मजदूर आंदोलन: दमन की दास्तान
ईश मिश्र
कल (23 मर्ई, 2026) के अखबार में हिंदू नोएडा-ग्रेटर नोएडा और गुडगांव से जुड़ी दो सुर्खियों पर निगाह गयी। पहली है मजदूरों के आंदोलन के दौरान नोएडा की एक फैक्ट्री मेंमजदूरों को आंदोलन के लिए उकसाने; नारेबाजी करने और हिंसा फैलाने के आरोप में, नरेश कुमार नाम के एक मदूर की गिरफ्तारी थथा दूसरी है नोएडा के एसईजे़ड ( विशेष आर्थिक जोन) की कंटीली चारदीवारी वाली एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में 16 घंटे काम करने के बाद आइसक्रीम खाने की खाहिस रोकती एक मजदूर की कहानी। पिछले महीने मजदूरों के आंदोलन के बाद उप्र सरकार ने न्यूनतम मजदूरी बढ़ाकर 13, 690 रु. प्रति माह कर दिया, जिससेे मजदूर मुश्किल से अकेले का पेट भर पाता है, परिवार पालने की बात तो बहुत दूर है। गौर तलब है कि उप्र में पिछले 12 सालों में न्यूनतम वेतन में कोई संशोधन नहीं हुआ जबकि मंहगाई दिन-दूना, रात चौगुना की रफ्तार से बढ़ती जा रही है। 13690 रु. के बढ़े हुए न्यूनतम वेतन में भी मजदूर कैसे परिवार चलाते हैं, चिंता का विषय है। पश्चिम एसिया में समाम्राज्यवादी यद्ध के चलते रसोई गैस के संकट ने जीना और भी मुश्किल कर दिया। नोएडा-ग्रेटर नोएडा; गुड़गांव-मनेसर के औद्योगिक इलाकों में देश के अलग अलग हिस्सों से मजदूर जीवन सवारने आए तथा नवउदारवादी पूंजीवाद के काम की अमानवीय परिस्थितियों तथा शोषण और मजदूर विरोधी नीतियों के तहत दिन रात खून-पसीना एक करके किसी तरह भरण-पोषण में लगे रहे। सरकारें जिस आकलन से न्यूनतम मजदूरी तय करती हैं, उसमें गुजारा करना मुश्किल होता है और मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी के लिए भी लड़ना पड़ता है। 8 घंटे काम के दिन, ओवरटाइम का समुचित भुगतान तथा समुचित मजदूरी की मांग को लेकरै 2-3 अप्रैल, 2026 से गुड़गांव-मानेसर से शुरू मजदूरों का आंदोलन 10-11 अप्रैल तक व्यापक रूप लेता गया तथा नोएडा-ग्रेटर नोएडा तक फैलता गया लेकिन आंदोलन शांतिपूर्ण ही बना रहा। 13 अप्रैल तक हजारों मजदूर शांतिपूर्ण आंदोलन में शरीक हो गए तथा 13 अप्रैल से पुलिस ने लाठीचार्ज तथा आंसूगैस के इस्तेमाल समेत बलप्रयोग शुरू किया तथा घुसपैठियों के जरिए आंदोलन को हिंसक रूप देने का प्रयास किया जिससे आंदोलन को निर्ममता से कुचला जा सके। आंदोलन वाले औद्योगिक क्षेत्रों से लौटी फैक्ट फाइंडिंग टीमों ने हजारों मजदूरों के गायब होने की कहानियां बताई। 