हमारे समय में तो कक्षा 9 में विषय-चुनाव का विकल्प था और हमने तभी जीवविज्ञान के बदले संस्कृत ले लिया था, इसलिए इंटर और बीएससी में गणित या जीवविज्ञान में चुनाव की दुविधा नहीं थी। वैसे डीपीएस के मेरे गणित पढ़ाए छात्रों के परिचित मिलते हैं तो कहते हैं गणित में रुचि के लिए मुझसे पढ़ लें। मैंने 36 साल से गणित की किताब नहीं छुई है। स्कूल में लगता था कि गणित जैसे आसान विषय में कोई कैसे फेल हो सकता है?
Wednesday, June 30, 2021
शिक्षा और ज्ञान 321 (स्त्री प्रतिभा)
मैं ब्रेन के जीवैज्ञानिक आयामों के बारे में तो नहीं जानता लेकिन बहुत लंबे छात्रजीवन और कम लंबे शिक्षक जीवन के अनुभव से यह जान पाया हूं कि प्रतिभा और बुद्धिमत्ता में लैंगिक भिन्नता की कोई भूमिका नहीं होती। पिछले 25-30 सालों में लड़कियां लड़कों से बेहतर कर रही हैं, इसलिए नहीं कि लड़कियों का ब्रेन ज्यादा विकसित होता है, बल्कि इसलिए कि लड़कियों में भेदभाव और वंचना की यादें अभी ताजी हैं, अवसर मिलने पर वे नई चुनौतियां स्वीकार करने और देने को उत्सुक हैं।
Tuesday, June 29, 2021
शिक्षा और ज्ञान 320 (शिक्षक)
दुर्भाग्य से, बहुत से लोग सारी नौकरियों की प्रतियोगिताओं से खारिज होकर, उच्च शिक्षा में मठाधीशी के चलते जुगाड़ से शिक्षक बन जाते हैं। इनमें से बहुत से शिक्षक शिक्षक होने का महत्व नहीं समझते, नहीं तो क्रांति का पथ वैसे ही प्रशस्त हो जाता। लेकिन अध्यापकों की इफरात तनख्वाह और कामचोरी का कुप्रचार, धनपशुओं की शिक्षा की दुकानों के दलालों की सोची-समझी चाल है। मेरी पत्नी कहती थीं कि इससे अच्छा तो ऑफिस की नौकरी करते, 9 बजे के पहले और 10 बजे का बाद घर पर तो रहते। शिक्षक की नौकरी 24 घंटे की होती है। मैंने तो 8 तक टाट-पट्टी वाले और उसके बाद लगभग मुफ्त की फीस वाले सरकारी संस्थानों से पढ़ाई की है। निजी दुकानों की फीस देने की कभी औकात ही नहीं रही। लाखों फीस देकर निजी स्कूलों से पढ़े लोगों को चुनौती देता हूं। निजी संस्थानों में आज जितनी फीस देकर पढ़ना होता तो अपढ़ ही रह जाते। उच्च शिक्षा में मठाधीशी के चलके बहुत से अवांछनीय तत्व घुस गए हैं लेकिन सामान्यीकरण उचित नहीं है। आज भी शिक्षा और छात्रों के प्रति निष्ठावान शिक्षकों की कमी नहीं है। राष्ट्रपति ने आयकर की बात झूठ बोला है।
शिक्षा और ज्ञान 319 (युद्ध)
जी चाहे सिकंदर हो, चंद्रगुप्त या शिवाजी, लूट युद्धों का ऐतिहासिक रिवाज रहा है। युद्ध हिंदू-मुसलमान नहीं, राजनैतिक होते थे। अगर इतिहास आपने पढ़ा हो तो शिवाजी जी की सेना में चौथ-विवाद की बात पढ़ा होगा, वैसे संघियों का इतिहासबोध, आम तौर पर तथ्यात्मक नहीं अफवाहजन्य होता है। राजशाहियों में सैनिक प्रायः mercenary (भाड़े के) होते थे। मध्यकाल में मौजूदा केंद्रीय बिहार सैनिक आपूर्ति का गढ़ होता था। शेर खान (जो बाद में शेरशाह शूरी नाम से मशहूर, अप्रतिम अंतर्दृष्टि का शासक बना जिसने अपने बहुत कम समय के शासन में यातायात, लगान, डाक व्यवस्था, सिंचाई आदि क्षेत्रों में अभूतपूर्व योगदान दिया) बहुत सैनिक ब्रोकर था। बक्सर सैनिक-व्यापार (मिलिट्री ट्रेड) का बहुत बड़ा केंद्र था। औरंगजेब की सेना में भी भोजपुरिया सिपाहियों का बोलबाला था और शिवाजी की सेना में भी।
