Monday, August 8, 2011

युवा मित्र रशा को सस्नेह

युवा मित्र रशा को सस्नेह
ईश
हुस्न की आपके कर दिया तारीफ़
समझा आपने नहीं मैं आदमी शरीफ

मिलती हैं हर रोज कितनी ही बालाएं
इतराती नहीं हुस्न पर दिखातीं दिमागी अदाएं

यकीनन आप हसीन हैं पर नहीं है इसमे आपका हाथ
कौन दिखता कैसा यह तो है कुदरती बात

देखी जो मैंने आपकी कामुक तस्वीरें
आयीं याद कालिदास की नायिका की तद्वीरें

लिखा जा सकता ऐसा अगर उस जमाने में
हर्ज क्यों आज ऐसा कहने में

कालिदास ने तो लिख डाला था पूरा ग्रन्थ
लाज़मी था लिखना कम-से-कम एक नज़्म

चलिए ख़त्म करता हूँ यहीं यह बात
कब तक चलेगा एक-तरफा संवाद?

वैसे रस्क करेंगी आपसे आने वाली नस्लें
ईश ने लिखीं थी तारीफ़ में कुछ नज्में ( हा हा हा ....)

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