Monday, March 23, 2026

बेतरतीब 187(अटारी)

 एक पोस्ट पर कमेंट :


1983 में मुझे अटारी में समझौता एक्सप्रेस में सहायक गार्ड की नौकरी करने वाला एक मेरा हमउम्र पाकिस्तानी मिला, जियाउल हक का जमाना था, पाकिस्तान में शराब पर पाबंदी थी उसे समझौता एकप्रेस की ड्यूटी इसलिए ज्यादा पसंद थी कि वह अमृतसर जाकर खुलेआम बीयर पी सकता था। उसके दादा आजमगढ़ के थे और रेलवे में नौकरी करते थे, बंटवारे के समय उनकी पोस्टिंग लाहौर में थी और वे वहीं रह गए। वह खुद को आजमगढ़ का समझता था मुझसे मिलकर वह इतना गद गद हुआ जैसे वह अपने गांव-देश के किसी से मिला हो, वह कभी आजमगढ़ गया नहीं लेकिन अपने दादा-परदादा के घर और बाग का ऐसा सजीव चित्रण करता था जैसे कि उसका बचपन वहीं बीता हो।

महामानव

 महाबली ने कहा, हमारे नॉनबायलोडिकल महामानव की नकेल उसके हाथ में है, महामानव उसके सामने नतमस्तक हो गए, शायद उसके पास एप्स्टीन फाइल की गुप्त जानकारियां हों, यदि मामला हरदीप पुरी तक सीमित होता तो महामानव ने उनसे छुटकारा पा लिया होता। पुरी इस अंदाज में अकड़ रहा है कि हम यदि डूबे सनम तो आपको भी ले डूबेंगे। महामानव महाबली के दर्शन को तो आतुर रहते ही हैं, तेलअवीव की तीर्थयात्रा में छोटे महाबली, इज्रायली नाजी नेता के भी दर्शन करके सनद ले आए। जब महाबली और छोटे महाबलियो ने बौराकर इरान पर ताबड़तोड़ हमला किया तो महामानव और उनके अंधभक्त सुर-असुर भजन गाने लगे। अब जब इरान ने जवाबी हमले में महाबली और उनके नायब को धूल चटादी तो महामानव ने इरानी राष्ट्रपति से शिकायत किया कि उन्हें अरब राजशाहियों में अमेरिकी अड्डों पर हमला नहीं करना चाहिए था, परमाणु हमले से इरान को तबाह करने वाले इज्रायली नाजियों की धमकी पर महामानव मतमस्तक हैं। महाबली ने कहा ईरान से तेल मत लो. महामानव ने कहा जैसी आज्ञा प्रभु। महाबली ने कहा रूस से तल लोगे तो दंडित करूंगा तो महामान ने कहा जैसी आज्ञा प्रभु। महाबली ने तरस खाकर कुछ समय तक रूस से तेल खरीदने पर छूट दे दी, महामानव कृपा पर गद गद हो गए। रूस ने धमकी दी कि यदि इज्रायल ने ईरान पर परमाणु हमला किया तो वह इज्रायल को नेस्तनाबूद कर देगा, महाबली और उनके नायब युद्ध रोकने का बहाना ढूंढ़ रहे हैं, इरान कह रहा है, फतह या शहादत।


गरीब आदमी गैस का सिलिंडर लेकर उसी तरह लंबी लाइनों में खड़ा टूल्हा जलने के इंतजाम का इंतजार कर रहा है जैसे वह नोटबंदी की सनक की मार से बैंको के आगे लंबी लाइन में खड़ा था। मध्यवर्ग तो अभी तक पेट पर भी लात खाकर भजन गा रहा है, लेकिन शीघ्र ही उसे भी पेट पर भी लात के लाले पड़ने वाले हैं। अयोध्या के रामलला महामानव को सद्बुद्धि दें कि वे देश को प्रलय की आग में झोंकने से बाज आएं।

Tuesday, March 17, 2026

बेतरतीब 186(तीरे के खेत)

