Sunday, December 25, 2011

अदम गोंडवी: एक जैविक जनकवि

अदम गोंडवी: एक जैविक जनकवि
ईश मिश्र

"मेरी खुद्दारी ने अपना सर झुकाया दो जगह
वो कोइ मज़लूम हो या साहिबे किरदार हो."
साहित्यिक प्रतिष्ठानों और प्रतिष्ठित साहित्यिकों की उपेक्षा और अवमानना को धता बताते हुए, सिर्फ मजलूम और साहिबे किरदार के सामने सर झुकाने वाले, गंवईं किसान, जनपक्षीय चिंतक-कवि, अदम गोंडवी, अपनी अदम्य जनपक्षीय प्रतिबद्धता और साहस के साथ, मजलूमों और मुफलिसों की पीड़ा और आक्रोश को शब्दों में पिरोकर जन-द्रोहिओं को बेनकाब करके जन-विद्रोह के आह्वान की कवितायें लिखते हुए खुद्दारी से जिए.अंतिम समय में मित्र-प्रशंसकों का उनके इलाज़ के लिए चंदे की अपील जारी करना उन्हें नागवार लगा और खुद्दारी के साथ उन्होंने किसी के प्रति बिना किसी कृतज्ञता-भाव और बिना किसी के शिकायत के जिन्दगी से विदा ले ली. ज़िन्दगी भर मीडिया और साहित्यिकों की नज़रों से ओझल रहे अदम, मरने के बाद सोसल नेटवर्किंग और मीडिया में विवाद के विषय बन गए. कुछ लोग, उनकी अराजक जीवन शैली और मयनवोशी के बहाने उन पर आत्मघात का आरोप लगा रहे हैं. लुछ अन्य लोग उनके साथ हुई उपेक्षाओं और अन्याय का ज़िक्र करके, दया भाव से उन्हें संतों की कोटि में बिठाना चाहते हैं. काश अदम जी होते तो दो टूक जवाब देते खांटी गोंडवी अंदाज में.
“फटे कपड़ों में तन ढाँके गुजरता हो जहाँ कोई
समझ लेना वो पगडंडी अदम के गाँव जाती है.”

“घर में ठंडे चूल्हे पर अगर खाली पतीली है
बताओ कैसे लिख दूं धूप फागुन की नशीली है”
और इन विद्वानों से कहते :
“मैंने अदब से हाथ उठाया सलाम को
समझा उन्होंने इससे है खतरा निजाम को.”

"ग़ज़ल को ले चलो अब गाँव के दिलकश नजारों में
मुसलसल फन का दम घुँटता है इन अदबी इदारों में ."

