Sunday, March 24, 2024

मार्क्सवाद 299 (मेरठ केस)

 1920-30 के दशकों में मजदर नेताओं पर चले मेरठ-षड्यंत्र मुकदमें पर Dr. Bhagwan Prasad Sinha की एक ज्ञानवर्धक पोस्ट पर कमेंट:


अंग्रेजों के तत्कालीन दलाल और आज बिना अर्थ जाने राष्ट्रभक्ति की सनद बांटने वाले कम्युनिस्टों पर तमाम ऊलजलूल लांछन लगाते रहते हैं, कम्युनिस्ट पार्टी एक मात्र पार्टी है जिस पर पार्टी के रूप में, औपनिवेशिक शासन द्वारा दो-दो मुकदमे (कानपुर-मेरठ) चलाए गए, जिसके सदस्य, काला पानी समेत लंबे समय तक जेलों की यातनाएं सहे लेकिन टूटकर माफीवीर नहीं बने; एक मात्र पार्टी है जो औपनिवेशिक शासन में प्रतिबंधित रही। जब धर्म के नाम पर बरगलाए गए युवक, औपनिवेसिक आकाओं के आशिर्वाद से आरएसएस की शाखाओं में खुलेआम लट्ठ भांजते थे तब कम्युनिस्ट कार्यकर्ता भूमिगत रहकर मजदूरों को संगठित कर रहे थे। मजदूरों की गजब की अंतरराष्ट्रीयता था, ब्रेडले और स्पार्ट (अंग्रेज कैदीियों ) ने औपनिवेशिक शासन के प्रलोभनों को ठुकराकर अपने हिंदुस्तान साथियों के साथ औपनिवेशिक जेलों के जुल्म को चुना। कानपुर और मेरठ केस के क्रांतिकारियों को सलाम। मजदूरों के अंतरराष्ट्रीय भाईचारे को सलाम।

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