Friday, January 2, 2026

बेतरतीब 184 (अहरा)

  अहरा


Pradeep Saurabh की बैगन के भुर्ते के वर्णन पर मुझे अहरा पर बनने वाले भोजन की याद आ गयी। अहरा उपले(कंडे) का अस्थाई चूल्हा होता था, जिसे पहले लोग अक्सर यात्रा में बनाते थे। पूर्वी उप्र में सड़क निर्माण के कार्य में जुटे मजदूर अहरा लगाते दिख जाते थे। मुझे अहरे पर बने भोजन की बचपन की पहली याद अपने मुंडन की है। मेरी मुंडन उम्र के पांचवे साल में हुई थी। बाबू जी (पिताजी) और अइया (दादी) के साथ मुंडन के बाद भैरो बाबा (कप्तीानगंज-महराजगंज के पास) से लौट रहा था। मेरे गांव से भैरो बाबा की दूरी कम-से-कम 40 किमी होगी। वापसी में किसी गांव में किसी किसान की नई सार (गाय-भैंस-बैलों का घर बनी थी), उस गांव में पिताजी के परिचित कुछ लोग थे, उनकी मदद से उन्होंने मिट्टी के बर्तन और कंडों का इंतजाम किया था। उक्त पोस्ट पर यह कमेंट लिखा गया था।

हमारे बचपन में यात्रा में लोग अहरा लगाते थे और बैगन का चोखा अहरे के भोजन का अनिवार्य हिस्सा होता था। मेरे बाबा बाग/ खेत/ट्यूबवेल की अपनी कुटी पर ही रहते थे, दोपहर और शाम को भोजन के लिए घर आते थे। वैसे खेत से घर की दूरी ज्यादा नहीं है, 700-800 मीटर ही होगी। कभी कभी उनका मन रात को खाना खाने घर आने का नहीं होता तो बाग में ही अहरा लगाते।

गांवों में अहरा लगाने का शिल्प,पता नहीं, अब भी बचा है या नहीं। अहरा कंडे (उपले) का अस्थाई, पिरामिडाकार चूल्हा होता है। जिसके ऊपर दाल-भात की मिट्टी की हंड़िया रखी जाती है। दाल पकने में ज्यादा समय लगता है इसलिए सीधे आंच पर दाल की हंडिया रखी जाती थी उसके ऊपर चावल की जिसके ऊपर मिट्टी का ढक्कन। सीधी आंच से दाल पकती है और उसकी भाप से चावल पकता है। अहरे की आग में आलू और बैगन तथा यदि खेत में हुआ तो टमाटर डाल दिया जाता है, जो दाल-चावल पकने तक भुन जाते हैं। यदि आंटा गूथने की सुविधा हुई तो उसकी भौरी भी आग में डाल दी जाती थी जो भी दाल चावल पकने तक पक जाती थी। भुना हुआ आलू-बैगन का भरता बनाकर उनमें बारीक कटी हरी मिर्च और नमक मिला दिया जाता था और दाल-भात; चोखा भौरी (लिट्टी) की दावत तैयार। जब भी बाबा बाग में अहरा लगाते तो मेरी पत्नी और भाभी (पौत्र बधुओं) को भी आमंत्रित करते जिनकी बाग-खेत में पिकनिक हो जाती। मेरी पत्नी (सरोज जी) आज भी नॉस्टेल्जिया कर उन पिकनिकों और अहरे पर पके दावत की याद करती है।

No comments:

Post a Comment