Friday, October 6, 2023

शिक्षा और ज्ञान 327 (जंगल राज)

 सत्योत्तर युग के नए भारत में मृदंग मीडिया और सोसल मीडिया के भक्तसंघ ने धर्मोंमादी सांप्रदायिकता को राष्ट्रवाद और नरसंहार; हत्या-बलात्कार तथा बुलडोजरी न्याय वैध प्रचारित कर रखा है। भारत वैसे ही भक्तिभाव प्रधान देश है जिसमें धर्मोंमाद के नशे में भक्त पेट पर लात भी प्रसाद समझकर खाकर भजन खाता है। यूरोपीय नवजागरण के राजनैतिक दार्शनिक, मैक्यावली ने समझदार राजा को सलाह दी है कि धर्म और नैतिकता की नकाब ओढ़कर अपनी सत्ता को मजबूत करने के लिए उसका सारा अनैतिक अनाचार-दुराचार वाजिब है, लेकिन जनता के पेट पर लात न मारे नहीं तो लोग विद्रोह कर देंगे। लोग पिता की मौत आसानी से भूल जाते हैं, पैतृक संपत्ति का नुक्सान नहीं। लेकिन लगता है वह हमारे जैसे किसी देश के भक्तिभाव की वैचारिक ताकत से अपरिचित था। आज हमारे देश में अन्याय-उत्पीड़न मृदंग बनने से इंकार करने वाली मीडिया पर तरह तरह के अत्याचार; बुलडोजरी न्याय सब वाजिब बन गए हैं। मीडिया जब तक मृदंग की तरह शासकीय सुर-ताल पर बजती रहेगी, फासीवादी शासन की वैधता बनी रहेगी। अरे भाई कोई यदि सचमुच का भीअपराधी है तब भी उसे सजा देने के लिए अदालत बनी है, एन्काउंटरी सजा-ए-मौत या बुलडोजर का न्याय जंगल राज का न्याय है, किसी सभ्य समाज का नहीं। संवैधानिक न्यायिक व्यवस्था किसी अपराधी के परिजनों को अपराधी नहीं मानती, फिर उन्हें बेघर कर भयानक सजा क्यों? किसी प्रोफेसर जैसी नौकरी से रिटायर होने के बाद एक फ्लैट खरीदने-बनाने में पूरी जिंदगी की कमाई खप जाती है; एक मकान बनाने में पीढ़ियों की मेहनत होती है, संविधानेतर जंगल राज का कानून उसे 5 मिनट में ध्वस्त कर देता है। जब अत्याचार और अन्याय कानून बन जाए तो विद्रोह नागरिक कर्तव्य है। जब सच्चाई का अपराधीकरण कर दिया जाए, तो सच्चाई के रास्ते पर चलना नैतिक दायित्व है।

Thursday, October 5, 2023

बॉस से अधिक खतरनाक हैं उसके कुत्ते

 बॉस से अधिक खतरनाक हैं उसके कुत्ते

जगह की पहचान लिए हैं रास्ते भर मूतते
हर आने-जाने वाले पर हैं बेबात भौंकते
पाते ही बॉस का इशारा काटने दौड़ते
पाते ही कुर्सी का आश्रय हैं ऐंठ जाते
देखते ही टुकड़ा हैं दुम हिलाकर बैठ जाते
बनाकर झुंड में निहत्थों पर हैं शेर हो जाते
पत्थर उठाते ही हैं दुम दबाकर भाग जाते

रथ के नीचे चलते हुए समझते हैं खुद को रथवान
सोचते हैं भौक कर बॉस का भजन लगते हैं विद्वान
और अनुशासन के ज़ीरो पॉवर बल्ब के कार्यवान
टुकड़ा देने वाले किसी को भी मान लेते हैं भगवान

होता था पहले इनकी प्यार-पुचकार में भी 14 इंजक्सनों का डर
अब शायद कुछ कम से ही उतर जाता है इनके काटने का जहर

(यूं ही कलम बहुत दिनों बाद आवारा हो गया)
(ईमि: 05.10.2023)

बेतरतीब 158 (आजादी और सामाजिक चेतना)

