Sunday, September 30, 2012

लल्ला पुराण ४५

विचार मुक्त होना मानवीय गुण से मुक्त होना है. मनुष्य ने अपनी आजीविका उद्पादन के श्रम की कला और कौशल से  अपने को पशु-परिवार से अलग किया और श्रम की कला चिंतन-शक्ति से आती है. लेकिन तमाम लोग किसी खास विचारधारा की मिथ्या-चेतना से अपनी चिंतन-शक्ति का इस्तेमाल नहीं करते और भेडचाल में लकीर पर चलते रहते हैं. विचार-मुक्त होना कौशल नहीं है बल्कि मष्तिष्क को बेरोजगार कर देना है.

Words acquire meaning through usage. The concept of Nirvana that acquired popularity through Buddha's teachings that means freedom from the cycles of rebirth. The mythological notion of rebirth was created by ruling class intellectuals to distract from the miseries of this world. The rational way of thinking leads to profound thought and not freedom from it. The self actualization is an intellectual process that comes by knowing one's nature and ways to realize it that comes from totally involved thinking and not from freedom from it.  What determines anyone's strong will power and correct mind set?  it is generally used for social  parasites - the Sadhus and sanyasis who are bereft of any rational thought and propagate ignorance and irrationality. And profound peace of mind is a myth, relative peace of mind is attained by unselfish rational thought process and not by renouncing it. But tragically most of us do not fully use our mind and direct our actions in accordance with established social values, traditions and customary laws under the historical illusion that the ancestors must have been wiser. I am saying historical because the law of the  dynamics of history bis continuous progressive advancement.  Every next generation is always smarter as it critically consolidates the achievements of previous generations and builds upon it. The societies that do not do so stagnate. For over thousand  years India intellectually stagnated under the garb of spiritual accomplishment. Freedom from thinking is freedom from one's human attributes.

@Prag Garg: जी हाँ राष्ट्रीयता के कालम में लिखते हैं इंडियन क्योंकि वह मेरी भौगोलिक-राजनैतिक अस्मिता है. लेकिन खेल के मैदान में इंडिया नहीं होता बल्कि दसवीं-बारहवीं पास ११ लड़के होते हैं जिन्हें इसी उम्र से इतना रूपया दिखने लगता है कि 'चक दे इंडिया' की नारेबाजी में उन्हें यह भी नहीं मालुम कि इस गरीब मुल्क में २०-२२ साल की उम्र में हजारों करोड़ रूपये का क्या सदुपयोग करेंगे निजी ऐयाशी के अलावा? उन्हें यह नहीं बताया जाता कि एक ज़िंदगी के लिये असीम रूपये की जरूरत नहीं होती. आईपीएल में खेलने के लिये कितने क्रिकेटरों ने अपने "राष्ट्रीय" अनुबंध ओ नज़र-अंदाज़ किया? केविन पीटरसन को दक्षिण अफ्रीका टीम में जगह मिलती तो वह इंग्लैण्ड के लिये खेलने क्यों जाता? राष्ट्र राज्य पूंजीवाद का राजनैतिक कवच है आधुनिक राष्ट्रवाद उसकी विचारधारा. इसी तरह के क्रिकेट-उन्मादी और युद्धोन्मादी राष्ट्रवाद की गफलत में लोग गर्व और शर्म करें, भूमण्डलीय पूंजी के दलाल देश को नव-उपनिवेशवाद के तार्किक परिणति तक बेख़ौफ़ पहुंचाते रहें. जी हाँ क्रिकेट में जो भी अच्छा खेलता है मैं उसका प्रशासक हूँ चाहे वह विरत कोहली हो या क्रिस गेल; सुनील गवास्कर हों या इमरान खान. लेकिन वहीं तक मैं न्हें भारत/वेस्ट-इंडीज/पाकिस्तान नहीं मानता हूँ. विराट कोहली के छक्के की उतनी ही तारीफ़ करता हूँ जितनी मोहम्मद हफीज की. "हिन्दुस्तान भी मेरा है, पाकिस्तान भी मेरा है/दोनों ही देशों में लेकिन अमरीका का डेरा है." (हबीब जालिब) 2/10/12

