एक पोस्ट पर एक कमेंट पर कमेंट का जवाब
मैं वृद्धावस्था में नहीं, किशोरावस्था (17 साल) में ही नास्तिक हो गया था औग 18-19 साल में भगत सिंह का नास्तिकता पर लेख ने नैतिक समर्थन प्रदान किया तथा उसके एकाध साल बाद भगवान के अस्तित्व पर वोल्नटेयर द्वारा लगाए प्रशनचिन्ह ने बौद्धिक औचित्य। मैं कर्मकांडी पुरोहित नहीं था, न ही पुरोहिती परिवार में पैदा हुआ था, कर्मकांडी ब्राह्मण परिवार में पैदा हुआ पला। मेरा कहने का आशय केवल इतना है कि एक कर्मकांडी परिवेश के बालक की प्रामाणिक नास्तिकता की यात्रा कठिन, आत्मान्वेषी आत्म संघर्ष की यात्रा थी। भगवान के भय का आतंक भीषण था। नास्तिकता की मंजिल पर पहुंच कर भगवान के भय से मुक्ति के आत्मसुख की अनुभूति अद्भुत थी। लोग कहते थे बुढ़ापे में भगवान ही याद आते हैं, अब तो लगभग 72 का हो गया अभी तक तो नहीं बाद आए। यदि व्यक्ति भूत और भगवान के भय से मुक्त हो जाए तो वह निर्भय हो जाता है।

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