 नदी के किनारे एक बगीचा है।हमारे बचपन में थोड़ा ऊंचाई पर 7-8 बड़े इमली के पेड़ थे और कोने में एक विशाल जामुन, थोड़ा नीचे महुआ, जामुन, आम और ढाख के पेड़ थे नीचे कोने में नदी के किनारे एक बंसवार। आम, जाम जामुन,महुआ, ढाख के पेड़ भूतपूर्व हो गए लेकिन इमली के पेड़ अभी भी जस-के तस हैं और घनी बंसवार में कुछ बांस अभी भी बचे हैं। अबकी घर गया तो एक सुबह तीरे के खेत (घर से पूरब , नदी के किनारे) देखने का मन हुआ, जो कई दशक परती रहने के बाद नदी उस पार के गांव कादीपुर (लोनियाना) का एक व्यक्ति इस शर्त पर बुआई को राजी हुआ कि पहली साल वह कुछ नहीं देगा उसके बाद से बंटाईदारी करेगा। गेंहू और सरसों की फसल बहुत अच्छी तैयार है। हमारे लड़कपन में इन खेतो में जब भी गन्ना बोया जाता तो अगले तीन-चार सालों बिन बोए उपज देता. कटने के बाद पेड़ा के रूप में उगकर। कुछ साल मूंगफली की खेती हुई थी। लोनियाने के ही किसी ने अधिया पर बोया था, मूंगफली की रखवाली कठिन काम था। शाही का बहुत डर होता था। उसके बाद कभी शाही नहीं देखा, शाही चलता तो कांटे छम छम बोलते आदमियों की आहट पर कांटे खड़े कर लेता अन्यथा पीठ प चिपकाए रखता। खैर तीरे के खेत देखने के रास्ते में बगैचा में से गया सोचा कोई दिखता तो इमलियों के बीच फोटो खिंचवाता, लेकिन सेल्फी एक ही पेड़ के साथ ले पाया, वह भी ऐसा कि पता ही ही नहीं चल रहा है कि किस चीज का पेड़ है. इस बगैचे के दक्षिण वन विभाग की जमीन में एक बड़ा मंदिर परिसर बन गया है जो सौ साल से अधिक समय में हमारे गांव की सबसे उल्लेखनीय परिघटना है। मंदिर निर्माण की कहानी फिर कभी।

Thursday, March 12, 2026

बेतरतीब 185 (जनेऊ)

 एक पोस्ट पर कमेंटः


जो भी साहित्यिक, ऐतिहासिक, कंवदंतीय साक्ष्य उपलब्ध हैं उनसे कहीं यह नहीं लगता कि कबीर की मृत्यु सिकंदर लोदी के आदेश से हाथी के कुचलने से हुई, यह तो निश्चित है कि कबीर ईश्वर-अल्लाह समेत सभी सत्ताओं को चुनौती देेते रहते थे। बाकी साधु-संतों द्वारा सत्ताओं को चुनौती देने या उनसे असहज सवाल करने की पौराणिक मिसालें ऐतिहासिक नहीं हैं, पुराण किसी विशिष्ट नैतिक मूल्यों को महिमामंडित और स्थापित करने के लिए गढ़े जाते हैं। यह जरूर लगता है कि प्रचीन काल के शासक आज की तुलना में ज्यादा सहिष्णु लगते हैं वरना वेद रचयिताओं की भर्त्सना करके चारवाक जैसे दार्शनिक जिंदा रहे थे। पहले के धार्मिक लोग भी आज से असहिष्णु नहीं थे। मेरे दादा जी पचांग के कट्टर अनुयायी और अबाध, अगाध आस्तिक थे। घर में ठाकुर का भोग लगने के पहले रसोई से किसी को भोजन नहीं मिल सकता था। हमारी दादी (अइया) ने छोटे बच्चों के लिए रसोई के बरामदे के एक कोने में छोटा सा चूल्हा बना रखा था। चुटिया (चुर्की) से मेरे छुटकारा पाने का किसी ने संज्ञान ही नहीं लिया और जनेऊ से मुक्ति पाने पर शुरू मेरे बाबा मंत्र पढ़कर जनेऊ पहना देते थे घर से वापस जाते समय गांव के बाहर निकते ही मैं फिर निकाल देता। जब उन्हें लगा कि उनके प्रयास व्यर्थ जा रहे हैं तो मेरे तर्कों का सम्मान करते हुए प्रयास बंद कर दिए । वैसे उन्हें मेरी नास्तिकता या जनेऊ न पहनना उन्हें पसंद नहीं था लेकिन उसके लिए मुझे न तो कभीन दंडित किया गया न ही अपमानित, वैसे कुछ घटनाओं के चलते उन्होंने पहले ही मेरा नाम पागल रख दिया था, लेकिन मुझे प्यार करना नहीं छोड़ा।

