Friday, July 5, 2013

तस्वीर


कविता लिखने को जी चाहता है इस तस्वीर पर
तकलीफ के उमड़ते सागर सी आँखे
और चहरे पर असंभव को साधने का संकल्प
तलाश रही हो जैसे जीने का नया विकल्प.
[ईमि/०५.०७.२०१३]

निराई के बहाने

मुजरिमों क लिए पहले डूब मरने की कहावत थी
कहते हैं आमजन की उनसे अदावत थी
डूबते-मरते नहीं मुजरिम आजकल
काट लेते हैं निराई के बहाने फसल
कहते हैं होती है क्यों इससे हैरान अकल
वे तो कर रहे हैं महज हुक्मरानों की नक़ल
[ईमि/०५.०७.२०१३]

Thursday, July 4, 2013

शब्द -शूल

टपक जाते है गर गलत शब्द कभी भूल से 
चुभते हैं वो दिल में दर्दनाक शूल से
[ईमि/०५.०७.२०१३]

Wednesday, July 3, 2013

खुशफहमी-ए-मुहब्बत



 खुशफहमी-ए-मुहब्बत में ज़िंदगी बिता दी
मारे गए आखिर बेवफा दोस्ती की घात से
उठे हैं कब्र से अबकी जो हम
चौंका देंगे दुनिया को अनूठे करामात से
उतार फेंका है सर से बोझ माजी का
बढ़ेंगे आगे अब बुलंद जूनून-ए-जज्बात से.
[ईमि/०४.०७.२०१३]

Monday, July 1, 2013

लल्ला पुराण ९५

पूंजीवादी चीन या  विघटित सोवियत संघ मार्क्सवाद नहीं हैं. मार्क्सवाद समाज और इतिहास की गति और उसके नियमों को समझने का तथ्यों-तर्कों पर आधारित विज्ञान है जो सत्यापित को ही सत्य मानता है. रूसी-चीनी क्रांतियाँ नन्वादी अभियान के पड़ाव थे, मंजिल नहीं. वैसे यहाँ बहस का मुद्दा यहाँ मार्क्सवाद नहीं बल्कि वाल्मीकि रामायण है. यह मार्क्सवाद का आतंक है कि बहस का मुद्दा कुछ भे हो लोगों के सर पर मार्क्सवाद का भूत सवार हो जता है. मार्क्सवाद पर हम अलग से बहस कर सकते हैं. वैसे तमाम लोग मार्क्सवाद का म पढ़े बिना फत्वानुमा वक्तव्य देते रहते हैं. १७-१८ साल की उम्र में जब मैं और रामाधीन भाई साथ साथ संघी छात्र राजनीति करते थे तो मैं भी अपने पूर्वाग्रहों  आधार पर मार्क्सवाद को खूब गालियाँ देता था. विद्यार्थी परिषद् के कार्यालय के नीचे पीपीएच की दूकान थी वहां उठते-बैठते-पढते दुनिया की समझ का फलक विस्तृत होने लगा. रामाधीन भाई साहब बाकी संघियों की तरह प्रेक्टिकल राजनीति में इतने व्यस्त रहे कि समझ बदलने का मौका ही नहीं मिला होगा.

लल्ला पुराण ९४

किसने कहा मार्क्सवाद सिमटता गया, मार्क्सवाद का भूत लोगों के सर पर ऐसा सवार है कि कोइ भी तर्कसंगत बात करो तो लोगों के सर पर मार्क्सवाद और माओवाद का भूत सवार हो जाता है. किसने कहा काल्पनिक नायक ईश्वरत्व की और बढ़ता गया? वाल्मीकि ने तो ऐसा नहीं  कहा. दर-असल हमारी धर्मान्धता और धार्मिक श्रद्धा ऐसी है की कोइ भी भगवान/भगवती बन सकता है. १९८० के आस-पास एक फिल्म आयी सन्तोशी माता, खूब चली और संतोषी माता नाम की एक नई लोकप्रिय देवी अवतरित हो गयी. फिल-निर्माता चालू था , बाकी दिन तो कई देवताओं में बंट चुके है तो इस नई देवी के लिए शुक्रवार निश्चित किया. हमारी एक सहकर्मी हाँ संतोषी माता का बरत रखती हैं और नारीवाद  पढ़ाती हैं. मैंने कहाँ कहा बौद्ध साहित्य पाली में संस्कृत के विरोध में लिखा गया? बिलकुल सही कह रहे हैं प्रचार की व्यापकता के लिए पाली में लिखा गया और कई लेखकों को संस्कृत आती भी नहीं थी.

लल्ला पुराण ९३

वाल्मीकि रामयाण बुद्ध के बहुत बाद लिखी गयी है, कौटिल्य के 

अर्थशास्त्र के भी बहुत बाद. कविता और उपन्यास में

कवि/लेखक की कल्पना द्वारा हकीकत का अमूर्तीकर्ण किया जाता है. 

कभी कभी हम उसके पात्रों को ऐतिहासिक/दैविक


मान लेते हैं. पुष्यमित्र द्वारा बौद्ध जन-संहार के बाद हूण-कुषाण काल में

बौद्ध दर्शन के पुनर्प्रसार से

संकट में पड़े वर्णाश्रमवाद यानि ब्राह्मणवाद की पुनर्स्थापना का यह एक

प्रभावी प्रयास था.


प्रणाम अग्रज! भाषावैज्ञानिक शब्दों के वश्लेषण की आधार रामायण का रचना काल महाभारत के बाद और मनुस्मृति के बाद का मानते हैं. कौटिल्य अर्थशास्त्र में लगभग हर पूर्ववर्ती विद्वानों और गुरुओं एवं परम्पराओं के विचारों को उद्धृत करने के बाद ही अपने विचार प्रदिपादित करते हैं. वाल्मीकि के विचार या राम नाम के किसी चरिते का वर्णन नहीं करते. कृष्ण की चर्चा जरूर है. विजिगिशु को राय देते हैं की विजय अभियान पर निकलने के पहले उसे देवताओं और दानवों का स्मरण कर लेना चाहिए और कृष्ण को कंस के साथ दानवों की श्रेणी में रखते हैं. उन्ही का समकालीन मेघस्तानीज  कृष्ण की चर्चा सूरसेन क्षेत्र (मथुरा) के एक स्थानीय लीजेंडरी नायक के रूप में करता है. यानि कि कौटिल्य के काल तक कृष्ण एक आर्य नायक नायक भी नहीं थे.