लोहिया हमेशा दुविधा तथा नेहरू को लेकर सापेक्ष हीनग्रंथि के शिकार रहे। आज आरएसएस की गोद में खेलने वाले समाजवादी लोहिया की ही विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं। जब सीएसपी के परचम के तले कम्युनिस्ट और सोसलिस्ट संयुक्तमोर्चा के तहत मजदूर-किसान-छात्रों की लामबंदी कर रहे थे तब लोहिया, मीनू मसानी और अशोक मेहता के साथ टॉर्च-खुरपी लेकर कम्युनिस्ट कॉन्सपिरेसी खोद रहे थे। सांप्रदायिकता की समझ इतनी खोखली थी कि कांग्रेस के विरुद्ध आरएसएस के साथ संयुक्त मोर्चा बनाने के लिए दीनदयाल उपाध्याय से समझौता किया और सांप्रदायिकता को सामाजिक स्वीकृति हासिल कराने में सहायक बने। 1960 के दशक में सांप्रदायिकता को सम्मान दिलाने में जो काम लोहिया ने किया था, 1970 के दशक में राजनैतिक अप्रासंगिकता का संकट झेल रहे जेपी ने आरएसएस को तथाकथित संपूर्ण क्रांति का सिरमौर बनाकर, उसे आगे बढ़ाया। इन दोनों लोगों की नीयत और ईमानदारी पर संदेह किए बिना कहा जा सकता है कि इनके सहयोग के बिना सांप्रदायिक फासीवाद इस मुकाम तक नहीं पहुंच सकता था।
Tuesday, March 25, 2025
Friday, March 21, 2025
लल्ला पुराण 333 (औरंजेब)
किसी ने एक पोस्ट में लिखा कि भारत में औरंगजेब के बहुत 'मनई' हैं, मैंने कहा कि उसके पास 'मनई' की कमी कभी नहीं रही, सारे राजपूत और मराठे उसके दरबारी थे, उन्होने पूछा, तब औरंगजेब को महान मान लिया जाए? उस पर:
मैंने तो ऐसा नहीं कहा कि औरंगजेब महान था। . पूर्व आधुनिक (pre modern) इतिहास में जब राज्य की स्थापना और विस्तार में तलवार की भूमिका अहम होती थी तब अधिक रक्तपात करने वाले राजा को महान मान लिया गया है चाहे वह सिकंदर हो या अशोक; समुद्रगुप्त या नैपोलियन। मैं सिर्फ यही कहना चाहता हूं कि इतिहास की किताब से एक पन्ना फाड़कर न पढ़ें। औरंगजेब जैसा भी था महान या कमीना उसके दरबारी कारिंदे भी वैसे ही थे। और ऐतिहासिक तथ्य है कि उसके ज्यादातर मनसबदार, जागीरदार तथा सैनय अधिकारी राजपूत और मराठे थे। शिवाजी के विरुद्ध युद्ध में औरंगजेब के सेनापति राजा जय सिंह थे। अकबर के समय राजपुताने के एक राजा, मेवाड़ के राणाप्रताप मुगल सल्तन की अधीनता न स्वीकार कर विरोध में लड़ते रहे. औरंगजेब के समय तो राजपुताने का एक भी रजवड़ा मुगल सल्तनत की अधीनता से बाहर नहीं था। राणाप्रताप के वंशज भी मुगल दरबारी बन गए थे। ऐसा तो नहीं हो सकता कि राजा कमीना था और उसके प्रशासन के सभी स्तंभ महान!! मैं केवल यही कह रहा हूं कि राजा के कारिंदों का राजनैतिक चरित्र वैसा ही होता है, जैसा उनके आका का। ऐसा कहना दोगलापन है कि उसका सेनापति राजा जय सिंह महान था लेकिन औरंगजे कमीना था। मैं केवल यही कहना चाहता हूं कि राजनीति में मामला सत्ता और मलाई का होता है , हिंद-मुसलमान का नहीं। औरंगजेब की सेना में ज्यादातर बड़े सेना अधिकारी राजपत और मराठे थे और शिवाजी की सेना में की अहम पदों पर मुसलमान थे। सांप्रदायिकता आधुनिक विचारधारा है ऐतिहासिक नहीं। धार्मिक राष्ट्र्र्रवाद की विद्रूप अवधारणा पर आधारित सांप्रदायिक विचारधाराएं, औपनिवेशिक पूंजी की कोख से जन्मी जु़ड़वा औलादें हैं।
