचा देती है. यूनान ज्वलंत उदाहरण है. यदि वाकई मानवतावादी हो तो जमीन तथा शिक्षा पर कारपोरेटी हमले के विरुद्ध संघर्षों से जुड़ो, संघर्ष विचारों को परिपक्वता प्रदान करते हैं. इस समय मानवता की रक्षा के लिए भूणि अधिग्रहण अध्यादेश तथा सीबीसीयस के जरिये विश्वविद्यालय व्यवस्था को नष्ट करने तथा दिमाग के उपनिवेशीकरण की साजिश के खिलाफ जनमत तैयार करने तथा संगठित होने की अावश्यकता है.    मैं शिक्षक हूं तथा वाद-विवाद का विमर्श नहीं करता. मेरा मकसद तुम जैसे उत्साही युवाओं को जनवादी चेतना अख्तियार करने के लिए उकसाना ही नहीं मदद करना भी है. खूब पढ़ो-बढ़ो-लड़ो.

शिक्षा और ज्ञान 56

Dewanshu Dwivedi  मित्र, अापके विचारों से मैं अवगत नहीं हूं, अक्षय ने सिर्फ नारा दिया है विचार नहीं.सही कह रहे हैं दुनिया द्वंद्वात्मक है. हमारा राष्ट्रवाद पर विश्वास नहीं यह हमने कब कहा, राष्ट्रवाद राष्ट्र-राज्य की विचारधारा है. समंतवादी शासन की वैधता का स्रोत ईश्वर था तथा धर्म उसकी विचारधारा , नई व्यवस्था -पूंजीवाद - के  राजनैतिक प्रबंध के लिए राष्ट्र राज्य का उदय हुआ, वैधता का नया स्रोत सहमति बनी तथा राष्ट्रवाद उसकी विचारधारा-नारा. पूंजी के भूमंडलीय हो जाने से राष्ट्रवाद का मतलब भी बदल गया है. नारे भावनाओं पर आधारित होते हैं, वह भी जरूरी है लेकिन वैचारिक परिपक्वता के बिना महज नारे लफ्फाजी बनकर रह जाते हैं, इतना समय-निवेश आप से वाद-विवाद के लिए नहीं सिखाने के मक्सद से करता हूं, आप नहीं सीखेंगे तो शायद अन्य लोग सीख लें. मजदूर का कोई राष्ट्र नहीं होता न पूंजी का. हम जनक्रांति के जरिये शोषण-अ्समानता से मुक्त समाज बनाना चाहते हैं, जिसके लिये वैज्ञानिक, जनवादी जनचेतना की जरूरत है, इन विमर्शों में समय व्यय उसी दिशा में योगदान का प्रयास है. फिलहाल जमीन तथा दिमाग पर करपोरेटी हमले को रोकने की जरूरत है, सीबीसीयस जैसे खतरनाक शिक्षा योजना तथा भूमि अधिग्रहण के विरुद्ध राष्ट्रीय स्तर पर संघर्ष की जरूरत है, इस मोर्चे पर सक्रिय ताकतों का सहयोग करें