Thursday, April 11, 2013

वियोग की पीड़ा


सुख होगा जितना सघन संयोग का
उतनी ही सघन वियोग की पीड़ा
[ईमि/११.०४.२०११]

Wednesday, April 10, 2013

पहले जैसा कभी कुछ नहीं होता


पहले जैसा कभी कुछ नहीं होता
पार करते हो दुबारा जब नदी एक
वह वही नहीं, होती है दूसरी नदी
कुछ भी साश्वत नहीं है दुनिया में
 परिवर्तन के सिवा
[ईमि/१०.०४.२०१३]

Wednesday, April 3, 2013

बोझ बन जाये जब कोई रिश्ता


बोझ बन जाये जब कोई रिश्ता
किसी को भी सकूँ नहीं मिलता
ढोते रहना उसे लिहाज में
पुराने दिनों की याद में
बोझ की थकान पैदा ही करेगी कटुता
कैसी भी क्यों न हो वाक्पटुता
[ईमि/०४.०४.२०१३]


कोई दोस्त इतना अजीज



 जब करते हैं बेचैन कुछ शब्द
हो जाता हूँ बिलकुल निःशब्द
खोजूं कैसे इन आँखों में वासना की लहर
दिखती जो तकलीफ का उमडता हुआ समंदर
इन आँखों मे है जो उत्साह
दर्शाता दुनिया बदलने की चाह 
करने को तारीफ़ इन उत्साह भरी आँखों की
दिखती जो अलग भीड़ में लाखों की
रोक नहीं सकता जिन्हें कोई महाकाल
पड़ जाता  है शब्दों का भीषण अकाल
करने को वर्णन यह बुलंद इरादों की मुस्कान
अन्वेषण में शब्दों के लग जाती थकान
चेहरे पर झलकते जज्बात और ताजगी के भाव
दर्शाते हैं पक्के इरादे और प्यार भरा स्वभाव
दोस्ती का होता मन पार कर उम्र की दहलीज
मिल जाए गर कोई दोस्त इतना अजीज
[ईमि/0३.०४.२०१३]

Tuesday, April 2, 2013

रकीब





जो दोस्त है अपना इतना करीब
कैसे बन सकता है मेरा रकीब?
कहा निभाया है उसने फ़र्ज़-ए-दोस्ती
फ्रायड की हवाओं से बचाया महबूब की हस्ती
मगर यह दोस्त है कुछ इतना अजीज़
और माशूक भी है तो अमूल्य पर नहीं कोई चीज
फिर सोचता हूँ इश्क का होता नहीं कोई स्थायी अनुबंध
है यह थोडी दूर की सहयात्रा का पारस्परिक प्रबंध
नहीं है मुहब्बत सनद किसी साश्वत बंदगी की   
महबूब भी है एक हमसफ़र सफर-ए-ज़िंदगी की
चलते हैं कुछ दूर साथ और बिछड जाते हैं
हुआ अगर संयोग तो फिर कभी मिल पाते हैं
रह जाती हैं सहयात्रा की कुछ यादें साथ
उन अंतरंग क्षणों की मोहक याद
हर वियोग देता है अवसाद अजीब
कितना भी अज़ीज़ क्यों न हो रकीब
विवेक को दीजिए तरजीह जज्बात पर
होने न पाए दिल का संवेग हावी दिमाग पर
वैसे भी नहीं है प्यार कोई कुदरती इबादत
यह तो है दो दिलों के पारस्परिक मेल की आदत
महबूब हो किसी को कितना भी अज़ीज़
दिमागदार इंसान है नहीं किसी की चीज़
अधिकार है उसका ही अपने व्यक्तित्व पर
उठा नहीं सकते उंगली उसके स्वतन्त्र अस्तित्व पर  
कर लो वियोग में महबूब से दोस्ती
बनी रहेगी पारस्परिक जज्बातों की हस्ती
[ईमि/०२.०४.२०१३]

Monday, April 1, 2013

क्या राज है इस अर्थपूर्ण मुस्कान का


क्या राज है इस अर्थपूर्ण मुस्कान का?

दर्शाती है इरादे किसी ऊंची उड़ान का
भय दिखता नहीं किसी भी आंधी-तूफ़ान का 
अनुकृति है यह जैसे अद्भुत स्वाभिमान का 
नापेगी जब अंतरिक्ष की दूरी 
सीमा आसमान की दिखेगी बेचारी
है चेहरे पर कामयावी का विशवास 
सुनेगी नहीं अब यह किसी की बकवास
इरादे हैं बुलंद होगा परिपूर्ण इसका अभियान
मिट जायेंगे बिघ्न-बाधाओं के नाम-ओ-निशान
[ईमि/०१.०४.२०१३]

तफरीह और प्यार


तुमने तफरीह में कह दिया कि
 प्यार है तुम्हे मुझसे
 मै भी इसे मज़ाक ही समझता रहा
इन्द्रियों ने जब तक गवाही न दी
अब मानने को मन नहीं करता
कि खुशफहमी थी वह मेरी
यह मान सकता हूँ
कि अब तुम्हे मुझसे प्यार नहीं है 
हो सकता है तुम्हे कभी ना रहा हो
होशो-हवास में रहने को जी नहीं करता
करता हूँ सफर जब ख्यालों की दुनिया की
नशे में कुछ का कुछ कर  जाता हूँ
और खुद को ही खोता जाता हूँ
बार बार चढता उतरता हूँ
लगता शिशिफस नहीं तो क्या हूँ
जंगल तो मेरी नियति है
लेकिन वह मुझे चुने
 उससे बेहतर उसका मुझसे चुना जाना है
कहता हूँ अलविदा इस दुआ के साथ
सर पर रहे तुम्हारे कामयाबी का हाथ
रोशन हो तुमारी दुनिया यह है शुभकामना
अपन का तो अंधेरे रास्तों से होता ही रहता है सामना 
[ईमि/०१.०४.२०१३]