Wednesday, March 28, 2018

अबकी बार लीक सरकार

कहा था अबकी बार विकास सरकार 
 हों जिसमें लीकलीला के अवसर अपार
 कभी परीक्षा का प्रश्नपत्र लीक होता है 
तो कहीं लीक होता है किसी का डेटा 
होता है लीक टेंडर ठेकेदारी का
 रोतों-रात टुटपुजिए से  
अरबपति बन जाता है तड़ीपार का बेटा
लीक होती है सूचना जांच की बैंक में
लीक के रीति-रिवाज की 
लीक करता है देश 
अरबों की लूट लीक 
कर नीरव मोदी लीक जाता है विदेश
 लीकती जबान तड़ीपार की 
निकलती हकीकत भ्रष्टाचार की 
लीक कर देता काली करतूतें
 यदुरप्पा की पिछली सरकार की 
लीक होती है चुनाव आयोग में
 लीक पहुंचती भाजपा आईटी सेल में
 हो रही चहुं ओर लीकम्-लीक बार बार
 यह तो निकली लीक सरकार

 (यों ही)

 (ईमि: 28.03.2018)

Monday, March 26, 2018

बगावत की पाठशाला 20 (युग चेतना)

गावत की पाठशाला
संघर्ष और निर्माण
विषय: मार्क्सवाद
पाठ 20
अध्याय: युग चेतना

उपभोक्ता संस्कृति बनाम जनसंस्कृतिः युगचेतना बनाम जनचेतना
ईश मिश्र

(इलाहाबाद पीयूसीयल द्वारा इविवि छात्रसंघ भवन में, 5 अक्टूबर 2014 को स्वराज, लोकतंत्र और टिकाऊ विकास पर आयोजित गोष्ठी में दिये भाषण का संस्मरण)

अपने युवा-बुजुर्ग साथी ओडी सिंह ने जब पीयूसीयल की इस पहल में, उपभोक्ता-संस्कृति बनाम जनसंस्कृति विषय पर पर्चे के साथ शरीक होने का आमंत्रण दिया तो इलाहाबाद आने के एक और अवसर के अति-उत्साह में तुरंत हामी भर दी. किंतु अव्यवस्थित, बौद्धिक अनुशासनहीनता के दुर्गुण की संपन्नता के चलते वायदा समय पर नहीं पूरा कर सका और अपनी बात मुल्तवी-ए-वायदा की मॉफी शुरू की. और इलाहाबाद में जबरन मिला एकांत (forced solitude) प्रतिकूलता के भेष में वरदान साबित हुआ और लिखने की शुरुआत हो सकी[i]. ये विषयेतर बातें मैं जानबूझकर कर रहा हूं क्योंकि सामाजिक सरोकार और जनहित में नियोजित विकास के किसी भी दावेदार का अनियोजित व्यक्तित्व-कृतित्व सामाजिक अपराध है. यह अलग बात है कि यह कृपालु समाज ऐसों को भी मॉफ कर देता है. इलाहाबाद से मेरा जैविक संबंध टूट सा गया था. 2012 में दमनविरोधी सम्मेलन में शिरकत के बाद से इस जगह से एक नया जैविक रिश्ता शुरू हुआ – राजनैतिक रिश्ता. यहां आकर संघर्षरत किसान-मजदूरों; छात्रों से संवाद से आशावादिता को बल मिलता है कि लोग लड़ रहे हैं जो भले ही कारपेटी मीडिया की दृष्टिसीमा कर जाते हैं. खचाखच भरे छात्रसंघ भवन में आधे से अधिक प्रतिनिधि तथा वक्ता – मजदूर-किसान -- आसपास के इलाकों में विस्थापन विरोधी और खनन अधिकारों के आंदोलनों के कार्यकर्त्ता-नेता थे. सच है कि किसान-मजदूरों के जैविक बुद्धिजीवी संघर्षों की आग में तपकर ही विकसित होते हैं. सामाजिक चेतना के जनवादीकरण की दिशा में हम जैसे जनपक्षीय बुद्धिजीवियों की उत्प्रेरक की हो सकती है. ग्राम्सी[ii] जैविक और पेशेवर बुद्दिजीवियों पर लेख में कहा है कि किसान एक ऐसा वर्ग है जो अन्य वर्गों को जैविक बुद्धिजीवी मुहैय्या कराता है लेकिन इसका अपना बुद्धिजीवी नहीं होता. तब से अब तक रीजनैतिक अर्थशास्त्र की गंगा में बहुत पानी बह चुका. आज अन्य वर्गों को जैविक बुद्धिजीवी प्रदान करने के साथ किसान वर्ग संघर्षों से अपना जैविक बुद्धिजीवी पैदा करने लगा है. व्यापक वाह्य समर्थन के अभाव के बावजूद किसान-आदिवासियों के विस्थापन विरोधी तथा भूमि एवं खनन के अधिकार के मौजूदा कारपोरेट विरोधी संघर्षों में क्रांतिकारी संभावनायें अंतर्निहित हैं. किसान-आदिवासी-ग्रामीण मजदूर जनांदोलनों में भागीदारी से अपने जैविक बुद्धिजीवी भी पैदा कर रहा है जो इसके हितों को प्रतिपादित कर अभिव्यक्ति देता है[iii]. संघर्ष में तपकर वर्गचेतना से लैस होने की तरफ अग्रसर आंदोलनकारी नेताओं और कार्यकर्ताओं के वक्तव्य और गीतों के शब्द ग्रामीण जनचेतना के जनवादीकरण की दिशा में आशा की किरणें लगीं, मगर राजनैतिक शिक्षा की गहन जरूरत भी महसूस हुई. ऐसे में जब कॉरपोरेटी, उपभोक्ता संस्कृति की मुखरता अभूतपूर्व तीब्रता से आक्रामक हो, इस जरूरत का गुरुत्व और भी सघन हो गया है.

व्यापारिक उत्पादन-विनिमय के सिद्धांतो पर आधारित उपभोक्तावाद, पूंजीवादी सामाजिक संबंधों की वस्तुगत सांस्कृतिक अभिव्यक्ति है. उपभोक्ता संस्कृति ने “आवश्कता आविष्कार की जननी है“, कथन को पलट दिया. उत्पादन आवश्कतापूर्ति के नहीं, अधिकतम मुनाफे के उद्देश्य से बाजार के लिये होने लगा और बाज़ार के भोंपू , दूसरा “अदृश्य हाथ“ –- दरबारी बुद्धिजीवी तथा विचारधारात्मक उपकरण –- परिवेश, शिक्षा, मीडिया, फिल्म, खेल, समारोह आदि या तो इसे समय की जरूरत बताते हैं या फिर टीना (TINA –THERE IS NO LTERNATIVE) के तहत अपरिहार्य. विकल्पहीनता मुर्दा क़ौमों की निशानी है, जिंदा क़ौमें कभी विकल्पहीन नहीं होतीं. अब आवश्यकता आविष्कार की जननी नहीं बल्कि “आविष्कार आवश्कता का जनक“ बन गया. इसका उद्देश्य, भूख मिटाना नहीं बढ़ाना है. “दिल मांगे मोर“. सत्ता के विचारधारात्मक उपकरण यथास्थिति को अपरिहार्य, समुचित और सर्वजनहिताय प्रचारित करके नई सामाजिक चेतना का निर्माण करते हैं, जो युग चेतना बन जाती है. बदलाव के लिये युग चेतना पर हमले की जरूरत है – जनचेतना के जनवादीकरण की. शासक वर्ग की कारपोरेटी मीडिया से निपटने के लिये वैकल्पिक मीडिया की जरूरत है.