मनुष्य सामाजिक प्राणी है

मनुष्य सामाजिक प्राणी  है
ईश मिश्र 

कक्षा में धमाचौकड़ी मची है
अध्यापक बता रहा है कि
मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है
बाहर निकल भागते है
 किसी मरीचिका के पीछे
आगे दिखता बंद राजद्वार 
"आम रास्ता नहीं" का इश्तहार

बंद राजद्वारों  के पीछे के राजपथ 
आरक्षित होते हैं चंद असुरक्षित अभिजनों के लिये 
और इनके संगमरमरी धरातल 
नाम-ओ-निशाँ भी नहीं छोड़ते किसी हलचल के
इसीलिये मुझेभाते हैं टेढ़े-मेढे कच्चे रास्ते
गिरते-फिसलते चलते जाते हैं जिनपर
ताकत से मिट्टी की गंध की
यादें रह जाती हैं और हिचकी आती है
लगता है किसी के बही में मेरा भी नाम दर्ज है
काश पता चल गया होता 
'टूलेट' की तख्ती धुंधलाने के पहले

रूसो की सास्त्र में अरूचि थी
मुझे कक्षा में ऊब होती है
मैं एअस्तू नहीं  समझ सकता.
[२७.०९.२०१२/शाम ६.०५ बजे]

Saturday, September 29, 2012

न हूँ मैं करिश्मा, न कोई सितम


न हूँ मैं करिश्मा, न कोई सितम
ईश मिश्र

करने को हमारी इंसानी सादगी को  तरह तरह से  बदनाम
मुद्दत से होती आ रही हैं साजिशें, कभी छिपकर कभी खुले आम
कोई कहे करिश्मा तो कोई कहे सितम
इंसान से कुछ अलग दिखें जिससे हम
पढ़ने-लिखने से हमें अब तक  पुरुषों के समाज ने रोका था
सहते रहे सितम, न पहले कभी टोंका था
लेकिन पढ़-लिख कर अब हम हो गयी है सजग
रचेंगी हम अब अपना एक नया शास्त्र अलग
न अब चलेगा कोई करिश्मा न होगा कोई सितम
बराबर साझेदारी का एक  नया समाज बनाएंगे हम
नहीं हैं हम कोई करिश्मा या कोई सितम
सीधे-सादे अक्लमंद इंसान हैं हम
(यह तुकबंदी हेरम्ब जी को समर्पित)

भगत सिंह का सपना


भगत सिंह का सपना
ईश मिश्र 
भगत सिंह का सपना था एक शोषण-मुक्त समाज
नहीं बजेगा जिसमे फिरकापरस्ती या जात-पांत राग
पूंजी का समुचित बंटवारा होगा आयेगा समाजवाद
मगर बना यहाँ गोरे की जगह काले अंग्रेजों का राज
गुलामी की कगार पर है फिर से हिन्दुस्तान
होगा अब कभी भी नए भगत सिंहो का आगाज
चूमकर फंदा फांसी का
लगाया था उन्होंने जब नारा-ए-इन्किलाब
गूँज गया था भारत भर में
राजगुरु-सुखदेव भगत सिंह जिंदाबाद
इन्किलाब-ए-इन्किलाब जिंदाबाद जिंदाबाद
दी थी कुर्बानी शहीदों ने पूरा करने को यह सपना
देश होगा आज़ाद राजा आप-अपना
बनेगा भारत एक स्वतंत्र समाजवादी संघ
न होगा कोई राजा न ही कोई रंक
नामुमकिन होगा मनुष्य का मनुष्य से शोषण-दमन
खुशहाली मेहनतश की फैलाएगी चैन-ओ-अमन

सदियों की गुलामी के बाद मिली जब आज़ादी
इसकी बागडोर काले अंग्रेजों को थमा दी
सहेली बनी जिनकी खूनी विदेशी पूंजी
शहीदों की शहादत की थाती गँवा दी
बीते नहीं थे अभी  पचास भी साल
तार-तार हुई आज़ादी और मुल्क बेहाल
आठ रूपये का डालर था सन उन्नीस सौ अस्सी में
पचास पार कर गया अब सुधारों की बेताल-पचीसी में

