Wednesday, September 2, 2020

मारे गए और मर गए

 मारे गए और मर गए

लॉकडाउन के चलते घर लौटते बहुत से मजदूर
अपने पिछले जन्म के कर्मों के चलते मारे गए और मर गए
लॉकडाउन के चलते घर लौटते बहुत से मजदूर
अपने पिछले जन्म के कर्मों के चलते
उसी तरह जैसे आत्महत्या कर ली
बहुत से नौजवानों ने
अर्थव्यवस्था के पातालगगामी होने से
भगवान की दुष्कृपा के चलते
मर गए बीमारी से बहुत से लोग
गरीबी में इलाज न करवा पाने से
एम्स जैसे अस्पतालों के
अभी तक बिक न पाने के चलते
अपनी ही सरहदों में
धोखे से मारे गए बहुत से जवान
महामहिम के मन की बात को
बहुतों के राष्ट्रीय सुरक्षा की बात न मानने के चलते
फैलेगी जब नाफरमानी की ऐसी अराजकता
पड़ेगी खतरे में राष्ट्रीय सुरक्षा
खुला छोड़ना पड़ेगा
गर्भवती का पेट फाड़कर
भाले की नोक पर भ्रूण का परचम लहराने वाले
बाबू बजरंगियों को
धर्म की सुरक्षा के चलते
और बंद करना पड़ेगा जेलों में
वरवर राव जैसे कवियों और कफील जैसे डॉक्टरों को
राष्ट्रीय एकता और अखंडता की कविताओं से
राष्ट्र की सुरक्षा के चलते
(ईमि: 02.09.2020)
उसी तरह जैसे आत्महत्या कर ली
बहुत से नौजवानों ने
अर्थव्यवस्था के पातालगगामी होने से
भगवान की दुष्कृपा के चलते
मर गए बीमारी से बहुत से लोग
गरीबी में इलाज न करवा पाने से
एम्स जैसे अस्पतालों के
अभी तक बिक न पाने के चलते
अपनी ही सरहदों में
धोखे से मारे गए बहुत से जवान
महामहिम के मन की बात को
बहुतों के राष्ट्रीय सुरक्षा की बात न मानने के चलते
फैलेगी जब नाफरमानी की ऐसी अराजकता
पड़ेगी खतरे में राष्ट्रीय सुरक्षा
खुला छोड़ना पड़ेगा
गर्भवती का पेट फाड़कर
भाले की नोक पर भ्रूण का परचम लहराने वाले
बाबू बजरंगियों को
धर्म की सुरक्षा के चलते
और बंद करना पड़ेगा जेलों में
वरवर राव जैसे कवियों और कफील जैसे डॉक्टरों को
राष्ट्रीय एकता और अखंडता की कविताओं से
राष्ट्र की सुरक्षा के चलते
(ईमि: 02.09.2020)

Tuesday, September 1, 2020

फुटनोट 242 (मन की बात)

