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गुलामी बल पूर्वक लादी गयी है इसलिए बलपूर्वक उसे उखाड़ फेंकना न केवल लाजिमी है, बल्कि वांछनीय भी।
रूसो अपनी कालजयी कृति , ' Social Contract (सामाजिक अनुबंध)' की शुरुआत इन पंक्तियों के साथ करता है, 'मनुष्य पैदा स्वतंत्र होता है और हर तरफ बेड़ियों में जकड़ा है'। ये बेड़िया धार्मिक, सामाजिक, आर्थिक और कानूनी होती हैं। पैदा होते ही उस पर हिंदू-मुसलमान; बाभन-अहिर; गरीब अमीर; अभिजन-आमजन;.......... की तख्तियां चस्पा हो जाती हैं। इसी लिए वह एक ऐसा राज्य बनाना चाहता है जिसमें लोग पहले की तरह ( प्राकृतिक अवस्था जैसे) स्वतंत्र हो सकें।
पहले जैसी स्वतंत्रता के लिए वह एक अनुबंध की अनुशंसा करता है जो सार्वजनिक हित में कानूनों का जनादेश (General Will) निर्मित जिसके अनुसार आचरण सभी नागरिकों का अनिवार्य कर्तव्य होगा। 'किसी को भी जनादेश के उल्लंघन की अवुमति नहीं होगी, दूसरे शब्दों में हर किसी को स्वतंत्र होने के लिए बाध्य किया जाएगा'। गुलामी अधिकार नहीं हो सकता। 'स्वतंत्र होने की बाध्यता', दर असल सार्वजनिक हित में स्वयं के बनाए नियमों की बाध्यता, बाध्यता नहीं, स्वतंत्रता ही है।

जनरल विल का अनुवाद आमतौर पर सामान्य इच्छा ही किया गया है लेकिन वह मुझे शाब्दिक अनुवाद अधिक लगता है। जनरल विल के निर्धारण की प्रक्रिया के बारे में रूसो स्पष्ट नहीं है और वह आधुनिक औद्योगिक समाज की जटिलताओं की बजाय पूर्व आधुनिक सरल समाज की बात करता है जहां सारी आबादी एक साथ बैठकर सार्वजनिक मसलों पर नियम बना सके। इसीलिए रूसो के विचारों को रुमानी कहा गया है। वह व्यापक विचार- विमर्श से सर्वसम्म्ति की बात करता है लेकिन सर्वसम्मति न होने पर बहुमत ही रास्ता है। यह जनादेश स्थाई नहीं होती लोगों की अगली बैठक इसे पलट सकती है। तमाम अस्पष्टताओं और तार्किक विसंगतियों के बावजूद रूसो की नीयत उन्हें महान बनाती है, वे पहले दार्शनिक हैं जो शासक और शासित के फर्क को खत्म कर आमजन को मुख्यधारा में लाते हैं और अभिजनों के हित साधने वाले संविधानों की जिल्द पर "We the people" को स्थापित कर देते हैं। मैंने कभी संक्षेप में नोट लिखा था, जिसका लिंक यहां दे रहा हूं, यदि समय मिला तो एक पाठ्य पुस्तक के लिए इसे विस्तारित करूंगा।
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