एक पोस्ट पर एक कमेंट:
दुनिया की सभी भौगोलिक सीमाएं ऐतिहासिक रूप से खींची गयी नकली सीमाएं हैं। हिंद-पाक की सीमा तो अनैतिहासिक है जो उपनिवेश-विरोधी आंदोलन की विचारधारा के रूप में उभर रहे भारतीय राष्ट्रवाद को खंडित करने के लिए औपनिवेशिक शासकों ने अपने भारतीय एजेंटों के माध्यम से हिंदू और मुस्लिम राष्ट्रवाद के कृत्रिम शगूफे छोड़े, फैलाए और हिंदू-मुस्लिम नाम पर खून खराबे करवाए और पूर्व (बंगाल) और पश्चिम ( पंजाब) में मनमानी लकीरें खींच दी। औपनिवेशिक शासक अपने हिंदू-मुस्लिम दलालों की मदद से भारत राष्ट्र के टुकड़े करने में सफल रहे और बंटवारे का घाव अभी तक नासूर बन टपक रहे हैं। फैज़ के शब्दों में, "खून के धब्बे धुलेंगे, कितनी बरसातों के बाद"। यदि धर्म राष्ट्रवाद का ऐतिहासिक आधार हो सकता तो भाषा के नाम पर पाकिस्तान के दो टुकड़े क्यों होते? मुझे एक बार (बहुत पहले) कहीं एक सिंधी, पाकिस्तानी स्त्री से परिचय हुआ। उसने सवाल किया कि मैं उससे उर्दू की बजाय अंग्रेजी में क्यों बात कर रहा था, मेरे कहने पर कि मुझे उर्दू नहीं आती तो हंसने लगी, बोली कि इतनी अच्छी उर्दू तो बोलता हूं, मेरे यह कहने पर कि यह तो हिंदी है, वह बोली एक ही बात हुई। उसने शिकायत की हिंदुस्तानी मुजाहिरों ने उर्दू थोपकर उनकी भाषा (सिंधी) को दोयम बना दिया।

No comments:
Post a Comment