Sunday, June 27, 2021
बेतरतीब 108 (बेटी)
Ram Chandra Shukla हम 6 भाइयों के बाद बहन पैदा हुई थी, मुझसे लगभग 12 साल छोटी। जो न हो वह मिल जाए तो खुशी ज्यादा होती है। वह 6 महीने की थी तो मैं शहर पढ़ने चला गया और छुट्टियों में ही मुलाकात होती थी। मैं उसे सिर पर बैठाकर घुमाता था। मां और दादी कहतीं लड़की को सिर पर बैठा रहे हो, बेटियां ही होंगी। वह जब 8वीं पास की तो पढ़ाई बंद कराके उसकी शादी खोजी जाने लगी। मैं उस समय जेएनयू में एमफिल का छात्र था तथा डीपीएस में गणित पढ़ाने लगा था। पूरे खानदान से लड़-झगड़ कर अड़ कर उसे ले जाकर वनस्थली विद्यापीठ राजस्थान में एडमिसन कराया जहां से उसने एमए बीएड की पढ़ाई की। दूसरी बेटी पैदा हुई तो उधार लेकर उत्सव मनाया कि लोगों को यह न लगे कि दूसरी बेटी होने से दब गया। नतिनी का नाम पेट में थी तभी माटी रख दिया था। छोटी बेटी ने कहा कि बेटा हुआ तो ढेला रखेंगे? मैंने कहा तब देखेंगे। आई माटी ही। पिछले कई सालों, बल्कि दशकों से लड़कियां हर क्षेत्र में लड़कों से आगे हैं, क्योंकि उनके मन में वंचनाओं और भेदभाव की यादें ताजा हैं। वे नई चुनौतियों के लिए तैयार हैं। मैंने शाहीन बाग पर लेख में इस परिघटना को नये नव जागरण का प्रतीक कहा था। मेरे ख्याल से भारत के भावी नए नवजागरण की नायिकाएं देवांगनाएं, नताशाएं तथा शरूफाएं होंगी और स्त्री प्रज्ञा तथा दावेदारी से लैश स्त्रीवादी चेतना इसका विशिष्ट आयाम होगी।
शिक्षा और ज्ञान 318 (नवजागरण)
मानवीय चेतना का विकास निरंतर, सतत, द्वंद्वात्मक प्रक्रिया है जिसके केंद्र में सदा से ही उहलोक (ईश्वर) तथा इहलोक (विवेक) का द्वंद्व रहा है। नवजागरण के तमाम ऐतिहासिक चरण रहे हैं। वैदिक तथा उत्तर वैदिक काल में लोकायत (चारवाक) बौद्धिक आंदोलन भी नवजारण ही था तथा बौद्ध बौद्धिक क्रांति भी। मध्ययुग में सामाजिक-आध्यात्मिक समानता के संदेश का कबीर का आंदोलन भी नवजागरण का एक चरण था जो अपनी तार्किक परिणति तक नहीं पहुंच सका। दिल्ली विश्वविद्यालय में स्त्री-प्रज्ञा और दावेदारी के अभियान के रूप में लड़कियों के पिंजड़ातोड़ आंदोलन से शुरू होकर 20016 के छात्रआंदोलन में गति प्राप्त करते कोविड से बाधित, शाहीनबाग सी परिघटनाओं में परिलक्षित सीएए विरोधी आज के आंदोलन एक नए नवजागरण की भावी प्रक्रिया के अंग हैं। यह नवजागरण नया इसलिए है कि इसका नेतृत्व स्त्रीचेतना से लैश युवतियां कर रही हैं। नताशाएं और देवागनाएं इस नए नवजागरण की नायिकाएं हैं।
बेतरतीब 107 (जन्मदिन)
107 जन्मदिन