Thursday, February 13, 2025
शिक्षा और ज्ञान 366 (जनतंत्र)
राजनैतिक हताशा की किसी की पोस्ट पर एक कमेंट का जवाब:
कभी कभी आक्रोश में ऐसी ही प्रतिक्रिया दिमाग में आती है कि यह जनता इसी लायक है, उसे ऐसा ही शासन चाहिए लेकिन जनता ऐसे क्यों है? हम मार्क्सवादी इस जनतंत्र को पंजीवादी (बुर्जुआ) जनतंत्र कहते हैं, लेकिन मार्क्सवाद के नाम पर चुनावी राजनीति करने वाली पार्टियों ने जनता की सोच/चेतना बदलने के लिए क्या किया? सीपीआई/सीपीएम तथा बुर्जुआ चुनावी पार्टियों में कोई गुणात्मक फर्क ही नहीं बचा है.। मार्क्स ने कहा है कि शासक वर्ग के विचार सासक विचार भी होते हैं, पूंजीवाद माल के साथ विचारों का भी उत्पादव करता है तथा सामाजिक उत्पादन के हर चरण के अनुरूप सामाजिक चेतना का स्वरूप और चरित्र भी होता है , परिवर्तन के लिए जरूरी है सामाजिक चेतना का जनवादीकरण यानि क्रांतिकारी (वर्ग) चेतना का संचार। सामाजिक चेतना के जनवादीकरणि के लिए जरूरी है, जाति-धर्म आदि के नाम पर अस्मिता राजनीति की मित्या चेतना से मुक्ति। हिंदुत्व फासीवाद 3ाह्ममवाद की ही राजनैतिक अभिव्यक्ति है। सामाजिक चेतना के जनवादीकरण का काम कम्युनिस्ट पार्टियों का है, जिसमें वे पूरी तरह असफल रहीं। लेकिन इतिहास का यह अंधकार युग अस्थाई है। फासीवादी ताकतें शिक्षा के विकृतीकरण से सामाजिक चेतना के जनवादीकरण की धार कुंद करने के हर संभव प्रयास कर रही हैं, ज्ञान के कुओं को धर्म की अफीम से पाट ररही हैं। लेकिन अदम गोंडवी के शब्दों में. "ताला लगा के आप हमारी ज़बान को , कैदी न रख सकेंगे जेहन की उड़ान को।" हर निशा एक भोर का ऐलान है, हर अंधे युग का अंत देर-सबेर होता ही है।
शिक्षा और ज्ञान 367 (गुलाम बौद्धिकता)
कृष्णमोहन की पुस्तक 'गुलाम बौद्धिकता'के संदर्भ में Gyan Prakash Yadav की पोस्ट पर कमेंट:
क्या संयोग है कि मैंने भी यह पुस्तक, 'गुलाम बौद्धिकता' पिछले साल मेले में ही खरीदी थी। ज्यादातर शैक्षणिक नौकरियां शिक्षणेतर कारणो (extra academic consideraions) से मिलती हैं, साथ में शैक्षणिक सक्षमता भी होना, अतिरिक्त योग्यता है। ऐसे में तमाम लुच्चे-लफंगे प्रवृत्ति के लोगों का प्रोफेसर होना आश्चर्यजनक नहीं लगना चाहिए। नाम में मिश्र के पुछल्ले के बावजूद मैंने दिल्ली एवं अन्य विश्वविद्यालयों में 14 साल इंटरविव दिए। 1984 में इलाहाबाद विवि में मेरा इंटरविव एक घंटे से अधिक चला, 6 पद थे, मैं सोचने लगा था कि गंगापार नया नया धूसी बन रहा था वहां घर देखूं या गंगा इस पार तेलियर गंज में, हा हा। उसके कुछ साल बाद तत्कालीन कुलपति कहीं टकरा गए और बताए कि मेरे इंटरविव से वे इतने प्रभावित हुए थे कि तमाम तर के बावजूद वे मेरा नाम पैनल में सातवें लंर पर रखवा पाए थे। 6 पद थे तो 7वें पर रखें या सत्तरवें पर? जब कोई कहता था कि मुझे नौकरी देर से मिली तो मैं कहता था कि सवाल उल्टा है, मिल कैसे गयी?