24 अप्रैल, 2026 को नोएडा-ग्रेटर नोएडा तथा 17 मई 2026 को गुड़गांव गयी जनहस्तक्षेप की फैक्ट फाइंडिंग टीम को भी यही जानकारी मिली। कुछ मजदूर प्रतिनिधियों और गिरफ्तार मजदूरों के परिजनों ने बताया कि पुलिस ने मजदूरों की बस्तियों में घरों में घुस कर, बिना कोई अरेस्ट वारंट दिखाए जबरन गिरफ्तारियां की। गिरफ्तार लोगों में बेलसोनिका ऑटोकंपोनेंट कंपनी मजदूर यूमियन मानेसर के जनरल सेक्रेटरी अजीत सिंह भी थे जिन पर अन्य आरोपों के साथ हत्या के प्रयास का आरोप भी लगा है। गिरफ्तार मजदूरों के परिजनों और साथियों ने बताया कि सभी मजदूरों पर एक से आरोप हैं। मावाधिकार कार्यकर्ता तथा जेएनयू के पूर्व छात्र उमर खालिद जैसे लड़कों को बिना मुकदमे के, जमानत नियम और हिरासत अपवाद के न्यायिक सिद्धांत की धज्जियां उड़ाते हुए, पांच साल से अधिक समय से बंद किया हुआ है, इस लिहाज से, लगता है मजदूरों के साथ नरमी बरती जा रही है। अजीत को एक महीने की ही हिरासत के बाद ही गुडगांव की जिला अदालत ने जमानत दे दी। पुलिस द्वारा अजीत के खिलाफ गिनाए आरोपों में ये नारे भी हैं, ‘ अभी तो यह अंगड़ाई है, आगे और लड़ाई है’, तथा इंकिलाब जिंदाबाद। गौरतलब है कि भगत सिंह और साथी इंकलाब जिंदाबाद नारा लगाते हुए फांसी का फंदा चूमे थे। अजीत के साथ ही पुलिस द्वारा पकड़े गए मजदूर श्यामबीर और हरीश की जमानत की खबर अभी तक नहीं है।
जेल में बंदी मजदूरों से उनके परिजनों और मित्रों के मिलने-जुलने पर काफी पाबंदियां है, कैदियों को बाहर से खाने-पीने या टूथ पेस्ट जैसी दैनिक उपयोग की चीजें नहीं पहुंचायी जा सकतीं, कैदियों को उन्हें जेल की कैंटीन से मंहगे दामों पर खरीदना होता है। पूंजीवाद दोगली व्यवस्था है, यह जो कहती है कभी नहीं करती और जो करती है कभी नहीं कहती। आंदोलनों में गिरफ्तारियों में पुलिस कभी आंदोलन के मुद्दों के या राजनैतिक प्रतिरोध के आरोप नहीं लगाती बल्कि आंदोलन के मुद्दों को कानून-व्यवस्था का मुद्दा बनाकर तोड़-फोड तथा हिंसा फैलाने के मनगढ़ंत आरोप लगाती है। नोएडा में मजदूरों के आंदोलन के लिवलिले में कुछ बहुत ही हास्यास्पद राजनैतिक गिरफ्तारियां हुई हैं, उनमें से एक ऐसी गिरफ्तारी यूएनआई के पूर्व पत्रकार तथा लेखक सत्यम वर्मा की है। सत्यम वर्मा लखनऊ स्थित जनचेतना पुस्तक आंदोलन से जुड़े हैं तथा मजदूर बिगुल पत्रिका में कभी कभी लिखते हैं। सत्यम को नोएडा गए कमटसेटकम 2 दशक तो हुए ही होंगे। लखनऊ में जनचेतना परिसर की तलाशी लेने के बाद वहां से पुलिस ने जानी-मानी कवि कात्यायनी और सत्यम को पूछ-ताछ के नाम पर पुलिस ने उठा लिया तथा इनके लैपटॉप और फोन जब्त कर लिए। कात्यायनी को तो छोड़ दिया गया लेकिन सत्य को गिफ्तार कर नोएड़ा जेल ले आया गया तथा उन्हें एनएसए (राष्ट्रीय सुरक्षा कानून) की धाराओं में बंद कर दिया गया। श्रृष्टि गुप्ता नामक दिल्ली की एक कलाकार को नोएड़ा के बोटैनिकल गार्डन मेट्रो स्टोसन से गिरफ्तार कर लिया गया। श्रृष्टि ने आंदोलन के समर्थन में एक प्रदर्शन में भाग लिया था तथा एक नुक्कड़ नाटक में। इसी तरह दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा आकृति चौधरी को भी नोएडा आंदोलन में हिंसा भड़काने के आरोप में 13अप्रैल से बंद कर रखा है। आकृति की जमानत सिप्रीमकोर्ट ने यह कहकर खारिज कर दिया कि उसे जमानत के लिए इलाहाबाद हाई कोर्ट जाना चाहिए।