परसों 25 जून को रात 11.40 बजे सिर पर घुंघराले घने बालों वाली 35-36 साल पुरानी तस्वीर के साथ 26 जून शुरू होने यानि 66 वर्ष का हो जाने से 20 मिनट पहले से ही जन्मदिन की बधाइयों की चाहत जाहिर करते, यह सोचकर पोस्ट डाल दिया कि सुबह एक छोटा सा विवरण लिखूंगा। वैसे मुझे पोस्ट डालने की जरूरत नहीं थी क्योंकि फेसबुक तो वैसे ही जन्म दिन की सार्वजनिक घोषणा कर देता है। जेएनयू में मेरे लोकल गार्जियन रह चुके, अग्रज अनिल चौधरी (Anil Chaudhary समेत कई मित्रों ने फेसबुक से मेरी किसी तस्वीर के साथ लेकिनं चाय-नाश्ते के बाद से ही मित्रों और छात्रों के इतने फोन आने लगे कि फुर्सत ही नहीं मिली और फिर इमा (छोटी बेटी) और विकास लंच पर आ गए तथा फोनों का सिलसिला फिर शुरू हो गया। अनिल ने जेएनयू के पुराने छात्रों के जमावड़े के ग्रुप फोटो के साथ बधाई की पोस्ट शेयर किया उनका बहुत बहुत आभार। जन्मदिन की सूचना की पोस्ट के अलावा फेसबुक मेमरी से जितनी तस्वीरें शेयर किया सभी पर बधाइयों की भरमार हो गयी। सभी का बहुत बहुत आभार। जेएनयू के सहपाठियों, हिंदू कॉलेज और डीपीएस के मित्रों, पत्रकारिता दिनों के तथा प्रेस क्लब के मित्रों के अलावा बहुत से फेसबुक मित्रों ने भी इनबॉक्स और आउट बॉक्स में बधाइयां दीं। सभी का तहेदिल से आभार व्यक्त करता हूं। वैसे दस्तावेजों में दर्ज मेरी अधिकारिक जन्मतिथि 3 फरवरी है, जिसके अनुसार मैं फरवरी 2019 में नौकरी से रिटायर हो गया। सही जन्मतिथि (26 जून 1955) लिखी होती तो मैं जून 2020 में रिटायर होता, लेकिन कोई पछतावा नहीं। वैसे पहली बार मैंने जन्मदिन 25 साल का होने पर मनाया। बचपन में उस समय गांवों में जन्मदिन मनाने का रिवाज नहीं था। मुझे जन्मकुंडली वाली विक्रम कैलेंडर की जन्मतिथि (आषाढ़, कृष्णपक्ष दशमी, संवत 2012) मालुम थी, रोमन कैलेंडर की नहीं। प्राइमरी 2 कक्षाओं की छलांग ( प्रि-प्रराइमरी यानि अलिफ [गदहिया गोल] से कक्षा 1 तथा कक्षा 4 से 5) के चलते1964 में मैंने 9 साल में ही प्राइमरी कर लिया। मेरे दादाजी (बाबा) पंचांग के ज्ञाता माने जाते थे उनकी सुंदर लिखावट के नमूने के तौर पर जन्मकुंडली संभाल कर रखा हूं। उस जमाने में हाई स्कूल की परीक्षा की न्यूनतम आयु 15 वर्ष थी, 1 मार्च 1969 को 15 साल का करने के लिए बाबू साहब ( हमारे प्राइमरी स्कूल हेड मास्टर बासदेव सिंह) के मन में 1954 फरवरी की जो भी तारीख (3) दिमाग में आई लिख दिया। मेरे पिताजी फैल गए कि लोग तो 2-3 साल कम लिखाते हैं और उन्होने मेरी डेढ़ साल ज्यादा लिख दिया? बाबू साहब के समझाने पर वे मान गए। उन दोनो की वार्तालाप से पता चला कि मेरी पैदाइश 1955 की होगी। बहुत दिनों बाद (जेएनयू में पढ़ते हुए) देखा कि जन्मकुंडली के पीछे 26 जून 1955 लिखा था। तब से जन्मदिन मनाने लगा। तीनमूर्ति लाइब्रेरी में माइक्रोफिल्म पर पुराने अखबार पढ़ने के दौरान 1955 के हिंदी अखबारों से इसकी तस्दीक कर लिया। उन दिनों के हिंदी अखबारों में विक्रम और शक संवत की भी तारीखों छपती थीं। तभी से हर साल २६ जून को जन्मदिन मनाता रहा। जश्न की कुछ अड्डेबाजियों तो अविस्मरणीय हैं। मेरी तस्वीरों, मित्रों की बधाई पोस्टों और इनबाक्स में अनगिनत बधाइओं की भरमार हो गयी। इतना प्यार पाकर मेरा दिल गार्डन-गार्डन हो गया. जिनकी बधाई पर अलग से आभार नहीं जता सका उनसे क्षमा-प्रार्थना के साथ हार्दिक आभार। मेसेज बॉक्स की आधे से अधिकबधाइयों का निजी आभार व्यक्त कर सका, बाकियों का अब एक साथ। कुछ मित्रों/स्टूडेंट्स ने बधाई के लिए फोन किया। सबका हार्दिक आभार। बाकी फिर।