मजदूर आंदोलन और पुलिस दमन
ईश मिश्र
पूंजीवाद में मालिक कम-से-कम मजदूरी देकर मजदूर से ज्यादा-सा-ज्यादा काम लेना चाहता है यानि ज्यादा-सा-ज्यादा शोषण करना चाहता है और मजदूर इसे कम-से-कम करना चाहता है और अंततः समाप्त करना चाहता है। इसके लिए उसे संगठित होने की जरूरत होती है। कार्ल मार्क्स ने अपनी कालजयी कृति “पूंजी” में लक्षणिक रूप से कहा है, "पूंजी वह मृत श्रम है, जो पिशाच की तरह जीवित श्रम का खून चूसकर ही जीवित रहती है, और श्रम के रूप में जितना अधिक खून चूसती है, उतना ही अधिक जीवित रहती है।"
सदियों के संघर्षों और शहादतों के परिणाम स्वरूप मजदूरों ने दिन के 8 घंटे के काम के अधिकार के साथ कुछ अधिकार हासिल किए थे। दिन के 8 घंटे के काम का अधिकार मार्क्स तथा यूरोप के अन्य जाने माने मजदूर नेताओं/समाजवादी बुद्धिजीवियों के नेतृत्व में 1864 में स्थापित मजदूर अंतर्राष्ट्रीय संगठन (फर्स्ट इंटरनेसनल) की प्रमुख मांगों में था। संघर्षों से हासिल मजदूर अधिकारों को इंगलैंड और अमेरिका में दक्षिणपंथी सरकारों ने 1980 के दशक से छीनना शुरू किया तथा 1990 के दशक में भूमंडलीकरण के साथ यह प्रवृत्ति भूमंडलीय हो गयी। भारत में भूमंडलीकरण के समर्थक भी इसमें निहित अमानवीय हद तक मजदूर विरोधी प्रवृत्तियों से सहमत थे और उन्होंने ‘मानवीय चेहरे के साथ’ भूमंडलीकरण की बात करना शुरू किया। भूमंडलीकरण के नाम पर एक तरफ कल्याणकारी संस्थाओं का विघटन शुरू हुआ दूसरी तरफ मजदूर विरोधी नीतियों का प्रतिपादन। मजदूर विरोधी नीतियां बनती और लागू होती गयीं और ट्रेड यूनियनें टूटती/कमजोर होती गयीं नजीजतन दशक-दर-दशक बीतते गए और मजदूर विरोधी नीतियों तथा मजदूरों के शोषण-दमन के विरुद्ध राष्ट्रीय या प्रदेश स्तर पर किसी ट्रेड यूनियन आंदोलन की खबर नहीं मिली। जो भी छिट-पुट समूह; मानवाधिकार संगठन या कार्यकर्ता मजदूरों के पक्ष में बोलते हैं, उन्हें सरकारें; उनके लंबरदार; सांप्रदायिक अंधभक्त और मृदंग मीडिया अर्बन नक्सल या देशद्रोही घोषित कर देती है। राष्ट्रीय ट्रेडयूनियनों का अस्तित्व संगठित क्षेत्र में सिमटता गया और धीरे धीरे उत्पादन का संगठित क्षेत्र नगण्य होता गया और असंगठित क्षेत्र में ट्रेडयूनियन बनाने की मनाही है। उत्पादन और सेवा-क्षेत्रों में उदारीकरण और भूमंडलीकरण के नाम पर ठेकेदारी प्रथा लागू होती गयी। 8 घंटे काम का अधिकार गूलर का फूल होता गया तथा अमानवीय स्तर की दयनीय मजदूरी पर 12 से 16 घंटे काम लिया जाने लगा। मार्क्स ने “दर्शन की गरीबी” में लिखा है कि अपनी आर्थिक परिस्थितियों के चलते मजदूर ‘अपने आप में वर्ग’ हैं, लेकिन तब तक वे एक भीड़ भर रहते हैं, जब तक साझा हितों के आधार पर साझे संघर्ष के लिए संगठित होकर ‘अपने लिए वर्ग’ नहीं बनते हैं। साझा हितों के आधार पर वे साझे संघर्ष के लिए तभी संगठित होते हैं, जब वे वर्गचेतना से लैश होते हैं। वर्ग चेतना से लैश होनने को सामाजिक चेतना का जनवादीकरण भी कहा जा सकता है। सामाजिक चेतना का निर्माण शासक वर्गों के वैचारिक प्रभाव के चलते होता है, जिसे मार्क्स ‘युग का विचार’ कहते हैं। युग के विचार यानि शासक वर्ग की विचारधारा को तोड़कर सामाजिक चेतना के जनवादीकरण या वर्गचेतना के संचार से ही मजदूर वर्गचेतना से लैश होकर वर्गसंघर्ष के