Wednesday, September 2, 2026

सियासत 4 (फासीवाद)

 क्या यह फासीवाद नहीं है?


सोचिए आप सुबह की सैर पर निकलें और सादे वेश में, दो उठागीर आप को उठा लें और मीलों दूर एक थाने में लेजाकर बताएं कि उन्हें पूछताछ के लिए लेजाया गया और आपको पता चले कि वे उठाईगीर अमित शाह की दिल्ली पुलिस के कांस्टेबल हैं, तो 1930-40 के दशक के नाजी जर्मनी या 1920-40 के के दशक के फासीवादी इटली की याद नहीं आएगी? आज तक पता नहीं चला है कि 20 जुलाई को जंतरमंतर पर कील लगी साठियों से बच्चों पर कहर ढाने वाले गुंडे कौन थे? सादी वर्दी में पुलिस वाले या भाड़े के?

कल चाणक्यपुरी में नेहरू पार्क सुबह की सैर करते वक्त जिन आशीष जोशी को बिना कारण बताए या घर वालों को सूचित किए , दिल्ली पुलिस के विशेष प्रकोष्ठ वाले पुलिसकर्मियों द्वारा उठा लिया गया वे भारत सरकार की सेवा अतिरिक्त सचिव पद से हाल ही में रिटायर हुए विरष्ठ अधिकारी हैं। स्क्रोल में छपी खबर के अनुसार, उन्होंने सोसलमीडिया की अपनी एक्स पोस्ट में बताया कि स्पेसल सेल वाले उन्हें स्पेसल सेल के थाने फ्रेंड्स कॉलेनी ले गए थे और शाम को घर छोड़ गए। बाकी बातें बाद में बताएंगे।

स्क्रोल में छपी खबर के अनुसार, जोशी ने जंतरमंतर आंदोलन के दौरान, एक्स पर बच्चों पर निर्दयता से हमले को लेकर अमितशाह और गृह सचिव के बीच मतभेद को लेकर एक पोस्ट लिख दिया था। गृह सचिव बच्चों पर सख्त कार्रवाई के खिलाफ थे।

जब एक वरिष्ठ रिटायर अधिकारी को सोसल मीडिया पर लिखने के लिए उठा लिया जा सकता है तो आम आदमी का क्या? लोगों में खौफ पैदा करने की ऐसी कार्रवाई फासीवाद का लक्षण नहीं है? भक्त कहेंगे दिन भर थाने में रखने के बाद छोड़ तो दिया गया! अगर उन्हें पूछताछ के लिए ले जाना था या गिरफ्तार करना था तो सरकार को कानूनी प्रक्रिया का पालन तो करना था।

मार्क्सवाद 358 (नोएडा मजदूर आंदोलन )

 इस सत्योत्तर (Post truth) युग में भी कभी कभी न्यायालयों में न्याय भी हो जाता है, न्याय करने वाले न्यायाधीशों को सलाम, आकृति को लाल सलाम। सत्यम को अविलंब रिहा किया जाए। इलाहाबाद हाई कोर्ट की एक पीठ ने उप्र सरकार को कटघरे में खड़ा करते हुए, नोएडा के मजदूर आंदोलन के सिलसिले में एनएसए के तहत बंद एक्टिविस्ट छात्रा आकृति चौधरी को रिहा कर दिया और नोएडा की डीएम के वेतन से 5 लाख रु. मुआवजे का आदेश दिया। नोएडा की डीएम के वेतन से आकृति को मुआवजा का आदेश तुरंत लागू हो इससे ऊपर तक पहुंच रखने वाले नौकरशाहों की मनमानी पर रोक लगेगी। गौरतलब है कि नोएडा की डीएम मेधा रूपम वोट चोरी मुख्य अभियुक्त ज्ञानेश कुमार (मुख्य चुनाव आयुक्त) की बेटी हैं।

