वह शक्ल-सूरत से अलग दिखता है
वह शक्ल-सूरत से अलग दिखता है
भीड़ जुटाकर उसकी हत्या कर दोउसका नाम मुसलमानों सा लगता है
भीड़ जुटाकर उसकी हत्या कर दो
तुम झुंड में शेर बनने वाले कुत्तों से हो
जब भी शेर बनने का झुंड बना सको
जो झुंड में न आए उसकी हत्या कर दो
जो भी झुंड में शेर बनने को कायरता कहे
उसकी भी झुंड बनाकर हत्या कर दो
भीड़- हत्या हत्या नहीं होती बध होती है
वैसे भी वैदिक हिंसा हिंसा न भवति

यह कविता पढ़कर दिल में बेचैनी पैदा होती है और वही इसका असर भी है। आप भीड़ की मानसिकता को बिना घुमाव के सामने रख देते हैं। मुझे यह बात चुभती है कि कैसे पहचान के नाम पर इंसानियत को कुचल दिया जाता है। आप झुंड और शेर के रूपक से डर और कायरता दोनों को उजागर करते हैं।
ReplyDeleteशुक्रिया
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