Tuesday, December 4, 2018

अंडमान


पोर्टब्लेयर
28.11.2018
अंडमान की एक झलक
पहली किश्त
मिडिल स्कूल में भूगोल की किताब में और ग्लोब पर, भारत के नक्शे में मुख्यभूमि (मेनलैंड) के पीछे समुद्र में अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह नामक, बड़ी-छोटी और बहुत छोटी, अनियमित ज्यमितीय आकृतियों की टेढ़ी-मेढ़ी रेखा मुझे हमेशा रोचक लगती थी। इस छोटी सी रेखा को अगर एक विंदु मान लिया जाए तो वह कलकत्ता और मद्रास बिंदुओं के साथ, लगभग समद्विभुजीव, समकोण त्रिभुज पर है। नौकरी में आखिरी से पहले वाली यलटीसी  पोर्ट ब्लेयर में तमिलों और बंगालियों की ही बहुतायत है, वैसे तो बन स्कूल दिनों से ही अंडमान द्वीप समूह के बारे में जानने की उत्सुकता थी। नौकरी समाप्त होने के पहले आखिरी के पहले वाले यलटीसी सुविधा का उपयोग अंडमान यात्रा में किया।
 50-60 हजार पहले से आबाद द्वीपों की जानकारी द्वीपों की खोज की कहानी वैसी ही है जैसे भूगोल के गड़बड़ जानकारी वाले स्पेनी नाविक कोलंबस द्वारा हजारों सालों से आबाद और विकसित अमेरिकी महाद्वीपों और कैरिबियाई द्वीपों समेत उनके द्वीपों की खोज की। अंग्रेज जब यहां पहुंचे तो उन्होंने प्राकृतिक संपदा से समृद्ध यहां के मूल निवासियों और उनकी संस्कृति के साथ वैसा ही विनाशकारी खेल खेला जैसा उन्होंने अमेरिकी महद्वीपों साथ किया था। जिस तरह कैरिबियाई द्वीपों में वहां के संसाधनों के दोहन के लिए वहां गुलाम तथा उपनिवोशों से बंधुआ मजदूर लाए गए, वैसे ही इन द्वीपों के संसाधनों के दोहन के लिए बंगाल, तमिलनाडु आदि जगहों से यहां मजदूर लाए गए जिनमें से ज्यादातक के वंशज यहीं बस गए। 1947 के बाद सिलुलर जेल (काला पानी) से मुक्त कैदियों में यहां बसने के इच्छुक कैदियों को भी जमीन दी गयी। लकड़ी काटने और ढोनों के लिए अंग्रज झारखंड से मजदूर लेकर आए थे। उनके वंशज भी यगीं बस गए। ऐंथ्रोपॉलिजिकल संग्रहालय से प्राप्त सूचना के अनुसार पोर्टब्लेयर की आबादी में 23% बंगाली, 19% तमिल; 5% झारखंडी तथा बाकी अन्य राष्ट्रीयताओं के लोग हैं।


