Friday, January 9, 2026

ब्राह्मणवादी प्रतिक्रांति

 बुद्ध के समय तक वर्ण व्यवस्था प्रचलित थी, अनुगत्तरानिकाय और दीर्घ निकाय में बुद्ध एक ब्राह्मण श्रोता से ब्रह्मा के विभिन्न अंगों से मनुष्यों की उत्पत्ति और ब्राह्मणीय क्षेष्ठता का परिहास करते हैं। कौटिल्य के अर्थ शास्त्र में राजधर्म प्रजा का रक्षण-पालन और योगक्षेम सुनिश्चित करना है। रक्षण में धर्म यानि वर्णाश्रमं धर्म का रक्षण भी है। वर्णाश्रम की प्रमुखता भले न रही हो लेकिन व्यवस्था के रूप में वर्णाश्रम के अस्तित्व से इंकार नहीं किया जा सकता। अशोक के बौद्ध होने के बाद बौद्ध धर्म को राजकीय संरक्षण प्राप्त हुआ। मुझे लगता है कि पुष्यमित्र शुंग द्वारा मौर्यशासन के अंत के बाद बौद्ध संस्कृति के विरुद्ध ब्राह्मणवादी प्रतिक्रांति शुरू हुई और प्रतिक्रांति के बौद्धिक औचित्य के लिए पुराण लिखे गए तथा पुराणकाल में इतिहास का मिथकीकरण शुरू हुआ और वर्णाश्रम को संस्थागत बनाने की बुनियाद पड़ी।

Thursday, January 8, 2026

पुनीत-आभा

 जैसा उन्होने बताया था, पुनीत डंडन से आभा दयाल की मुलाकात लखनऊ में हुई थी। पुनीत से मेरी पहली मुलाकात लखनऊ में, जेएनयू से पढ़े और श्रीपत मिश्र के मुख्यमंत्रित्व काल में लखनऊ विवि में लेक्चरर बने आशुतोष मिश्र के साथ हुई थी। 1985-86 में, मैं कुछ दिनों साकेत के पास, पुष्पविहार में सरकारी कॉलोनी में एक फ्लैट सबलेटिंग पर लिया था। आभा को साथ अभय की शादी हो चुकी थी। पुनीत लखनऊ से किसी काम से दिल्ली आए थे और मेरे पास रहने आए, आभा उन दिनों नीपा में नौकरी करती थीं। पुनीत से मिलने वे पुष्पविहार मेरे फलैट पर मिलने आईं। मुझे यह सामान्य मित्रवत मुलाकात लगी थी।


बाद में पता चला कि पुनीत दिल्ली शिफ्ट हो गए और आभा के साथ ही रहने लगे।

आखिरी दिनों में अभय पांडव नगर में नहीं नोएडा में रहते थे और उसके पहले कटवरिया सराय में।

मैं जब हिंदू कॉलेज में हॉस्टल वार्डन था तब अभय कटवरिया के अपने मकान मालिक के साथ एकाध बार मिलने आए थे, बाद में फोन पर बात होती रहती थी, अभय ने कई बार नोएडा बुलाया लेकिन अब-तब करते चलता रहा और एक दिन अभय के असमय निधन की खबर मिली।

अभय की समृतियों को सलाम।

Friday, January 2, 2026

बेतरतीब 184 (अहरा)