 मैंने एक पोस्ट में लिखा कि मैं और मेरी पत्नी एक दूसरे की क्रमशः नास्तिकता और धार्मिकता के प्रति सहनशीलता दिखाते हुए सहअस्तित्व के सिद्धांत का पालन करते हैं। एक सज्जन ने इसे ब्राह्मण कम्युनिस्ट की अवसरवादी प्रवृत्ति कहा और एक अन्य मित्र ने कहा कि जब अपनी पत्नी को नहीं बदल सकता तो बदलाव के लिए औरों को कैसे प्रभावित करूंगा? एक और मित्र ने इसे उच्चजातीय प्रपंचबताया। उस पर --

मेरा विवाह उस उम्र में हो गया था जब मैं ठीक से विवाह का मतलब भी नहीं समझता था, हमारे गांव के सांस्कृतिक परिवेश में बाल विवाह आम प्रचलन था। आधुनिक शिक्षा की पहली पीढ़ी के रूप में हाई स्कूल इंटर की पढ़ाई (1967-71) शहर (जौनपुर जो सांस्कृतिक रूप से 1960-70 के दशक तक गांव का ही विस्तृत संस्करण था) में करते हुए चेतना का स्तर इतना हो चुका था कि इतनी कम उम्र में विवाह नहीं होना चाहिए तथा इंटर की परीक्षा के बाद घर पहुंचने पर अपनी शादी का कार्ड छपा देखकर विद्रोह का विगुल बजा दिया लेकिन भावनात्मक दबाव के आगे झुक गया और विद्रोह अपनी तार्किक परिणति तक नहीं पहुंच सका। एक बार किसी ने पूछा कि सबके चुनाव की आजादी के अधिकार की बात करता हूं तो क्या शादी भी अपनी मर्जी से किया था? मैंने कहा, शादी तो अपनी मर्जी से नहीं किया था (शादी के समय और उसके 3 साल बाद गवना आनेतक मैंने पत्नी को देखा ही नहीं था), लेकिन शादी निभाने का फैसला अपनी मर्जी से किया था। यदि यह शादी मेरी मर्जी से नहीं हुई थी तो पत्नी की भी मर्जी से नहीं हुई थी, लड़कियों से तो मर्जी पूछने का सवाल ही नहीं होता था। उस समय हमारे गांवों में लड़कियों के पढ़ने का रिवाज नहीं था। उन्होंने गांव के स्कूल से प्राइमरी तक पढ़ लिया था। लड़कियों की छोड़िए, विश्वविद्यालय पढ़ने जाने वाला अपने गांव का मैं पहला लड़का था। 1982 में 8वीं के बाद अपनी बहन की पढ़ाई के लिए मुझे पूरे खानदान से महाभारत करना पड़ा था तथा अड़कर मैंने उसका राजस्थान में लड़कियों के स्कूल/विवि वनस्थली विद्यापीठ में एडमिसन कराया, वह अलग कहानी है। भूमिका लंबी हो गयी। बाकी बातें अगले कमेंट में। यह कमेंट दो घटनाओं से खत्म करता हूं। पहली घटना 1980-81 के आसपास की है एक संभ्रांत क्रांतिकारी जोएनयू की सहपाठी को मुझसे कुछ राजनैतिक डीलिंग करनी थी। हम दोनों अलग अलग वाम संगठनों में थे। राजनैतिक बातचीत की भावुक भूमिका के तौर पर उन्होंने कहा कि बाल विवाह के चलते मुझे, आसानी से तलाक मिल सकता था। मेरा माथा ठनका। मैंने पूछा कॉमरेड आपका क्या इंटरेस्ट है? कोई गांव का शादीशुदा लड़का अकेले हॉस्टल में रह रहा हो तो कई लोग शायद यह मानते हों कि वह शादी से छुटकारा चाहता होगा। मैंने कहा था, "If there are two victims of some regressive social custom, one co-victim should not further victimize the more co-victim and in patriarchy the woman is more co-victim." दूसरी घटना मेरे कॉलेज की है। एक सहकर्मी से वैज्ञानिकता और धार्मिकता पर बहस हो रही थी, तर्कहीन होने पर उन्होंने कहा कि वे मेरी कोई बात तब मानेंगे जब मैं अपनी पत्नी को नास्तिक बना दूं। मैंने कहा कि इतने दिनों में जब मैं आपको भूमिहार से इंसान न बना सका जबकि आपतो पीएचडी किए है और इतने सीनियर प्रोफेसर है, मेरी पत्नी तो प्राइमरी तक पढ़ी गांव की स्त्री हैं। बाकी फिऱ।
05.10.2022