Wednesday, March 11, 2026

शिक्षा और ज्ञान 389 (जाति)

 एक पोस्ट पर कमेंटः


हर जगह की ही तरह भारत में भी कारीगर समुदाय आर्थिक रूप से सामंती जकड़ से मुक्त हो गया था और मार्क्स ने कहा ही है कि अर्थ ही मूल है, तो उसे सामाजिक मुक्ति की सूझी और यूरोप में कारीगरों ने व्यापारियों के साथ मिलकर अपने गिल्ड बनाए और सड़क के चौराहों और बंदरगाहों के इर्द गिर्द कस्बे बसाना शुरू किया, कालांतर में तिजारती पूंजीवाद के विकास में जिसकी महत्वपूर्ण भूमिका थी। भारत में कारीगर जातियां शूद्र कोटि में थीं तो सामाजिक स्वतंत्रता के लिए उन्होंने यह सोच कर कि इस्लाम में भगवान के सामने सब समान हैं, धर्मांतरण कर मुसलमान बन गए, लेकिन वहां भी भगवान के सामने सब समान हैं, आपस में नहीं। जाति है कि जाती ही नहीं वे वहां भी जाति लेकर गए।

Monday, March 9, 2026

शिक्षा और ज्ञान 388(नव मैकार्थीवाद)

एक पोस्ट पर एक कमेंट


दूसरे विश्वयुद्ध के बाद, दुनिया के द्विध्रुवीय ध्रुवीकरण के साथ शीतयुद्ध की शुरुआत हुई और शीतयुद्ध शुरू हो गया अमेरिका में अंधराष्ट्रवादी लामबंदी के लिए सोवियत संध के रूप में एक साझा दुश्मन खोजा गया और एक साझी बुराई के रूप में वामपंथ। जोसेफ मैकार्थी नामक एक दुष्ट, लफ्फाज रिपब्लिकन सेनेटर के सिर पर वामपंथ का भूत सवार हुआ जिसके असर में अमेरिका और हिंदुस्तान समेत तमाम अन्य देशों के वास्तविक और छद्म 8क्षिणपंथी आज भी अभुआते रहते हैं, वैसा ही जैसा कि हिंदुत्व फासीवादियों के सिर पर पाकिस्तान और हिंदू-मुस्लिम नरेटिव का सवार रहता है। मैकार्थी ने अमेरिका में बुद्धिजीवियों, कलाकारों, लेखकों, वैज्ञानिकों की सूची का अन्वेषण किया जो अमेरिका में सोवियत घुसपैठिए या वामपंथी थे। परमाणुवैज्ञानिक रोेगबर्ग दंपत्ति को सिंग-सिंग चेयर पर बैठाकर मार ही दिया गया। अमेरिका में मैकार्थीवाद के कुकर्मों के विस्तार में जाने की गुंजाइश नहीं है, हिंदुस्तान में नवमैकार्थीवादी हर बुराई के लिए 'वामियों' का अन्वेषण करते हैं, इससे वे बुराई के कारण खोजने के कठिन काम से बच जाते हैं, वैसे जैसे धार्मिक हर बात का करण-कारण किसी दैवीय शक्ति के हवाले करके। हिंदुस्तान में वामियों की राजनैतिक उपस्थिति नगण्य सी है फिर भी यहां के नवमैकार्थीवादी हर बात के लिए वामियों को जििम्मेदार ठहराने से नहीं चूकते। वाैसे यह बात सही है कि निजी विवादों से उपजी घटनाओं में लोग जातिवादी (दलित-ब्राह्मण) या सांप्रदायिक (हिंदू-मुसलमान) कोण ढूंढ़ने की भूल करके सामाजिक विद्वेष पैदा करनने की गलती करते रहते हैं।


