Wednesday, April 2, 2025

बेतरतीब 186 (गोर्की)

 मैंने प्रॉग्रेस प्रकाशन (मॉस्को) से प्रकाशित गोर्की का उपन्यास 'मदर' 1973-74 में इलाहाबाद में यूनिवर्सिटी रोड के पास पीपीएच (पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस) की दुकान से 8-10 आने (या ऐसा ही कुछ) में खरीदा था विज्ञान का विद्यार्थी था, साहित्यिक विज्ञान के बारे में जानकारी नहीं थी, 1975 दिसंबर तक पढ़ना टालता गया। जाड़े की छुट्टियों में घर जाते समय साथ ले गया और रास्ते में बस में ही पढ़ना शुरू किया, कथानक, जगहें और पात्र विदेशी होने के बावजूद अपरिचित नहीं लगे। 2016 में (40-41 साल बाद) पलटने के लिए फिर उठा लिए और आदि से अंत तक पढ़ गया तथा लगा पहली बार पढ़ रहा हूं। महान रचनाएं जितनी भी बार पढ़ी जाएं, हमेशा लगता है जैसे पहली बार पढ़ रहे हैं। सभी रचनाएं समकालिक होती हैं, महान रचनाएं सर्वकालिक (कालजयी) होती है। पढ़ना खत्म ही किया था कि रोहित बेमुला की शहादत के विरुद्ध आंदोलित जेएनयू पर सरकारी हमले के विरुद्ध आंदोलन छिड़ गया। 14 या 15 फरवरी की बात होगी घऱ के बगीचे में जेएनयू पर लेख लिखने बैठा ही था कि पता चला उस दिन जेएनयू में कैंपस पर हमले के विरुद्ध मानव श्रृंखला (ह्यूमन चेन) प्रतिरोध का आयोजन है तो एक बार लगा कि एक की संख्या का ही तो फर्क है, लेख ही पूरा कर लूं। फिर लेनिन की स्टेट एं रिवल्यूसन की पोस्ट स्क्रिप्ट याद आई, 'क्रांति में भागीदारी उसके बारे में लिखने से अधिक सुखद है तथा लैपटॉप बंद कर मोटर सािकिल में किक मारा और जेेनयूूू पहुंच गया और पाया बहुत से समकालीन जेेनयआइट्स दूर-दराज से आए हैं, लगा कि न आता तो जीवन भर पश्चाताप रहता। लेख की शुरुआत गोर्की की मां के ही संदर्भ से किया। कन्हैयाऔर उमर की मांओं में मुझे पॉवेल की मां दिखी। कालजयी मां के कालजयी लेखक गोर्की को सलाम।


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Monday, March 31, 2025

शिक्षा और ज्ञान 367 ( हिंदुस्तानी)

 उर्दू (और हिंदी) का विकास फारसी से नहीं, हिंदी की पूर्ववर्ती उत्तर भारतीय भाषाओं, विशेष रूप से ब्रज से बाजारू कामकाज की भाषा के रूप में हुआ, जिसकी लिपि फारसी थी। गौरतलब है कि काफी समय तक पंजाबी की लिपि भी फारसी थी। ब्रज (खड़ी बोली) के व्याकरण और वाक्य-संरचना (Grammer and syntax) के आधार पर दकनी (दक्षिणी) हिंदी के रूप में इसकी शुरुआत हुई जिसमें अरबी, फारसी, अवधी भोजपुरी, पंजाबी आदि भाषाओं के बातचीत में इस्तेमाल होने वाले प्रचलित शब्द जुड़ते गए, जैसा कि हर विकासशील भाषा के साथ होता है। दक्षिणी हिंदी कालांतर में हिंदुस्तानी बन गयी , जो फारसी लिपि में लिखने पर उर्दू और नागरी लिपि में लिखने पर हिंदी कहलाने लगी। 1919 के कांग्रेस अधिवेसन में गांधी जी ने उत्तर भारत में बोली जाने वाली तथा क्रमशः फारसी एवं नागरी में लिखी जानी वाली हिंदुस्तानी को अखिल भारतीय संपर्क भाषा के रूप अपनाने का प्रस्ताव पेश किया था। कांग्रेस में संस्कृतनिष्ठ भाषा के पैरोकारों ने हिंदुस्तानी को हिंदी-उर्दू में विभाजित कर हिंदी का समर्थन किया। इस तरह भाषा के सांप्रदायिककरण की प्रक्रिया शुरू हुई। 1948 में गांधी की हत्या हो गयी।1949 में संविधान सभा जब राष्ट्रीय संपर्क भाषा के मुद्दे पर मतदान हुआ तो हिंदुस्तानी और हिंदी के पक्ष में बराबर मत पड़े और अध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद के कास्टिंग वोट से हिंदी के पक्ष में फैसला हुआ।लेकिन जो हिंदी या उर्दू हम या पाकिस्तानी बोलते हैं, वह दरअसल हिंदुस्तानी ही है जो नागरी लिपि में हिंदी हो जाती है और फारसी लिपि में उर्दू।

