इंडिया ब्लॉक की बैठक में राहुल गांधी के भाषण पर एक पोस्ट पर कमेंट:
राहुल की राजनैतिक अर्थशास्त्र की समझ थोड़ा कमजोर है वरना वे प्रमुख और गौड़ अंतर्विरोध का अंतर समझते और केरल के पूर्व मुख्यमंत्री के बारे में ऐसा बयान न देते। वैसे उनके वक्तव्य का मुख्य संदेश कि फासीवाद से निपटने के लिए चुनाव नहीं आंदोलन ही विकल्प है। चुनाव आयोग समेत सारी संवैधानिक संस्थाओं पर आरएसएस ने कब्जा कर लिया है। और आज के हालात में कांग्रेस की धुरी के गिर्द संयुक्त मोर्चा ही विकल्प है। इससे इतर मेरा मानना है कि आज के हालात के जिम्मेदार हम वामपंथी ही हैं। कम्युनिस्ट पार्टियां क्रांति की तैयारी के कार्यक्रमों को तिलांजलि देकर पूर्णतः चुनावी पार्टियां बन गयीं। चुनाव का इस्तेमाल, संख्याबल को जनबल में तब्दील करने के लिए सामाजिक चेतना के जनवादीकरण के साधन के रूप में करना था लेकिन जब साधन ही साध्य बन जाए तो हार निश्चित है। पश्चिम बंगाल में 32 साल शासन में रहने के दौरान सीपीएम ने सामाजिक चेतना के जनवादीकरण के कार्यक्रम चलाने की बजाय अन्य पार्टियों की तरह शासन ही करती रही और इसका संख्यीबल पहले टीएमसी में चला गया और फिर बीजेपी में। हम वामपंथियों को गहन आत्मावलोकन, आत्ममंथन और आत्मालोचना की जरूरत है। उम्मीद है पुरातन पड़ गई संरचनाओं की जगह नई संरचनाएं पनपेंगीं, भारत ही नहीं पूरी दुनिया में एक नए वामपंथी नवजागरण की जरूरत है -- एक नए इंटरनेसनल की, जिसके लिए, भारत जैसे देश में, जातिवाद और सांप्रदायिकता जैसी मिथ्या चेतनाओं से मुक्ति पूर्व शर्त है।

No comments:
Post a Comment