मैं पहली बार स्टीमर (पानी का जहाज ) में विंध्याचल जाने के लिए मिर्जापुर में गंगा पार करने के लिए बैठा। 1960 के आस-पास की बात होगी। उसके पहले, सुने थे कि हमारे गांव और आसपास के गांवों से लोग जौनपुर-भदोही होते हुए बैलगाड़ी से गंगा तट पहुंचते थे और नाव से गंगा पार कर विंध्याचल जाते थे। मैं 5 साल से ज्यादा उम्र का था यह बात निश्चितता से इसलिए कह सकता हूं कि मेरे सिर पर बड़े बाल नहीं थे और पांचवे साल में मेरी मुंडन हो चुकी थी। उस समय रेल से विंध्याचल जाने के दो रास्ते थे, बिलवाई/शाहगंज से मुगलसराय जाकर और वहां से गाड़ी बदलकर विंध्याचल जाना और दूसरा बिलवाई/शाहगंज से मुगलसराय की गाड़ी से जाकर बनारस में उतर जाना और वहां से इलाहाबाद (रामबाग) की छोटी लाइन (अब बड़ी लाइन हो गयी है) से माधो सिंह उतर कर नाव से गंगा पार कर मिर्जापुर/विंध्याचल जाना। यह बात मैं स्थितिजन्य आकलन से कह रहा हूं। अब उस यात्रा की और बाते तो हमें याद नहीं हैं लेकिन माधो सिंह स्टेसन याद है क्योंकि वहां मैं खो गया था और स्टीमर (पानी का जहाज) याद है। स्टीमर को मुझे जहाज कहते सुन किसी ने समझाया कि जहाज उससे 100 गुना बड़ा होता है। 2019 में कार से विंध्याचल से लौटते समय माधो सिंह स्टेसन देखने का मन हुआ । ब्रिटिशकालीन वह स्टेसन जस-का-तस बना हुआ है जाैसा कि हमने उसे बचपन में देखा था। वहां मेरी मां (माई) और दादी (अइया) समेत गांव के बहुत से स्त्री-पुरुष तथा बच्चों का मेला था। पैलेंजर से बनारस जाकर माधो सिंह आए होंगे। स्टेसन पर मैं मेले में से निकल कर घूमने चला गया तथा खीरा खाते हुए गांव के मेले में पहुंचा तो पता चला कि लोगों ने समझा कि मैं खो गया। खैर यह बात फिर कभी। उसके कई साल बाद मैं जब हाई स्कूल में जौनपुर पढ़ता था तो कभी कभी बनारस घूमने चला जाता था। उस समय अस्सी और रामनगर के बीच स्टीमर चलता था, मैं कई बार स्टीमर में चढ़ने के लिए अस्सी से रामनगर चला जाता था। अंडमान में जब वाकई जहाज देखा तब बचपन की बात याद आई कि जहाज स्टीमर सो 100 गुना बड़ा होता है, वास्तव में उससे भी बहुत बड़ा।
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