Thursday, March 1, 2018

लल्ला पुराण 194 (गांधी के बहाने)

आपने वाजिब सवाल पूछा है कि जब जब भी आंदोलन क्रांतिकारी मोड़ पर पहुंचा, गांधी ने वापस ले लिया। इस पर 1987 में एक लेख लिखा था, दुर्गा भाभी के इंटरविव के साथ, उनकी इस बात के संदर्भ में कि गांधी एक बनिया थे, सभी फैसले जोख कर करते थे। खोजकर टाइप कराकर शॉफ्ट कॉपी सेव करूंगा। गांधी अपने समय की सामाजिक चेतना के साथ थे, भगत सिंह आगे। गांधी के पीछे जनता थी, भगत सिंह के साथ क्रांति के विचार। जो भी समय से आगे होता है वह उस समय अल्पमत में होता है लेकिन भविष्य का नायक बनता है। जब सुकरात पर मुकदमा चल रहा था तो बाहर जनता उनकी मौत के नारे लगा रही थी, 1600 में पादरियों के हुक्म से रोम में चौराहे पर जब वैज्ञानिक ब्रूनो को जिंदा जलाया जा रहा था, जनता गद गद हो तमाशा देख रही थी। धर्म संवेदनशीलता को बर्बर और क्रूर बनाता है, हत्या को बध कह कर उत्सव मनाता है। गैलीलियो को भी सार्वजनिक तौर पर गिलेटिन पर चढ़ाया गया था। पादरियों की रूसो को मारने की सुपाड़ी से आखिरी दिनों में भगोड़ा बना दिया था, मार्क्स को 3 देशों से भागना पड़ा था, चौथे परदेश में जिंदगी बिताया। आज इस चुंगी पर भगवान के बारे में कुछ कह देने पर लोग गालियों (शाब्दिक अर्थों में ही नहीं) की खंजर खींचकर खून के प्यासे हो जाते हैं, भगत सिंह तो भगवान की अवधारणा की चीड़-फाड़ के साथ लिख कर बताते हैं कि वे नास्तिक क्यों थे? बुतपरस्त समाज आज उन्हें माला भले पहनाए, अगर चुंगी पर होते तो भक्त उनकी मुझसे भी बुरी गत करते। होली पर भी उनके कमेंट्स में मन का कलुष झलक रहा है।

बुरा न मानो होली है।

लल्ला पुराण 193 (वामा-कौमी)

वामी-कौमी से मैं आहत नहीं होता, अफवाहजन्य इतिहासबोध वाले बच्चों की समझ और सामाजिक चेतना के स्तर को लेकर चिंतित होता हूं। अब यह इडियम बन गया है। पहले कोल्हू के बैल का मुहावरा था, अब कोल्हू और बैल ही नहीं हैं। वैसे मार्क्स के भूत से पीड़ित भक्त पढ़ता [मैंने दो लेख पोस्ट किया था, 'सीपीयम में घमासान' (समयांतर, फरवरी, 2018) और 'कम्युनिस्ट तथा जाति' (समयांतर मई, 2016) किया था] तो समझता कि जिनको वे वामी-कौमी की गालियां दे रहे हैं, हम उन्हें वामी-कौमी मानते ही नहीं और वे हमें अराजक या उग्रवामी कहते हैं। हाय अल्ला पांडौ में पांड़ा। वामियों के बारे में कहा जा सकता है, 'हा अल्ला लालौ में लाल'। जैसा ऊपर मैंने कहा मुहावरे, कहावतें, उपमाएं ससंदर्भ निर्मित समाप्त होती हैं। फेसबुक पर भक्त उस प्रवृत्ति का मुहावरा है जो एक बार दिमाग में बैठी बातों को टटोलता नहीं बल्कि उन्ही का भजन गाता रहता है। बाभन से इंसान बनना, जन्मप्रदत्त अस्मिता से ऊपर उठकर विवेक से अर्जित अस्मिता निर्माण का मुहावरा है। इस मुहावरे की रचना का श्रेय प्रो. आसयस शर्मा को जाता है, जिन्होने किसी संदर्भ में अपने 'भूमिहार से इंसान' बनने का जिक्र किया। रूपांतर कर प्रचार करने का श्रेय मेरा है। सादर, जिसे लगे वह भी बुरा न माने होली है। हास्य का आननंद वही लेता है जो अपना मजाक बना सकता है। वैसे बचपन में मेरा उपनाम पागल था। ईश नाम रखने वाले दादा जी ने ही यह उपनाम भी दिया था। सादर।

होली 5

होलिऔ में बुढ़वा बौरायल बा
होली के बगावत बतावत बा
होयेले सत्संग दिल खोलि के
छोट-बड़ा का बाड़ा तोड़िके

होली 4

होलिऔ में बुढ़वा बौरायल बा
होली के बगावत बतावत बा
होयेले सत्संग दिल खोलि के
छोट-बड़ा का बाड़ा तोड़िके

होली 3

होलिऔ में बुढ़वा बौरायल बा
होली के बगावत बतावत बा
होयेले सत्संग दिल खोलि के
छोट-बड़ा का बाड़ा तोड़िके

होली 2

चुंगी में एक सनकी बा
नांव त ओकर ईश
केतनौ बड़का भगवनवा आवै
ना. नवाइब शीष
ओकर ई जुर्रत देखा
उप्पर वाले के नकली कहेला
अपुआं के बतावै असली ईश
नाम है पूरा ईश मिसिरा
होलिऔ के गावै इंकिलाबी मिसरा
कहेल ऊल-जलूल गजल
भुलाइ गयल चुंगी हरफ-ए सदाकत
ओकरे जिम्मे बा लिखै के बगावत
चलेल नतमस्तक समाज में सीना तानि के
भरेल एकर बड़ी कीमत
सिर उठाइ क चलै क
छोटकी सजा जानि के

होली 1

चुंगी पे हवे एक अजीबोगरीब नमूना
पकड़े रहेल भगवा लुंगी का कोना
नाम बा ओकर कउनो ठीक-ठाक जायसवाल
पेशे से हवै प्रोफेसर करैल धर्मांधता क बवाल
जोगीरा......