लेकिन वरिष्ठ लेखक-कवि मोहन श्रोत्रिय जैसे लोगों ने अदम की कविताओं की धार और प्रहार के पैनेपन के ही प्रसंग से एक तथ्यपरक मूयांकन के साथ श्रधांजलि दी है: "वह अकेले बहुतेरे कवियों से अधिक सार्थक और प्रेरक काम कर रहे थे. ...... यह अनुल्लेखनीय नहीं है की उनकी रचनाएँ प्रतिष्ठानी समर्थन-अनुमोदन-प्रोत्साहन के बगैर लोकप्रिय हुईं." बोधिसत्व ने अदम को "नक्कालों की दुनिया में" "एक खुले मन का कवि" बताया. "उनमें ऐसी कई बातें थीं जो आज इन्स्सानियत के अजूबघर में, कवि समाज के म्युजियम में भी नहीं मिलतीं."
ऐसी असन्दिग्ध प्रतिबद्धता, इतनी संवेदनशीलता और सम्प्रेषण की ऐसी पैनीधर वाले चिन्तक/कवी/लेखखक/कलाकार -- "संस्कृतिकर्मी" -- "अराजक जीवन और असीम मदिरापान" के "व्यसन" में क्यों डूबते हैं? इन उप्देश्क्कों ने कभी सोचा कि क्यों कोइ रूसो या गोरख पाण्डेय विक्षिप्त हो जाता है है या आत्महत्या कर लेता है? शोषण-दमन के विरुद्ध "बगावत" की गुहार लगाने और "जनता को हक है कि हथियार उठा ले " जैसा बेख़ौफ़-बेबाक वक्तव्य देने वाला अदम गोंडवी क्यों मदिरामय हो जाता है? शासक वर्ग विचारों के “खतनाक” असर को खत्म करने के मकसद से विचारक को ही ख़त्म कर देता है, लेकिन वह नहीं जनता कि इससे वे विचार और भी “खतरनाक” हो जाते हैं. उसी तरह कविता की धार के पैनेपन से जूझने में असमर्थ शासक वर्गों के भोंपू मरणोपरांत कवि के निजी आचरण पर कीचड उछालना शुरू कर देते हैं, यह जाने बिना कि इससे कविता की धार और तेज हो जायेगी. किसी ने सही कहा है: ‘क्या सोच कर तुम मेरा कलम तोड़ रहे हो/इससे तो और निखर जायेगी आवाज़’. अदम की कवितायें, उन्ही क्र शब्दों में, “बयान” हैं.
“एशियाई हुस्न की तस्वीर है मेरी गज़ल,
मशरिकी फन में नई तामीर है मेरी गज़ल.
दूर तक फैले हुए सरयू के साहिल पे आम,
शोख लहरों की लिखी तहरीर है मेरी गज़ल.”
“मदिरामय” “अराजकजी जीवन-शैली” के अंतिम कुछ वर्षों में भी अदम काका कलम मौन नहीं रहा. पोस्ट-माडर्निजम पर प्रासंगिक टिप्पणी वाली कविता हाल की है.
“तुलसी इनके लिए विधर्मी,
देरीदा को खास लिखेंगे.
इनके कुत्सित संबंधों से
पाठक का क्या लेना-देना
लेकिन ये तो जिद पे अड़े हैं
अपना भोग-विलास लिकेंगे.

अदम की कविताओं का उनके उचित सन्दर्भ में मूल्यांकन, साबित करेगा कि उनकी गणना पिछली और इस सदी के महान जनकवियों में होनी चाहिए. राजनैतिक ग़जलों की जो परम्परा दुष्यंत ने शुरू किया, अदम उसे एक नए मुकाम तक ले गए. आकंठ भ्रष्टाचार में डूबे वर्तमान में अदम की कवितायें और भी प्रासंगिक हैं. लेकिन साथ होने पर लगता ही नहीं था कि पुरस्कारों और प्रतिष्ठानों से अछूते, मटमैले कुरता-धोती-गमछा में गंवई किसान दिखने वाले, कुछ अपनी और ज्यादा अपने समानधर्मी कवियों की कवितायें और संस्मरण, सखा-भाव और बाल-सुलभ उत्सुकता से सुनाने वाले, अदम गोंडवी इतने बड़े आदमी थे. "अदीबों की नयी पीढी से" धूमिल की विरासत को करीने से" "संजो कर" रखने की गुजारिश" करने वाले अदम जी, नागार्जुन पर लिखी अपनी कविता बहुत चाव से सुनाते थे. बिना प्रतिस्पर्धा के अपने समानधर्मी पूर्ववर्ती और समकालीन कवियों के प्रति अतिशय सम्मान और उनकी विरासत को आगे बढाने की अदम की धुन उल्लेखानीय है. पिछले कई सालों से बातची वे अक्सर अपने को “सड़कछाप” कहा करते थे. अदम जी सड़कछाप नहीं थे. वे आमजन के कवि थे और उन्ही के साथ सड़क के आदमी थे, साहित्य के वातानुकूलित संग्रहालयों के नहीं. अदम सच मायने में एक जैविक जनकवि थे.

