बुद्ध के समय तक वर्ण व्यवस्था प्रचलित थी, अनुगत्तरानिकाय और दीर्घ निकाय में बुद्ध एक ब्राह्मण श्रोता से ब्रह्मा के विभिन्न अंगों से मनुष्यों की उत्पत्ति और ब्राह्मणीय क्षेष्ठता का परिहास करते हैं। कौटिल्य के अर्थ शास्त्र में राजधर्म प्रजा का रक्षण-पालन और योगक्षेम सुनिश्चित करना है। रक्षण में धर्म यानि वर्णाश्रमं धर्म का रक्षण भी है। वर्णाश्रम की प्रमुखता भले न रही हो लेकिन व्यवस्था के रूप में वर्णाश्रम के अस्तित्व से इंकार नहीं किया जा सकता। अशोक के बौद्ध होने के बाद बौद्ध धर्म को राजकीय संरक्षण प्राप्त हुआ। मुझे लगता है कि पुष्यमित्र शुंग द्वारा मौर्यशासन के अंत के बाद बौद्ध संस्कृति के विरुद्ध ब्राह्मणवादी प्रतिक्रांति शुरू हुई और प्रतिक्रांति के बौद्धिक औचित्य के लिए पुराण लिखे गए तथा पुराणकाल में इतिहास का मिथकीकरण शुरू हुआ और वर्णाश्रम को संस्थागत बनाने की बुनियाद पड़ी।
Friday, January 9, 2026
Thursday, January 8, 2026
पुनीत-आभा
जैसा उन्होने बताया था, पुनीत डंडन से आभा दयाल की मुलाकात लखनऊ में हुई थी। पुनीत से मेरी पहली मुलाकात लखनऊ में, जेएनयू से पढ़े और श्रीपत मिश्र के मुख्यमंत्रित्व काल में लखनऊ विवि में लेक्चरर बने आशुतोष मिश्र के साथ हुई थी। 1985-86 में, मैं कुछ दिनों साकेत के पास, पुष्पविहार में सरकारी कॉलोनी में एक फ्लैट सबलेटिंग पर लिया था। आभा को साथ अभय की शादी हो चुकी थी। पुनीत लखनऊ से किसी काम से दिल्ली आए थे और मेरे पास रहने आए, आभा उन दिनों नीपा में नौकरी करती थीं। पुनीत से मिलने वे पुष्पविहार मेरे फलैट पर मिलने आईं। मुझे यह सामान्य मित्रवत मुलाकात लगी थी।
बाद में पता चला कि पुनीत दिल्ली शिफ्ट हो गए और आभा के साथ ही रहने लगे।
आखिरी दिनों में अभय पांडव नगर में नहीं नोएडा में रहते थे और उसके पहले कटवरिया सराय में।
मैं जब हिंदू कॉलेज में हॉस्टल वार्डन था तब अभय कटवरिया के अपने मकान मालिक के साथ एकाध बार मिलने आए थे, बाद में फोन पर बात होती रहती थी, अभय ने कई बार नोएडा बुलाया लेकिन अब-तब करते चलता रहा और एक दिन अभय के असमय निधन की खबर मिली।
अभय की समृतियों को सलाम।
Friday, January 2, 2026
बेतरतीब 184 (अहरा)
अहरा
Pradeep Saurabh की बैगन के भुर्ते के वर्णन पर मुझे अहरा पर बनने वाले भोजन की याद आ गयी। अहरा उपले(कंडे) का अस्थाई चूल्हा होता था, जिसे पहले लोग अक्सर यात्रा में बनाते थे। पूर्वी उप्र में सड़क निर्माण के कार्य में जुटे मजदूर अहरा लगाते दिख जाते थे। मुझे अहरे पर बने भोजन की बचपन की पहली याद अपने मुंडन की है। मेरी मुंडन उम्र के पांचवे साल में हुई थी। बाबू जी (पिताजी) और अइया (दादी) के साथ मुंडन के बाद भैरो बाबा (कप्तीानगंज-महराजगंज के पास) से लौट रहा था। मेरे गांव से भैरो बाबा की दूरी कम-से-कम 40 किमी होगी। वापसी में किसी गांव में किसी किसान की नई सार (गाय-भैंस-बैलों का घर बनी थी), उस गांव में पिताजी के परिचित कुछ लोग थे, उनकी मदद से उन्होंने मिट्टी के बर्तन और कंडों का इंतजाम किया था। उक्त पोस्ट पर यह कमेंट लिखा गया था।