  अहरा


Pradeep Saurabh की बैगन के भुर्ते के वर्णन पर मुझे अहरा पर बनने वाले भोजन की याद आ गयी। अहरा उपले(कंडे) का अस्थाई चूल्हा होता था, जिसे पहले लोग अक्सर यात्रा में बनाते थे। पूर्वी उप्र में सड़क निर्माण के कार्य में जुटे मजदूर अहरा लगाते दिख जाते थे। मुझे अहरे पर बने भोजन की बचपन की पहली याद अपने मुंडन की है। मेरी मुंडन उम्र के पांचवे साल में हुई थी। बाबू जी (पिताजी) और अइया (दादी) के साथ मुंडन के बाद भैरो बाबा (कप्तीानगंज-महराजगंज के पास) से लौट रहा था। मेरे गांव से भैरो बाबा की दूरी कम-से-कम 40 किमी होगी। वापसी में किसी गांव में किसी किसान की नई सार (गाय-भैंस-बैलों का घर बनी थी), उस गांव में पिताजी के परिचित कुछ लोग थे, उनकी मदद से उन्होंने मिट्टी के बर्तन और कंडों का इंतजाम किया था। उक्त पोस्ट पर यह कमेंट लिखा गया था।

हमारे बचपन में यात्रा में लोग अहरा लगाते थे और बैगन का चोखा अहरे के भोजन का अनिवार्य हिस्सा होता था। मेरे बाबा बाग/ खेत/ट्यूबवेल की अपनी कुटी पर ही रहते थे, दोपहर और शाम को भोजन के लिए घर आते थे। वैसे खेत से घर की दूरी ज्यादा नहीं है, 700-800 मीटर ही होगी। कभी कभी उनका मन रात को खाना खाने घर आने का नहीं होता तो बाग में ही अहरा लगाते।

गांवों में अहरा लगाने का शिल्प,पता नहीं, अब भी बचा है या नहीं। अहरा कंडे (उपले) का अस्थाई, पिरामिडाकार चूल्हा होता है। जिसके ऊपर दाल-भात की मिट्टी की हंड़िया रखी जाती है। दाल पकने में ज्यादा समय लगता है इसलिए सीधे आंच पर दाल की हंडिया रखी जाती थी उसके ऊपर चावल की जिसके ऊपर मिट्टी का ढक्कन। सीधी आंच से दाल पकती है और उसकी भाप से चावल पकता है। अहरे की आग में आलू और बैगन तथा यदि खेत में हुआ तो टमाटर डाल दिया जाता है, जो दाल-चावल पकने तक भुन जाते हैं। यदि आंटा गूथने की सुविधा हुई तो उसकी भौरी भी आग में डाल दी जाती थी जो भी दाल चावल पकने तक पक जाती थी। भुना हुआ आलू-बैगन का भरता बनाकर उनमें बारीक कटी हरी मिर्च और नमक मिला दिया जाता था और दाल-भात; चोखा भौरी (लिट्टी) की दावत तैयार। जब भी बाबा बाग में अहरा लगाते तो मेरी पत्नी और भाभी (पौत्र बधुओं) को भी आमंत्रित करते जिनकी बाग-खेत में पिकनिक हो जाती। मेरी पत्नी (सरोज जी) आज भी नॉस्टेल्जिया कर उन पिकनिकों और अहरे पर पके दावत की याद करती है।

Thursday, January 1, 2026

बेतरतीब 183 (प्राइमरी स्कूल)

 मित्र Vivek Mishra अपने पिताजी ( कालजयी साहित्यकार, प्रो. राम दरश मिश्र) के प्राइमरी स्कूल की तस्वीर शेयर किया उस पर कमेंट में मुझे अपना प्राइमरी स्कूल याद आ गया।


हमारे गांव के प्राइमरी स्कूल में भी एक बड़े कच्चे खपड़ैल कमरे के चारों तरफ बरामदे थे, सामने का बरामदा बरामदा ही था बगल और पीछे के 3 बरामदे मिट्टी की दीवारों से घेर कर कमरे बना दिए गए थे जो कि क्लास रूम थे। तीन कमरों में पढ़ने वाले गदहिया गोल को मिलाकर 6 कक्षाओं के विद्यार्थी होते थे और पढ़ाने वाले 3 शिक्षक। एक कमरे में सबसे जूनियर शिक्षक गदहिया गोल और कक्षा 1 को पढ़ाते थे और दूसरे में उनसे सीनियर शिक्षक कक्षा 2 और 3 को तथा तीसरे में हेडमास्टर कक्षा 4 और 5 को। मैं गदहिया गोल से 1 में और 4 से 5 में कूद-फांद के चलते 4 ही साल उस स्कूल में पढ़ा और 2 ही शिक्षकों से। जब मैं कक्षा 4 में पहुंचा तो तबके हेड मास्टर रिटार हो गए और उनसे जूनियर शिक्षक जिन्हों ने हमें कक्षा 2 और 3 में पढ़ाया था वे हेड मास्टर बन गए और 4 तथा 5 को पढ़ाने लगे। यानि 4 सालों में 3 साल एक ही शिक्षक से पढ़ना पड़ा था।