लिए संगठित होता है। मजदूरी में वृद्धि और काम की परिस्थितियों जैसी मांगों के लिए आर्थिक संघर्ष भी वर्ग संघर्ष का ही हिस्सा है, जिसे क्रांतिकारी राजनैतिक संघर्ष का पूर्वाभ्यास भी कहा जा सकता है। जैसा कि नोएडा और ग्रेटर नोएडा में कुछ मजदूरों से बातचीत से लगा, किसी राजनैतिक पार्टी या राष्ट्रीय ट्रेडयूनियन के अभाव में नोएडा, ग्रेटर नोएडा, गुड़गांव तथा मानेसर एवं बिहार के बरौनी में फूटा मजदूरों का जनाक्रोश एवं हड़तालें स्वफूर्त वर्ग चेतना का परिणाम हैं।
पश्चिमी एशिया में अमेरिका-इज्रायल द्वारा थोपे गए साम्राज्यवादी युद्ध के चलते, रसोई-गैस की किल्लत की सबसे अधिक मार मजदूरों पर पड़ी और बहुत से मजदूर काम छोड़कर अपने गांव भागने लगे, लेकिन गांव में रोजी-रोटी की सुविधा होती तो वे पेट भरने के लिए हजार मील दूर क्यो आते? काम की शर्तों में सुधार और मजदूरी में न्यूनतम मानवीय प्रतिष्ठा के साथ जीवन-बसर भर की बढ़ोत्तरी के लिए हड़ताल के अलावा उनके पास कोई रास्ता नहीं बचा। संविधान में जीने का अधिकार मौलिक अधिकार के रूप में दर्ज है, और जीने की शर्त है भरण-पोषण की न्यूनतम जरूरतें जिन्हें पूरी करना साम्राज्यवादी भूमंडलीय पूंजी की व्यवस्था अनावश्यक मानती है। ऐसे में असहनीय, अमानवीय परिस्थितियों में जी रहे मज़दूरों के आक्रोश का विस्फोट लाजिमी है। दुष्यंत कुमार की ये पंक्तियां याद आती हैं, “रक्त वर्षों से नसों में खौलता है, आप कहते हैं क्षणिक उत्तेजना है।” बौखलाहट में सरकार मजदूरों, मजदूरों की जायज मांगों के लिए उनके आंदोलन का समर्थन करने वाले छात्र एवं मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को हिंसा भड़काने के झूठे आरेपों में गिरफ्तार कर रही है। नोएडा पुलिस यूएनआई के पूर्व पत्रकार एवं भगत सिंह तथा साथियों के दस्तावेजों के संपाद सत्यम वर्मा तथा मजदूर बिगुल से जुड़े कई छात्रों को गिरफ्तार कर चुकी है। गौतमबुद्ध नगर के जेल अधिकारियों के मार्फत मिली अपुष्ट खबरों के अनुसार, गंभीर आरोपों में बंद कुछ मजदूरों तथा मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के अलावा ज्यादातर मजदूरों को जमानत पर छोड़ा जा चुका है। मजदूरों के मामले में गंभीर आरोप कितने गढ़े हुए होते हैं, जग जाहिर है। आद्योगिक इलाके तथा कारखाना क्षेत्र पुलिस छावनियों में तब्दील हो गए हैं।
24 अप्रैल को मानवाधिकार संगठन “जन हस्तक्षेप” की फैक्ट फाइंडिंग टीम ने नोएडा-ग्रेटर नोएडा के औद्योगिक इलाकों में मजदूरों से बातचीत में पाया कि आंदोलन की शुरुआत रिचा ग्लोबल गारमेंट कंपनी से हुई। कंपनी पहले गुड़गांव में थी और वहां अधिक वेतन देती थी। कुछ साल पहले कंपनी ने नोएडा सेक्टर 83 में शिफ्ट होने के बाद, मजदूरी में कटौती कर दी। इसके लिए कंपनी ने एक नायाब तरीका निकाला पहले मजदूरों को नौकरी से निकाल दिया और फिर उन्हें ही कम वेतन पर फिर से काम पर रख लिया। जनहस्तक्षेप टीम को “एक मजदूर ने बताया कि 9 अप्रैल को खबर फैली कि हरियाणा सरकार द्वारा न्यूनतम वेतन में 35% वृद्धि के कारण कंपनी के मानेसर प्लांट में अधिक वेतन दिया जा रहा है, जिससे कंपनी के नोएडा कार्यालय के मजदूरों में असंतोष बढ़ गया। वे समान काम की समान मजदूरी की मांग करने लगे। 9 अप्रैल 2026 को मजदूरों ने कंपनी गेट पर धरना शुरू कर दिया। 10 अप्रैल को प्रबंधन ने पुलिस बुलाई और कुछ मजदूरों को गिरफ्तार करवा दिया। इसके बावजूद विरोध शांतिपूर्ण बना रहा। अगले दिन विरोध मदरसन जैसी अन्य कंपनियों तक फैल गया।”
