Wednesday, July 20, 2022

मार्क्सवाद 272 (आर्थिक संकट)

  1930 के दशक के आर्थिक संकट का कारण था over production and under consumption, जिसका कारण था लोगों की क्रयशक्ति का अभाव, जिसका कारण था अधिकतम निजी मुनाफे के एडम स्मिथ सिद्धांत पर आधारित उत्पादन साधनों पर निजी स्वामित्व कि बुनियाद पर टिकी पूंजीवादी प्रणाली। इस आर्थिक संकट से पूंजीवाद ध्वस्त होने के कगारपर पहुंच गया तथा तबाही से पीड़ित उत्पादक (मजदूर) तबाही से राहत के लिए हाहाकार मचाने लगा। पूंजीवाद को ध्वस्त होने से बचाने और मजदूरों के हाहाकार को शांत करने के लिए एडम स्मिथ के अहस्तक्षेपीय के राज्य सिद्धांत की जगह केंस के अर्थ व्यवस्था पर राज्य के नियंत्रण पर आधारित हस्तक्षपीय, कल्याणकारी (वेल्फेयर) राज्य के सिद्धांत को लागू किया गया जिसके तहत विशाल सार्वजनिक आर्थिक उपक्रम तथा कल्याणकारी संल्थान स्थापित किए गए। भारत में पूंजी वाद था ही नहीं तो ध्वस्त होने से बचाने का सवाल ही नहीं था, तो यहां कल्याणकारी राज्य की स्थापना पूंजीवाद की स्थापना के लिए हुई, क्योंकि 1847 में औपनिवेशिक शासक अर्थव्यवस्था को तबाही की जिस हालत में छोड़ गए उसमें औद्योगिक योगदान 6.3% था, जब कि 19वीं शताब्दी की शुरुआत तक भारत अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के प्रमुख खिलाड़ियों में था। देशी पूंजीपतियों का उदय तो हो चुका था, जिनमें ज्यादातर के आदिम संचय अफीम युद्ध के दौरान अफीम 'के व्यापार पर आधारित था, लेकिन विशाल औद्योगिक अधिरचना में निवेश की न तो उनकी क्षमता था न ही इच्छाशक्ति। इसलिए जनता के पैसे के राजकीय निवेश की बुनियाद पर पूंजीवाद की स्थापना हुई। सार्वजनिक क्षेत्र की भ्रष्टाचार और कुप्रबंधन से तबाही से उत्पन्न का इलाज निजीकरण खोजा गया। रोग कभी इलाज बन नहीं सकता और संकट के दौर आते रहेंगे जब तक कि इसमें आमूल-चूल परिवर्तन से नयी प्रणाली की स्थापना नहीं होती।

1 comment:

  1. यूरोप और अमेरिका में जितना पूंजीवादी (औद्योगिक) विकास 400 सालों में हुआ उतना दूसरे विश्वयुद्ध तक सोवियत संघ में 15-16 सालों में, जिसका मतलब राज्यनियंत्रित, नियोजित विकास निजी स्वामित्व के विकास की तुलना में बेहतर है। साम्राज्यवादी आक्रमण के खतरों से घिरे होने के कारण उसे विश्व सामरिक शक्ति भी बनना पड़ा, वरना जितने संसाधन सैनिक उपक्रमों में खर्च हुए उतने में कितने और सामाजिक बेहतरी के उपक्रम बनते। जैसी भी सामाजिक व्यवस्था थी हर व्यक्ति को काम का संवैधानिक अधिकार था। यह अधिकार कोई भू पूंजीवादी राज्य नहीं दे सकता कितना भी विकसित क्यों न हो। बेरोजगारी पूंजीवाद कादोष नहीं अंतर्निहित अनिवार्य प्रवृत्ति है।

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