Tuesday, June 2, 2026

बेतरतीब 190 (बचपन, प्राइमरी से आगे)

 1964 में प्राइमरी यानि कक्षा 5 की परीक्षा पास करने के, बाद सबसे नजदीकी स्कूल लग्गूपुर पढ़ने गया जो हमारे गांव से 6-7 किमी दूर था। स्कूल लग्गूपुर गांव में एक जमींदार,  सरजू पांडे की विशालकाय कोठी के आहाते में था, लेकिन उसका नाम जूनियर हाई स्कूल पवई था। पवई उस गांव से सटी हुई (लगभग 1किमी दूर) बाजार है।  पांडे जी ने कोठी गोरखपुर में रहने वाले अपने दामाद क नाम संकल्प कर दिया था, और खाली रहती थी। उसी से सटा एक खपड़ैल बनाकर पति-पत्नी, उसी में रहते थे।सुना है, उसी गांव में ग्राम समाज की जमीन में वह स्कूल अलग भवन में बन गया है, मुझे कभी नजदीक से देखने का मौका नहीं मिला। अबकी बार गांव जाऊंगा तो देखने जाऊंगा। कोठी के बरामदे में कक्षा 8 की पढ़ाई होती थी और बरामदे से सटे दो कमरे ऑफिस और स्टाफ रूम के रूप में इस्तेमाल हते थे। कोठी के आहाे में विशाल अशोक के पेड़ के इर्द-गिर्द दो मड़हों में कक्षा 7 और कक्षा 6 के क्लास चलते थे। आहाते मे विशाल अशोक के पेड़ के नीचेे कुर्सियों पर शिक्षक बैठते थे। 


 जब हम कक्षा 6 में गए तो हमारे साथ कक्षा 4 में पढ़ने वाले लड़के तब कक्षा 5 में आए। कक्षा 5 के हमारे सहपाठियों में हमारे गांव के रमाकर उपाध्याय अपने बड़े भाई के साथ कलकत्ता चले गए, बाकी अगल-बगल के गांवों के लड़के कहां गए, पता नहीं। प्रभाकर जी कलकत्ता में किसी स्कूल में नौकरी करते थे। वे तब तक के हमारे गांव के चंद पढ़े-लिखे लोगों में थे। उन्हीं जितना पढ़े, सुर्जू भाई (सूर्यकुमार मिश्र) जौनपुर जिला कृषि कार्यालय में नौकरी करते थे। उस साल (1964 में)अपने गांव के से कक्षा 6 में लग्गूपुर पढ़ने जाने वाला मैं अकेला छात्र था, कक्षा 7 में कोई नहीं था। कक्षा 8 में 3 लोग थे, तीनों मेरे भइया के हमउम्र थे, भइया उसी साल 1964 में आठवीं पास कर, हाई स्कूल में पढ़ने गांव से 12 मील दूर, शाहगंज चले गए थे। जब मैं कक्षा6 में लग्गूपुर जाना शुरू किया तो साथ जाने वाले, कक्षा 8 के 3 लोग थे – राम बचन सिंह; सती प्रसाद मिश्र (लंगड़) तथा रामकिशोर मिश्र (बचूड़ी)। सती प्रसाद और किशोर क्रमशः चाचा भतीजे थे। लंगड़ भाई का नाम लंगड़ क्यों पड़ा, समझ में नहीं आता था, उनके पैर बिल्कुल दुरुस्त थे। वैसे गांव की संवेदनशीलता काफी क्रूर होती है, पैरों में कुछ खराबी वाले का बुलाने का नाम लंगड़ पड़ जाता था और नेत्रहीन का सूरदास। किशोर बताते हैं कि उनका और मेरे भइया तथा ठकुरइया के कनिक बाबा (कनिक बहादुर सिंह) के बेटे सत्येंद्र सिंह का जन्म एक-दो दिन के अंतर पर हुआ था। किशोर गांव के  रिश्ते में भतीजे लगते हैं, उम्र में 4-5 साल बड़े होने के बावजूद मिलने पर या फोन पर चाचा जी संबोधन के साथ ही बात करते हैं। फौज में थे, शायद सूबेदार के पद से रिटायर होकर अब इलाहाबाद में बस गअए हैं। सती प्रसाद कलकत्ता में बैंक में नौकरी करते थे, 7-8 साल पहले कलकत्ता से गांव आते समय गया में ट्रेन से गिर कर घायल हो गए थे जिन्हें वहीं रेलवे अस्पताल में भर्ती कराया गया लेकिन वेे बचे नहीं।राम बचन सिंह दिल्ली में स्टेट्समैंन में चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी थे, 8-10 साल पहले किसी बीमारी से उनका निधन हो गया। इनके हमउम्र हमारे भइया का दिसंबर, 2023 में किडनी आदि की बीमारी से नोएडा के एक अस्पताल में निधन हो गया। 