हमारे बचपन में यात्रा में लोग अहरा लगाते थे और बैगन का चोखा अहरे के भोजन का अनिवार्य हिस्सा होता था। मेरे बाबा बाग/ खेत/ट्यूबवेल की अपनी कुटी पर ही रहते थे, दोपहर और शाम को भोजन के लिए घर आते थे। वैसे खेत से घर की दूरी ज्यादा नहीं है, 700-800 मीटर ही होगी। कभी कभी उनका मन रात को खाना खाने घर आने का नहीं होता तो बाग में ही अहरा लगाते।
गांवों में अहरा लगाने का शिल्प,पता नहीं, अब भी बचा है या नहीं। अहरा कंडे (उपले) का अस्थाई, पिरामिडाकार चूल्हा होता है। जिसके ऊपर दाल-भात की मिट्टी की हंड़िया रखी जाती है। दाल पकने में ज्यादा समय लगता है इसलिए सीधे आंच पर दाल की हंडिया रखी जाती थी उसके ऊपर चावल की जिसके ऊपर मिट्टी का ढक्कन। सीधी आंच से दाल पकती है और उसकी भाप से चावल पकता है। अहरे की आग में आलू और बैगन तथा यदि खेत में हुआ तो टमाटर डाल दिया जाता है, जो दाल-चावल पकने तक भुन जाते हैं। यदि आंटा गूथने की सुविधा हुई तो उसकी भौरी भी आग में डाल दी जाती थी जो भी दाल चावल पकने तक पक जाती थी। भुना हुआ आलू-बैगन का भरता बनाकर उनमें बारीक कटी हरी मिर्च और नमक मिला दिया जाता था और दाल-भात; चोखा भौरी (लिट्टी) की दावत तैयार। जब भी बाबा बाग में अहरा लगाते तो मेरी पत्नी और भाभी (पौत्र बधुओं) को भी आमंत्रित करते जिनकी बाग-खेत में पिकनिक हो जाती। मेरी पत्नी (सरोज जी) आज भी नॉस्टेल्जिया कर उन पिकनिकों और अहरे पर पके दावत की याद करती है।
Thursday, January 1, 2026
बेतरतीब 183 (प्राइमरी स्कूल)
मित्र Vivek Mishra अपने पिताजी ( कालजयी साहित्यकार, प्रो. राम दरश मिश्र) के प्राइमरी स्कूल की तस्वीर शेयर किया उस पर कमेंट में मुझे अपना प्राइमरी स्कूल याद आ गया।
हमारे गांव के प्राइमरी स्कूल में भी एक बड़े कच्चे खपड़ैल कमरे के चारों तरफ बरामदे थे, सामने का बरामदा बरामदा ही था बगल और पीछे के 3 बरामदे मिट्टी की दीवारों से घेर कर कमरे बना दिए गए थे जो कि क्लास रूम थे। तीन कमरों में पढ़ने वाले गदहिया गोल को मिलाकर 6 कक्षाओं के विद्यार्थी होते थे और पढ़ाने वाले 3 शिक्षक। एक कमरे में सबसे जूनियर शिक्षक गदहिया गोल और कक्षा 1 को पढ़ाते थे और दूसरे में उनसे सीनियर शिक्षक कक्षा 2 और 3 को तथा तीसरे में हेडमास्टर कक्षा 4 और 5 को। मैं गदहिया गोल से 1 में और 4 से 5 में कूद-फांद के चलते 4 ही साल उस स्कूल में पढ़ा और 2 ही शिक्षकों से। जब मैं कक्षा 4 में पहुंचा तो तबके हेड मास्टर रिटार हो गए और उनसे जूनियर शिक्षक जिन्हों ने हमें कक्षा 2 और 3 में पढ़ाया था वे हेड मास्टर बन गए और 4 तथा 5 को पढ़ाने लगे। यानि 4 सालों में 3 साल एक ही शिक्षक से पढ़ना पड़ा था।
