Thursday, November 5, 2020

लल्ला पुराण 366 (चरणस्पर्श)

 हर युग में शासक वर्ग के विचार ही शासक विचार होते हैं जो युग चेतना का निर्माण करते हैं और खास ढंग की सामाजिक चेतना तथा यथास्थितिवादी सामाजीकरण सामाजिक चेतना के जनवादीकरण का प्रतिरोध करता है। पितृसत्तात्मक वर्णाश्रमी सामाजिक चेतना श्रेणाबद्ध सामाजिक और लैंगिक भेदभाव का पोषण करता है। मनुष्य का चैतन्य प्रयास से भौतिक परिस्थियां और तदनुरूप सामाजिक चेतना बदलती है तथा न्यूटन के गति दूसरे नियम के अनुसार य़थास्थिति की ताकतें इस बदलाव का प्रतिरोध करती हैं, रीति-रिवाज इस प्रतिरोध के माध्यम हैं। चरण स्पर्श अभिवादन का पुरुषवादी वर्णाश्रमी सामाजिक चेतना का पोषक, अभिवादन का सामंती तरीका है। मेरे छात्र बिना चरणस्पर्श किए मेरा बहुत सम्मान करते हैं। छात्रों की जगह पैर में नहीं दिल में होती है।पत्नी पति का चरणस्पर्श करती है, पति पत्नी का नहीं, अब्राह्मण ब्राह्मण का चरणस्पर्श करता है ब्रह्मण अब्राह्मण का नहीं।

Wednesday, November 4, 2020

नतमस्तक समाज

 नतमस्तक समाज में सिर झुका कर ही सलाम का रिवाज है

किसी का सर उठाकर चलना नाकाबिले बर्दाश्त है
अतिविनम्रता में लोग चरणस्पर्श और शाष्टांग करते हैं
हम तो रवायतों की मुखालफत का मंहगा शौक पालते हैं

समझबूझ कर ही उठाते हैं खतरा रवायतों के मुखालफत का
कलम कुंद करना ही होता है रिवाज नतमस्तक समाज का
करते हैं इंकार हवा को पीठ देने से समझते हैं उसका रुख
उठाते हैं मौजों की विपरीत दिशा में कश्ती चलाने का सुख

पाकिस्तान

 किसी ने लिखा कि मुनव्वर राणा जैसे लोगों ने पाकिस्तान बनवाया। उस पर:


मैंने इस पर 1991-92 में ज्ञान पांडे की पुस्तक "Construction of Communalism in Colonial North India" के छोटे-बड़े समीक्षात्मक लेख हिंदी में क्रमशः जनसत्ता और तीसरी दुनिया तथा अंग्रेजी में क्रमशः Pioneer & Social Science Probing के लिए लिखे थे। कैंपस छोड़ने के पहले टाइप कराया था खोजकर शेयर करूंगा। भारत में सांप्रदायिकता औपनिवेशिक पूंजी की खोख से निकली आधुनिक विचारधारा है तथा भारतीय समाज और देश बांटने की परियोजना औपनिवेशिक शासन की है जिसकी शुरुआत 1857 से हो गयी थी जब विद्रोही सैनिकों की मदद से संगठित, सशस्त्र किसान क्रांति ने ब्रिटिश हुकूमत की चूलें हिला दी थीं और यदि भारत के सामंती शासक वर्गों का बड़ा हिस्सा किसान क्रांति के विरुद्ध अपने सैन्यबल के साथ औपनिवेशिक लुटेरों का साथ न देता तो इतिहास अलग होता। देशद्रोही दलाल देसी सामंती शासकों की मदद से क्रांति कुचलने और क्रांतिकारियों को खुली फांसी से आतंक फैलाने के बाद दोनों ही समुदायों के अपने दलालों की मदद से सांप्रदायिकता का निर्माण कर समाज को बांटो और राज करो की नीति अपनाय जिसकी परिणति औपनिवेशिक शासन के अंत के साथ अभूतपूर्व रक्तपात बीच देश और दिलों के बंटवारे में हुई। बंटवारे के घाव सांप्रदायिक नफरत के रूप में अभी भी नासूर बन रिस रहे हैं और समाज के दिल को छलनी कर रहे हैं। इसके लिए मुनव्वर राणा के ही वैचारिक पूर्वज अकेले जिम्मेदार नहीं हैं, उतने ही जिम्मेदार मोदी-योगी तथा कांग्रेसी हिंदुत्ववादियों के वैचारिक पूर्वज भी हैं।

बेतरतीब 93 (माटी का चौथा जन्मदिन)

 अपनी मां की गोद मै बैठी यह मेरी नतिनी आज 4 साल की हो गयी

आज के दिन दुवा करता हूं की कि जीवन में भरती रहे नई उड़ान
मानवता की सेवा में नापे नई ऊंचाइ सीमा न हो जिसकी आसमान
पढ़ते-लड़ते-बढ़ते हुए तय करे नई मंजिलें बने एक बेहतरीन इंसान
माटी को जन्म दिन की बहुत बहुत बधाई