पुरानी से इतनी अलग है नई गुलामी
लार्ड क्लाइव की जरूरत हो गयी है अब बेमानी
मीर जाफर बन गए हैं सारे-के-सारे राजारानी
गिरवी रख दिया इन्होने अपने सभी किरानी
आया है जबसे भूमंडलीकरण का राज
मेहनतकश हो गया है रोजी-रोटी का मोहताज
सरकारें देती जंगल-जल-जमीं पर कारपोरेटी कब्जा
कब पैदा होगा युवकों में अब भगत सिंह सा जज्बा
ज़ुल्म बढ़ता है तो मिट जाता है
खुद-ब-खुद नहीं मिटाना पड़ता है
करता हूँ आज नवजवानों का आह्वान
मिटा दें इस नई गुलामी के नाम-ओ-निशान
बन भगत सिंह ले आयें एक सुन्दर, नया बिहान
२९.०९.२०१२/२०:२३ बजे

Thursday, September 27, 2012

लल्ला पुराण ४४

विविध और बहुल वृत्तांतो से भरपूर महाभारत एक कालजयी रचना है जिसकी कथा-वस्तु पर आज तक लिखा जा रहा है. मिथकीय महाकाव्य से सामाजिक इतिहास समझने के लिये उसे demystify करना पड़ता है. प्राचीन काल की समृद्ध भौतिकवादी और आध्यात्मिक  दार्शनिक परम्पराओं में राजनैतिक सिद्धांत का अभाव है. विचार वस्तु-जन्य होते हैं, इसका उलटा नहीं होता. ऐसा इसलिए है कि सातवीं-छठी शताब्दी ईशापूर्व यानि लगभग बुद्ध के काल तक राज्य एक संस्था के रूप में जड़ें नहीं जमा सका था. तमाम मामलों में आज भी प्रासंगिक कौटिल्य के अर्थशास्त्र से पहले राज्य की उत्पत्ति और कार्यों का सिद्धांत बौद्ध-संकलनों --'अनुगत्तारानिकाय' और 'दीघनिकाय' में मिलता है. यह बात यह रेखांकित करने के लिये कह रहा हूँ कि महाभारत के शांतिपर्व में राज्य के सिद्धांत 'अर्थशास्त्र' से पहले का नहीं हैं. महाभारत उस संक्रमणकालीन समय की कहानियों का काव्यात्मक संकलन है जब ऋग्वैदिक कुटुंब व्यवस्था टूट रही थी और युद्ध के जरिये केंद्रीकृत राज्यों की स्थापना हो रही थी. पुरुष-प्रधान परिवार और वर्णाश्रम आधारित श्रम-विभाजन जड़ें जमा रहा था. भीष्म, पांडवों और कौरवों को क्रमशः गंगा पुत्र, कुंती-पुत्र और गांधारी पुत्र कहा जाता है. विवाह-पूर्व और विवाहेतर प्रेम और  प्रणय प्रतिबंधों और वर्जनाओं की परिधि में लाये जा रहे थे. अन्तःकुतुम्बीय और अंतर-कुतुम्बीय सम्बन्ध गड्ड-मड्ड थे. लोहिया जी ने द्रौपदी को कृष्ण की प्रेमिका बताया तो कुछ आधार होगा. महाभारत का मेरा विशद अध्ययन नहीं है, लेकिन कृष्ण जैसा दिल-फेंक आदमी द्रौपदी से भी प्रेम करते रहे हों, तो आश्चर्य की बात नहीं है. 

बेतरतीब

It is collection of some of the FB comments

That sounds convincing reason for making themselves miserable by turning the means (money) of life into its end.Once I asked a high profile doctor ( a school classmate) what knowledge you have gained that you are selling it so high? I happened to run into him at an airportafter 40 years and he could, surprizingly, recognize me.( except coming and greying of beard

Wednesday, September 26, 2012

मदरसा-ए-ज़ब्त-ए-गम


मदरसा-ए-ज़ब्त-ए-गम
ईश मिश्र 
चलाती हूँ मदरसा-ए-ज़ब्त-ए-गम
ख्वाहिशमंदों के लिए खुला है हरदम
असीमित नहीं है लेकिन शुरुआती कक्षा
पास करनी होगी एक जटिल प्रवेश-परीक्षा
(क्या तुकबंदी है!)
२६.०९.२०१२
निराला है मकतबे इश्क का दस्तूर 
जिसने याद किया उसका खुदा मालिक
समझा मगर जिसने मर्म-ए-इश्क
बावजूद विघ्न-बाधाओं के पास होगा जरूर 
27.09.2012/