ग्राम्सी ने लिखा है कि किसानों के पास अपना जैविक बुद्धिजीवी नहीं होता. वह अन्य वर्गों को जैविक बिद्धिजीवी प्रदान करता है लेकिन खुद के लिए नहीं. अदम गोंडवी इसके अपवाद हैं. अदम अन्य दलित-दबले-कुचले वर्गों के साथ कृषक वर्ग के भी बुद्धिजीवी हैं. साम्रदायिकता और जातिवाद के मुद्दों को भी वे वर्ग हित से जोड़कर देखते हैं और वर्ग-शत्रु की इन विचारधाराओं पार प्रखर प्रहार करते हैं:

ये अमीरों से हमारी फैसलाकुन जंग थी
फिर कहाँ से बीच में मस्जिद व मंदिर आ गए.
जिनके चेहरे पर लिखी है जेल की ऊंची फसील
रामनामी ओढ़ कर संसद के अंदर आ गए.”


“हिंदू या मुस्लिम के एहसास को मत छेडिए
अपनी कुर्सी के लिए जज्बात को मत छेडिए.
छेडिए इक जंग मिल-जुल कर गरीबी के खिलाफ
दोस्त मेरे मजहबी नग्मात को मत छेडिए.”

"भूख के एहसास को शेरो सुखन तक ले चलो
या अदब को मुफलिसों की अंजुमन तक ले चलो."


अदम जी २८ मार्च २०११ को हिंदी भवन में काव्य पाठ करने आये थे. मैंने तो कभी सोचा भी नहीं था कि अगले दिन अदम जी, हाल ही में वाणी प्रकाशन से प्रकाशित अपना संकलन, समय से मुठभेड़ देने, मेरे घर आयेंगे. यहां अनुल्लेखनीय नहीं होगा कि पत्र-पत्रिकाओं, गोष्ठियों के माध्यम से अदम गोंडवी का जनपक्षीय कविकर्म लगभग ४ दशकों से आम जन के मानस पटल पर दस्तक दे रहा था. कई क्रान्तिकारी सांस्कृतिक समूह उनकी कविताओं गानों को न जाने कब से स्वर देते रहे हैं. याद नहीं है, “सौ में सत्तर आदमी जब आज भी नाशाद है/दिल पे रख कर हाथ कहिए, देश क्या आज़ाद है” और अन्य गज़लें हम कब से उद्धृत करते आ रहे हैं, लेकिन यह किसी प्रतिष्ठित प्रकाशन से छपा उनका पहला संकलन है और कुल दूसरा. पहला संकलन, धरती की सतह पर १९८७-८८ में उनके मित्र, वरिष्ठ कवि-लेखक, सुरेश सलिल के अथक प्रयास से छपा था. २९ मार्च २०११ की उस शाम नहीं लगा था कि अदम जी के साथ ‘आचमन’ और आत्मीय विचार-विमर्श में बीते ४-५ घंटे जीवन के अविश्मरणीय क्षण होंगे और दुबारा दुर्लभ. उसके बाद १४-१६ अप्रैल को अदम जी का फिर दिल्ली आना हुआ और ३ दिन उनके साथ सत्संग का अवसर दुबारा मिला. उसका ज़िक्र आगे करूंगा. इन अंतिम दो मुलाकातों में उनके अन्दर एक अजीब सी बेचैनी दिखी जिसके बारे में वे कोइ उपयुक्त शेर सुनाकर उसी तरह टाल जाते थे जैसे 'संजीवनी' पर निर्भरता के सवाल. उनकी शराब के लिए संजीवनी शब्द का प्रयोग उनके बेटे आलोक करते थे जो की इस यात्रा में उनके साथ थे क्योंकि अदम जी स्वास्थ्य कारणों से अकेले यात्रा नहीं कर सकते थे. आद्यांत मदिरापान के बावजूद अदम की जबान भले ही लड़खड़ा जाए विचार और विश्लेषण की प्रखरता नहीं.

