Tuesday, March 17, 2026

बेतरतीब 186(तीरे के खेत)

 नदी के किनारे एक बगीचा है।हमारे बचपन में थोड़ा ऊंचाई पर 7-8 बड़े इमली के पेड़ थे और कोने में एक विशाल जामुन, थोड़ा नीचे महुआ, जामुन, आम और ढाख के पेड़ थे नीचे कोने में नदी के किनारे एक बंसवार। आम, जाम जामुन,महुआ, ढाख के पेड़ भूतपूर्व हो गए लेकिन इमली के पेड़ अभी भी जस-के तस हैं और घनी बंसवार में कुछ बांस अभी भी बचे हैं। अबकी घर गया तो एक सुबह तीरे के खेत (घर से पूरब , नदी के किनारे) देखने का मन हुआ, जो कई दशक परती रहने के बाद नदी उस पार के गांव कादीपुर (लोनियाना) का एक व्यक्ति इस शर्त पर बुआई को राजी हुआ कि पहली साल वह कुछ नहीं देगा उसके बाद से बंटाईदारी करेगा। गेंहू और सरसों की फसल बहुत अच्छी तैयार है। हमारे लड़कपन में इन खेतो में जब भी गन्ना बोया जाता तो अगले तीन-चार सालों बिन बोए उपज देता. कटने के बाद पेड़ा के रूप में उगकर। कुछ साल मूंगफली की खेती हुई थी। लोनियाने के ही किसी ने अधिया पर बोया था, मूंगफली की रखवाली कठिन काम था। शाही का बहुत डर होता था। उसके बाद कभी शाही नहीं देखा, शाही चलता तो कांटे छम छम बोलते आदमियों की आहट पर कांटे खड़े कर लेता अन्यथा पीठ प चिपकाए रखता। खैर तीरे के खेत देखने के रास्ते में बगैचा में से गया सोचा कोई दिखता तो इमलियों के बीच फोटो खिंचवाता, लेकिन सेल्फी एक ही पेड़ के साथ ले पाया, वह भी ऐसा कि पता ही ही नहीं चल रहा है कि किस चीज का पेड़ है. इस बगैचे के दक्षिण वन विभाग की जमीन में एक बड़ा मंदिर परिसर बन गया है जो सौ साल से अधिक समय में हमारे गांव की सबसे उल्लेखनीय परिघटना है। मंदिर निर्माण की कहानी फिर कभी।

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