Sunday, March 4, 2018

लल्लापुराण 198 (न्यायालय और भ्रष्टाचार)


मैं पहले ही कह चुका हूं , सिर्फ पुलिसिए ही नहीं जज भी पट्टाधारी होते हैं, क्लीन चिट देकर गवर्नर बन जाते है, भ्रष्ट देशद्रोही। एक दीपक मिश्र है जमीर होती तो कब का रिजाइन कर चुका होता, 4 जजों ने कहा यह बेईमान है, अहम अपराधियों के मामले एक और बहुत जूनियर मिश्र को दे देता है जिसके पास क्लीनचिट का स्टैंप है लगा देता है। आप भी जानते हैं गोधरा मोदी ने करवाया है, लेकिन कानूनी तकनीकियों का सहारा लेकर दिल री बात जुबान पर नहीं लाते। आर भी जानते हैं कि पुलिस चाहे तो कोई भी दंगा आधे घंटे में रोक सकती है, लेकिन दंगाइयों से मिलकर 3 साल चलाती है, संवैधानिक उत्तरदायित्व की ऐसी-तैसी कर नेताओं का कारिंदा बन अपराध करती कराती है, ईमानदारी से बताइए, मेरे करीब 3-4 दर्जन आईपीयस मित्र हैं, मेरी राय उनसे संवाद और पट्टाधारी पुलिसियों की करतूतों के अध्ययन पर आधारित है। हमलोगों का इलाहाबाद और जेयनयू का एक जूनियर आईपीयस (यूपी) शूर्यकांत शुक्ला तो इतना गलीच पट्टाधारी हो गया कि रिटारी की कगार पर मंदिर बनाने वाला कारसेवक हो गया, रिटायरी के बाद बड़ा टुकड़ा पाने की उसके लिए शुभकामना करता हूं। पुलिस यूपी का सबसे बड़ा बजरंगी गुंडा गिरोह बन गयी है। ईमानदारी से बताइए।

जो कानून है, मानूंगा, मैंने तो अपनी बात कही। शिक्षक होने के नाते शिक्षा का हाल पर दुखी होता हूं। अपने गांव जाता हूं तो दुखी होजाता हूं। तेज तेज लड़के लड़कियां, लेकिन कुंजी किस्म की टेक्स्टबुक और दैनिक जागरण तथा चौराहे पर गांव की गुटबाजी कीअड्डेबाजी ही इन बच्चों को ज्ञानार्जन के उपलब्ध संसाधन हैं। सकूल-कॉलेजों में लाइब्रेरी प्रणाली इतिहास बन चुकी है। रिटायर होकर पीयफ वगैरह से गांव में एक लाइब्रेरी और फ्री डेबोर्डिंग स्कूल शुरू करने की योजना है।

Saturday, March 3, 2018

लल्ला पुराण 197 (शिक्षा और सोच की तमीज)