औद्योगिक क्रांति के शुरुआती दौर में, पूंजीवाद को अधिकतम मुनाफ़े के सिद्धांत पर आधारित व्यवस्था के रूप में परिभाषित करने तथा ऐतिहासिक, सामाजिक प्रगति को निजी मुनाफ़ा कमाने की करामातों का अनचाहा परिणाम मानते वाले, नई व्वयस्था के एक प्रमुख जैविक बुद्धिजीवी, अर्थशास्त्री, ऐडम स्मिथ के अनुसार, नियोजित परमार्थ (सामूहिक हित) से अधिक परमार्थ व्यक्ति के निजी स्वार्थ सिद्धि के उपक्रमों से अनचाहे ही हो जाता है. मुनाफा कमाने की बेरोक-टोक निजी गतिविधियों और सामूहिक हित के उसके अनचाहे परिणामों का समन्वय बाजार के रहस्यमय “अदृश्य हाथ“[iv] करते हैं. एडम स्मिथ मुनाफ़ा कमाने की गतिविधियों के उपपरिणाम के रूप में इतिहास की व्याख्या करते हुए जानबूझ कर समन्वयक शक्ति को सरकार न कह कर बाजार का “अदृष्य हाथ“ बताते हैं. कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो में मार्क्स और एंगेल्स अदृश्य हाथों का रहस्योद्घाटन पूंजीपति वर्ग के सामान्य हितों (general interests) की कार्यकारी समिति—राज्य – के रूप में करते हैं. लेकिन पूंजीवादी व्यवस्था अपने अन्तर्निहित दोगले चरित्र के चलते राज्य को एक निष्पक्ष इकाई घोषित करती है इसलिए शासक सार्वजनिक मंचों पर पूंजीपतियों के कारिदा दिखने से बचता है, खासकर उदारवादी जनतंत्र में, जहाँ सरकार जनता के संसाधनों से पूंजीवाद की सेवा करती है लेकिन दावा जनता की सेवा करने का. यह अदृश्य हाथ आज साफ़ दिखता है, टाटा को किसानों की जमीन पर कब्जा दिलाने के लिए, आन्दोलनकारी किसानों पर गोलीबारी करके 16 आदिवासी किसानों की ह्त्या बाज़ार के अदृश्य हाथ नहीं, उड़ीसा सरकार करती है. किसानों की जमीन पर पॉस्को को काबिज करने के लिए पान के भीटों से समृद्ध जगतसिंहपुर के किसानों को बाज़ार के अदृश्य हाथ नहीं, भारत सरकार उजाड रही है. जनविरोधी नीतियों का प्रस्ताव बाज़ार के अदृश्य हाथ का नहीं बल्कि विशाल बहुमत से सत्तासीन विकास पुरुष मोदी सरकार का है.(इनकी पूर्ववर्ती सरकारें भॊ थोड़ा हिचक के साथ ही सही, यही कर रही थीं). मोदी जी ने समीकरण बदल दिया, मुनाफाखोर की पीठ पर सत्ता के हाथ की बजाय मुनाफखोर का हाथ सत्ता की पीठ पर पहुंचा दिया. इस तरह की बेबाक ईमानदारी का एक ही और उदाहरण है, पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर, जिन्होंने गर्व से कोयला माफिया सूरजदेव सिंह से अपनी मित्रता का सार्वजनिक इज़हार किया था. इतिहास दुहराता नहीं, प्रतिध्वनित होता है, भयावह है मौजूदा प्रतिध्वनि. एक ईस्ट इंडिया कंपनी को मुल्क में व्यापार की अनुमति ने इसे 200 से अधिक सालों की गुलामी और लूट का शिकार बना दिया, विकास के लिए तमाम दैत्याकार भूमंडलीय कंपनियों को निवेश का निमंत्रण क्या गुल खिलायेगा? उपभोक्ता संस्कृति की इस प्रतिध्वनि के शोर को जनसंस्कृति के इंकिलाबी नारों से ही दबाया जा सकता है.

ऐडम स्मिथ, पूंजीवादी संपत्ति के नैसर्गिक अधिकार के प्रणेता, पूर्ववर्ती उदारवादी चिंतक, जॉन लॉक[v] की ही तर्ज पर निजी और सार्वजनिक क्षेत्रों – नागरिक समाज और राज्य -- में विभाजन रेखा खींचते हैं. नागरिक समाज “राष्ट्र की संपत्ति“[vi] में दिन-दूना और रात-चौगना इज़ाफा कर सकने में सक्षम है यदि इसे वाह्य हस्तक्षेप (राजनैतिक नियंत्रण) से मुक्त किया जा सके. मतलब मुनाफे की खुली छूट. जैसे भारत की मौजूदा सरकार “इंस्पेक्टर राज“ खत्म करने के नाम पर मजदूर विरोधी नीतियों के जरिये मुल्क के संसाधनों और लोगों की जल-जंगल-जमीन की अबाध कॉरपोरेटी लूट को आसान बनाया जा रहा है तथा अधिकतम मुनाफ़े की डगर सरल. नई बोतल में पुरानी शराब के मुहावरे को चरितार्थ करने वाला नवउदारवादी राज्य उदारवादी से कैसे भिन्न है, उसकी चर्चा बाद में. दरअसल, पूंजीवाद के पैररोकार, सभी क्लासिकल उदावादी चिंतक, व्यापारिक समाज -- बाजार -- को सम्मानजनक नाम देने के मकसद से, मर्यादित पर्याय के रूप में “नागरिक समाज” की अवधारणा का इस्तेमाल करते थे. आज पूंजीवाद के नवउदारवादी दौर में, आक्रामक रूप से मुखर बाजार सम्मान के लिए किसी अन्य मर्यादोक्ति की मोहताज नहीं है, बल्कि स्वयं सम्मान का स्रोत है. अब “नागरिक समाज“ शब्द इसकी सहयोगी शक्ति, यनजीओ समूहों की मर्यादोक्ति है. ऐडम स्मिथ साहब का यह भी कहना है कि पूरा समाज, सारी कायनात ही एक बाज़ार है और हर व्यक्ति व्यापारी. जिसके पास बेचने को कुछ और नहीं है, उसके पास अपनी चमड़ी है. आदिम पूंजी का इतिहास वे किसी मिथकीय युग में खोजते हैं जब धरती पर सब बराबर थे. कुछ तोग साधू-संतों की तरह सात्विक जीवन बिताकर बचत व्यापार में लगाया वे पूंजीपति बन गये. बाकियों ने दुष्टों की तरह तामशी जीवन में सब कुछ उड़ा दिया और दमड़ी वालों को चमड़ी बेचने को मजबूर, मजदूर बन गये. सात्विक जीवन से पूंजीपति बने धीरूभाई अंबानी का उन्हीं की तरह परिश्रमी बेटा अधिक वेतन का हक़दार होते हुये भी साधू-संतों की तरह सात्विक जीवन क लिये 33 करोड़ में ही काम चला लेता है. वैसे सामग्री की तरह श्रम के खरीद-फरोख्त के नैसर्गिक अधिकार का सिद्धांत जॉन लॉक पहले ही प्रतिपादित कर चुके थे[vii].