जब यह अपनी मां के पेट में थी तो मेरी छोटी बेटी ने कहा कि उसकी दीदी की बेबी के लिए उन्ही लोगों (दोनों बहनों) की एक सुंदर सा नाम सोचूं। मैंने कहा कि तुम लोगों का नाम तो बिना सोचे रख दिया था, इसका नाम माटी रख देते हैं। उसने कहा लड़का हुआ तो ढेला? उसका तब सोचेंगे। इस बात को जानने वाली मैं और मेरी एक प्रिय स्टूडेंट नतिनी होने की खबर पर खूब हंसे कि माटी ही हुई,दूसरा नाम सोचने की जरूरत नहीं पड़ी। मेरी छोटी बेटी जब पैदा हुई तो पत्रकारिता करता था। किसी पत्रिका के एक ही अंक में दो लेख छपे तो दो बाईलाइन अच्छी नहीं लगती लेकिन अपने लिखे का मोह भी नहीं छूटता तो दूसरे लेख के नीचे ईमि लिख देता था। इसका नाम रखना हुआ तो ईमि के ई का इ कर दिया और मि का मा, इमा हो गया।

माटी की तरफ से आप सब का बहुत आभार। उसके मां-बाप ने शिकागो में घर खरीदा है (लोन की किस्तों पर), वीडियो काल पर मैंने माटी से कहा अपना घर भेज दो, बोली यह तो बहुत बड़ा है, इसे उठाकर लेजानेके लिए इतने आदमी कहां मिलेंगे? वह अपना बड़ा वाला डॉल हाउस भेज देगी उसमें हम सब आ जाएंगे। उसका शुरुआती बचपन कैंपस के घर में बीता है लेकिन बच्चों को उस उम्र की यादें कम ही रहती हैं। मुझे 5 साल के पहले की कुछ बातें याद हैं और कुछ ऐसी घटनाएं जिनकी लोग बाद के दिनों में चर्चा करते थे। माटी ने बोलना-चलना कैंपस में ही शुरू किया। बहुत से स्टूडेंट्स उसके साथ खेलते तथा उसकी तस्वीरें खींचते रहते। भाग कर सीढ़ियां चढ़ती। एक बार लड़कों के हॉस्टल की सीढ़ियां चढ़ अंदर जाने लगी, मैंने कहा लड़कियों का अब हॉस्टल में जाना मना है, कहा 'तुम्हारे नानू वार्डन थे तब जा सकती थी'। गेट पर बैठे लड़के उसे अंदर ले गए। मैं वार्डन था तो मुझसे कहा गया कि अन्य हॉस्टलों में लड़कियों का प्रवेश मना है, मैं भी रोक दूं। मैंंने कहा कि मैं फिमेल गेस्ट्स का प्रवेश बंद करूंगा तो मेल गेस्ट्स का भी प्रवेश बंद कर दूंगा, जो खतरा लड़कियों से है वह लड़कों से भी हो सकता है। 18-22 साल के लड़के-लड़कियां इतने समझदार हैं कि विधायक-सांसद चुन सकते हैं आपस में मिलजुल नहीं सकते? मेरे एक स्टूडेंट (अभी बीएसएफ का कमांडेंट) का रूम तो उसके क्लास की लड़कियों का स्टडीरूम सा था। उसे कहता था,'तुम्हें तो इस लिए हॉस्टल से नहीं निकाल रहा कि ये सब कहां जाएंगी'। खैर माटी की तरफ से आभार व्यक्त करने में वार्डन के अनुभव में खो गया, कभी उन तीन खूबसूरत सालों पर लिखूंगा। बेटियों और माटी के कमरे की एक खिड़की के पार मेरी झोपड़ी (लाइब्रेरी और अध्ययन कक्ष) था। 5-6 महीने की थी तो बेटियों से डैडी सुन एक बार डैडी बुलाया फिर खिड़की का पर्दा हटाकर खिड़की पीटते हुए डड् -डड् करने लगी, थोड़ी बड़ी हुई तो नन् नन्। एक बार मैंने गुड नाइट का तो बोली नेइ और हाथ से घर के अंदर आने के रास्ते का नक्शा सा बनाती अंदर आने का इशारा किया। बोलने लगी तो नानू साफ बोलने लगी। उसकी मां और मौसी उसे भूत से डराकर सुलाती थीं। एक बार मेरे कमरे में पानी लेकर आई और बोली 'नानू दावी-मानी (दवाई-पानी) और खिड़की दिखाकर बोली भूत। मैंने कहा तुम लोग इसे भूत से डराती हो तो यह तुम्हारे बाप को। खैर आप सबका माटी की तरफ से फिर से आभार। सब लोग दुआ कीजिए कि वह बहुत ही अच्छी इंसान बने और मानवता की सेवा में नए प्रतिमान गढ़े।