उर्दू (और हिंदी) का विकास फारसी से नहीं, हिंदी की पूर्ववर्ती उत्तर भारतीय भाषाओं, विशेष रूप से ब्रज से बाजारू कामकाज की भाषा के रूप में हुआ, जिसकी लिपि फारसी थी। गौरतलब है कि काफी समय तक पंजाबी की लिपि भी फारसी थी। ब्रज (खड़ी बोली) के व्याकरण और वाक्य-संरचना (Grammer and syntax) के आधार पर दकनी (दक्षिणी) हिंदी के रूप में इसकी शुरुआत हुई जिसमें अरबी, फारसी, अवधी भोजपुरी, पंजाबी आदि भाषाओं के बातचीत में इस्तेमाल होने वाले प्रचलित शब्द जुड़ते गए, जैसा कि हर विकासशील भाषा के साथ होता है। दक्षिणी हिंदी कालांतर में हिंदुस्तानी बन गयी , जो फारसी लिपि में लिखने पर उर्दू और नागरी लिपि में लिखने पर हिंदी कहलाने लगी। 1919 के कांग्रेस अधिवेसन में गांधी जी ने उत्तर भारत में बोली जाने वाली तथा क्रमशः फारसी एवं नागरी में लिखी जानी वाली हिंदुस्तानी को अखिल भारतीय संपर्क भाषा के रूप अपनाने का प्रस्ताव पेश किया था। कांग्रेस में संस्कृतनिष्ठ भाषा के पैरोकारों ने हिंदुस्तानी को हिंदी-उर्दू में विभाजित कर हिंदी का समर्थन किया। इस तरह भाषा के सांप्रदायिककरण की प्रक्रिया शुरू हुई। 1948 में गांधी की हत्या हो गयी।1949 में संविधान सभा जब राष्ट्रीय संपर्क भाषा के मुद्दे पर मतदान हुआ तो हिंदुस्तानी और हिंदी के पक्ष में बराबर मत पड़े और अध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद के कास्टिंग वोट से हिंदी के पक्ष में फैसला हुआ।लेकिन जो हिंदी या उर्दू हम या पाकिस्तानी बोलते हैं, वह दरअसल हिंदुस्तानी ही है जो नागरी लिपि में हिंदी हो जाती है और फारसी लिपि में उर्दू।
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