मित्र Vivek Mishra अपने पिताजी ( कालजयी साहित्यकार, प्रो. राम दरश मिश्र) के प्राइमरी स्कूल की तस्वीर शेयर किया उस पर कमेंट में मुझे अपना प्राइमरी स्कूल याद आ गया।
हमारे गांव के प्राइमरी स्कूल में भी एक बड़े कच्चे खपड़ैल कमरे के चारों तरफ बरामदे थे, सामने का बरामदा बरामदा ही था बगल और पीछे के 3 बरामदे मिट्टी की दीवारों से घेर कर कमरे बना दिए गए थे जो कि क्लास रूम थे। तीन कमरों में पढ़ने वाले गदहिया गोल को मिलाकर 6 कक्षाओं के विद्यार्थी होते थे और पढ़ाने वाले 3 शिक्षक। एक कमरे में सबसे जूनियर शिक्षक गदहिया गोल और कक्षा 1 को पढ़ाते थे और दूसरे में उनसे सीनियर शिक्षक कक्षा 2 और 3 को तथा तीसरे में हेडमास्टर कक्षा 4 और 5 को। मैं गदहिया गोल से 1 में और 4 से 5 में कूद-फांद के चलते 4 ही साल उस स्कूल में पढ़ा और 2 ही शिक्षकों से। जब मैं कक्षा 4 में पहुंचा तो तबके हेड मास्टर रिटार हो गए और उनसे जूनियर शिक्षक जिन्हों ने हमें कक्षा 2 और 3 में पढ़ाया था वे हेड मास्टर बन गए और 4 तथा 5 को पढ़ाने लगे। यानि 4 सालों में 3 साल एक ही शिक्षक से पढ़ना पड़ा था।