Saturday, March 29, 2025

न्याय की मूर्ति

 न्याय मूर्ति वर्मा को बदनाम करने की सजिश की गयी है, वैसे ये नोटों की गड्डियों से न्याय देवी की मूर्ति बनाने का उपक्रम कर रहे थे, लेकिन आग ने साजिश कर दी और नोटों पर अग्निशमन विभाग की नजर पड़ गयी। प्राण प्रतिष्ठा के लिए स्थापित होने के पहले ही मूर्ति की सामग्री में आग लगा दी गयी। साजिश करता न्यायमूर्ति के आवास में घुसपैठ कर गया। यदि भ्रष्टाचार के आरोप में कुछ सच्चाई होती तो सर्वोच्च न्यायालय एपआईआर दर्ज करने की अपील क्यों खारिज करता? अदालत की अवमानना का डर न होता तो साजिशकर्ता भारत के मुख्य न्यायाधीश की मलीभगत का भी इशारा कर देता। न्यायमूर्तियों के खिलाफ इस तरह की साजिशों को रोका न गया तो आमजन का न्यायलयों से विश्वास ही उठ जाएगा। वैसे लगता है इलाहाबाद के जजों को साजिशकर्ताओं ने चिन्हित कर लिया है। इसके पहले एक न्यायमूर्ति मिश्र जी कोबदनाम करने के लिए उनके फैसले को तोड़-मरोड़ कर बलात्कार समर्थक बना दिया।

Tuesday, March 25, 2025

मार्क्सवाद 349 (लोहिया)

 लोहिया हमेशा दुविधा तथा नेहरू को लेकर सापेक्ष हीनग्रंथि के शिकार रहे। आज आरएसएस की गोद में खेलने वाले समाजवादी लोहिया की ही विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं। जब सीएसपी के परचम के तले कम्युनिस्ट और सोसलिस्ट संयुक्तमोर्चा के तहत मजदूर-किसान-छात्रों की लामबंदी कर रहे थे तब लोहिया, मीनू मसानी और अशोक मेहता के साथ टॉर्च-खुरपी लेकर कम्युनिस्ट कॉन्सपिरेसी खोद रहे थे। सांप्रदायिकता की समझ इतनी खोखली थी कि कांग्रेस के विरुद्ध आरएसएस के साथ संयुक्त मोर्चा बनाने के लिए दीनदयाल उपाध्याय से समझौता किया और सांप्रदायिकता को सामाजिक स्वीकृति हासिल कराने में सहायक बने। 1960 के दशक में सांप्रदायिकता को सम्मान दिलाने में जो काम लोहिया ने किया था, 1970 के दशक में राजनैतिक अप्रासंगिकता का संकट झेल रहे जेपी ने आरएसएस को तथाकथित संपूर्ण क्रांति का सिरमौर बनाकर, उसे आगे बढ़ाया। इन दोनों लोगों की नीयत और ईमानदारी पर संदेह किए बिना कहा जा सकता है कि इनके सहयोग के बिना सांप्रदायिक फासीवाद इस मुकाम तक नहीं पहुंच सकता था।

Friday, March 21, 2025

लल्ला पुराण 333 (औरंजेब)

 किसी ने एक पोस्ट में लिखा कि भारत में औरंगजेब के बहुत 'मनई' हैं, मैंने कहा कि उसके पास 'मनई' की कमी कभी नहीं रही, सारे राजपूत और मराठे उसके दरबारी थे, उन्होने पूछा, तब औरंगजेब को महान मान लिया जाए? उस पर:


मैंने तो ऐसा नहीं कहा कि औरंगजेब महान था। . पूर्व आधुनिक (pre modern) इतिहास में जब राज्य की स्थापना और विस्तार में तलवार की भूमिका अहम होती थी तब अधिक रक्तपात करने वाले राजा को महान मान लिया गया है चाहे वह सिकंदर हो या अशोक; समुद्रगुप्त या नैपोलियन। मैं सिर्फ यही कहना चाहता हूं कि इतिहास की किताब से एक पन्ना फाड़कर न पढ़ें। औरंगजेब जैसा भी था महान या कमीना उसके दरबारी कारिंदे भी वैसे ही थे। और ऐतिहासिक तथ्य है कि उसके ज्यादातर मनसबदार, जागीरदार तथा सैनय अधिकारी राजपूत और मराठे थे। शिवाजी के विरुद्ध युद्ध में औरंगजेब के सेनापति राजा जय सिंह थे। अकबर के समय राजपुताने के एक राजा, मेवाड़ के राणाप्रताप मुगल सल्तन की अधीनता न स्वीकार कर विरोध में लड़ते रहे. औरंगजेब के समय तो राजपुताने का एक भी रजवड़ा मुगल सल्तनत की अधीनता से बाहर नहीं था। राणाप्रताप के वंशज भी मुगल दरबारी बन गए थे। ऐसा तो नहीं हो सकता कि राजा कमीना था और उसके प्रशासन के सभी स्तंभ महान!! मैं केवल यही कह रहा हूं कि राजा के कारिंदों का राजनैतिक चरित्र वैसा ही होता है, जैसा उनके आका का। ऐसा कहना दोगलापन है कि उसका सेनापति राजा जय सिंह महान था लेकिन औरंगजे कमीना था। मैं केवल यही कहना चाहता हूं कि राजनीति में मामला सत्ता और मलाई का होता है , हिंद-मुसलमान का नहीं। औरंगजेब की सेना में ज्यादातर बड़े सेना अधिकारी राजपत और मराठे थे और शिवाजी की सेना में की अहम पदों पर मुसलमान थे। सांप्रदायिकता आधुनिक विचारधारा है ऐतिहासिक नहीं। धार्मिक राष्ट्र्र्रवाद की विद्रूप अवधारणा पर आधारित सांप्रदायिक विचारधाराएं, औपनिवेशिक पूंजी की कोख से जन्मी जु़ड़वा औलादें हैं।

