*जन हस्तक्षेप*
फासीवादी मंसूबों के खिलाफ अभियानता. 20 अप्रैल 2026
*गुड़गांव-मानेसर श्रमिकों के वेतन बढ़ोतरी आंदोलन पर दमन संबंधी जांच रिपोर्ट पर वक्तव्य-*
मानवाधिकार और लोकतांत्रिक अधिकार संगठन जन हस्तक्षेप हरियाणा के गुड़गांव और मानेसर में विभिन्न कंपनियां के मजदूरों द्वारा वेतन बढ़ोतरी की मांग को लेकर दिए जा रहे धरने पर पुलिस प्रशासन द्वारा बर्बर लाठी चार्ज और मजदूर नेताओं व कार्यकर्ताओं को बीएनएस धारा 109 (सीआरपीसी की पुरानी धारा 307) के तहत हत्या के आरोप में गिरफ्तार करने की कड़ी निंदा करता है। साथ ही मांग करता है कि सरकार तुरंत सभी गिरफ्तार मजदूरों और कार्यकर्ताओं को रिहा करे और उन पर लगे आपराधिक धाराओं को वापस ले। साथ ही उन दोषी कंपनियों और श्रम विभाग के अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करे, जिन्होंने वर्ष 2025 में श्रमिक नेताओं के साथ बनी कमेटी में आम सहमति से वेतन बढ़ोतरी का फैसला लिए जाने के बावजूद उसे लागू नहीं किया और मजदूरों को आंदोलन के लिए विवश होना पड़ा। जन हस्तक्षेप हरियाणा सरकार से भी मांग करता है कि वह 2025 में मजदूरी को लेकर गठित कंपनी मालिकों के एसोसिएशन, ट्रेड यूनियन नेताओं और श्रम विभाग के अधिकारियों की संयुक्त कमेटी द्वारा स्वीकृत किए गए 23196 रूपए न्यूनतम मजदूरी को तत्काल प्रभाव से नोटिफाई कर उसे लागू करे।
गुड़गांव-मानेसर में मजदूरों के शांतिपूर्ण वेतन बढ़ोतरी संबंधी आंदोलन पर कंपनी मालिकों और पुलिस प्रशासन के बर्बर दमन और गिरफ्तारियों की खबरों को देखते हुए तथ्यों की जांच के लिए जन हस्तक्षेप की चार सदस्यीय तथ्यानवेषी टीम 17 अप्रैल 2026 को गुड़गांव गई। टीम ने प्रभावित मजदूरों और भोडसी जेल में बंद श्रमिक कार्यकर्ताओं के परिजनों से मिले कर विस्तृत बातचीत की। पुलिस प्रशासन और प्रबंधन ने 75 एफआईआर नंबर में 44 लोगों को गिरफ्तार किया था। बाद में उन्हें जमानत पर छोड़ दिया, लेकिन वेल सोनिक कंपनी यूनियन के जनरल सेक्रेटरी अजीत, कोषाध्यक्ष पिंटू कुमार यादव, श्यामवीर, राजू, हरीश सहित अन्य श्रमिकों को 307 के तहत भोडसी जेल में बंद कर दिया था। जांच दल के लौटने के दूसरे दिन सोमवार 18 अप्रैल को अजीत सिंह की जमानत हो गई, लेकिन शेष लोग अभी भी जेल में हैं।
जन हस्तक्षेप की टीम ने तथ्यों की जांच में पाया कि मजदूरों का असंतोष लंबे समय से था। खास तौर पर ठेका मजदूर कम वेतन और बेतहाशा बढ़ रही महंगाई से त्रस्त थे। श्रमिक कार्यकर्ताओं ने बताया कि 2025 में मजदूरी बढ़ाने को लेकर राज्य सरकार ने एक कमेटी बनाई थी। इसमें कंपनी प्रबंधन के एसोसिएशन, मजदूर यूनियन और श्रम विभाग के अधिकारी सदस्य थे। श्रमिकों की तरफ से अजीत सिंह, एटक के अनिल पवार और आकाश सदस्य थे। अंतिम बैठक दिसंबर में हुई, जिसमें न्यूनतम मजदूरी वृद्धि पर सहमति बनी। इसे 1 अप्रैल 2026 से लागू करना था। बाद में हरियाणा सरकार ने कमेटी की रिपोर्ट में संशोधन करते हुए 3 अप्रैल को 15220 रुपए न्यूनतम मजदूरी बढ़ाने पर सहमति दी और 8 अप्रैल को उसका नोटिफिकेशन जारी किया। यहां एक गौरतलब तथ्य है कि इसी दौरान हरियाणा सरकार ने गुड़गांव और मानेसर सहित कई जिलों में बड़े पैमाने पर प्रशासनिक तबादले किए।