दूसरी किश्त

17 विश्वविद्यालय मार्ग, दिल्ली 110007
03.12.2018

भारतीय नौसेना नियंत्रित छोटे से पोर्ट-ब्लेयर हवाई अड्डे से निकलते ही नीरज से मुलाकात हुई, जिन्होंने अपना परिचय हमारे टूर मैनेजर के रूप में दिया। इनके साथ ही एक और स्मार्ट लड़का था जमीर, ड्रावर। जमीर के परदादा 1947 में सेलुलर जेल से छूटे कैदी थे। नीरज को सही सही नहीं याद है कि उनके किस पीढ़ी के पूर्वज बंगाल से कैसे पोर्टब्लेयर आए। दोनों का ही क्रमशः बंगाली या तमिल की बजाय अपनी अंडमानी पहचान पर जोर था। यहां संपर्क भाषा हिंदी है। एयरपोर्ट से होटल का रास्ता मुश्किल से 15-20 मिनट का होगा। चौराहे पर गांधी की मूर्ति वाली मुख्य बाजार से थोड़ी ही दूर स्थित यह मलयाली बाहुल्य इलाका है। शहर पहाड़ पर बसा है और सड़कें नारियल, सुपाड़ी, आम एवं अन्य पेड़ों की हरियाली से आच्छादित हैं।
नाश्ते के बाद जमीर के साथ हम पहले दिन के पर्यटन पर निकल पड़े। पहला और सूचनाप्रद पड़ाव एंथ्रोपॉलोजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (एयसआई) का संग्रहालय था। मूलनिवासियों की जीवनशैली के नमूने और विवरण अत्यंत सूचनाप्रद हैं। द्वीपसमूह पर उपनिवेशीकरण के चरणों के भी कुछ विवरण हैं, अधिक नहीं। महान अंडमानी जनजाति द्वारा उपनिवेशीकरण का सशस्त्र प्रतिरोध लगभग उसी समय अमेरिका में अरिजोना घाटी के मूलनिवासियों के सशस्त्र प्रतिरोध की याद दिलाता है तथा औपनिवेशिक बर्बरता की भी। (डी ब्राउन की पुस्तक, बरी माई हर्ट ऐट वुंडेज नी में इसका सचित्र सा वर्णन है।) दोनों में ही मुकाबला तीर-धनुष और बंदूक में था। मार्क्स के शब्दों में भारत का स्वतंत्रता संग्राम, 1857 की सशस्त्र किसान क्रांति को सिंधिया जैसे गद्दार रजवाड़ों की मदद से कुचलने के बाद औपनिवेशिक शासकों के पास युद्धबंदियों के रूप में कैदियों की संख्या काफी थी। अंडमान के द्वीप उनकेलिए कैदखाने बन गए। उसके बाद हम सेलुलर जेल पहुंचे। टिकट की लाइन लंबी नहीं थी। ज्यादातर पर्यटक भारतीय ही थे। परिसर के बाहर से भवन तथा उसका आर्टिटेक्चर सुंदर लगा। वृत्त की त्रिज्याओं की आकृति में  बने बहुत से तीनतल्ला विंग हैं। वहां से अगले पड़ाव रोस्स द्वीप के निकलते समय जेल के पिछवाड़े बने जीबी पंत मेडिकल कॉलेज दिखाकर बताया कि जेल के कई विंग उसको समर्पित हो गए। ऊपर रोशनदान के साथ 15X10 फुट के एकाकी (सॉलिटरी) कोठरियां देखकर जो बात दिमाग में आई वह थी, भारतीय जेलों के मौजूदा जेलों की अमानवीय हद तक दयनीय हाल।   एक विंग में दूसरी मंजिल की सबसे कोने की कोठरी में सावरकर को रखा गया था। लगभग हर पर्यटक उल कोठरी तक जाता है। इसी कोठरी के कष्टों के चलते 1907 में, 1957 की किसान क्रांति के 50वें वर्ष के उपलक्ष्य में लिखी अपनी पुस्तक भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम  में कौमी एकता तथा सामासिक संस्कृति के प्रशंसक, प्रखर उपनिवेशवाद-विरोधी देशभक्त विनायक दामोदर सावरकर का कायाकल्प हो गया। वे उपनिवेशविरोधी राष्ट्रवाद के विकास को बाधित करने के लिए हिंदुत्व राष्ट्रवाद का सिद्धांत देकर अंग्रेजों की बांटो-राज करो नीति का एक हथियार निर्मित किया। कष्ट लगता है जज्बाती विद्रोहियों को वफादार बना देती होगी। सावरकर की राजनैतिक यात्रा की चर्चा की गुंजाइश नहीं है।
हमारा अगला नियोजित पड़ाव कार्बिन कैंडी बीच था। सेलुलर जेल से हरे-भरे पहाड़ी पहाड़ी सडडक से जल्दी ही हम कार्बन बीच पहुंच गए। दो तरफ से हरे पहाड़ों से घिरे बीच; वाटर स्पोर्ट् खेलते लड़के-लड़कियां; बच्चों के साथ किनारे उथले पानी में सेल्फी और फोटो खीचते पर्यटक – मनोरम दृश्य था। लगभग 2 घंटे बीच पर बिताने के बाद होटल पहुंचने के पहले सेलुलर जेल में लाइट एंड साउंड कार्यक्रम था।   

 
जारी................



    

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