Wednesday, March 4, 2026

नेहरूनामा 1

 पिछले कई सालों से अंधभक्त नेहरू के बारे में अफवाहों का भजन गाते रहते हैं। एक ऐसे ही अंधभक्त के कमेंट का जवाब:


अंधभक्त इतिहास नहीं पढ़ते शाखा की जहालतपूर्ण बौद्धिकों में उड़ाई गई अफवाहों का भजन गाते हैं। नेहरू के बाप इतने रईश थे कि चाहते तो वे शहंशाही जिंदगी जी सकते थे लेकिन उन्होंने सारा वैभव त्याग कर, पैतृक संपत्ति राष्ट के नाम करकरके स्वतंत्रता आंदोलन में कूदना वाजिब समझा और कई साल जेलों में बिताया जहां उन्होंने कई कालजयी कृतियों की रचना की। देश को समर्पित उनकी संपत्तिया राजभवन और आनंदभवन आज भी पर्यटन विभाग के जरिए राष्ट्रीय राजस्व में वृद्धि कर रही हैं। लेकिन जैसा कहा कि अंधभक्त बंददिमाग जाहिल होता है, पेट पर लात को भी प्रसाद की तरह खाकर रटी फवाहों का भजन गाता है। स्वतंत्रता आंदोलन में कूदने के बाद नेहरू ने खादी ही पहना, लखटकिया शूट नहीं।

Monday, February 9, 2026

भागवत पुराण 1

 मोहन भागवत ने पशुओं की डॉक्टरी की पढ़ाई की है लेकिन कोई कह रहा था कि वह गधों का गड़ेरिया बन गया। उसने कहा कि बांग्लादेश के हिंदुओं को एकजुट होकर अपने अधिकारों के लिए लड़ना चाहिए यही बात अगर बांगला देश का कोई यहां के मुससलमानों से कहता तो??

Tuesday, January 27, 2026

ब्राह्मणवाद 2

 एक पोस्ट पर कमेंटः


शिक्षा पर एकाधिकार के चलते तथाकथित ज्ञान पर वर्चस्व के बल पर ब्राह्मणवाद का सामाजिक वर्चस्व सदियों से बना रहा। शिक्षा की सिद्धांततः सार्वभौमिक सुलभता औपनिवेशिक शिक्षा नीति का एक सकारात्मक उपपरिणाम है जिससे ब्राह्मणवाद का वर्चस्व दरकने लगा। उस वर्चस्व को बरकरार रखने के लिए मुसलमान के रूप में एक साझे दुश्मन के नाम पर हिंदुत्व की विचारधारा गढ़ी गयी, जिससे अल्पसंख्यक वर्चस्व की रक्षा बहुसंख्यक यानि बहुजन की ताकत से की जा सके। हिंदुत्व ब्राह्मणवाद की ही राजनैतिक अभिव्यक्ति है।