साथियों ,अब किसी पर मेरे लिए अभद्र भाषा के प्रयोग के लिए ग्रुप में कर्रवाई न करने का निवेदन करता हूं। बाकी जब तक हूं, ग्रुप के नियमों का पालन करूंगा। "सामूहिक बुद्धिमत्ता निजी बुद्धिमत्ता से सदा श्रेष्ठतर होती है कोई एक व्यक्ति कितना भी बुद्धिमान क्यों न हो"। और मुझे रूसो का जबरन आजाद करने की बात बहुत आकर्षित करती है। यह जबरन दरअसल जबरन होता ही नहीं क्योंकि सामूहिकता के समान सदस्य के रूप में खुद द्वारा बनाए गए नियमों का पालन करने को बाध्य किया जाना, जबरन की कोटि में नहीं आता। कल कुछ पुराने शिष्य-मित्र आ गए। उनके जाने के बाद इस ग्रुप में एक प्रोफेसर समेत कई (सौभाग्य से बहुत कम) बच्चों के व्यवहार (भाषा और सोच, क्योंकि आभासी दुनिया मे यही दिखता है) के बारे में गहन चिंतन में फंस गया। आत्मग्लानि हो रही थी कि मैं क्यों कभी कभी निराधार निजी आक्षेपों और अनर्गल प्रलापों से तिलमिलाकर भूल जाता था कि 42 साल पहले 20 का था। यह एक शिक्षक को शोभा नहीं देता, लेकिन शिक्षक संयोग से एक साधारण इंसान ही होता है। हम सब अलग अलग क्षमताओं से संपन्न सधारण इंसान हैं, कुछ असाधारण दिखने की कोशिस करते हैं। मुझे साधारणता से गहरा प्रेम है। अब मैंने सारे आक्षेप-अभद्रताओं के प्रति सहनशीलता पैदा कर लिया है कि 42 साल का अंतर न भूलूं, शिक्षकीय धैर्य के साथ अपनी शक्ति और क्षमता की सीमाओं में सीखने-सिखाने का प्रयास करता रहूंगा। यह विचार कल 2002 बैच के दो शिष्य-मित्रों से बात-चीत में किसी 16 साल पुरानी घटना के जिक्र से आया। घटना का लब्बोलुबाब है कि मैं ग्राउंड में इन बच्चों के साथ क्लास में पढ़ाई किसी बात पर बहस कर रहा था। एक टेंसन सिंह मार्का गंभीर सहकर्मी ने दूर से मुझे बुलाया, पास जाने पर शिकायत करने लगे कि स्टूडेंट्स की मौजूदा पीढ़ी कितनी बद्तमीज हो गई है, शिक्षकों की इज्जत नहीं करते। मैंने पूछा यह जरूरी बात बताने के लिए अभी क्यों बुलाया? उन्होंने कहा कि ग्राउंड में क्लास लेने में कोई बुराई नहीं है लेकिन बच्चों को चाहिए था कि मेरे लिए कुर्सी ले आते मैं उन्ही के बराबर जमीन (घास) पर बैठा था। उनको मेरा जवाब पूरी क्लास हो गया, जिसका लब्बो लबाब है कि इज्जत दहेज या दलाली में नहीं मिलती, कमाई जाती है; समता का सुख सर्वश्रेष्ठ सुख है....। जिस बात के लिए इस घटना का जिक्र किया वह है कि हमने उनसे पूछा, हमारे विद्यार्थी कैसे हैं, इसमें हमारा कोई योगदान है क्या? नहीं तो बांधे बोरिया विस्तर। शिक्षक होने के नाते बच्चों पर गुस्सा करने की बजाय अपनी लामुदायिक आत्मालोचना करना चाहिए। भाषा की आक्रामकता कलम की फितरत है, नए मुहावरो का प्रचार और नई उक्तियों को लोकोक्तियों में तब्दील करने की कोशिस भी लेखकीय दायित्व है। मैं ईश मिश्र, माटी का नाना (विलोम वल्दियत) हलफनामा देकर वायदा करता हूं कि कभी नहीं भूलूंगा कि 42 (जून के बाद 43) साल पहले 20 साल का था और किसी के किसी आक्षेप और बुरा नहीं मानूंगा।
04.03.2018)

लल्ला पुराण 196 (त्रिपुरा चुनाव)

"दरअसल वैचारिक रूप से well organized और well drafted समाज न होने की वजह से हिंदुओं से communicate कर पाना कम्युनिस्टों के लिए संभव नही है।" असंभव महज एक सैद्धांतिक अवधारणा है। ऐसा इसलिए है कि कम्युनिस्ट पार्टियों के नेताओं ने मार्क्स पढ़ना बंद कर दिया है। क्रांतिकारी परिस्थितियां आसमान से नहीं हैं, मौजूदा परिस्थिति को लही क्रांतिकारी बनाना पड़ता है। इस पर पाठशाला के अगले पाठ लिए लेक्चर तैयार कर रहा हूं। मैं बहुत ईमानदार मास्टर हूं, बिना तैयारी क्लास नहीं जाता। मैंने "समाजवाद की समस्याएं" शीर्षक से एक लेख लिखा था (समकालीन तीसरी दुनिया, मई, 2015), सीपीयम की केंद्रीय कमेटी की मीटिंग के बाद एक लेख , 'भारत के कम्युनिस्ट आंदोलन में एक और फूट" (समयांतर, फरवरी, 2018) । Constitutionalism in Indian Communist Movement शीर्षक से जेयनयू में यमफिल का टर्मपेपर लिखा था लेकिन तब तक लेखक होने के आत्मविश्वास का अन्वेषण नहीं कर पाया था। साल बाद 1987 में एक जर्नल थर्ड कॉन्सेप्ट में छपा। सब हमने शेयर किया है, लेकिन भक्त लेख नहीं पढ़ता है, मेरा नाम पढ़कर इनके पापों की गालियां हमें देने लगता है। सीपीआई-सीपीयम और अन्य संसदीय पार्टियों में कोई गुणात्मक फर्क नहीं रह गया है। माऩिक सरकार या इंद्रजीत गुप्ता की निजी ईमानदारी से कोई फर्क नहीं पड़ता। क्लास में विस्तार से बात होगी। इस समय जो कश्मीर-से कन्याकुमारी तक केशरिया फहराने पर जोश की उमंगों पर तैर रहे हैं, वे फासीवाद के उदय पर ऐंटोनियो ग्राम्सी पढ़ लें तो जान जाएंगे कि वे आत्मघाती लहरों पर सवारी कर रहे हैं।