 मैं तो मन की बात सुनता नहीं हूं लेकिन 130 करोड़ लोगों का प्रतिनिधित्व करने वाले महामहिम के मन की बात की महिमा जानने के लिए सुनना जरूरी नहीं है। लेकिन उनके मन की बात न सुनने के पीछे मेरी जन्मजात अनुशासनहीनता है, महामहिम के मन की बात की महिमा की कमी या मन में महामहिम के प्रति कोई असम्मान नहीं। फेसबुक पर कुछ देशद्रोही किस्म के लोगों ने महामहिम के मन की बात की 5 लाख लोगों द्वारा नापसंदगी शेयर किया है, वह भी महामहिम द्वारा भगवान राम के मंदिर के लिए चांदी के ईंटों के साथ भूमिपूजन के पुण्य काम के चंद ही दिनों बाद! इतनी असहिष्णुता? अब तहां है कलबुर्गी और गौरीलंकेश के बध पर मोमबत्ती जलाने वाला अहसहिष्णुता गैंग? आजादी गैंग और चुकड़े चुकड़े गैंग की भी जुबान अब बंद है। वैसे 130 करोड़ के सामने 5 लाख की क्या बिसात, सबके खिलाफ यूएपीए में गैरजमानती वारंट जारी हो सकता था, लेकिन महामहिम ऐसी सहिष्णु संस्कृति की नुमाइंदगी करते हैं जिसमें विरोधी का भी आतिथ्य किया जाता है। मानवाधिकार के नाम पर देशद्रोह को अंजाम देने वाले कवियों, प्रोफेसरों, वकीलों और बुद्धिजीवियों को भी जीने का अधिकार दिया जाता है, जेल में ही सही। इरान होता तो कब के मार दिए गए होते ये लोग। इतनी असहिष्णुता कि महामहिम के मन की बात को डिस्लाइक करने वाले इतने लोग? कम्युनिस्टों का शासन होता तो इन्हें कब का मीर दिया गया होता। भगवान ने दुनिया से इन्हें विदा कर दिया लेकिन केरल में अभी भी बचे हैं। देश संकट में है, महामहिम इससे निकालने के लिए दिन रात एक कर रहे हैं, मोरों को दाना चुगा रहे हैं, बतखों का तस्वीरें खींच रहे हैं, कबूतर उड़ा रहे हैं। लेकिन इन कृतघ्न देशद्रोहियों को महामहिम का पक्षीप्रेम नहीं दिखता, उनके मन की बात डिसलाइक करने की धक्कमपेल लगाए हुए हैं। महामहिम की जनतंत्र में अटूट आस्था का ही मामला है कि खुद के मन की बात का असम्मान करने वाले जयचंदों को बर्दाश्त कर रहे हैं। महामहिम की महानता ही है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट कफील जैसे डॉक्टरों को रिहा करने की जुर्रत कर सकता है और जजों का लोया भी नहीं होता। देश संकट में है, चीन सीमा में घुसा आ रहा है, पाकिस्तान आतंकी घुसपैठ करा रहा है। बंगलादेशी घुसपैठिए देश को खोखला कर रहे हैं। इस संकट की घड़ी में महामहिम के मन की बात का महिमामंडन की बजाय ये पातकी महामहिम के मन की बात डिस्लाइक करके दुश्मनों के हाथ मजबूत कर रहे हैं। मेरा इनके कुकृत्य से इतना दुखी है कि और लिखना मुश्किल हो रहा है। अयोध्या के भावी मंदिर में भविष्य में बिराजने वाले भगवान राम से यही प्रर्थना है कि इन कृतघ्नों को सद्बुद्धि दें कि वे देश पर आसन्न संकट को समझें तथा राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए महामहिम के मन की बात का महिमामंडन करें।

Monday, August 31, 2020

गांधी होते होते क्या हो गए

पेंसन

 Markandey Pandey इन देशों में ये सुविधाएं जनसंघर्षों से हासिल की गयी हैं, जैसा पारितोष जी ने बताया लोगों से सोसल सेक्योरिटी टैक्स लिया जाता है, जिस संचित कोष का इस्तेमाल सामाजिक सुरक्षा -- वृद्धावस्था पेंसन, बेरोजगारी भत्ता, कमआयु की अविवाहित लड़कियों के बच्चों की देखभाल -- आदि मदों में किया जाता है। उसी ढर्रे पर राजीव गांधी के शासन में (शायद) यहां इंदिरा गांधी वृद्धावस्था पेंसन योजना शुरू की गयी, अभी का पता नहीं लेकिन पहले कुछ 300 या 500 रुपए मिलते थे वह भी 'वृद्धावस्था' के प्रमाणपत्र के बाद। अब तो सेना को छोड़कर हर विभाग में 2004 (अटल जी के शासन में) से सेना को छोड़कर सबकी पें,न खत्म कर दी गयी लेकिन पुरानी पेंसन योजना में भी पेसन कोष कर्मचारी की भविष्यनिधि से नौकरी की अवधि में काटा गया संचित कोष ही होता था। पहले रिटायरमेंट के बाद ज्यादातर लोग कम जीते थे तो सरकार का फायदा होता था लेकिन अब ज्यादा जीने लगे तो पेंसन बंद कर दिया।

Saturday, August 29, 2020

मार्क्सवाद 227 (चुनावी वाम एकता)