Wednesday, October 4, 2023

शिक्षा और ज्ञान 326 (आस्तिकता और सांप्रदायिकता)

 समस्या आस्तिकता नहीं. सांप्रदायिकता है, जो धार्मिक नहीं, धर्मोंमादी लामबंदी की राजनैतिक विचारधारा है, जिसकी इमारत दूसरे धार्मिक समुदायों से नफरत की बुनियाद पर खड़ी है।

Tuesday, October 3, 2023

शिक्षा और ज्ञान 325 (स्त्री रिक्शाचलक)

  ऐसी दबंगई को सलाम। ऐसी ही एक स्त्री रिक्शाचलक दिल्ली यूनिवर्सिटी मेंं थी। लेकि वे पैसे सब (पुरुषों) जितना ही लेती थी। 40-45 साल के आस-पास की पढ़ी-लिखी दिखने वाली स्त्री। दिल्ली विवि होते हुए कमला नगर से विश्वविद्यालय मेट्रो स्टेसन। रिटायर होने के बाद जब कभी गया, दिखीं नहीं।


मुझे लगता था कि दिल्ली में रिक्शा किराया वाजिब नहीं है, अगर समग्रता में नहीं तो, अपेक्षाकृत वाजिब किराया दूं। डी'स्कूल से मेट्रो का किराया 20 रु. था मुझे लगता था कि कम-से-कम 30 होना चाहिए, तो मैं 30/ दे देता था। ई रिक्शा में 10/ सवारी का रेट था। कमललानगर से मेट्रो तक 20/

एक दिन मैं किसी काम सेकमला नगर गया था। और फोन आया, कोई पुराना दूर से मिलने आया था, डी'स्कूल में इंतजार कर रहा था। वह सवारी के इंतजार मे थीं, मैने कहा अकेले ले चलिए, पूरा किराया ले लीजिए। वे 4 ही सवारी बैठाती थीं। बोली 80/ लगेंगे। मैं डी'स्कूल उतरा तेमेट्रो की सवारी खड़ी थी, उन्होंने उन्हें बैठने को कहा और 100/ में से 60 / लौटाने लगीं, मेरे मना करने पर कहने लगीं मैं गैर वाजिब किराया नहीं लेती, यब कहते हुए कि खाली जातीं तब 80/ लेती। रिक्शा स्टार्ट कर चल दीं।

Monday, October 2, 2023

जीवन का उद्देश्य

 नहीं है जिंदगी का कोई जीवनेतर उद्देश्य

मुकम्मल मकसद है एक अच्छी जिंदगी जीना
मगर सवाल है कि क्या है अच्छी जिंदगी?
अच्छा तो अपने आप में कुछ होता नहीं
वह तो है महज एक विधेय यानि कि विशेषण
जैसे अच्छा शिक्षक होना अच्छा छात्र होना
कहने का मतलब अच्छा इंसान होना
नहीं है अच्छाई कोई मात्रात्मक इकाई
अच्छाई एक अनवरत गुणात्मक प्रक्रिया है
होती है निर्धारित अच्छाई
खास हालात में विवेक के इस्तेमाल से
करने से हर बात और हर विचार पर सवाल
नहीं मिलता जबतक जवाब मानवता के पक्ष में
स्व के स्वार्थबोध पर स्व के परमार्थबोध की तरजीह से
मुहावरे की भाषा में बाभन से इंसान बनने से।
(ईमि: 30.09.2013)

बाभन से इंसान बनना

 सुखद तो है बाभन से इंसान बनना

सुखद तो है बाभन से इंसान बनना

मगर आसान नहीं
कर लेते हैं जो लोग यह मुश्किल काम
आंख की किरकिरी बन जाते हैं उनकी
जो अभिशप्त हैं बने रहने को शैतान
और जब शैतानों का शैतान हो सम्राट
इंसानों पर होता है हमला विराट
लिखेंगे यदि प्रेमचंद हकीकत ठाकुर के कुएं की
घोषित कर देंगे शैतान उन्हें कुलांगार
(ईमि:30.09.2023)