पूंजीवाद एक दोगली प्रणाली है यह जो कहती है कभी नहीं करती, जो करती है कभी नहीं कहती. यह स्वर्ग का वायदा करके धरती लूटती है. पूंजीवाद नारा देता है समानता, स्वतंत्रता भाईचारे का जब कि इसका वजूद ही इनके विपरीत सिद्धांतों पर टिका होता है. पूंजीवाद के शैशव काल में, निरंकुश और उदारवादी राज्य के संक्रमण कालीन चिंतक, थॉमस हॉब्स समाज सें बढ़ती हुई असामनता और श्रमिक वर्ग की आजीविका के लिए पराधीनता के ऐतिहासिक संदर्भ में, यथास्थिति का औचित्य साबित करने के द्देश्य से, हर व्यक्ति की स्वाभाविक स्वतंत्रता और समानता की अवधारणा का प्रतिपादन करते है. लेकिन आगे इस ‘प्रकृति-प्रदत्त‘ स्वतंत्रता बरदान की बजाय अभिशाप बताते है.हॉब्स साहब के तर्क वही हैं जो स्वशासन या सामूहिक स्वामित्व के विरोधी भोंपू आज तक देते आ रहे हैं. अरस्तू ने कहा था कि मनुष्य स्वभाव से एक सामाजिक प्राणी है. हॉब्स उसे स्वाभाविक रूप से असमाजिक, एकाकी, आत्मकेंद्रित, स्वार्थी, अहंकारी, झगड़ालू और पशुवत निर्दयी समझते हैं जो हर किसी पर अपना प्रभुत्व स्थापित करने की कोशिस करता है. ऐसे में समानता स्वतंत्रता वरदान की जगह अभिशाप बन जाती है. इस लिये उसे यदि अमन चैन की जिंदगी जीना है तो वह डंडे से हांके जाने के लिए प्रकृति प्रदत्त अधिकार निरंकुश शासन को सौंपने का समझौता करे या जो भी शासन हो उसे ही स्वनिर्मित मान आज्ञापालन करे. वे खास ढंग से समाजीकृत व्यक्ति के मनोभाव को सार्वभौमिक बताते हैं. पूंजीवाद के पहले सर्वमान्य सिद्धांतकार जॉन लॉक कहते हैं कि प्रकृति के उपहारों पर सभी समान और स्वतंत्र व्यक्तियों का समान अधिकार है लेकिन उनपर श्रम व्यय करके व्यक्ति करके निजी संपत्ति निर्मित करता लेकिन जिस निजी पूंजीवादी संपत्ति के अधिकार की वे हिमायत करते हैं वह श्रम से नहीं बल्कि श्रम के शोषण, शिल्प उद्योगों के विनाश, किसानों की बेदखली और औपनिवेशिक लूट से संचित की जा रही थी. ऐडम स्मिथ पूंजीपतियों की संपत्ति को “ राष्ट्र की संपत्ति बताते हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद को देश का पहरेदार बताकर देश की बाजार भूमंडलीय पूंजी की लूट के लिए खोल देते हैं. शासक वर्गों के करनी-कथनी के इस अंतरविरोध का लगातार पर्दाफास करते रहने की जरूरत है.

मार्क्स और एंगेल्स ने 1845 में जर्मन विचारधारा[viii] में लिखा कि हर युग में शासक वर्ग के विचार शासक विचार होते हैं. भौतिक उत्पादन की शक्तियों पर जिस वर्ग का नियंत्रण होता है वही वर्ग बौद्धिक उत्पादन भी नियंत्रित करता है, भौतिक उत्पादन के साथ ही बौद्धिक उत्पादन के साधनों की दशा-दिशा भी वही तय करता है. जिनके पास बौद्धिक उत्पादन के साधन नहीं होते, वे शासक विचारों से शासित होते हैं. शासक वर्ग के विचार मौजूदा वर्चस्व के संबंधों की ही अभिव्यक्ति हैं और आदर्श भी. मार्क्स इन विचारों को विचारधारा कहते हैं जो कि भ्रांति या मिथ्या-चेतना है. थॉमस हॉब्स से शुरू करके सभी उदारवादी चिंतक प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से नवोदित शासकवर्ग के हितों को सार्वभौमिक हित के रूप में चित्रित करते हैं. जिसका आशय यह है कि पूंजीवाद ही सर्वोचित तथा अपरिहार्य है जिसमें हर व्यक्ति अपनी योग्यतानुसार पुरस्कृत होता है और अयोग्यता के लिए दंडित. हर युग का शासक वर्ग व्यवस्था के वैधीकरण के लिए वैचारिक वर्चस्व निर्मित करता है जो शोषण-दमन पर आधारित व्यवस्था को न्यायपूर्ण बताता है जिसे शोषित भी आत्मसात कर लेता है. यही मिथ्या-चेतना युग-चेतना बन जाती है. शोषित युगचेतना के प्रभाव में शोषण को अपनी कमियों का परिणाम और नियति मान लेता है.

लाभोन्मुख अराजक, अनियंत्रित पूंजीवादी विकास के आंतरिक अंतर्विरोधों से उपजा पूंजीवादी संकट-- 1930 के दशक की मंदी-- और रूसी क्रांति के बाद सोवियत संघ के राज्य नियंत्रित पूंजीवाद की मिसाल ने पूंजीवादी देशों के लिए, एडम स्मिथ को अलविदा कह, पूंजीवाद को ध्वस्त होने से बचाने के लिए, पुलिस (अहस्तक्षेपयीय) राज्य को अलविदा कल्याणकारी राज्य अपनाया. गौर तलब है कि मंदी के संकट का कारण था , अतिरिक्त माल (सरप्लस ऑफ गुड्स), यानि, ज्यादा उत्पादन और लोगों (उत्पादकों) में क्रय शक्ति की कमी के चलते कम खपत. संकट से उबरने के लिए अर्थव्यवस्था पर राज्य-नियंत्रण, सार्वजनिक इकाइयों के गठन और सामाजिक सुरक्षा की नीतियों का रास्ता अपनाया गया. यह भी गौरतलब है कि सोवियत संघ में राज्य नियंत्रित पूंजीवादी विकास डेढ़ दशकों में यूरोप और अमेरिका की बराबरी पर पहुंच गया. दूसरे विश्वयुद्ध के समय सोवियत संघ अमेरिका की बराबरी का आर्थिक-सामरिक शक्ति बन चुका था. भारत जैसे उत्तर-औपनिवेशिक देशों में कल्याणकारी राज्य की स्थापना पूंजीवाद को ध्वस्त होने से बचाने के लिए नहीं, स्थापित करने के लिए किया गया, क्योंकि पूंजीवादी विकास यहां नदारत था. हमारे पूर्व प्रधानमंत्री, अर्थशास्त्री मनमोहन जी भले ही इंगलैंड जाकर विकास के लिए अंग्रेज प्रभुओं का गुणगान करें लेकिन हक़ीक़त यह है कि 1947 में जब अंग्रज गये तो अर्थव्यवस्था में सेवा क्षेत्र समेत औद्योगिक योगदान लगभग 7% था. गौर तलब है कि 19वीं शताब्दी के पहले दशक तक अंतर्राष्ट्रीय व्यापार का मतलब होता था, भारत तथा पूर्व-एशिया, मुख्यतः चीन के उत्पादों का व्यापार. पूंजीवादी विकास, यानि, औद्योगीकर के लिये विशाल औद्योगिक अधिरचना की आवश्यकता थी. यद्यपि राष्ट्रीय पूंजीपति वर्ग अस्तित्व में आ चुका था लेकिन अधिरचना में निवेश में, उनमें से न तो किसी की रुचि थी न ही निजी रूप से कोई सक्षम था. इसकी जिम्मेदारी राज्य पर आ पड़ी और विशाल सार्वजनिक क्षेत्र वजूद में आया.

