एक पोस्ट पर कमेंट :
1983 में मुझे अटारी में समझौता एक्सप्रेस में सहायक गार्ड की नौकरी करने वाला एक मेरा हमउम्र पाकिस्तानी मिला, जियाउल हक का जमाना था, पाकिस्तान में शराब पर पाबंदी थी उसे समझौता एकप्रेस की ड्यूटी इसलिए ज्यादा पसंद थी कि वह अमृतसर जाकर खुलेआम बीयर पी सकता था। उसके दादा आजमगढ़ के थे और रेलवे में नौकरी करते थे, बंटवारे के समय उनकी पोस्टिंग लाहौर में थी और वे वहीं रह गए। वह खुद को आजमगढ़ का समझता था मुझसे मिलकर वह इतना गद गद हुआ जैसे वह अपने गांव-देश के किसी से मिला हो, वह कभी आजमगढ़ गया नहीं लेकिन अपने दादा-परदादा के घर और बाग का ऐसा सजीव चित्रण करता था जैसे कि उसका बचपन वहीं बीता हो।

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