Monday, February 3, 2025
शिक्षा और ज्ञान 365 (इतिहास का गतिविज्ञान)
इतिहास का गतिविज्ञज्ञान अपनी रफ्तार और दिशा अपनी गति की प्रक्रिया में खुद तय करता है, उसके लिए पहले से कोई टाइमटेबल नहीं बनाया जा सकता। हमारे छात्रजीवन से अब तक के परिवर्तनों की 60 साल पहले कल्पना भी नहीं की जा सकती थी, लड़कियों को पढ़ने के लिए लड़ना पड़ता था, आज लड़ने के लिए पढ़ रही हैं।
कुछ नहीं कुछ नहीं होता
न सोचने से किसी विचार का जन्म नहीं होता,
न लिखने से भी कुछ नहीं होता,
इसलिए लिखता हूं
न बोलने से भी कुछ नहीं होता,
इसलिए बोलता हूं
न पढ़ने से भी कुछ नहीे होता,
इसलिए पढ़ लेता हूं
न करने से भी कुछ नहीं होता
इसलिए कुछ-न-कुछ करता रहता हूं
वैसे तो कुछ भी कुछ नहीं होता
उसी तरह जैसे नामुमकिन जिंदा आदमी का कुछ न करना
न सोचने, न लिखने, न बोलने, न पढ़ने, न करने से भी कुछ नहीं होता
इसलिए सोचता, लिखता, पढ़ता, बोलता और करता रहता हूं
ये सब इस उम्मीद में करता रहता हूं कि हो सकता है कुछ हो ही जाए।
(ईमि: 03.02.2025)
Sunday, January 26, 2025
शिक्षा और ज्ञान 364(धर्म और राजनीति)
नवनिर्वाचित अमेरिकी राषटरपति को चर्च के बिशप द्वारा नसीहत की Premkumar Mani जी की पोस्ट पर कमेंट:
धर्म के चंगुल से राजनीति की मुक्ति यूरोपीय नवजागरण क्रांति की एक उपलब्धि थी। आधुनिक राजनैतिक दर्शन की बुनियाद रखते हुए इस युग के राजनैतिक दार्शनिक मैक्यावली ने धार्मिक आचार संहिता से स्वतंत्र रजनैतिक आचार संहिता की हिमायत की। आचार संहिताओं के मूल्यों में टकराव की स्थिति में उसने समझदार प्रिंस को धार्मिक आचार संहिता पर राजनैतिक आचार संहिता को तरजीह देने की हिमायत की। प्रबोधन (एनलाइटेनमेंट) क्रांति ने ईश्वर को इहलौकिक क्रियाकलापों के निर्धारण से मुक्त कर दिया। आधुनिक राज्य के आधुनिक, उदारवादी राजनैतिक दर्शन ने सत्ता के श्रोत के रूप में ईश्वर की अमूर्त अवधारणा की जगह 'हम लोग' की अमूर्त अवधारणा ने ले ली और सत्ता की विचारधारा के कूप में धर्म की जगह राष्ट्रवाद ने ले ली। ऐसे में संविधान की जगह ईश्वर के नाम पर राजनैतिक शपथ लेना या चर्च या मंदिर जाकर राजनैतिक दायित्व निभाने के लिए ईश्वर की अभ्यर्थना प्रतिगामी राजनैतिक कृत्य है। वैसे आप की बिशप के साहस की बात से सहमत हूं। जहां ज्यादातर धार्मिक गुरू और साधू-संत सत्ता की कृपा-पात्रता और सरकारी नीतियों के महिमामंडन के कुकृत्यों में संलग्न हों ऐसे में चर्च के बिशप द्वारा महाबली अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप को प्रवासियों और थर्ड जेंडर जैसे मुद्दों पर उनकी नीतियों के विरुद्ध नशीहत देना वाकई साहस का काम है। साहस को सलाम, देखिए ट्रंप ईश्वरके प्रतिनिधि की सलाह मानता है कि नहीं?