Tuesday, December 30, 2025

उसकी हत्या कर दो

 वह शक्ल-सूरत से अलग दिखता है

वह शक्ल-सूरत से अलग दिखता है
भीड़ जुटाकर उसकी हत्या कर दो

उसका नाम मुसलमानों सा लगता है
भीड़ जुटाकर उसकी हत्या कर दो
तुम झुंड में शेर बनने वाले कुत्तों से हो
जब भी शेर बनने का झुंड बना सको
जो झुंड में न आए उसकी हत्या कर दो
जो भी झुंड में शेर बनने को कायरता कहे
उसकी भी झुंड बनाकर हत्या कर दो
भीड़- हत्या हत्या नहीं होती बध होती है
वैसे भी वैदिक हिंसा हिंसा न भवति

Monday, December 29, 2025

शिक्षा और ज्ञान 387 (एंजेल चकमा की भीड़ हत्या)

 उन्ही का शहर वही मुद्दई वही मुंशिफ


भीड़ हत्या का गौरवशाली राष्ट्रवादी इतिहास: वैसे सांप्रदायिक नफरत और हिंसा की जड़ें तो औपनिवेशिक काल तक जाती हैं, जब औपनिवेशिक शासकों ने उपनिवेशविरोधी संघर्ष की विचारधारा के रूप में उभर रहे भारतीय राष्ट्रवाद को विखंडित करने के लिए, दोनों प्रमुख समुदायों के अपने दलालों के माध्यम से सांप्रदायिक (हिंदू-मुस्लिम) राष्ट्रवाद की परियोजना शुरू की, जिसकी परिणति अंततः औपनिवेशिक परियोजना की सफलता के रूप में देश के ऐतिहासिक-भौगोलिक विखंडन में हुई, जिसका घाव नासूर बन पता नहीं कितनी पीढियों तक रिसता रहेगा। जिसके चलते देश के सभी खंडित हिस्से में सांप्रदायिक आतताई राजनैतिक सेंध लगाने में सफल रहे। इस्लामी राष्टरवाद के प्रभाव में भारतीय राष्ट्र मुस्लिम पाकिस्तानी हिस्से में इन आतताइयों को जल्दी सफलता मिल गयी और भारतीय राष्ट्रवादी आंदोलन की सशक्त विरासत के चलते बचे भारत को हिंदू पाकिस्तान बनाने में आरएसएस को को 4 दशक से ज्यादा लग गया और भारतीय राष्ट्रवाद, हिंदू राषट्रवाद के फासीवादी अभियान के रास्ते में अब भी एकसशक्त गतिरोधक के रूप में खड़ा है और भारतीय राष्ट्रवाद की ताकतें हिंदू राष्टवाद की बुनियाद हिलाने में लगी हैं। इसी गतिरोधक को तोड़ने/कमजोर करने के प्रयास में हिंदुत्व फासीवादी ताकतें लोगों में लोगों में नफरत का जहर भर कर भीड़ हत्याओं का प्रायोजन करती हैं।