Monday, August 31, 2026

हिंदी-उर्दू-हिंदुस्तानी

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कई देशों के विश्वविद्यालयों में हिंदी-उर्दू विभाग एक ही हैं क्योंकि दोनों भाषाओं में केवल लिपि का अंतर है, जिसे हिंदुस्तानी कहा जहा जा सकता है। 1919 के कांग्रेस अधिवेशन में महात्मा गांधी ने हिंदुस्तानी को राष्ट्रीय संपर्क भाषा के रूप में प्रस्तावित किया था, जिसे गैरहिंदी भाषी प्रतिनिधियों का समर्थन भी प्राप्त था। हिंदुस्तानी से गांधी का आशय उत्दीतर भारत में बोली जाने वाली भाषा से था जिसे कुछ लोग फारसी लिपि में लिखते थे और कुछ नागरी में।-शुद्धतावादियों ने संस्कृतनिष्ठ हिंदी की वकालत की।

1949 में राष्ट्रीय संपर्क भाषा के प्रश्न पर सविधान सभा हिंदी-हिंदुस्तानी पर तीखी बहस के बाद मतदान हुआ और दोनों पक्षों में समान मत पड़े, अंततः राजेंद्र प्रसाद के कास्टिंग वोट से हिंदी को स्वीकृति मिली।

फारसी लिपि में छपी हिंदी रचनाएं पाकिस्तानी उर्दू भाषियों के लिए उसी तरह सुगम हैं जैसे नागरी में छपी मंटो की कहानियां या हबीब जालिब के नज्में हिंदी भाषी हिंदुस्तानियों के लिए। प्रेमचंद पहले उर्दू में ही लिखते थे। उर्दू के कुछ बड़े उपन्यासकार- कहानी कार हैं, कृष्ण चंदर, 'शिकस्त' उनका प्रसिद्ध उपन्यास है;राजेंद्र सिंह बेदी: विभाजन की त्रासदी और मानवीय संवेदनाओं पर लिखने वाले महान कहानीकार; 'एक चादर मैली सी' उनका मास्टरपीस है।रतन नाथ धर 'सरशार': उर्दू के शुरुआती उपन्यासकारों में से एक। उनका उपन्यास 'फ़साना-ए-आज़ाद' मील का पत्थर माना जाता है। हमारे मित्र हैं, प्रोफेसर आसिफ नक्वी, म्युजिऑलॉजी के प्रोफेसर थे, उर्दू में अफसाने लिखते हैं और शायरी करते हैं, नागरी पढ़ लेते हैं , लेकिन मंद गति से। मैं उनकी कविताएं उसी तरह अच्छी करह समझ लेता हूं जिस तरह हबीब जालिब, इब्ने इंशां या फैज की।

Saturday, August 29, 2026

सियासत 3 (भौगोलिक सीमाएं)

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दुनिया की सभी भौगोलिक सीमाएं ऐतिहासिक रूप से खींची गयी नकली सीमाएं हैं। हिंद-पाक की सीमा तो अनैतिहासिक है जो उपनिवेश-विरोधी आंदोलन की विचारधारा के रूप में उभर रहे भारतीय राष्ट्रवाद को खंडित करने के लिए औपनिवेशिक शासकों ने अपने भारतीय एजेंटों के माध्यम से हिंदू और मुस्लिम राष्ट्रवाद के कृत्रिम शगूफे छोड़े, फैलाए और हिंदू-मुस्लिम नाम पर खून खराबे करवाए और पूर्व (बंगाल) और पश्चिम ( पंजाब) में मनमानी लकीरें खींच दी। औपनिवेशिक शासक अपने हिंदू-मुस्लिम दलालों की मदद से भारत राष्ट्र के टुकड़े करने में सफल रहे और बंटवारे का घाव अभी तक नासूर बन टपक रहे हैं। फैज़ के शब्दों में, "खून के धब्बे धुलेंगे, कितनी बरसातों के बाद"। यदि धर्म राष्ट्रवाद का ऐतिहासिक आधार हो सकता तो भाषा के नाम पर पाकिस्तान के दो टुकड़े क्यों होते? मुझे एक बार (बहुत पहले) कहीं एक सिंधी, पाकिस्तानी स्त्री से परिचय हुआ। उसने सवाल किया कि मैं उससे उर्दू की बजाय अंग्रेजी में क्यों बात कर रहा था, मेरे कहने पर कि मुझे उर्दू नहीं आती तो हंसने लगी, बोली कि इतनी अच्छी उर्दू तो बोलता हूं, मेरे यह कहने पर कि यह तो हिंदी है, वह बोली एक ही बात हुई। उसने शिकायत की हिंदुस्तानी मुजाहिरों ने उर्दू थोपकर उनकी भाषा (सिंधी) को दोयम बना दिया।