बगावत की पाठशाला 4

बगावत की पाठशाला
पाठ 4
विषय: मार्क्सवाद क्या है?

ऐतिहासिक भौतिकवाद 1 (होमवर्क)
द्वंद्वात्मक भौतिकवाद की पिछली क्लास में माट्साहब कामचोरी के मूड में अंग्रेजी में 10 साल पहले के अपने अंग्रेजी में नोट का लिंक पढ़ने का होमवर्क देकर होली खेलने चले गए। अगर किसी ने होमवर्क कर लिया तो अच्छी बात नहीं किया तो कोई बात नहीं। आज तो कामचोरी का होली के खुमार का अच्छा बहाना है, एक और होमवर्क दे देता हूं। 2011 मार्च में अदमजी (अदम गोंडवी) वाणी से प्रकाशित अपना संग्रह, ‘समय से मुठभेड़’ देने घर आए और ऐतिहासिक भौतिकवाद पर पद्य में पुस्तिका लिखने का आदेश दे दिए, मेरे यह कहने पर कि मैं पद्य नहीं गद्य लिखता हूं, उन्होंने मुझे मेरी बात याद दिलाया कि इंसान नित आत्मान्वेषण करता है। मैं उनकी बात मानकर शुरू तो कर दिया और दो खंड (सिद्धांत तथा आदिम अवस्था से पूंजीवाद का संक्रमण) लिखा फिर वैयक्तिक और बौधिक अनुशासनहीनकृता व आवारगी के अक्षम्य दुर्गुणों के चलते, बीच में छोड़कर और कुछ करने लगे। 2 खंड हो गया है, 4 ही बाकी है। हा हा। अब समय निकालकर लिखे को संपादित, परिष्कृत, संवर्धित करूंगा तथा अलिखे को लिखूंगा। लिखा पढ़ने और राय बनाने देने का होमवर्क देकर आज भी कहीं निकल रहा हूं। अगली क्लास द्वंद्वात्मक भौतिकवाद पर जारी रहेगी।

लल्ला पुराण 195 (त्रिपुरा चुनाव)