देहरादून में, सांप्रदायिक उन्माद के संघी 'राष्ट्रवादी' विचारधारा से प्रेरित, सीमावर्ती राज्य त्रिपुरा के एंजेल चकमा की जघन्य भीड़ हत्या जैसी जघन्य भीड़ हत्या या 'वध' का समकालिक गौरवशाली इतिहास दादरी के अखलाक अहमद की भीड़ हत्या से शुरू होता है। हाल ही में उप्र के 'यशस्वी' मुख्यमंत्री सनातन पुरुष, योगी आदित्यनाथ ने अखलाक़ के हत्या के आरोपियों पर चल रहे मुकदमें वापस लेने का आदेश दिया था उसी तरह जैसे 2002 में बिलकिस बानो के बलात्कारियों को गुजरात की हिंदू-राष्टवादी सरकार ने दोषमुक्त कर दिया था।

चाकमा के हत्यारों के विरुद्ध कार्रवाई में भी उत्तराखंड के 'यशस्वी' मुख्यमंत्री धामी जी की पुलिस ने इतना-हिल्ला हवाला किया कि मुख्य आरोपी को नेपाल भागने का अवसर मिल गया। वैसे तो अदालतों से भी बहुत उम्मीद नहीं रखनी चाहिए न्यायतमंत्र में भी हिंदू राष्ट्रवाद की घुसपैठ भारतीय राष्ट्रवाद पर भारी पड़ रहा है, हाल ही में दिलली उच्च न्यायालय द्वारा उन्नाव के बलात्त्कार-हत्या के दोषी भाजपा नेता कुलदीप सेंगर की सजा निलंबित करने का आदेश दिया था जिसपर, बहुत हल्वा-गुल्ला के बाद, फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी है। वैसे तो आमतौर पर राजनैतिक अपराधियों को अदालतों से क्लीन चिट मिल जाती है।

Friday, December 26, 2025

शिक्षा और ज्ञान 386 (कैलीगुला)

 एक पोस्ट पर कमेंट


How to Lose a Country: The Seven Steps from Democracy to Dictatorship में एर्दोआन की मिशाल से एसे टेमेलकुरान (Ece Temelkuran) द्वारा वर्णित जनतंत्र से तानाशाही की यात्रा के सात कदम मौजूदा और ऐतिहासिक अतीत सभी तानाशाहों के उत्थान की कहानी है, लेकिन हर तानाशाही के हर उत्थान के बाद के बाद उसका पतन भी होता है। लेकिन उत्थान के पतनशील शीर्ष तक पहुंचने के तक यह मानवता को कितना घायल करता है इसका सही आकलन मुश्किल है और घाव कितनी पीढ़ियों के मगहम से भरेगा, यह कहना भी मुश्किल है। इन सात कदमों के अलावा हर तानाशाह इतिहास के विकृतीकरण का काम भी करता है। 2014 में सत्ता पर काबिज होने के बाद भारत की मौजूदा सरकार ने इतिहास पुनर्लेखन कमेटी गटित किया जिसका घषित उद्देश्य ज्ञात-अज्ञात अतीत में महानताओं का अन्वेषण करना या इतिहास का पुनर्मिथकीकरण है। किसी आबादी को गुलाम बनाने के लिए उसे उसके इतिहास से वंचित करना हर तानाशाह की अनिवार्य नीति होती है, इतिहास के महानायकों का खलनायकीकरण होता है और खलनायकों-गद्दारों को महानायक बनाकर पेश किया जाता है। प्राचीन रोम में एक सम्राट था कैलीगुला जो खुद को भगवान मानता था और अपनी सत्ता को शाश्वत। कहता था कि उसे लोगों की नोफरत की परवाह नहीं, बशर्ते वे उससे डरते रहें, लेकिन वह नहीं जानता था कि अतिशय घृणा भय का बांध तोड़ देती है। उसे उसके अंगरक्षकों ने ही उसे रोम के चौराहे पर कत्ल कर दिया और किंवदंतियों के अनुसार, लोगों में उसके मुंह में मूतने की होड़ लग गयी थी।