शुरुआत में होंडा कंपनी में 2017 से ठेका मजदूरी पर काम कर रहे श्रमिकों ने न्यूनतम वेतन बढ़ाने की मांग को लेकर धरना दिया। कंपनी ने 16 हजा और 18 हजार की दो कैटेगरी का वेतन देने की सहमति दी। इसका दूसरी कंपनियों के श्रमिकों पर व्यापक असर पड़ा। वहीं सरकार द्वारा 8 अप्रैल को नोटिफिकेशन जारी होने के बाद, मुंजाल शोवा कंपनी मानेसर में बढ़े वेतन की नोटिस लगाने की मांग को लेकर 9 अप्रैल को श्रमिक धरने पर बैठ गए। इसके सामने की कंपनी सत्यम कंपनी के श्रमिक भी शाम को धरने पर बैठ गए। हालांकि इससे पहले रूप पॉलीमर्स के श्रमिक 5 अप्रैल को ही धरने पर बैठ गए थे। सत्यम और मुंजाल के श्रमिकों को कंपनी मालिकों और प्रशासन ने गेट पर बैठने से मना किया। इस पर श्रमिक तहसील परिसर में धरना देने चले गए। इस तरह 3 अप्रैल से लेकर आठ अप्रैल तक कई कंपनियों के श्रमिक तहसील पर धरना देने आ गये।
9 अप्रैल को ऑटोमोबाइल सेक्टर की कंपनियों ने बढ़ा वेतन लागू कर दिया, लेकिन गारमेंट व अन्य उत्पादों की कंपनियों ने ऐसा नहीं किया। इससे पूरे इंडस्ट्रियल एरिया के श्रमिकों में असंतोष फैल गया। रिचा के तीन प्लांट है। इसके अलावा सत्यम रूप पॉलीमर आदि कई कंपनियां के श्रमिक 7 अप्रैल को धरने पर बैठ गए और बाद में कई और कंपनियों के श्रमिक जुड़ते गए। कई कंपनियों ने अपने मजदूरों को हड़ताल पर जाने की अनुमति नहीं दी। सेक्टर 37 में इन स्टाइल इंक कंपनी आदि के बाहर 25-30 पुलिसकर्मी तैनात कर दिए गए। गारमेंट कंपनी रिचा ग्लोबल ने जब बढ़े वेतन का नोटिस नहीं लगाया, तो श्रमिकों ने 9 तारीख को फैक्ट्री गेट पर जमा होकर नोटिस लगाने की मांग की। इसके तुरंत बाद ही पुलिस वहां पहुंच गई और उसने लाठी चार्ज किया। श्रमिक भाग कर मंगरोला, नाहरपुर आदि आसपास के गांवों की तरफ भागे, तो उन्हें रास्ते में पकड़ कर पीटा गया और जो भी मिला उसे गिरफ्तार कर लिया।
जांच के दौरान यह तथ्य स्पष्ट रूप से सामने आए हैं कि कई कंपनियां के प्रबंधन ने तहसील पर धरना दे रहे श्रमिकों को अपना कर्मचारी मानने से इनकार कर दिया। यही नहीं श्रमिक स्थानीय गांवों में जिन लोगों के यहां कमरा किराए पर लेकर रहते हैं, उनसे भी दबाव डलवाया गया। गुड़गांव-मानेसर में ट्रेड यूनियन आंदोलन का इतिहास रहा है, लेकिन यह भी महत्वपूर्ण है कि कंपनियां स्थानीय दबंग लोगों के जरिए मजदूरों पर हमले करवाने से लेकर सभी तरह के दबाव डलवाती रही हैं। हालांकि इस बीच कई कंपनियों ने बढ़ा वेतन लागू कर दिया, लेकिन अभी भी मानेसर की नील मेटल प्रोडक्ट, स्टरलाइट 4G जैसी कंपनियों ने बढ़ा वेतन नहीं दिया है। यही कारण है कि हरियाणा में 8 व 9 मई के बाद से छिटपुट कई कंपनियों में श्रमिक विरोध कर रहे हैं।