1980 के दशक शुरू होते-होते मार्गेट थैचर से रोनाल्ड रीगन तक को कल्याणकारी अर्थव्यवस्था बाजार की ताकतों पर बोझ और सार्वजनिक क्षेत्र सफेद हाथी नजर आने लगे. विनिवेश के नाम पर सार्वजनिक संपदा की विक्री शुरू हो गयी और उदारीकरण के नाम पर सार्वजनिक क्षेत्र का निजीकरण. धीरे-धीरे मंद गति संक्रमण रोग की तरह नवउदारवादी “सुधार“ अन्य विकसित-अविकसित और विकासशील देशों में फैलने लगा. बर्लिन की दीवार के पतन के साथ नवउदारवादी अभियान की मुखरता आक्रामक हो उठी. सोवियत संघ के पतन बाद, कॉरपोरेट नियंत्रित भूमंडलीय पूंजी के निर्देशन में, विश्व बैंक, आईयमयफ तथा डब्ल्यूटीओ जैसी संस्थाओं के माध्यम से भूमंडलीकरण के नाम पर सभी देशों पर थोपा जाने लगा और इसके इतिहासकार ने इतिहास का अंत घोषित कर दिया. निजीकरण-उदारीकरण विकास का नया मंत्र बन गया. दर-असल जिस उदारवाद के रोग के इलाज के रूप में कल्याणकारी राज्य अपनाया गया, उसे बीमार करके या बीमार घोषित करके, नवउदारीकरण के नाम पर पुराने रोग को दवा बना दिया. नई बोतल में पुरानी शराब. नवउदारवादी दावे गुब्बारा 2 दशक से भी कम समय में ही फूट गया. जिसमें सरकारी खजाने के अनुदान की हवा भर कर फौरी समाधान निकाल लिया गया. लेकिन यह लक्षण का इलाज है, रोग का नहीं. मंदी का संकट अतिरिक्त माल से पैदा संकट था तो मौजूदा संकट अतिरिक्त पूंजी का संकट है. भूमंडलीय पूंजी को निवेश के लाभप्रद नीड़ों की तलाश है, टीना(कोई और विकल्प नहीं) के तहत नरसिंह राव सरकार से शुरू मुल्क की नीलामी की निरंतर प्रक्रिया मोदी राज में त्वरित होने के खतरनाक इशारे कर रही है. राज्य के विचारधारात्मक उपकरण नवउदारवाददी नीतियों को विकास के लिए आवश्यक एवं अपरिहार्य प्रचारित कर रहे हैं. बढ़ती बेरोजगारी, ठेका प्रथा, मजदूरों की बेहाली आदि को आर्थिक प्रगति का अनचाहा किंतु अपरिहार्य परिणाम बताया जा रहा है, जिसे युग चेतना के प्रभाव में लोग मान भी लेते हैं. उदारवादी और नवउदारवादी राज्यों में मुख्य फर्क यह है कि उदारवादी राज्य अर्थव्यवस्था में अहस्तक्षेप की नीति पर चलते हुये पूंजी का अबाध संचय सुनिश्चित करे. नवउदरवादी राज्य विकास में सहभागी है, कॉरपोरेट का अधिकतम मुनाफा सुनिश्चित करने में सक्रिय भुमिका निभाता है, सरकारी मशीनरी के उपयोग से लोगों के जल-जमीन-जंगल पर कारपोरेटी कब्जा दिला कर.

क्रांतिकारी परिवर्तन के 2 कारक होते हैं – वस्तुनिष्ठ(objective) और आत्मनिष्ठs(subjective). वस्तुनिष्ठ कारक है व्यवस्था के अंतरविरोधों की परिपक्वता से उपजा व्यवस्था का व्यापक संकट और आत्मनिष्ठ कारक है नई सामाजिक शक्तियों की वैकल्पिक उपस्थिति. पूंजीवाद के संकट कई बार सामने आया. 1930 के दशक की मंदी और 2007 से शुरू मौजूदा संकट ज्वलंत उदाहरण हैं. लेकिन दोनों ही समय आत्मनिष्ठ कारक – वर्ग चेतना से लैस संगठित मजदूर वर्ग – गैर मौजूद रहा. अमेरिका और युरोप के स्वस्फूर्त ऑकुपाई वालस्ट्रीट आंदोलन या भारत में भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन यदि वैचारिक-संगठनात्मक आधार पर संगठित होते तो कुछ अलग नतीजे होते. खैर कोई भी आंदोलन व्यर्थ नहीं जाता. स्वस्फूर्त आदोलनों की भी ऐतिहासिक भूमिका होती है. दर-असल ये सारे जनांदोलन जारी वर्गसंघर्ष हिस्से ही हैं. भौतिक या बौद्धिक श्रमशक्ति बेचकर आजीविका कमाने वाला कामगार (मजदूर), पूजीपति वर्ग के समक्ष अपने-आप में एक वर्ग है, लेकिन वह भीड़ का एक टुकड़ा भर बना रहता है जब तक वह साझे वर्ग हित के आधार पर संगठित नहीं होता. मजदूर एक राजनैतिक दल के रूप में ही लामबंद हो सकता है. मजदूरों के ‘अपने-आप में वर्ग‘ से ‘अपने लिए वर्ग‘ में परिवर्तन के बीच की जटिल कड़ी है – वर्ग चेतना. मजदूर जब व्यवस्था के अंतरविरोधों को समझकर, वर्गहित के आधार वर्ग चेतना से लैस होकर ही लामबंद हो पूंजीवाद के विरुद्ध निर्णायक जंग का नेतृत्व करेगा. जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है, शासक वर्ग के विचार शासक विचार भी होते है वही युग चेतना का निर्माण करते हैं. युगचेतना से निर्धारित जनचेतना के जनवादीकरण से युगचेतना को सार्थक चुनौती देकर ही जनचेतना को वर्गचेतना में तब्दील की जा सकती है. जनचेतना के जनवादीकरण से निकली जनसंस्कृति ही उपभोक्ता संस्कृति के फरेब का पर्दाफास कर सकती है. जनांदोलनों में भागीदारी से तो जनचेतना का जनवादीकरण तो होता ही है लेकिन जनपक्षीय बुद्धिजीवियों और क्रांतिकारी संस्कृतिकर्मियों की भी अहम भूमिका है.

ईश मिश्र

17 बी, विश्वविद्यालय मार्ग

दिल्ली विश्वविद्यालय

दिल्ली ११०००७

[i][i][i] मैक्यावली और बर्नी

[ii] ऐंतोनियो ग्राम्सी

[iii] कलिंगनगर, नरायनपटना.......