टेक्स्ट के बीच में फुटनोट की पुरानी आदत के लिए माफी के साथ आगे की कहानी यह है कि कक्षा 8 के अपने तीनें सीनियरों के साथ 10 बजे सग्गूपुर पहुंचने के लिए सुबह लगभग 7 बजे हम घर से निकल पड़ते थे, गांव पार करते करते ये तीनों लोग मिल जाते थे। हमारा पहला पड़ाव, लगभग डेढ़ किमी दूर, सलारपुर की मुर्दहिया बाग में होता था, वहां बगल के गांवों बखरिया के ठकुरी यादव और केदार यादव और चकिया के किशोर (छोटकू) कहांर मिलते थे और हम सलारपुर गांव के अंदर होतेे हुए गद्दोपुर के यमुना ताल पर पहुंचते थे। सलारपुर में घुसते ही पहला घर अंगनू कोहांर का था। अगनू भी कक्षा 8 में पढ़ते थे। अंगनू और सलारपुर के 2-3 लड़के और साथ हो लेते तथा सलारपुर के जुड़वां गांव रामनगर के कुछ लड़के यमुना ताल पर मिलते रामनगर के लड़कों में जयहिंद राजभर और विनोद सिंह और अभिमन्यु सिंह कक्षा 8 में थे, रामकेवल सिंह कक्षा 6 में हमारे साथ तथा कक्षा 6 और 7 में  कुछ और लड़के थे, जिनके नाम याद नहीं हैं। यमुना ताल विशालकाय तालाब था जो गद्दोपुर,रामनगर और कछरा, तीन गांवों में फैला था। अब सुनते हैं यमुना ताल सिमट कर बहुत ही छोटा तालाब हो गया है।  यमुना ताल के पड़ाव के बाद हम गद्दोपुर पहुंचते थे वहां पांडे लोगों के कुंए पर पानी पिया जाता तथा वहां के 3-4 लड़कों के साथ आगे बढ़ते और हमारा आखिरी पड़ाव लग्गूपुर के पहले बनवसिया बाग में होता, यदि समय बचा होता तो हम वहां कुछ खेलते और फिर लग्गूपुर गांव के अंदर होते हुए स्कूल पहुंचते। जाड़े में दिन जल्दी डूबने के चलते वापस घर पहुंचते-पहुंचते अंधेरा हो जाता था, लेकिन अंधेरे में भी रास्ते पर आंखें सध जाती थीं।


मिडिल स्कूल में 2 मौलवी साहब थे, ताहिर अली (हेड मास्टर) और आले हसन; एक बाबू साहब, श्याम नारायण सिंह; एक मुंशी जी (चंद्रबली यादव) तथा एक राय साहब (राम बदन राय)। राय साहब का गांव दूर था, इसलिए स्कूल पर ही रुकते थे। राय ससाहब का पोता दिल्ली विश्वविद्यालय के केएम कॉलेज में पढ़ता था, गांव पता चलने पर पूछा था कि उसके गांव (आजमगढ़ जिले में दुर्बासा के पास) के आसपास के मेरे एक शिक्षक थे तो उसने बताया कि वे जीवित थे और उसके दादा जी थे (2लाल पहले उनका देहांत हुआ)। 2012 में मैं अपनी ससुराल (मेरे गांव से लगभग 35 किमी) से मोटर साइकिल से घर जा रहा था, मुख्य सड़क  से अपने गांव मुड़ते समय दिमाग में राय साहब से मिलने की बात आई और मुड़ा नहीं आगे बढ़ गया और वहां से सगभग 40 किमी दूर दुर्बासा पहुंचकर घाट पर चाय के साथ पुरानी यादें ताजा करके नए बने पुल से नदी पार कर, राय साहब के गांव (पश्चिम पट्टी) पहुंच गया। मैने 1967 में मिडिल पास किया था और ताज्जुब हुआ कि  45 साल बाद भी राय साहब ने बताने पर पहचान लिया और मेरे बारे में उस समय की कई बातें याद दिलाया। हमने 1964 में जब जूनियर हाई स्कूल पवई में कक्षा 6 में दाखिला लिया तो वहां 4 शिक्षक थे: प्रधानाध्यापक छोटे कद के, बड़े मौलवी साहब,ताहिर हुसैन; और लंबे कद के छोटे मौलवी साहब, आले हसन; बाबू साहब, श्याम नारायण सिंह और कृषि मास्टर मुंशीजी चंद्रबली यादव। बड़े मौलवी साहब कक्षा 6 को नहीं पढ़ाते थे। 


