विभिन्नता में वास्तविक एकता समता भाव से ही संभव है, असमानता में एकता नहीं, श्रेणीबद्धता होती है और संबंधों का सुख एकता में है, श्रेणीबद्धता में सुख नहीं, सुख की खुशफहमी होती है. असमानता के सारे पैरोकार विभिन्नता को असनानता के रूप में परिभाषित करते हैं और फिर वे उसी परिभाषा से,गोल-मटोल तर्क के सहारे, असमानता को प्रमाणित करते हैं. "हाथ की पाँचों उंगलियां बराबर नहीं होती " का घिसा-पिटा कथन एसी तरह का गोल-मटोल कुतर्क है. आकार की मात्रात्मक असमानता से उनका गुणात्मक महत्व नहीं तय होता.अंगूठा आकार में अपेक्षाकृत छोटा होता है, लेकिन द्रोणाचार्य को एकलव्य का अंगूठा ही सबसे खतरनाक लगा था.
Friday, September 13, 2013
राग गिटार से
निकालो गजब के राग गिटार से मच जाये कोहराम
झंझावत से अमर कर दो जंग-ए-आज़ादी का पैगाम
ख़ाकनशीनों में गीतों से अपने भर दो नई ऊर्जा वो जान
कर दो ज़ुल्म के मातों को गतिमान और वाचाल
बना दो इन गीतों को शोषण-दमन का मुसलसल बयान
अन्तर्विरोधों को समझ सकें जिससे सब साधारण इन्सान
बना दो अपने नग्मों को भूखे-नंगों के अरमानों के नारे
बन जायेंगे जो भीड़ से हिरावल दस्तों के विप्लवी हरकारे
बनायेंगे मिलकर सभी एक ऐसा सुंदर नया जहान
इंसान को सता न सकेगा जिसमें कोई और इंसान
[ईमि/13.09.2013]
झंझावत से अमर कर दो जंग-ए-आज़ादी का पैगाम
ख़ाकनशीनों में गीतों से अपने भर दो नई ऊर्जा वो जान
कर दो ज़ुल्म के मातों को गतिमान और वाचाल
बना दो इन गीतों को शोषण-दमन का मुसलसल बयान
अन्तर्विरोधों को समझ सकें जिससे सब साधारण इन्सान
बना दो अपने नग्मों को भूखे-नंगों के अरमानों के नारे
बन जायेंगे जो भीड़ से हिरावल दस्तों के विप्लवी हरकारे
बनायेंगे मिलकर सभी एक ऐसा सुंदर नया जहान
इंसान को सता न सकेगा जिसमें कोई और इंसान
[ईमि/13.09.2013]
तोड़ दो मर्दवाद का दुर्गद्वार
तोड़ दो सदियों पुराने मर्दवाद का दुर्गद्वार
नहीं पड़ेगी डाइनामाइट की जरूरत
हथौड़े का वार काफी है
इसकी जर्जर दीवारों के लिये
मसक दो सलाखें इसके कैदखाने की
जला दो सारी वर्जनायें और दिशा-निर्देश
देते हों जो लाचारी-ओ-बेखुदी के संदेश
बनाओ ताकत चेहरे पर लिखी दर्द की कहानी को
लड़ो यक़ीन के साथ कि जीतना ही है यह जंग
मत सहो अब और इस अफसोस के साथ
कि सहते क्यों रहे अब तक
नहीं है विकल्प कोई लड़ने का
क्योंकि लड़े बिना कुछ नहीं मिलता
हम लड़ेंगे सारे जोर-ज़ुल्म के बावजूद
लड़ेंगे आज़ादी के एक-एक इंच के लिये
हम लड़ेंगे और जीतेंगे
क्योंकि हम लड़ेंगे एक आज़ाद जमाने के लिये
अमन-ओ-चैन के अफ्साने के लिये
[ईमि/13.09.20-13]
नहीं पड़ेगी डाइनामाइट की जरूरत
हथौड़े का वार काफी है
इसकी जर्जर दीवारों के लिये
मसक दो सलाखें इसके कैदखाने की
जला दो सारी वर्जनायें और दिशा-निर्देश
देते हों जो लाचारी-ओ-बेखुदी के संदेश
बनाओ ताकत चेहरे पर लिखी दर्द की कहानी को
लड़ो यक़ीन के साथ कि जीतना ही है यह जंग
मत सहो अब और इस अफसोस के साथ
कि सहते क्यों रहे अब तक
नहीं है विकल्प कोई लड़ने का
क्योंकि लड़े बिना कुछ नहीं मिलता
हम लड़ेंगे सारे जोर-ज़ुल्म के बावजूद
लड़ेंगे आज़ादी के एक-एक इंच के लिये
हम लड़ेंगे और जीतेंगे
क्योंकि हम लड़ेंगे एक आज़ाद जमाने के लिये
अमन-ओ-चैन के अफ्साने के लिये
[ईमि/13.09.20-13]
दर्द गम-ए-जहाँ का
इन आँखों में छिपा है दर्द गम-ए-जहाँ का
और चेहरे पर जंग-ए-आज़ादी का ज़ज्बा
चलती हैं उन्मुक्त उंगलियां जब गिटार पर
कर देती हैं पैदा इंक़िलाबी स्वर और ताल
हो सवार इसके नग्मों की उफनती लहरों पर
पार कर जाती है तक़लीफ का उमड़ता समन्दर
[ईमि/13.09.2013]
और चेहरे पर जंग-ए-आज़ादी का ज़ज्बा
चलती हैं उन्मुक्त उंगलियां जब गिटार पर
कर देती हैं पैदा इंक़िलाबी स्वर और ताल
हो सवार इसके नग्मों की उफनती लहरों पर
पार कर जाती है तक़लीफ का उमड़ता समन्दर
[ईमि/13.09.2013]
Thursday, September 12, 2013
दीदार-ए-दिल
कहाँ हो जाती हो गायब देकर मौजूदगी का एहसास
चाहिए दीदार-ए-दिल नहीं महज आभास. हा हा
[ईमि/१३,०९.२०१३]
चाहिए दीदार-ए-दिल नहीं महज आभास. हा हा
[ईमि/१३,०९.२०१३]
मुनादी-ए-ऐलान
चलती तो हूँ मैं करते हुए मुनादी-ए-ऐलान
तुम्हारी मशरूफियत मुझे कैसे मालुम
ग़म-ए-जुदाई की है या तलाश-राह की
उसूलों पर जीने या निजी चाह की
[१२.०९.२०१३]
गर टूटा हो आइना
सच है कि होगा शक्ल का
कुछ तो एहसास
हो कैसा भी आइना
दिखेगी मगर खंडित तस्वीर
गर टूटा हो आइना
[ईमि/१३.०९.२०१३]
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