बुद्ध के समय तक वर्ण व्यवस्था प्रचलित थी, अनुगत्तरानिकाय और दीर्घ निकाय में बुद्ध एक ब्राह्मण श्रोता से ब्रह्मा के विभिन्न अंगों से मनुष्यों की उत्पत्ति और ब्राह्मणीय क्षेष्ठता का परिहास करते हैं। कौटिल्य के अर्थ शास्त्र में राजधर्म प्रजा का रक्षण-पालन और योगक्षेम सुनिश्चित करना है। रक्षण में धर्म यानि वर्णाश्रमं धर्म का रक्षण भी है। वर्णाश्रम की प्रमुखता भले न रही हो लेकिन व्यवस्था के रूप में वर्णाश्रम के अस्तित्व से इंकार नहीं किया जा सकता। अशोक के बौद्ध होने के बाद बौद्ध धर्म को राजकीय संरक्षण प्राप्त हुआ। मुझे लगता है कि पुष्यमित्र शुंग द्वारा मौर्यशासन के अंत के बाद बौद्ध संस्कृति के विरुद्ध ब्राह्मणवादी प्रतिक्रांति शुरू हुई और प्रतिक्रांति के बौद्धिक औचित्य के लिए पुराण लिखे गए तथा पुराणकाल में इतिहास का मिथकीकरण शुरू हुआ और वर्णाश्रम को संस्थागत बनाने की बुनियाद पड़ी।
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