स्कूल हम लोग खेलते-कूदते खुराफात मचाते जाते थे। रामनगर के एक जमींदार थे घोड़ सिंह। उनका नाम राधाधीन सिंह था,लकिन वे गालियां मां-बहन-बेटियों का घोड़े से रिश्ता जोड़कर देते थे। धमाचौकड़ी मचाते स्कूल जाते बच्चों को देखकर वेदूर से ही गाली देते थे, ‘तेली-तमोली-भर-बांगर क लड़िका एक तौ पढ़ै के न चाही, पढ़ै जइहें तो खुराफात मचैहेंट तरी बेटी क घोड़……’।  इसलिए उन्हें सब घोड़ सिंह कहने लगे। जातीय श्रेष्ठतावाद एक सामाजिक सच्चाई थी,लेकिन प्रतिरोध की संस्कृति भी शुरू हो गयी थी। शिक्षा की सार्वभौमिक सुलभता औपनिवेशिक शिक्षा नीति का एक सकारात्मकउपपरिणाम है। गैर द्विज शूद्र जातियों के लड़के भी पढ़ने लगे थे। स्कूल कॉलेजों में लड़कियोंकी संख्या नगण्य थी। हमारी क्लास में पांडेय जी के खानदान की दो लड़कियां थीं और दूर के एक गांव, भुलेसरा  की एक ही लड़की स्कूल आती थी। अब लगता है कि कि कितनी साहसी लड़की थी, भुलेसरा भी स्कूल से 6-7लकिमी दूर था। अगर समकोण त्रिभुज के माध्यम से भौगोलिक स्थिति का वर्णन करें तो हमारा गांव स्कूल से कर्ण की दूरी पर था तो भुलेसरा लंबवत भुजा की। उसका नाम विद्यावती था। हम कभी नजदीक की बाजार, मिल्कीपुर  होते घर जाते तो भुलेसरा के बच्चे भी मिल्कीपुर तक साथ ही जाते थे, वहां से हमारा गांव 3-4 किमी दूर था। मिडिल स्कूल के एक ही सहपाठी, राधेमोहन सिंह से अभी तक संपर्क है, उनका गांव भुलेसरा के पास भरचकिया है। राष्ट्रीयसहारा में प्रूफ रीडर की नौकरी से रिटायर होकर वे गांव में ही रहते हैं। बासूपुर के एक जमींदार परिवार के भोले (देवेंद्र पांडे) से गांव जाने पर एकाध बार मुलाकात हो गयी। बासूपुर और लग्गूपुर के पांडेय परिवार एक ही कुल के हैं। स्कूल के हमारे एक सीनियर अभिमन्यु सिंह गांव जाने पर कभी कभी मिलते थे, प्राइमरी में शिक्षक थे, कुछ साल पहले उनका निधन हो गया।  स्कूल के सहयात्रियों में एकाध दलित और कुछ अन्य पिछड़ी जातियों (अब के ओबीसी) के लड़के भी थे उनमें जयहिंद राजभर काफी वाचाल थे। सलारपुर में घुसते ही अलगू कोंहार का घर पड़ता था। अलगू कक्षा 8 में पढ़ते थे।  औपनिवेशिक शिक्षा नीति का एक सकारात्मक उपपरिणाम है शिक्षा की सैद्धांतिक सार्वभौमिक सुलभता, जो 1980-90 के दशक तक व्यवहार में भी दिखने लगी।  तथाकथित छोटी जातियों को भी सैद्धांतिक रूप से शिक्षा की सुविधा उपलब्ध थी। लेकिन स्कूल जाने वाले लड़कों की संख्या नगण्य थी। फीस नाममात्र की थी – जहां तक मुझे याद है, प्राइमरी में 2 पैसा, मिडिल स्कूल में 2 आने थी तथा हाई स्कूल और इंटर में 2 रुपया 2 आना। इस तरह स्कूल की पढ़ाई हम लगों ने लगभग मुफ्त में की। 