 राजनैतिक शिक्षा और जनांदोलनों के माध्यम से अपना जनबल तैयार करने की बजाय पिछले 55 सालों से कम्युनिस्ट पार्टियां इस या उस शासकवर्ग की पार्टी का पुछल्ला बनकर अपना क्षरण करती जा रही हैं। आज तीनों पार्बिटियों का संसदीय आधार 1964 में सीपीआई की संसदीय शक्हाति का 10% भी नहीं रह गया है। में महागठबंधन में शामिल होने की बजाय क्रांतिकारी उन्हें एक मजबूत वाम विकल्प तैयार करना चाहिए। वक्त की जरूरत है तीनों संसदीय पार्टियां आपसी गठबंधन से एक ताकतवर ब्लॉक बनाएं तथा एक ताकतवर स्थिति से फासीवाद-विरोधी दलों से सीटों का चुनावी समझौता करें तथा जनांदोलनों की रणनीति की छोटी कम्युनिस्ट पार्टियां चुनाव में इस ब्लॉक का समर्थन करें। मेरी राय में राममनोहर लोहिया-दीनदयाल उपाध्याय के कांग्रेस विरोधी समझौते के तहत 1967 में कम्युनिस्ट और सोसलिस्ट पार्टियों का भारतीय जनसंघ के साथ संविद प्रयोग भयानक भूल थी जिससे आरएसएस की सांप्रदायिक राजनीति के सामाजिक समवीकार्यता की प्रक्रिया की शुरुआत हुई। बिहार आंदोलन में जेपी द्वारा आरएसएस को अपना प्रमुख सहयोगी बनाने, प्रगतिशील छवि बनाने के लिए इंदिरा गांधी द्वारा आपातकाल में उसे प्रमुखता से निशाना बनाना तथा 1977 में जनता सरकार के प्रयोग में उसकी अहमियत से आरएसएस की सांप्रदायिकता पर सामाजिक स्वीकार्यता की मुहर लग गयी। मेरे ख्याल से बिहार चुनाव में तानों पार्टियों को मजबूत गठबंठन बनाकर जनता के प्रमुख समस्याओं के चुनावी मुद्दों पर लड़ना चाहिए। चुनाव के बाद जरूरत पड़ने पर महागठबंधन का सरकार बनाने में समर्थन करना चाहिए। अस्मिता की राजनीति ने बिहार के क्रांतिकारी आंदोलनों को बहुत क्षति पहुंचाया है।

फुटनोट 241 (सीएजी)

 सरकार राज्यपाल की ही तरह सीएजी की नियुक्ति भी स्वामिभक्ति के आधार पर करती है लेकिन उसमें कुछ संविधान के प्रति निष्टावान निकल जाते हैं और कुछ सरकार के अंतिम दिनों में परिवर्तन की हवा देखकर आगामी संभावित सरकार के हाथों बिक कर संभावना को घटना में बदलने में मददगार होते हैं। जैसे मनमोहन सरकार के अंतिम दिनों में सीएजी ने 2 जी स्पेक्ट्रम के आबंटन में सैकड़ों करोड़ के घाटे की रिपोर्ट दी थी जो सरकार गिरने के बाद अदालत में बेबुनियाद पायी गयी। नव चयनित सीएजी, मुर्मू शायद वही है जिसे मनोज सिन्हा के पहले जम्मू-कश्मीर का राज्यपाल बनाया गया था। सीएजी के रूप में " अच्छा " काम किया तो सेवानिवृत्ति के बाद मनमोहन सरकार पर कोर्ट द्वारा निरस्त कर दिए गए भ्रष्टाचार के आरोप लगाने वाले तत्कालीन सीएजी विनोद राय की तरह फायदे के पद पर नियुक्ति हो जाएगी। यूपीएससी की तैयारी करते समय सभी उम्मीदवार देश की सेवा करने के शगूफे छोड़ते हैं, चयनित होने के बाद ज्यादातर अपनी और अपने राजनैतिक आकाओं की सेवा करते हैं। ऐसे अभागे अधिकारी आजीवन ईमानदारी की ताकत की अनुभूति से वंचित रह जाते हैं।

सिर उठाकर चलना नतमस्तक समाज में

 सिर उठाकर चलना नतमस्तक समाज में

हिम्मत का काम है

हर्फ-ए-सदाकत लिखना नटों-भांटों के राज में
हिम्मत का काम है
भूल गए हों जब सच बोलना सारे दानिशमंद
बुलंद करना है हमें नारा-ए-बगावत