माणिक सरकार अपने पूर्ववर्ती नृपेन भट्टाचार्य की तरह नितांत ईमानदार व्यक्ति हैं, लेकिन उनकी पार्टी वैचारिक दिवालिएपन की शिकार है, 32 साल में बंगाल में क्रांतिकारी चेतना को और क्रांतिकारी दिशा देने की बजाय कुंद किया। मानिक सरकार या इंद्रजीत गुप्त की निजी ईमानदारी का जनता क्या अचार बनाएगी? मुल्क की आज की दुर्दशा का दायित्व काफी हद तक यहां की संसदीय कम्युनिस्ट पार्टियों के अकर्म-कुकर्मों का है। हमारी आने वाली पीढ़ियां हमारी पीढ़ी पर थूकेंगी जैसे जर्मनों की मौजूदा पीढ़ियां अपने हिटलरवादी पूर्वजों के नामों पर थूकेंगी कि हमने एक ऐसे दंगेबाज को प्रधानमंत्री बनाया जो झूठ के अलावा कुछ नहीं बोलता जो अपनी शिक्षा-शादी के बारे में गलत हलफनामा देता है और ऐसे पट्टाधारी जज थे जो दिल्ली विश्वविद्यालय पर गजट पब्लिक करने पर रोक लगा देता है। एक और दंगेबाज, फर्जी एंकाउंटरबाज अपराधी को जो जज पेशी से छूट नहीं देता उसका ट्रांसफर हो जाता है, दूसरा भी छूट नहीं देता उसका इहलोक से उहलोक में ट्रांसफर होता है। 3 अन्य जजों से जज लोया ने अपनेऊपर बन रहे दबाव की बात शेयर किया था, उनमें से 2 की दुर्घटना (8वी मंजिल से गिरने और ट्रेन की बर्थ से गिरने से) जाहिर है तीसरा अब शायद ही बोले? कहीं कोई हंगामा नहीं हत्यारों की पूजा-अर्चना में कमी नहीं। ऐसे विवेकशून्य आवाम को कोई गुलाम बना सकता है, 2-4 हजार अंग्रेजों द्वारा हमें गुलाम बनाकर 200 साल लूटते रहे, रोटी के लिए 2 कौड़ी की वर्दी में बिकनेवाले हमारे बहादुर पूर्वजों और अंग्रेजों के तलवे चाटने वाले पट्टाधारी रजवाड़ों के बलबूते। मुल्क का एक तिहाई जीडीपी लेकर मोदी को पालने वाले धनपशु भाग गए। विजय माल्या आज भी राज्यसभा का भाजपा सदस्य है, न तो पार्टी से न ही राज्यसभा से निकाला गया। रेल समेत सारी परिसंपत्तिया औने-पौने दामों पर अपने प्रिय धनपशुओं को बांटे-बेचे जा रहा है। गोभक्ति के उंमाद में किसानों को तबाह कर रहा है। 2019 तक देश 50 साल पीछे पहुंच जा रहा है। नौकरियां पैदा करने की जगह जो है वह भी खाए जा रहा है। आईटी में लाखों खर्चकर इंजीनियर बनने वाला ओला चला रहा है। कहीं कोई हंगामा नहीं। रोम जल रहा है, भक्त कीर्तन गा रहा है, आवाम बासुरी बजा रहा है। औपनिवेशिक साम्राज्यवाद और नवउदारवादी वित्तीय साम्राज्यवाद में बस इतना फर्क है कि अब किसी लॉर्ड क्लाइव की जरूरत नहीं है, सिराजजुद्दौला भी मीर जाफर बन गए हैं, कभी मनमोहन के रूप में कभी मोदी के।

Friday, March 2, 2018

बगावत की पाठशाला 4 (होम वर्क)

बगावत की पाठशाला
पाठ 4
मार्क्सवाद क्या है?
द्वंद्वात्मक भौकिकवाद 3
जब टीचर का पढ़ाने का मन नहीं करता तो क्या करता है? सर्प्राइज टेस्ट। यह 10 साल पहले विद्यार्थियों के लिए नोट तैयार किया था। इस बार इसे अपडेट करूंगा। यदि किसी के पास हिंदी में अनुवाद का समय हो तो आभारी रहूंगा।

Dialectical Materialism Ish Mishra The term Dialectical Materialism was not used by Marx himself but by subsequent Marxists to delin...
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Thursday, March 1, 2018

तू जिंदा है....

हमारे समय में जेयनयू की होली का यह हिटसांग होता था।

तू जिंदा है तो ज़िन्दगी की जीत में यकीन कर
अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर.
तू जिंदा है ….

ये ग़म के और चार दिन, सितम के और चार दिन,
ये दिन भी जायेंगे गुज़र, गुज़र गए हज़ार दिन.
कभी तो होगी इस चमन पे भी बहार की नज़र,
अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर.
तू जिंदा है…

हमारे कारवां को मंजिलों का इंतज़ार है,
ये आँधियों, ये बिजलियों की पीठ पर सवार है.
तू आ कदम मिला के चल, चलेंगे एक साथ हम,
अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर.
तू जिंदा है …

ज़मीं के पेट में पली अगन, पले हैं ज़लज़ले,
टिके न टिक सकेंगे भूख रोग के स्वराज ये,
मुसीबतों के सर कुचल चलेंगे एक साथ हम,
अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर.
तू जिंदा है..

बुरी है आग पेट की, बुरे हैं दिल के दाग ये,
न दब सकेंगे, एक दिन बनेंगे इन्कलाब ये,
गिरेंगे ज़ुल्म के महल, बनेंगे फिर नवीन घर,
अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर.
तू जिंदा है…

---- शैलेंद्र