Friday, January 9, 2026

ब्राह्मणवादी प्रतिक्रांति

 बुद्ध के समय तक वर्ण व्यवस्था प्रचलित थी, अनुगत्तरानिकाय और दीर्घ निकाय में बुद्ध एक ब्राह्मण श्रोता से ब्रह्मा के विभिन्न अंगों से मनुष्यों की उत्पत्ति और ब्राह्मणीय क्षेष्ठता का परिहास करते हैं। कौटिल्य के अर्थ शास्त्र में राजधर्म प्रजा का रक्षण-पालन और योगक्षेम सुनिश्चित करना है। रक्षण में धर्म यानि वर्णाश्रमं धर्म का रक्षण भी है। वर्णाश्रम की प्रमुखता भले न रही हो लेकिन व्यवस्था के रूप में वर्णाश्रम के अस्तित्व से इंकार नहीं किया जा सकता। अशोक के बौद्ध होने के बाद बौद्ध धर्म को राजकीय संरक्षण प्राप्त हुआ। मुझे लगता है कि पुष्यमित्र शुंग द्वारा मौर्यशासन के अंत के बाद बौद्ध संस्कृति के विरुद्ध ब्राह्मणवादी प्रतिक्रांति शुरू हुई और प्रतिक्रांति के बौद्धिक औचित्य के लिए पुराण लिखे गए तथा पुराणकाल में इतिहास का मिथकीकरण शुरू हुआ और वर्णाश्रम को संस्थागत बनाने की बुनियाद पड़ी।

Thursday, January 8, 2026

पुनीत-आभा

 जैसा उन्होने बताया था, पुनीत डंडन से आभा दयाल की मुलाकात लखनऊ में हुई थी। पुनीत से मेरी पहली मुलाकात लखनऊ में, जेएनयू से पढ़े और श्रीपत मिश्र के मुख्यमंत्रित्व काल में लखनऊ विवि में लेक्चरर बने आशुतोष मिश्र के साथ हुई थी। 1985-86 में, मैं कुछ दिनों साकेत के पास, पुष्पविहार में सरकारी कॉलोनी में एक फ्लैट सबलेटिंग पर लिया था। आभा को साथ अभय की शादी हो चुकी थी। पुनीत लखनऊ से किसी काम से दिल्ली आए थे और मेरे पास रहने आए, आभा उन दिनों नीपा में नौकरी करती थीं। पुनीत से मिलने वे पुष्पविहार मेरे फलैट पर मिलने आईं। मुझे यह सामान्य मित्रवत मुलाकात लगी थी।


बाद में पता चला कि पुनीत दिल्ली शिफ्ट हो गए और आभा के साथ ही रहने लगे।

आखिरी दिनों में अभय पांडव नगर में नहीं नोएडा में रहते थे और उसके पहले कटवरिया सराय में।

मैं जब हिंदू कॉलेज में हॉस्टल वार्डन था तब अभय कटवरिया के अपने मकान मालिक के साथ एकाध बार मिलने आए थे, बाद में फोन पर बात होती रहती थी, अभय ने कई बार नोएडा बुलाया लेकिन अब-तब करते चलता रहा और एक दिन अभय के असमय निधन की खबर मिली।

अभय की समृतियों को सलाम।

Friday, January 2, 2026

बेतरतीब 184 (अहरा)

  अहरा


Pradeep Saurabh की बैगन के भुर्ते के वर्णन पर मुझे अहरा पर बनने वाले भोजन की याद आ गयी। अहरा उपले(कंडे) का अस्थाई चूल्हा होता था, जिसे पहले लोग अक्सर यात्रा में बनाते थे। पूर्वी उप्र में सड़क निर्माण के कार्य में जुटे मजदूर अहरा लगाते दिख जाते थे। मुझे अहरे पर बने भोजन की बचपन की पहली याद अपने मुंडन की है। मेरी मुंडन उम्र के पांचवे साल में हुई थी। बाबू जी (पिताजी) और अइया (दादी) के साथ मुंडन के बाद भैरो बाबा (कप्तीानगंज-महराजगंज के पास) से लौट रहा था। मेरे गांव से भैरो बाबा की दूरी कम-से-कम 40 किमी होगी। वापसी में किसी गांव में किसी किसान की नई सार (गाय-भैंस-बैलों का घर बनी थी), उस गांव में पिताजी के परिचित कुछ लोग थे, उनकी मदद से उन्होंने मिट्टी के बर्तन और कंडों का इंतजाम किया था। उक्त पोस्ट पर यह कमेंट लिखा गया था।

