Wednesday, September 21, 2022

शिक्षा और ज्ञान 378 (सांप्रदायिकता और चुनाव)

असगर भाई ( Asghar Wajahat) ने श्रीलंका की एक अदालत द्वारा पूर्व राष्ट्रपति श्रीसेना को नोटस जारी करने की एक खबर शेयर किया है कि उन्होंने एक आत्मघाती, आतंकी हमले की खुफिया जानकारी होने के बावजूद उसे रोकने या विफल करने का कोई प्रयास नहीं किया। इस आत्मघाती विस्फोट में 270 लोग मारे गए थे जिसकी प्रतिक्रिया में वहां भीषण जनसंहार हुआ था और जिसके बाद के चुनाव में श्रीसेना की विशाल बहुमत से विजय हुई। सांप्रदायिक हिंसा/जनसंहार चुनाव के साधन बन गए हैं। गौरतलब है कि 1984 में दिल्ली में सिख-जनसंहार के बाद चुनाव में कांग्रेस को विशाल बहुमत मिला; 1990 में अडवाणी की रथयात्रा की पृष्ठभूमि हुई सांप्रदायिक हिंसा के उंमाद से भाजपा ने पहली बार उत्तर प्रदेश में बहुमत पाकर सरकार बनाया, जिसने बाबरी मस्जिद ध्वस्त करवाने का उल्लेखनीय काम किया। सर्वविदित है कि गोधरा और उसके बाद के अभूतपूर्व जनसंहार के बाद गुजरात में ऐसा सांप्रदायिक ध्रुवीकरण हुआ कि भाजपा का स्थाई चुनावी जनाधार बन गया और गांधीनगर से चला चुनावी विजयरथ मुजफ्फरनगर की संप्रदायिक हिंसा और विस्थापन जैसी छोटी-मोटी अमानवीयताओं की मदद से 12 सालों में दिल्ली पहुंच गया।

सवाल हिटलर द्वारा यहूदियों के जनसंहार का तो है ही लेकिन उससे बड़ा सवाल शिक्षा के चरित्र का है कि विशाल शिक्षित जनसमूह यहूदियों के जनसंहार का समर्थक/प्रशंसक था।

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