Thursday, February 13, 2025

शिक्षा और ज्ञान 366 (जनतंत्र)

 राजनैतिक हताशा की किसी की पोस्ट पर एक कमेंट का जवाब:


कभी कभी आक्रोश में ऐसी ही प्रतिक्रिया दिमाग में आती है कि यह जनता इसी लायक है, उसे ऐसा ही शासन चाहिए लेकिन जनता ऐसे क्यों है? हम मार्क्सवादी इस जनतंत्र को पंजीवादी (बुर्जुआ) जनतंत्र कहते हैं, लेकिन मार्क्सवाद के नाम पर चुनावी राजनीति करने वाली पार्टियों ने जनता की सोच/चेतना बदलने के लिए क्या किया? सीपीआई/सीपीएम तथा बुर्जुआ चुनावी पार्टियों में कोई गुणात्मक फर्क ही नहीं बचा है.। मार्क्स ने कहा है कि शासक वर्ग के विचार सासक विचार भी होते हैं, पूंजीवाद माल के साथ विचारों का भी उत्पादव करता है तथा सामाजिक उत्पादन के हर चरण के अनुरूप सामाजिक चेतना का स्वरूप और चरित्र भी होता है , परिवर्तन के लिए जरूरी है सामाजिक चेतना का जनवादीकरण यानि क्रांतिकारी (वर्ग) चेतना का संचार। सामाजिक चेतना के जनवादीकरणि के लिए जरूरी है, जाति-धर्म आदि के नाम पर अस्मिता राजनीति की मित्या चेतना से मुक्ति। हिंदुत्व फासीवाद 3ाह्ममवाद की ही राजनैतिक अभिव्यक्ति है। सामाजिक चेतना के जनवादीकरण का काम कम्युनिस्ट पार्टियों का है, जिसमें वे पूरी तरह असफल रहीं। लेकिन इतिहास का यह अंधकार युग अस्थाई है। फासीवादी ताकतें शिक्षा के विकृतीकरण से सामाजिक चेतना के जनवादीकरण की धार कुंद करने के हर संभव प्रयास कर रही हैं, ज्ञान के कुओं को धर्म की अफीम से पाट ररही हैं। लेकिन अदम गोंडवी के शब्दों में. "ताला लगा के आप हमारी ज़बान को , कैदी न रख सकेंगे जेहन की उड़ान को।" हर निशा एक भोर का ऐलान है, हर अंधे युग का अंत देर-सबेर होता ही है।

शिक्षा और ज्ञान 367 (गुलाम बौद्धिकता)

 कृष्णमोहन की पुस्तक 'गुलाम बौद्धिकता'के संदर्भ में Gyan Prakash Yadav की पोस्ट पर कमेंट:


क्या संयोग है कि मैंने भी यह पुस्तक, 'गुलाम बौद्धिकता' पिछले साल मेले में ही खरीदी थी। ज्यादातर शैक्षणिक नौकरियां शिक्षणेतर कारणो (extra academic consideraions) से मिलती हैं, साथ में शैक्षणिक सक्षमता भी होना, अतिरिक्त योग्यता है। ऐसे में तमाम लुच्चे-लफंगे प्रवृत्ति के लोगों का प्रोफेसर होना आश्चर्यजनक नहीं लगना चाहिए। नाम में मिश्र के पुछल्ले के बावजूद मैंने दिल्ली एवं अन्य विश्वविद्यालयों में 14 साल इंटरविव दिए। 1984 में इलाहाबाद विवि में मेरा इंटरविव एक घंटे से अधिक चला, 6 पद थे, मैं सोचने लगा था कि गंगापार नया नया धूसी बन रहा था वहां घर देखूं या गंगा इस पार तेलियर गंज में, हा हा। उसके कुछ साल बाद तत्कालीन कुलपति कहीं टकरा गए और बताए कि मेरे इंटरविव से वे इतने प्रभावित हुए थे कि तमाम तर के बावजूद वे मेरा नाम पैनल में सातवें लंर पर रखवा पाए थे। 6 पद थे तो 7वें पर रखें या सत्तरवें पर? जब कोई कहता था कि मुझे नौकरी देर से मिली तो मैं कहता था कि सवाल उल्टा है, मिल कैसे गयी?