       मार्च से स्कूल खुलने का समय 10 बजे से पीछे खिसक कर 7 बजे हो जाता था। 5 बजे ही घर से निकलना पड़ता था। घर की मुख्य रसोई के बरामदे के कोने में अइया (दादी) ने एक छोटा चूल्हा बना रखा था, सुबह सुबह कुछ बना देतीं थीं, और कुछ नहीं तो एक रोटी बन जाती थी दूध या घी में पिघलाकर गुड़ के साथ खाकर और कुछ भूजा वगैरह लेकर सुबह बहुत जल्दी स्कूल के लिए निकल पड़ता था। कक्षा 8 की जिला बोर्ड की परीक्षा मार्च में होती थी। जैसा ऊपर बता चुका हूं, मेरे अलावा गांव के और दीनों लोग कक्षा श्र में थे। हमारे गाव के तीनों सीनियर सहयात्री उसके बाद स्कूल जाना बंद कर दिए तो मार्च के बचे दिन और अप्रैल-मई में अपने गांव से मिडिल स्कूल जाने वाला मैं अकेला छात्र था। सलारपुर तक अकेले जाता था वहां से कुछ और साथी मिल जाते थे। इन गर्मियों में एक भूत का एपीसोड है जिसे थोड़ा बाद में बताता हूं।  


हम जब स्कूल में दाखिला लिए तो स्कूल में सभी शिक्षक लगभग स्थानीय थे। सबसे नजदीक, पवई के आलेहसन मौलवी साहब थे, जो पैदल ही आ जाते थे। अंग्रेजी और इतिहास के शिक्षक श्याम नारायण सिंह, 5-6 किमी दूर के गांव छज्जो पट्टी के थे और हेड मास्टर, ताहिर मौलवी साहब 6-7 किमी दूर माहुल के थे तथा कृषि अध्यापर चंद्रबली मुंशी जी, 7-8 किमी दूर खैरुद्दीन पुर के। ये तीनों साइकिल से स्कूल आते थे। संस्कृत शिक्षक राम बदन राय दुर्बासा के पास पश्चिम पट्टी के थे, जो वहां से 25-30 किमी दूर था, वे स्कूल में ही रुकते थे। जिस बरामदे में कक्षा 8 की क्लास चलती थी उसके ऊपर के बरामदे को दोनों किनारे एक एक कमरे थे, उनमें से एक में राय साहब टिकते थे। स्कूल में रामशकल नाम के चपरासी थे, वे और उनकी मां भगतिन चाची मिल कर नौकरी करते थे, भगतिन चाची की बात की कुछ खास बातें कक्षा 8 की चर्चा के साथ बताऊंगा। रायसहब हमारे दाखिला लेने के बाद किसी और स्कूल से स्थांतरित होकर आए थे। मैं कद-काया में छोटे होने के नाते कक्षा में सबसे आगे बैठता था। संस्कृत का पहला पाठ सरस्वती बंदना था, “या कुंदेंदुतुषारहार धवला या शुभ्रवस्त्रावृता…….”।राय साहब ने पूछा कि कौन वह श्लोक लय में पढ़ सकता था। मैंने हाथ उठा दिया , और पूरा श्लोक सही सही पढ़ दिया। रायसाहब ने छात्रों को संबोधित कर कहा कि आज से मुझे ईश नारायण मिश्र की बजाय पंडित ईशनारायण मिश्र बुलाया जाए। कुछ दिन लड़के पंडित कह चिढ़ाते थे, फिर छोड़ दिया। 


एक दिन मैं  स्कूल खुलने से थोड़ा पहले पहुंच गया और राय साहब स्कूल के कुंए पर नहा रहे थे। मुझे प्यास लगी थी, मैं कुंए पर पानी पीन पहुंचा। रामशकल कुंए से बाल्टी में पानी निकाल रहा था। राय साहबव में हंसकर पूछा कि क्या खाकर आया हूं मैंने थोड़ा हिचकिचाहट के साथ बताया, धूध रोटी, उन्होंने पूछा कितनी रोटी? मैंने कहा एक त वे रामशकल से बोले , “ अरे इसे जल्दी पानी पिलाओ, एक रोटी खाकर आया है”। 


कक्षा 6 के एक और संस्मरण के बाद आगे बढ़ता हूं। यह जीवन की नैतिक अपराध बोध की पहली याद घटना है, इसे मैंने बहुत (लगभग 10 साल) पहले लिखा।   जिसे यहां कॉपी-पेस्ट कर रहा हूं। 

02,06.2026

No comments:

Post a Comment