अदम जी न संत थे, न शराबी. गोंडा जिले के परसपुर-आटा गाँव में एक संपन्न ठाकुर परिवार में पैदा हुए, विरल काव्य-प्रतिभा से संपन्न, अद्भुत स्वाध्याय और व्यवस्था की समझ एवं अदम्य जनपक्षीय प्रतिबद्धता से ओत-प्रोत, चिन्तक-कवि, अदम गोंडवी एक असाधारण रूप से साधारण इंसान थे. उनकी साधारणता उनका बड़प्पन था. रूसो और अदम में काफी समानताएं हैं.दोनों ही कबीर की तरह ‘जो घर फूके अपनों चले हमारे साथ’ के दर्शन में विश्वास करते थे और दोनों ही ५-७वी तक पढ़े थे. रूसो के विचार में, सभ्यता मनुष्यों के अन्दर दोगलेपन का संचार करती है. सम्मान पाने के चक्कर में वह वैसा दिखना चाहता है जैसा होता नहीं. आपातकाल के बाद जैसा सुखद आश्चर्य जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में गंगा ढाबे पर बाबा(नागार्जुन) के साथ पहली बार चाय पीते हुए, उनसे अभिनय-भाव में "बीबी इंदिरा हो......." सुनने में हुआ था, वैसा ही मंडी हाउस में ढाबे पर चाय के साथ अदम गोंडवी से, "सौ में सत्तर आदमी जब आज बी नाशाद है/दिल पर रख कर हाथ कहिये देश क्या आज़ाद है/.........." सुनकर. सलभ श्रीराम सिंह से "नफस- नफस कदम-कदम..........." सुनकर भी ऐसी ही अनुभूति हुई थी. इन तीनों जनकवियों में और कई समानताओं के अलावा एक समानता यह थे कि तीनो ही सभ्यता के उपरोक्त गुण से वंचित थे.

सुनते हैं अदम कई बार बहुत ताम-झाम वाले आयोजनों के निमंत्रण अस्वीकार कर देते थे. लेकिन हिन्दू कालेज के रतनलाल ने जब १४ अप्रैल २०११ को बाबा साहब आंबेडकर के जन्मदिवस के छोटे से आयोजन में आमंत्रित किया तो उन्होंने सहर्ष स्वीकार कर लिया. वह अदम जी के सार्वजनिक कविता पाठ के चंद अंतिम कार्यक्रमों में से एक था. उनके बेटे आलोक भी साथ थे. इतिहासकार डी.एन. झा की सदारत में भव्य कार्यक्रम हुआ. कुछ कवितायें उन्होंने पढ़ा और कुछ मेरे समेत उनके प्रशंसकों -- काली प्रसाद मौर्या, रविकांत और कृपाल—ने. चमारों की गली पढ़ना तो अदम जी ने शुरू किया और खत्म किया किया कली प्रसाद मौर्या ने. अंतिम पंक्तियों तक पहुंचते-पहुंचते वाचक और श्रोता सभी के गले रुद्ध हो गए और आँखे अश्रुपूरित. जरा सोचिये, वर्णाश्रमी-सामंतवादी सांस्कृतिक परिवेश और सन्दर्भ में पांचवीं-सातवीं तक पढ़े, पूर्वी उत्तरप्रदेश के एक पिछड़े इलाके के एक जन्मना ठाकुर युवक की, चमारों की गली में जाकर ज़िंदगी के ताप को महसूसने और महासूसाने की; “अन्त्यज, कोरी, पाशी” की पीड़ा को आत्मसात कर “धर्म के ठेकेदारों” को उनकी र्दुर्दशा के लिए जिम्मेदार ठहराते हुए, चुनौती देने; और “समझदारों की दुनिया है विरोधाभाष की” की भौतिकवादी समझ की काव्याभ्यक्ति तक की यात्रा कितने कठिन और दुरूह आत्म-मंथन, स्वाध्याय, स्वनिर्माण और संस्कारों से विद्रोह के आत्म-संघर्षों की यात्रा होगी? यह भी सोचिये कि जिसने आमजन के जैविक बुद्धिजीवी की भूमिका ईमानदारी से निभाने के प्रयासों की इतनी लंबी यात्रा बिना किसी प्रोत्साहन के, अभाव-उपेक्षा और अन्य प्रतिकूलताओं के बावजूद बिना उफ़ किये इतने साहस से तय किया वह जीवन के अंतिम वर्षों में जीने के लिए मदिरा पर क्यों निर्भर हो जाता है?