[iv] ऐडम स्मिथ

[v] लॉक

[vi] स्मिथ

[vii] लॉक

[viii] जर्मन विचारधारा
17.11.2014

सफलता-विफलता

सफलता-विफलता दार्शनिक परिकल्पनाएं हैं
दोनों की ही बहु-आयामी कई दिशाएं हैं
किसी के लिए सफलता
धन-दौलत जैसी छोटी आकांक्षाएं हैं
किसी के लिए छल-कपट से पद-प्रतिष्ठा की चाहतें
किसी के लिए दुनिया बदलने की भावनाएं
रूसो ने कहा जो इस दुनिया में सबसे सफल है
है नैतिक पतन की अव्वल मिशाल
हमें तो जलाए रखना है
इंकिलाब की मशाल
(बेतरतीब तुकबंदी हो गयी)
(ईमि:26.03.2018)



Sunday, March 25, 2018

गीदड़ की मौत आती है तो शहर भागता है

धरती पर पर्याप्त संपदा है
भर सकता है इससे पेट हर इंसान और पशुपक्षी
पर काबिज हैे उनपर चंद धनपशु जोंकें
इसीलिए कर हमला शिक्षा पर
चाहता है ब्राह्मणवादी कुज्ञान थोपना
समाज को मनुवादी कुंए में झोंकना
लेकिन सीख लिया एकलब्यों ने अब
बिन अंगूठे के तीर चलाना
जेयनयू एक विचार है
विचार पर हमला कर देगा
धनपशुओं का सर्वनाश
विचार मरता नहीं
फैलता है
इतिहास रचता है
गीदड़ की मौत आती है तो शहर भागता है
फासीवादी जेयनयू की तरफ
(ईमि: 25.03.2018)

बगावत की पाठशाला 19 (कॉमिंटर्न)