Thursday, August 27, 2026

नास्तिकता

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मैं वृद्धावस्था में नहीं, किशोरावस्था (17 साल) में ही नास्तिक हो गया था औग 18-19 साल में भगत सिंह का नास्तिकता पर लेख ने नैतिक समर्थन प्रदान किया तथा उसके एकाध साल बाद भगवान के अस्तित्व पर वोल्नटेयर द्वारा लगाए प्रशनचिन्ह ने बौद्धिक औचित्य। मैं कर्मकांडी पुरोहित नहीं था, न ही पुरोहिती परिवार में पैदा हुआ था, कर्मकांडी ब्राह्मण परिवार में पैदा हुआ पला। मेरा कहने का आशय केवल इतना है कि एक कर्मकांडी परिवेश के बालक की प्रामाणिक नास्तिकता की यात्रा कठिन, आत्मान्वेषी आत्म संघर्ष की यात्रा थी। भगवान के भय का आतंक भीषण था। नास्तिकता की मंजिल पर पहुंच कर भगवान के भय से मुक्ति के आत्मसुख की अनुभूति अद्भुत थी। लोग कहते थे बुढ़ापे में भगवान ही याद आते हैं, अब तो लगभग 72 का हो गया अभी तक तो नहीं बाद आए। यदि व्यक्ति भूत और भगवान के भय से मुक्त हो जाए तो वह निर्भय हो जाता है।

Tuesday, August 25, 2026

जंतरमंतर 2

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जंतरमंतर आंदोलन में AISA के अलावा एसएफआई, एआईएसएफ तथा कई अन्य वाम छात्र संगठन भी थे, पहली जरूरत इन वाम संगठनों में एकता की है जो 10 साल पहले जेएनयू आंदोलन के समय बन रही थी किंतु इनके मातृ संगठनों के चलते वह बन नहीं पाई, अब समय है कि बनाएं। काक्रोच पार्टी यदि केजरीवाल की आम आदमी पार्टी के रास्ते पर भी चलना चाहे तो pressure from below के चलते चल नहीं पाएगी। मुझे शुरू में यह प्रायोजित लगा था और अब भी लग रहा है लेकिन मैंने समयांतर में एक लेख में लिखा था कि कई बार inadvertent consequences are different and more substantial than intended ones. अब जंतरमंतर आंदोलन राष्ट्रव्यापी हो चुका है और राहुल गांधी की भूमिका महत्वपूर्ण हो गयी है। फासीवाद से लड़ने के लिए आपसी मतभेदों को भूलकर एकजुट होने की जरूरत है तथा वाम सगटनों को सीजेपी और कांग्रेस के साथ मिलकर नई शिक्षा नीति एवं एनटीए के विरुद्ध एक व्यापक मोर्चा बनाना चाहिए जो विस्तृत होकर राष्ट्रव्यापी राजनैतिक आंदोलन का स्वरूप ग्रहण करे। इंकिलाब जिंदाबाद। जय भीम लाल सलाम।

Saturday, August 22, 2026

जंतरमंतर 1

 मैं तो हमेशा भविष्य की पीढ़ियों के प्रति यह सोचकर आशावान रहता था कि इतिहास की गाड़ी में रिवर्स गीयर नहीं होता इसलिए इतिहास के यूटर्न्स को अस्थाई मानता था, इताहास के यू टर्न से उपजी हताशा पर रोहित बेमुला से निकले जय भीम लाल सलाम के नारे ने पानी फेरना शुरू किया और जेएनयू आंदोलन ने उसे पानी में डुबो दिया था। अब जंतरमंतर आंदोलन ने आशा की नई किरणें दिखाई हैं। इंकिलाब जिंदाबाद।