इस पूरे कांड में पुलिस और राज्य सरकार की भूमिका पर गंभीर सवाल उट रहे हैं तथा उनके तर्क संदेहास्पद हैं। मजदूरों का आंदोलन शांतिपूर्ण था, वे शांतिपूर्ण तरीके से न्यूनतम मानवीय गरिमा के साथ जीने भर की मजदूरी के लिए आंदोलित थे, पुलिस ने लाठीचार्ज और आंसूगैस के प्रहार से आंदोलन को बलपूर्वक तोड़ना शुरू किया। नोएडा-ग्रेटर नोएडा तथा गुड़गांव में कई उद्य़ोगों के मजदूरों ने बताया कि कंपनियों के रातकी शिफ्ट के मजदूरों को प्रबंधन और पुलिस ने इस तर्क पर बाहर नहीं निकलने दिया कि वे बाहर जाकर आंदोलन में शामिल हो जाएंगे तथा इसी मानसिकता से प्रबंधन और पुलिस ने दिन की पारी के मजदूरों को अंदर जाने से रोका। अंदर के मजदूर अंदर से और बाहर के मजदूर बाहर से धरना-प्रदर्शन शुरू कर दिए। पुलिस ने बलपूर्वक आंदोलन तोड़ना शुरू कर दिया। पुलिस ने सड़क पर बैरीकेड लगा दिया , ट्रैफिक रुकने से अपरा-तफरी मच गयी और भीड़ में से कुछ लोगों ने पत्थरबाजी शुरू कर दिया। अपरातफरी में पता ही नहीं चला कि पत्थरबाजों में कितने आंदोलनकारी थे, कितने पुलिस एजेंट और कितने आम जन तथा पुलिस को बल प्रयोग तथा आंदोलन के समर्थकों और सरकार के आलोचकों के दमन का अतिरिक्त बहाना मिल गया। दो दिन पहले गुड़गांव की अदालत से जमानत पाए अजीत समेत गिरफ्तार आंदोलनकारियों तथा समर्थकों पर हत्या का प्रयास समेत गंभीर आपराधिक आरोप लगाए गए हैं। अप्रैल में जब हम गौतमबुद्ध नगर जेल के जेल अधिकारियों से मिले तो उन्होंने बताया कि ज्यादातर आंदोलनकारी मजदूरों को छोड़ दिया गया था कुछ को छोड़कर जिनपर गंभीर आरोप थे और यह समधना मुश्किल नहीं कि गंभीर आरोप हत्या के प्रयास और आगजनी जैसे होते हैं, जैसा कि गुड़गांव के मजदूरों ने बताया था। जैसा कि समयांतर के पिछले अंक के मजदूर आंदोलन के लेख में रेखांकित किया गयीा है कि आदित्य आनंद जैसे तथाकथित मास्टर माइंड सोसल मीडिया पर मजदूरों से शांतिपूर्ण आंदोलन की अपील कर रहे थे। इस आंदोलन में एक अच्छी बात यह देखने को मिली कि आंदोलित मजदूर किसान आंदोलनों से भी संपर्क बना रहे हैं।
आंदोलन राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र, दिल्ली यानि गुडगांव-हरयाणा की हदों सै निकल अन्य औद्योगिक क्षेत्रों में फैल रहा है, दमन भी बढ़ रहा है और उसका प्रतिरोध भी, उम्मीद है स्वस्फूर्त आंदोलन की चेतना संगठित सर्वहारा चेतना में तब्दील हो राष्ट्रीय सर्वहारा आंदोलन का पथ प्रशस्त करेगा।

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