तीसरा इंटरनेसनल – कम्युनिस्ट इंटरनेसनल (कॉमिंटर्न)
दूसरा (सोसलिस्ट) इंटरनेसनल युद्ध की शुरुआत के साथ 1914 में बिखर गया था। मार्क्स का मानना था कि पूंजीवाद चूंकि अंतरराष्ट्रीय है इसलिए उसका विकल्प भी अंतर्राष्टीय होगा। पश्चिमी पूंजीवादी देशों तथा अमेरिका की सैन्य सहायता से प्रतिक्रांतिकारी सफेद सेना के साथ गृहयुद्ध के मध्य लेनिन ने इंटरनेसनल के पुनर्गठन की योजना बनाई और मार्च 2019 में कम्युनिस्ट इंटरनेसनल उद्घाटन सम्मेलन आयोजित किया गया। लेनिन का मानना था की समाजवाद को तभी सफल और दूरगामी बनाया जा सकता है यदि दुनिया में हर जगह समाजवादी क्रांतियां हों; समाजवादी प्रणाली की आर्थिक मागों और विकास को विश्व स्तर ही संरक्षित और प्रसारित किया जा सकता है। लेनिन मानते थे कि पूंजीवादी उत्पीड़न से दुनिया भर के सर्वहारा की मुक्ति अत्यंत आवश्यक है जिससे भविष्य को युद्धों के रक्तपात से बचाया जा सके; विकराल पूंजीवादी तंत्र से उनकी मानवता और आजादी बचाई जा सके। उद्घाटन सम्मेलन में रूसी कम्युनिस्ट पार्टी के अलावा कई अन्य यूरोपीय देशों और अमेरिका के कम्युनिस्ट और सोसलिस्ट पार्टियों के प्रनिधियों ने सिरकत की। सम्मेलन में संगठन का संविधान और लक्ष्य और कार्यप्रणाली की आचार संहिता तथा घोषणा पत्र जारी किया। मौजूदा हालात और संभावनाओं पर लेनिन की रिपोर्ट सम्मेलन की केंद्रीय विषयवस्तु थी। ग्रेगरी ज़िनोवीव कॉमिंटर्न के पहले सचिव थे लेकिन इसके मुख्य सिद्धांतकार लेनिन ही रहे। कॉमिंटर्न का केंद्रीय सरोकार था, अंतर्राष्ट्रीय सर्वहारा क्रांति के लिए दुनिया भर के देशों में कम्युनिस्ट पार्टियों का गठन। सम्मेलन में भागीदार पार्टियों ने लेनिन के जनतांत्रिक केंद्रीयतावाद , “मुक्त विमर्श और एकीकृत कार्रवाई” के सिद्धांत का अनुमोदन किया। कॉमिंटर्न को विश्वक्रांति की कार्यकारिणी के रूप में प्रतिष्ठित किया गया। कॉमिंटर्न के प्रयासों से 1920 में दूसरे सम्मेलन तक यूरोप, अमेरिका, लैटिन अमेरिका तथा एशिया के कई देशों में कम्युनिस्ट पार्टियों का गठन हो चुका था। भारत के मानवेंद्रनाथ रॉय दूसरे सम्मेलन में मेक्सिको की कम्युनिस्ट पार्टी के प्रतिनिधि के रूप में दूसरे सम्मेलन में शिरकत की थी और 1921 में ताशकंद में प्रवासी भारतीयों को लेकर 1921 में ताशकंद में भारत की कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना की जिसका पहला सम्मेलन 1925 में कानपुर में हुआ।
दुनिया में समाजवादी आंदोलनों का संदर्भविंदु पेरिस कम्यून से हटकर रूसी क्रांति बन गयी। इसने राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलनों और समाजवादी आंदोलनों में एक नई ऊर्जा और आत्मविश्वास का संचार कर दिया। लेनिन ने दूसरे सम्मेलन के निमंत्रण के साथ पार्टियों को एक 21 सूत्री दस्तावेज भेजा था, जिनसे सहमति कॉमिंटर्न की सदस्यता की अनिवार्य शर्त थी। 21 सूत्रों में पार्टी की अन्य समाजवादी समूहों से अलग पहचान तथा पूंजीवादी राज्य की वैधानिकता पर अविश्वास। पार्टी संगठन का कार्य प्रणाली जनतांत्रित केंद्रीयता के ढर्रे पर होगी। दूसरे सम्मेलन में औपनिवेशिक सवाल भी एक प्रमुख मुद्दा था। जितने भी कम्युनिस्ट सरकारों पर अक्सर सर्वहारा की तानाशाही के नाम पर पार्टी और पार्टी के सर्वोच्च नेता की तानाशाही के आरोप लगते रहे हैं, वर्ग संघर्ष और पाटी के अंतःसंबंधों पर एक संक्षिप्त चर्चा अप्रासंगिक नहीं होगी।
वर्ग-संघर्ष और पार्टी
      शासक वर्गों के पास अपना वर्चस्व और विशेषाधिकार बरकरार रखने के राज्य के दमनकारी और प्रोपगंडा उपकरणों समेत बहुत साधन हैं और सर्वहारा साधनविहीन। फिर सवाल उठता है इतने शक्ति-साधन संपन्न शत्रु से साधनविहीन कामगर वर्ग कैसे लड़े और नई सामाजिक व्यवस्था कायम करे? लेकिन मार्क्स संदेश की प्रमुख बात यही है कि यह हो सकता है लेकिन इसके लिए सजग प्रयास करना होगा। जैसा कि मार्क्स के हवाले से ऊपर कहा गया है कि यह प्रमुखतः पूंजीवादी अंतर्विरोधों की गहनता और रानैतिक, सांस्कृतिक और बौद्धिक अधिसंरचनाओं पर इसके बहुआयामी प्रभाव पर निर्भर करता है। लेकिन अंततः यह बदलाव लोगों के हस्तक्षेप तथा कर्म से ही से ही संभव होगा। अपनी भूमिका कारगर रूप से अदा करने के लिए मजदूर वर्ग और इसके सहयोगियों को संगठित होना पड़ेगा। ‘अपने-आप में वर्ग’ से ‘अपने लिए वर्ग’ बनने के लिए मजदूर वर्ग को अपनी पार्टी बनानी पड़ेगी लेकिन लोगों के मुद्दों से अलग पार्टी का अपना कोई एजेंडा नहीं होगा। मार्क्स का जोर मजदूर वर्ग की मुक्ति पर तो था ही, लेकिन यह मुक्ति उनके स्वतः प्रयास से होनी चाहिए। मार्क्स ने 1864 में फर्स्ट इंटरनेसनल के संबोधन के प्राक्कथन में लिखा है, “मजदूर वर्ग की मुक्ति का संघर्ष मजदूर वर्ग को स्वयं करना होगा”[1]। अपने समस्त लेखन में मजदूरों के संगठन की जरूरत के ज़िक्र की बहुतायत के बावजूद मार्क्स संगठन के स्वरूप और संरचना के बारे में कुछ नहीं कहते। उनका मानना था कि अलग-अलग देशों के मजदूर अपनी विशिष्ट परिस्थितियों के अनुसार संगठन बनाएंगे। एक बात वे जरूर बार बार कहते हैं कि मजदूरों का संगठन मजदूर वर्ग से अलग ‘पेशेवर साजिशकर्ताओं’ के किसी पंथ की तरह नहीं होना चाहिए। संगठन का स्वरूप जो भी हो मार्क्स का सरोकार अपनी मुक्ति के लिए मजदूर वर्ग में वर्गचेतना का विकास है। पार्टी वर्ग की राजनैतिक अभिव्यक्ति और संघर्ष का साधन है।
      मार्क्स और एंगेल्स मजदूरों की आत्म मुक्ति की क्षमता पर आश्वस्त थे। 1879 में उन्होंने जर्मन सोसल डेमोक्रेटिक पार्टी के कुछ नेताओं को फटकारते हुए एक सर्कुलर भेजा जिसमें उन्होने इस समझ को खारिज किया कि मजदूर वर्ग खुद अपनी मुक्ति का संघर्ष चलाने मे अक्षम है और उसे फिलहाल ‘पढ़े-लिखे’ और ‘संपत्तिवान’ बुर्जुआ वर्ग का नेतृत्व स्वीकार करना चाहिए जिसके पास मजदूरों की समस्याएं समझने का अवसर होता है[2]। उनके लिए वर्ग पहले था पार्टी बाद में। लेनिन ज़ारकालीन रूस की विशिष्ट परिस्थियों में एक विशिष्ट किस्म की पार्टी बनाना चाहते थे जो मजदूरों से यथासंभव संपर्क में रहे। उन्हें भय था, जो उनके बाद सही साबित हुआ कि पार्टी में यदि मजदूर वर्ग लगातार जान न फूंकता रहे तो वह आमजन से कट कर एक नौकरशाही में तब्दील हो जाएगी। बहुत पहले से वे एक केंद्रीकृत अधिनायकवादी शासन के विरुद्ध, ‘पेशेवर क्रांतिकारियों’ का संगठन बनाना चाहते थे जिसकी परिणति बाद में ‘जनतांत्रिक केंद्रीयता’ (डेमोक्रेटिक सेंट्रलिज्म’) के सिद्धांत में हुई। इस सिद्धांत के तहत नीतिगत प्रस्ताव निचली इकाइयों विमर्श से निकले प्रस्ताव केंद्राय नेतृत्व के विचारार्थ जाना था जो उन्हें समायोजित कर पुन: अंतिम संस्तुति के लिए निचली इकाइयों को वापस भेजता। सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी और कॉमिंटर्न के तत्वाधान में बनी दुनिया की सभी कम्युनिस्ट पार्टियों में यह सिद्धांत विकृत हो कर अधिनायकवादी केंद्रीयता में तब्दील हो गया. कई मार्क्सवादी चिंतक इसे ऊपर से थोपी राजनीति (पॉलिटिक्स फ्रॉम एबव) कहते हैं। एरिक हाब्सबॉम ने दुनियां की कम्युनिस्ट पार्टी के नेताओं को मार्क्स पढ़ने की सलाह दी थी।
