Wednesday, December 21, 2016

International Proletariat 55

Auel Korr Absolutely. True that strength of national capital makes the nation state stronger in international dealings and its immediate antagonist is the national bourgeoisie and hence the bourgeois nation state. That is why Marx gave slogan of the unity of the workers of the world to be organized against the capitalism within the national boundaries with the awareness that the nationalism is the ideology of the bourgeois state for the class hegemony. The national capital in 3rd world is subservient to global imperialist capital. There is an urgent need of a new International.

Monday, December 19, 2016

नोटबंदी का घटाटोप

उस वक्त की बात है जब लिखी गयी थी यह कविता
चहकती थी हर शाख और महकती थी हर दिशा
मौसम में थी जीने-खाने की सहजता
सीमित कमाई से भी था घरबार चलता
बिछाकर सरकार ने नोटबंदी का भयानक जाल
लूट लिया मौसम से खून-पशीने बना जान-माल
बंद कर दिया है दिशाओं ने महकना
और शाखों ने चहकना
छा गया है दिशाओं पर नोटबंदी का घटाटोप
सरकार लगा रही है नंगे-भीखों पर कालाबाजारी के आरोप
शाखाएं ऊंघ रही हैं एटीम की लंबी कतारों में
भूल गए हैं खग-मृग झूमना, फुदकना और चहकना
लेकिन ये दिशाएं महकना भूली नहीं हैं
शाखाओं के तेवर में चुप रहना नहीं है
फिर से मंहकेंगी दिशाएं और चहकेंगी शाखाएं
नोटबंदी के फरेब की टूटेंगी मृगमरीचिकाएं
(यों ही)
(ईमि: 20.12.2016)

Sunday, December 18, 2016

शिक्षा और ज्ञान 94 (कविता)

एक सज्जन ने फेसबुक की अपनी पोस्ट में लिखा, "राजनैतिक दृष्टि को कविता में परोसने वाले अक्सर घटिया कविता ही लिख पाते हैं. उस पर:

ऐंतोन चेखव कला के लिए कला को सामाजिक अपराध मानते थे. स्वांतः सुखाय लिखने वाले लोग लिख कर फाइल में रख लें, सुख लेना हो तो निकाल कर पढ़ लें. पाश ने लिखा कि लोग सुरेंद्र शर्मा की कविताएं भूल जाएंगे क्योंकि वे एक लड़की से प्यार की कविता है और उनकी कविताएं याद रखेंगे क्योंकि वे सारे जहां से प्यार की कविताएं हैं जिनमें महबूब का भी प्यार शामिल है. फिर तो आप मजज़ाज, शाहिर, फैज, नागार्जुन, दुष्यंत, हबीब जालिब, इब्नेइंशां, गोरख, अदम, देबी प्रसाद मिश्र........... की कविताओं को या तो राजनैतिक नहीं मानते या घटिया म्ानते हैं. मान्यवर, राजनीति हमारा जीवन नियंत्रित करती है, जब भी सामाजिक सरोकार की रचना होगी वह राजनीति से परे नहीं होगी. अराजनिकता बहुत खतरनाक राजनीति होती है, रीढ़विहीन. शोषक-शोसित की विभाजन रेखा खिंची हुई है सबको अपना पक्ष तय करना है. 

मोदी विमर्श 52

मोदी जी मैक्यावलियन शासनशिल्प की कला में सबसे सफल प्रधानमंत्री हैं. मैक्यावली समझदार शासक को आसमान का वायदा करके धरती लूटने की सलाह देता है और यह कि यदि वायदा पूरा करने से खुद को हानि हो और वायदा का संदर्भ निकल गया हो तो उसे पूरा करना मूर्खता है. राजा के पास वायदा पूरा करने में असमर्थता के हजारों वाजिब कारण गिनाए जा सकते हैं. 80% कालाधन विदेशों में है, देश के कालाधन का केवल 5% नगदी था जो मोदी जी की नोटबंदी ने सफेद कर दिया. जनता भक्तिभाव से ओतप्रोत है कि अंततः इससे भ3ष्टाचार और कालाधन समाप्त हो जाएगा. भारत भक्ति प्रधान देश है चाहे संतोषी मांता की भक्ति हो या मोदी बाबा की.