जांच टीम को श्रमिक कार्यकर्ताओं ने बताया कि आंदोलन में कम वेतन और बेतहाशा महंगाई प्रमुख कारण था। 2019 में कंपनियों ने पुराने श्रमिकों को निकाल दिया था। उस समय अधिकांश मजदूर मिनिमम 15000 से लेकर ₹30000 तक वेतन पाते थे। उस समय उनकी यूनियन भी होती थी, लेकिन कोरोना खत्म होने के बाद 2021 से कंपनियों ने जब कर्मचारियों को दोबारा नौकरी पर रखा, तो उन्हें 10 और 11 हजार रुपए ही देना शुरू किया। वह यूनियन से भी नहीं जुड़ सकते थे, क्योंकि वह ठेकेदारों के माध्यम से आए थे। कंपनी प्रबंधन का भी यूनियन पर दबाव था कि वह ठेका श्रमिकों को अपना सदस्य नहीं बना सकते, अधिकांश कंपनियों में यूनियन है, लेकिन उसमें ठेका श्रमिक सदस्य नहीं बन सकते और ठेका श्रमिकों के सवाल पर यूनियन खामोश रहती हैं, जिन यूनियन ने ठेका श्रमिकों को सदस्य बनाया तो उनकी यूनियन की मान्यता समाप्त कर दी गई। बेल सोनी कंपनी की ट्रेड यूनियन इसका बड़ा उदाहरण है, जिसने ठेका कर्मियों को सदस्य बनाया तो कंपनी ने उसकी मान्यता लेबर आफिस (ट्रेड यूनियन रजिस्ट्रार) से शिकायत कर समाप्त करवा दी और कंपनी ने नई यूनियन बनवा दी। अब यह मामला हाई कोर्ट में है।
जन हस्तक्षेप जांच दल में हिंदू कॉलेज (डीयू) के पूर्व प्रोफेसर ईश मिश्र, नागरिक अधिकार कार्यकर्ता सिद्धार्थ, वरिष्ठ पत्रकार अनिल दुबे और वरिष्ठ पत्रकार हैदर नकवी शामिल थे। टीम ने जांच में पाया कि गुड़गांव-मानेसर में क्रांतिकारी मजदूर आंदोलनों का इतिहास रहा है, लेकिन हाल के वर्षों में कंपनी मालिकों और आरएसएस-बीजेपी की सरकार ने श्रमिकों के जीने लायक न्यूनतम वेतन को ही नहीं समाप्त किया है, बल्कि उनके यूनियन बनाने और विरोध प्रकट करने का संवैधानिक एवं कानूनी अधिकारों को भी समाप्त किया है।
जन हस्तक्षेप मांग करता है कि -
1- आंदोलन से जुड़े मजदूरों और कार्यकर्ताओं के खिलाफ सभी मामले तुरंत वापस लिए जाएं और उन्हें रिहा किया जाए।
2- गिरफ्तार सभी श्रमिकों के जप्त किए गए मोबाइल आदि उपकरण उन्हें वापस लौटाए जाएं।
3- ठेका मजदूरों को यूनियन बनाने या पहले से चल रही यूनियन में शामिल होने का अधिकार दिया जाए।
4- अप्रैल माह से घोषित बढ़े वेतन का भुगतान सुनिश्चित किया जाए और वेतन वृद्धि को महंगाई से जोड़ा जाए। मजदूरों को पीएफ और ईएसआई का लाभ मिलना सुनिश्चित किया जाए।
5- ठेका मजदूरी की व्यवस्था खत्म किया जाए और कंपनियों को सीधे रोजगार देने का निर्देश दे।
6- गुड़गांव-मानेसर की सभी औद्योगिक इकाइयों और कंपनियों के रिकार्ड तैयार कर पंजीकृत किए जाएं साथ ही मजदूरों की रजिस्ट्री बने।
7- चार श्रम संहिता को निरस्त किया जाए और श्रम कानूनों एवं श्रम अधिकारों, जिसमें यूनियन बनाने का अधिकार भी शामिल है, को लागू करना सुनिश्चित किया जाए।
संयोजक-
डॉक्टर विकास बाजपेई जेएनयू
सहसंयोजक-
अनिल दुबे वरिष्ठ पत्रकार
9811080915

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