1914 के पहले लेनिन ने कभी नहीं कहा कि वे ऐसी पार्टी बनाना चाहते थे जो उन देशों के लिए उपयुक्त हो जहां पहले से ही ‘राजनैतिक स्वतंत्रता’ हासिल कर ली गई है। क्रांतिकारी प्रक्रिया की प्रगति के लिए संगठन और दिशा निर्देश की परमावश्यकता पर जोर  मार्क्सवाद में लेनिन का विशिष्ट योगदान है। वे मजदूरों की निष्क्रियता को लेकर चिंतित नहीं थे, बल्कि इसके चलते संघर्ष के राजनैतिक प्रभाव में कमी और क्रांतिकारी उद्देश्य में भटकाव को लेकर चिंतित थे। इसीलिए पार्टी की परमावश्वयकता को विशेष रूप से रेखांकित करते हैं जिसके दिशा निर्देश और नेतृत्व के बिना मजदूर वर्ग का संघर्ष विसंगतियों और दिशाहीनता का शिकार हो जाएगा। गौरतलब है रूस पश्चिमी यूरोप के विकसित पूंजीवादी देशों की तरह बुर्जुआ जनतांत्रिक क्रांति या मार्क्स के शब्दों में ‘राजनैतिक मुक्ति’ के दौर से नहीं गुजरा था। इसीलिए जारशाही को उखाड़ फेंक समाजवादी फतेह के लिए मजदूरों की एक अनुशासित हिरावल दस्ते के निर्माण पर बल दिया।
इसके बावजूद लेनिन भली भांति जानते थे कि जनता के अनुभवों में घुले-खपे-जुड़े बिना  पार्टी अपना क्रांतिकारी उद्देश्य नहीं पूरा कर सकती। जब भी पार्टी में खुली बहस का मौका मिला – 1905; 1917 और उसके बाद – उन्होने पार्टी में नौकरशाही प्रवृत्ति पर करारा प्रहार किया। क्या करना है? (व्हाट इज़ टू बी डन?) और राज्य और क्रांति में अनुशासित संगठन की जरूरत पर जोर देने के बावजूद कामगर आवाम से पार्टी के जैविक संबंधों की बात को उन्होने हमेशा तवज्जो दिया। 1920 में वामपक्षी साम्यवाद: एक बचकानी उहापोह (लेफ्टविंग कम्युनिज्म: ऐन इन्फेंटाइल डिसॉर्डर[3]) में लेनिन लिखते हैं, “इतिहास, खासकर क्रांतियों का इतिहास अपनी अंतर्वस्तु में सर्वाधिक वर्ग चेतना से लैस, सर्वाधिक उन्नत वर्गों के हरावल दस्ते से अधिक विविधतापूर्ण, अधिक बहुआयामी, अधिक जीवंत और अधिक निष्कपट है”[4]। इसके बावजूद उन्होंने क्रांतिकारी प्रक्रिया में पार्टी की अहम भूमिका को उन्होने नहीं नकारा, न ही मजदूर वर्ग के साथ इसके संबंधों को कमतर करके आंका। वे रोज़ा लक्ज़म्बर्ग की ही तरह पार्टी की केंद्रीय समिति को गलतियों से परे न मानने के बावजूद एक सुगठित संगठन के पक्षधर थे। ज़ारकालीन रूस की परिस्थियों में लेनिन एक विशिष्ट तरह की पार्टी के पक्षधर थे, लेकिन सर्वहारा की तानाशाही या पार्टी (नेतृत्व) की तानाशाही के जवाब में उन्होंने कहा, “मौजूदा हालात में वर्ग का प्रतिनिधित्व पार्टी ही कर सकती है”।  
रोज़ा लक्ज़म्बर्ग ने 1918 में रूसी क्रंति नाम शीर्षक से लिखी पुस्तिका में रूस की खास परिस्थियों में बॉलसेविक दल की प्रशंसा करते हुए लिखा था, “बॉलसेविकों ने प्रमाणित कर दिया है कि ऐतिहासिक संभावनाओं की सीमा में एक सच्ची क्रांतिकारी पार्टी जो भी कर सकती है उसमें वे सक्षम हैं। उनसे किसी चमत्कार की उम्मीद नहीं करनी चाहिए साथ ही उन्होंने आगाह किया था कि खास परिस्थियों में अपनाई गई रणनीति को अंतर्राष्ट्रीय सर्वहारा क्रांति के मॉडल के रूप में नहीं पेश करना चाहिए[5]। लेकिन जैसा कि अब इतिहास बन चुका है, सवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी और तदनुसार कॉमिंटर्न ने उनकी सलाह दरकिनार कर रूसी क्रांति को अंतर्राष्ट्रीय सर्वहारा मॉडल की तरह पेश किया और सर्वहारा की तानीशाही को पार्टी और पार्टी नेतृत्व की तानाशाही में तब्दील हो गयी। कॉमिंटर्न ने लेनिन की सलाह को दरकिनार कर पार्टी में नौकरशाही को पनपने दिया जिसकी अंतिम परिणति सोवियत संघ के पतन में हुई[6]
चूंकि रूस में पूंजीवादी क्रांति के अभाव में सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी की दुहरी जिम्मेदारी थी, औद्योगिक विकास और समाजवाद का निर्माण। पहली जिम्मेदारी इसने बखूबी निभाकर साबित कर दिया कि राज्य नियंत्रित पूंजीवाद में निजी मुनाफे पर आधारित पूंजीवाद से तेज आर्थिक विकास होता है। दूसरे विश्वयुद्ध तक सोवियत संघ सर्वाधिक शक्तिशाली पूंजीवादी देश अमेरिका के समतुल्य आर्थिक और सैनिक शक्ति बन गया। पार्टी में वैचारिक विवाद, दूसरे विश्वयुद्ध के खतरे की विशिष्ट परिस्थितियों में विशिष्ट नीतियों; कृषि के सामूहिककरण के गुण-दोष; क्रांति के कुछ नेताओं पर जन अदालतों के आयोजन; कॉमिंटर्न की छठीं कांग्रेस में औपनिवेशिक देशों में राष्ट्रीय आंदोलनों से असहयोग की नीति आदि की चर्चा की गुंजाइश यहां नहीं है, वे अलग-अलग चर्चा के विषय हैं। न ही दूसरे विश्वयुद्ध के बाद शीतयुद्ध के दौर में पूंजीवादी साम्राज्यवाद से प्रतिस्पर्धात्मक वर्चस्व के संघर्ष पर चर्चा की। ये अलग चर्चा के विषय हैं तथा इन पर बहुत कुछ लिखा जा चुका है। रंधीर सिंह की पुस्तक समाजवाद का संकट में इसका सटीक विश्लेषण किया गया है। सोवियत संघ में बेरोजगारी, भिखमंगाई, वेश्यावृत्ति आदि गधे की सींग की तरह गायब हो गयी थीं। सोवियत संघ की उपलब्धियों और राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलनों तथा साम्राज्यवादी शोषण को नियंत्रित करने में उसकी भूमिका भी अलग विमर्श के विषय हैं।  स्टालिन की मृत्यु के बाद पार्टी नेतृत्व ने 1961 में 22वीं पार्टी कांग्रेस में, मबम्मद साहब के अंतिम पैगंबर होने की तर्ज पर, नया सोवियत समाज: सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी का अंतिम दस्तावेज पारित कर सोवियत संघ को सब लोगों का राज्य, यानि वर्गविहीन राज्य घोषित कर दिया तथा पूंदीवादी पुनर्स्थापना का पथ प्रशस्त किया[7] माओ ने सोवियत संघ को सामाजिक साम्राज्यवादी घोषित कर दिया[8] तथा सोवियत संघ के विघटन के बाद साम्राज्यवादी भोपुओं ने इतिहास का ही अंत कर दिया[9]