Wednesday, December 14, 2016

ईश्वर विमर्श 41

धर्म जहां शासक वर्गों के वर्चस्व का हथियार रहा है वहीं कष्ट के अभिशप्त की राहत का (या राहत के भ्रम) का श्रोत भी रहा है और प्रतिरोध का तर्क भी. 17वीं-18वीं शताब्दी के गृहयुद्धों में ईश्वर की अवधारणा और ग्रंथों की अलग-अलग व्याख्याएं ही मुख्य मुद्दा था. मेरी पत्नी बहुत धार्मिक हैं, दयालु भी. रोज-सुबह शाम पूजा-आरती करती हैं. आस्था में तर्क नहीं होता. एक अराजकतावादी नास्तिक और मार्क्सवादी नास्तिक में फर्क यह है कि अराजक राज्य की तरह धर्म को समाप्त करना चाहता है जब कि मार्क्सवादी उन हालात को जो धर्म की जरूरत जारी रखते हैं. धर्म दुखी को खुशी और तृप्ति की आशा और खुशफहमी प्रदान करता है. जब लोगों को सही सही की खुशी और तृप्ति मिलेगी तो खुशफहमी की जरूरत नहीं रहेगी, परिणामस्वरूप न धर्म की. धर्म अपने आप बिखर जाएगा. शांति और सत्य की अलौकिकता में अन्वेषण हमारे लौकिक ज्ञान की सीमाओं का परिणाम है. भय विरासत में मिली एक अमूर्त सैद्धांतिक अवधारणा है. हमारे गांव में हमारे ही खान-दान की एक बुजुर्ग थीं जिनका कई 'भूतों-चुड़ैलों से संवाद' होता था. मैं इंटर में पढ़ता था और अनुभव से जान गया था कि भूत-वूत की बातें कपोल कल्पना है. मैंने एक दिन उनसे पूछा कि भूत-प्रेत मुझे क्यों नहीं डराते? उनका मासूम जवाब आज तक याद है. तुम्हें कैसे डराएगा, जै मनता ही ही नहीं उसे कैसे डराएगा? भूत की अमूर्त अवधारणा की बात, भय की अमूर्त अवधारणा पर भी लागू होती है.

Tuesday, December 13, 2016

नोटबंदी 8

अडानी की जहाज से उतरकर
उसने हुंकार किया
झेला है उसने चाय बेचने का संताप
इसीलिए किया नोटबंदी
बिक न सके जिससे
किसी चायवाले की चाय
बंद हो जाएगा धरती पर चाय बेचने का पाप

लगाकर माथे से मनुस्मृति
उसने पिछड़ी जाति जन्मने का प्रलाप किया
झेलनी न पड़े किसी और को आरक्षण की जिल्लत
उसने शिक्षा-नियुक्ति के निजीकरण का रास्ता साफ किया
कहा श्रमेव जयते
मजदूरों के अधिकारों के सब कानून नेस्तनाबूद किया

56 इंच का सीना तान
किया था इसने हुंकार रैलियों में ऐलान
विदेशी बैंकों में पड़ा काले धन में बसती
देश की खुशहाली की जान
कालाबाजारियों मगर सब इसके खास हैं
तो इसने चली नोटबंदी की चाल
कैशलेस के शगूफे से कर दिया रिटेल सेक्टर तबाह
साफ हो गई विश्वबैंक की मंशा से रिटेल में यफडीआई की राह

कहा था इसने किसी ललकार-हुंकार रैली में
बना जिस दिन वह शहंशाह
100 दिनों में लाएगा विदेशों से धन अथाह
बांट-देगा प्रजा में बिना भेदभाव
हर प्रजा को देगा 15-15 लाख
करने लगे जब लोग अपने हिस्से की बात
मन में आयी इसके उनकी ही जेबें लूटने की खुराफात
लुटते हुए भी भक्त हैं भक्तिभाव से ओतप्रोत
भगवान के लि सहना कष्ट वरदान है न कि प्रकोप
(ईमि: 13.12.2016)

Monday, December 12, 2016

कल्पनाशीलता

जो भी व्यवस्था के विरुद्ध जनपक्षीय कतार में है, वह वामपंथी है. कल्पनाशीलता मानव-प्रजाति का विशिष्ट गुण है. आर्किटेक्ट भवन का निर्माण पहले कल्पना में करता है, फिर कागज पर और अंततः जमीन पर.