हमारे बचपन में यात्रा में लोग अहरा लगाते थे और बैगन का चोखा अहरे के भोजन का अनिवार्य हिस्सा होता था। मेरे बाबा बाग/ खेत/ट्यूबवेल की अपनी कुटी पर ही रहते थे, दोपहर और शाम को भोजन के लिए घर आते थे। वैसे खेत से घर की दूरी ज्यादा नहीं है, 700-800 मीटर ही होगी। कभी कभी उनका मन रात को खाना खाने घर आने का नहीं होता तो बाग में ही अहरा लगाते।

गांवों में अहरा लगाने का शिल्प,पता नहीं, अब भी बचा है या नहीं। अहरा कंडे (उपले) का अस्थाई, पिरामिडाकार चूल्हा होता है। जिसके ऊपर दाल-भात की मिट्टी की हंड़िया रखी जाती है। दाल पकने में ज्यादा समय लगता है इसलिए सीधे आंच पर दाल की हंडिया रखी जाती थी उसके ऊपर चावल की जिसके ऊपर मिट्टी का ढक्कन। सीधी आंच से दाल पकती है और उसकी भाप से चावल पकता है। अहरे की आग में आलू और बैगन तथा यदि खेत में हुआ तो टमाटर डाल दिया जाता है, जो दाल-चावल पकने तक भुन जाते हैं। यदि आंटा गूथने की सुविधा हुई तो उसकी भौरी भी आग में डाल दी जाती थी जो भी दाल चावल पकने तक पक जाती थी। भुना हुआ आलू-बैगन का भरता बनाकर उनमें बारीक कटी हरी मिर्च और नमक मिला दिया जाता था और दाल-भात; चोखा भौरी (लिट्टी) की दावत तैयार। जब भी बाबा बाग में अहरा लगाते तो मेरी पत्नी और भाभी (पौत्र बधुओं) को भी आमंत्रित करते जिनकी बाग-खेत में पिकनिक हो जाती। मेरी पत्नी (सरोज जी) आज भी नॉस्टेल्जिया कर उन पिकनिकों और अहरे पर पके दावत की याद करती है।

Thursday, January 1, 2026

बेतरतीब 183 (प्राइमरी स्कूल)

 मित्र Vivek Mishra अपने पिताजी ( कालजयी साहित्यकार, प्रो. राम दरश मिश्र) के प्राइमरी स्कूल की तस्वीर शेयर किया उस पर कमेंट में मुझे अपना प्राइमरी स्कूल याद आ गया।


हमारे गांव के प्राइमरी स्कूल में भी एक बड़े कच्चे खपड़ैल कमरे के चारों तरफ बरामदे थे, सामने का बरामदा बरामदा ही था बगल और पीछे के 3 बरामदे मिट्टी की दीवारों से घेर कर कमरे बना दिए गए थे जो कि क्लास रूम थे। तीन कमरों में पढ़ने वाले गदहिया गोल को मिलाकर 6 कक्षाओं के विद्यार्थी होते थे और पढ़ाने वाले 3 शिक्षक। एक कमरे में सबसे जूनियर शिक्षक गदहिया गोल और कक्षा 1 को पढ़ाते थे और दूसरे में उनसे सीनियर शिक्षक कक्षा 2 और 3 को तथा तीसरे में हेडमास्टर कक्षा 4 और 5 को। मैं गदहिया गोल से 1 में और 4 से 5 में कूद-फांद के चलते 4 ही साल उस स्कूल में पढ़ा और 2 ही शिक्षकों से। जब मैं कक्षा 4 में पहुंचा तो तबके हेड मास्टर रिटार हो गए और उनसे जूनियर शिक्षक जिन्हों ने हमें कक्षा 2 और 3 में पढ़ाया था वे हेड मास्टर बन गए और 4 तथा 5 को पढ़ाने लगे। यानि 4 सालों में 3 साल एक ही शिक्षक से पढ़ना पड़ा था।