सरकार आंदोलन को दबाने और आंदोलनकारी मजदूरों का दमन करने तथा आंदोलन को बदनाम करने की जुगत में लग गयी। कल 28 अप्रैल 2026 को ‘सत्यम वर्मा रिहाई मंच’ द्वारा प्रेस क्लब दिल्ली में आयोजिक पत्रकार सम्मेलन में सरकार द्वारा आंदोलन का मास्टर माइंड घोषित, आदित्य आनंद के भाई केशव आनंद ने वीडियो दिखाया जिसमें आदित्य और अन्य आंदोलनकारी शांतिपूर्ण आंदोलन की अपील कर रहे हैं और व्याट्सअप की क्लिपिंग दिखाय़ा जिसमें पुलिस के घुसपैठिए आंदोलन को वदनाम करने के लिए हिंसा की अपील कर रहे हैं। खैर यह तो सुविदित तथ्य है कि मजदूरों के आंदोलन को बदनाम करने के लिए पुलिस घुसपैठकर उसे हिंसक बनाने की कोशिश करती है चाहे वह 1886 का शिकागो का मजदूर आंदोलन हो या 2026 का नोएडा-ग्रेटर नोएडा और गुडगांव-मानेसर का।
जनहस्तक्षेप की टीम को मजदूरों से बातचीत में पता चला कि 13 अप्रैल को पुलिस ने कंपनियों के सामने सड़कों पर बैरिकेड्स लगा दिए, जिससे ट्रैफिक जाम हो गया। जाम में फंसे लोगों के विरोध के विरुद्ध पुलिस ने बल प्रयोग किया, जिससे फैली अफरा-तफरी को चलते आंदोलन पास की फैक्ट्रियों तक फैल गया और धीरे-धीरे, आंदोलन नोएडा फेज 2, सेक्टर 59, 60, 62, 83 और 84 के औद्योगिक क्षेत्रों में फैलता गया। पुलिस ने मजदूरों की अंधाधुंध गिरफ्तारी शुरू कर दी और विरोध में देखते-देखते 30,000-40,000 मजदूर सड़कों पर आ गए। पुलिस ने एक हजार से ज्यादा मजदूरों को गिरफ्तार किया, उन्हें 5 से 7 दिनों तक जेल में रखा, उनके परिवारों को उनके ठिकाने की जानकारी तक नहीं दी। मजदूर न्यूनतम वेतन और श्रम कानूनों को लागू करनेके लिए आंदोलित थे लेकिन उनके खिलाफ एफआईआर में उकसाने, संपत्ति को नुकसान पहुंचाने और आगजनी के झूठे आरोप हैं। घटना के बाद, सरकार और श्रम विभाग ने कई ठेकेदारों के लाइसेंस रद्द करना शुरू कर दिया, जो इस बात का प्रमाण है कि सरकार भी मानती है कि उद्योगपति और ठेकेदार गड़बड़ कर रहे थे।
हमारी समझ से यह आंदोलन स्वस्फूर्त है तथा मजदूरों में अपने हितों के प्रति स्वस्फूत चेतना का संचार क्रांतिकारी परिघटना है और असहनीय, अमानवीय परिस्थितियों में जी रहे मज़दूरों के आक्रोश के विस्फोट का जो सिलसिला बिहार में बरौनी और हरियाणा में पानीपत के बाद मानेसर, गुड़गांव, फरीदाबाद, उत्तरप्रदेश में नोएडा, ग्रेटर नोएडा, इलाहाबाद, राजधानी दिल्ली के औद्योगिक क्षेत्रों, राजस्थान में भिवाड़ी, टप्पूकड़ा, चौपानकी, खुशखेड़ा, नीमराना, और उत्तराखंड में लालकुआँ, हलद्वानी, रुद्रपुर से होते हुए आगे बढ़ा, वह अब गुजरात के सूरत और हजिरा आदि से होते हुए झारखण्ड, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ के औद्योगिक इलाकों तक फैलता जा रहा है। दक्षिण के औद्योगिक क्षेत्रों में भी ज्वालामुखी विस्फोट के लिए सतह के नीचे कुलबुला रहा है। यह लेख इस आशावादी मनोकामना के साथ समाप्त करना अनुचित न होगा कि उम्मीद है कि यह आंदोलन देश में मजदूरों के भावी क्रांतिकारी आंदोलन का पूर्वकथ्य साबित होगा।

No comments:
Post a Comment