[1] https://www.marxists.org/archive/marx/works/1864/10/27.htm

[2] Letters: Marx-Engels Correspondence 1891 - Marxists Internet Archive

https://www.marxists.org/archive/marx/works/1891/letters/91_11_01.htm
[3] Lenin, https://www.marxists.org/archive/lenin/works/1920/lwc/
[4] https://www.marxists.org/archive/lenin/works/1920/lwc/
[6] Randhir Singh, Crisis of Socialism
[7] Roger E Kanet, The Rise and Fall of ‘All ;people’s State: Recent Changes in Soviet Theory of State, Soviet Studies, Vol. 20, No.1, July, 1968, pp. 81-93

[8] I Wor Kuen, Soviet Social Imperialism and the International Situation Today, Getting Together, Vol. VII, No. 2, July 1976.

[9] Francis Fukuyama, The End of History? http://www.jstor.org/stable/24027184

Saturday, March 24, 2018

बगावत की पाठशाला 18 (वर्ग चेतना 1)

बगावत की पाठशाला 
संघर्ष  और  निर्माण

विषय: मार्क्सवाद
पाठ 17
वर्ग और वर्ग चेतना
1
       क्रांति के दो कारक होते हैं, आंतरिक और वाह्य। आंतरिक कारण है व्यवस्था का संकट, यानि व्यवस्था के अंतर्विरोधों की परपक्वता। वाह्य कारण है, सत्ता संभालने की तैयारी के साथ वैकल्पिक क्रांतिकारी शक्ति की मौजूदगी। फ्रांस में वर्ग-संघर्ष में 1848 की क्रांति-प्रतिक्रांति के बीच बोनापार्टवाद के उदय के बारे में मार्क्स ने लिखा कि पूंजीपति वर्ग हार चुका था और सर्वहारा वर्ग की सत्ता पर काबिज होने की तैयारी नहीं कर पाया था।[1] यह तैयारी क्या है?  मार्क्स और एंगेल्स अपनी लगभग सब रचनाओं में इस बात को लगातार रेखांकित किया है कि सर्वहारा अपनी मुक्ति की लड़ाई खुद लड़ेगा। लेकिन कैसे? ‘अपने आप में वर्ग’ से ‘अपने लिए वर्ग’ बन कर यानि संख्या बल से जनबल बन कर, वर्ग हित के आधार पर अपने को संगठित करके। संख्याबल से जनबल में संक्रमण की कठिन कड़ी है वर्गचेतना। मार्क्स ने जर्मन विचारधारा में लिखा है, “हर ऐतिहासिक युग में शासक वर्ग के विचार ही शासक विचार होते हैं, यानि समाज की भौतिक शक्तियों पर जिस वर्ग का शासन होता है वही बौद्धिक शक्तियों पर भी शासन करता है. भौतिक उत्पादन के शाधन जिसके नियंत्रण में होते हैं, बौद्धिक उत्पादन के साधनों पर भी उसी का नियंत्रण रहता है, जिसके चलते सामान्यतः बौद्धिक उत्पादन के साधन से वंचितों के विचार इन्हीं विचारों के आधीन रहते  हैं”[2]। मार्क्स इसे युग का विचार या युग चेतना कहते हैं। यह युग चेतना सामाजिक चेतना का स्वरूप निर्धारित करती है। “हर युग का शासक वर्ग व्यवस्था के वैधीकरण के लिए वैचारिक वर्चस्व निर्मित करता है जो शोषण दमन पर आधारित व्यवस्था को न्यायपूर्ण बताता है जिसे शोषित भी आत्मसात कर लेता है। यही मिथ्या चेतना, युग चेतना  बन जाती है। शोषित युग चेतना के प्रभाव में शोषण को पनी कमियों का परिणाम और नियति मान लेता है”[3]। हर युग का शासक वर्ग अपने आंतरिक तथा गौड़ एवं प्रायः कृतिम अंतर्विरोधों को समाज का प्रमुख अंतर्विरोध प्रचारित कर मुख्य अंर्विरोध की धार कुंद करने की कोशिस करता है और काफी हद तक सफल भी होता है। साम्राज्यवादी, भूमंडलीय पूंजी की दो सेवक पार्टियों, भाजपा तथा कांग्रेस के आपसी अंतर्विरोध को प्रमुख राष्ट्रीय, राजनैतिक अंर्विरोध प्रचारित किया जा रहा है। शासक वर्ग वर्गचेतना के अभियान की गति के विरुद्ध धर्म, जाति, उपजाति आदि पर आधारित विचारधाराओं को हवा देता है।   
      जैसा कि ऊपर मार्क्स के हवाले से कहा गया है कि भौतिक जीवन की उत्पादन प्रणाली सामाजिक, राजनैतिक और बौद्धिक प्रक्रियाओं का सामान्य निरूपण करती हैं। “अपने विकास के खास चरण में समाज की भौतिक उत्पादन शक्तियों और मौजूदा उत्पादन संबंधों का टकराव होता है” जो उत्पादक शक्तियों के “विकास में बाधक बन जाते हैं। तब शुरू होता है सामाजिक क्रांति का एक युग” । इस तरह हम देखते हैं कि सामाजिक क्रांति की दो शर्ते हैं। पहली शर्त विकास का चरण और दूसरी वर्ग चेतना से लैश सर्वहारा संगठन।
      मार्क्स सोचते थे कि विकास के अपने चरम पर पूंजीवाद के अंतर्विरोध परिपक्व हो जाएंगे तथा श्रम-समाजीकरण के जरिए मजदूरों में वर्गचेतना का प्रसार होगा तथा सर्वहारा अपने लिए वर्ग बनेगा। वह इन अंतर्विरोधों को समझेगा और संगठित जनबल से उसे समाप्त कर नए युग का प्रारंभ करेगा। यदि क्रांति की स्थिति ऐसे देश में बनी जहां पूंजीवाद का विकास न हुआ हो, जैसा रूस या चीन में हुआ, तो यह क्रांति की नेतृत्वकारी पार्टी का उत्तरदायित्व बनता है कि पूंजीवाद के विकास के वह शिक्षा, सभा तथा संघर्षों के जरिए युग चेतना के मिथ को बेनकाब करें और उनके अंदर पूंजीवाद की व्यक्तिवादी सामाजिक चेतना का जनवादीकरण करे। चीनी सास्कृतिक क्रांति का यही मकसद था। 1960 के दशक तक भारत की कम्युनिस्ट पार्टी की उल्लेखनीय संसदीय उपस्थिति थी, लेकिन पार्टी इस कदर संसदीय समीकरणों में उलझ गयी कि क्रांति और वर्गसंघर्ष की बातें कर्मकांडी कथा बनकर रह गयीं। अन्य पार्टियों की ही तरह कम्युनिस्ट पार्टियां भी अपने संख्याबल को जनबल में तब्दील करने के प्रयास की बजाय उन्हें पार्टी लाइन से हांकते रहे। वर्ग चेतना के अभाव में उनके चुनावी जनाधार का संख्याबल, भाजपाई या सपाई संख्याबल बन गया। यह परिशिष्ट इस बात से खत्म करता हूं कि पूंजीवाद की ही तरह समाजवाद भी सिद्धांत के संकट से गुजर रहा है। दुनिया के हर देश में पूंजीवाद से जन-असंतोष है, उसे संख्याबल से जनबल में तब्दील करने के सिद्धांत और रणनीति असंतोष के इसी उहापोह से निकलेगा।
      उपसंहार
      क्रांति एक निरंतर प्रक्रिया है, रास्ते में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं। समाजवाद पूंजीवाद का विकल्प है और सामूहिकता वर्ग चेतना पूंजीवादी व्यक्तिवादी चेतना का। पूंजीवाद के विभिन्न चरणों के अनुरूप समाजवादी सिद्धांत भी बदलते हैं। उदारवादी पूंजीवाद के विरुद्ध, फ्रासीसी क्रांतियों (1789, 1848, 1871); रूसी क्रांतियों (1905, 1917); चीन (1949), क्यबा (159), वियतनाम की क्रांतियों के प्रयोगों से क्रांति का एक दौर खत्म हुआ नवउदारवादी पूंजीवाद के विरुद्ध तमाम देशों में स्वस्फूर्त विरोध हो रहे हैं जिन्हें एक संगठित रूप देने से क्रांति के नए दौर की शुरुआत होगी। भूमंडलीय पूंजी का कहर भूमंडलीय है, प्रतिरोध भी भूमंडलीय होनी चाहिए। इस वक्त साम्राज्यवादी भूमंडलीय पूंजी से लड़ने के लिए एक नए इंटरनेसनल के गठन की जरूरत है।
22.03.2018  



[1] The Class Struggles in France, 1848 to 1850 - Marxists Internet Archive

https://www.marxists.org/archive/marx/works/1850/class-struggles-france/
[2] Karl Marx, German Ideology, Pregress, Moscow, 1968, p. 26
[3] ईश मिश्र, उपभोक्ता संस्कृति बनाम जनसंस्कृति: युगचेतना बनाम युग चेतना, डॉ. सुनीत सिंह एवं पीयूष त्रिपाठी (सं), स्वराज, लोकतंत्र एवं टिकाऊ विकास, पीयूसीयल, इलाहाबाद, 2014, पृ. 16-19