अदम गोंडवी बनने से पहले उनका नाम रामनाथ सिंह था. और जब मौजूदा यथार्थ की क्रूर विसंगतियों को आत्मसात कर 'दुस्साहसी' "अभिव्यक्ति के खतरे" उठाकर अदम गोंडवी बने और "चमारों की गली में" "ज़िंदगी के ताप" को महसूसने-महासूसाने लगे, ठाकुरों की बस्ती में युयुत्सु बन गए. लेकिन अदम के क्रांतिकारी, जनपक्षीय सरोकार और एक न्यायपूर्ण समाज के सपने को साकार करने की ललक और प्रतिबद्धता अदम्य है. वे ललकार कर कहते हैं:

"ताला लगा के आप हमारी जबान को
कैदी न रख सकेंगे जेहन के उड़ान को."
और बिना लाग-लपेट के घोषणा करते हैं जो आज भी उतनी प्रासंगिक है जितनी तब तक रहेगी जब तक तथाकथित जनतांत्रिक व्यवस्था भूमंडलीय पूंजी की सेवा में जनता पर ज़ुल्म ढाती रहेगी.

"पैसे से आप चाहें तो सरकार गिरा दें
संसद बदल गयी है यहाँ की नखास में.
जनता के पास एक ही चारा है बगावत
यह बात कह रहा हूँ होशो हवाश में"

होशो हवाश में बगावत का रास्ता दिखाने वाले अदम क्रान्ति की निरंतरता में यकीन करते थे और नई पीढ़ियों की समझ और उनमें बदलाव की ललक और क्रांतिकारी उमंगो के प्रति काफी आशावादी थे.

"ये नई पीढी पे निर्भर है वही जजमेंट दे
फलसफा गांधी का मौजूं है कि नक्सलवाद है."

और समतामूलक समाज के सपने को साकार करने का जिम्मा उसे ही सौंपते हैं:

"एक सपना है जिसे साकार करना है तुम्हे
झोपडी से राजपथ का रास्ता हमवार हो."

अदम ठेठ गंवई अंदाज़ और तेवर के कवि थे और किसानों-दलितों के दुःख-दर्द के कारणों की पहचान और और उनसे निज़ात पाने के रास्ते के अन्वेषण को समर्पित है अदम का कवि कर्म. उनकी कवितायें अपनी धार और शैली के पैनेपन के चलते शहरी मध्य वर्ग में भी लोकप्रिय हुईं,जैसा का मोहन श्रोत्रिय ने सही कहा है यह उनकी अतिरिक्त उपलब्धि है. अदम के लिए जीवन का कोई "जीवनेतर उद्देश्य" नहीं था. वे मानते थे एक "सार्थक" जीवन जीना अपने आप में बहुत बड़ा उद्देश्य है. और एक जनपक्षीय कवि के रूप में आख़िरी सांस तक अपने विचारों और कविकर्म से, तमाम तरह की प्रतिकूल परिस्थियों और वंचना/उपेक्षा के बावजूद अपने पक्ष और प्रतिबद्धता पर अडिग रहते हुए, जीवन की सार्थकता साबित करते रहे.

इस लेख का उद्देश्य अदम गोंडवी की कविताओं का मूल्यांकन नहीं है जो की एक अलग बहस का मुद्दा है और यह बहस होनी ही चाहिए. न ही इसका उद्देश्य अदम के निजी जीवन को लेकर हो रही आलोचनाओं का जवाब देना है, उनकी रचनाएँ और पुरस्कारों/प्रतिष्ठानों से पारस्परिक वैमनष्यता का उनका सहज-सरल जीवन खुद जवाब हैं उनके. इसका उद्देश्य अदम के रचना-कर्म को उनकी हाल के दिनों की "अराजक जीवन शैली" और "शराब की लत" के निजी जीवन से पृथक कर के देखना भी नहीं है. ऐसा करना कर्मणा मार्क्सवादी, अदम के साथ अन्याय होगा. इसका उद्देश्य एक बड़े जनकवि को विनम्र श्रद्धांजलि देना है जिसने मजाज़, फैज़, दुष्यंत, नागार्जुन, पाश, गोरख पाण्डेय जैसे जनकवियों की राजनैतिक कविताओं की परंपरा में एक नया आयाम जोड़ा. मई इस कामना के साथ जनकवि अदम गोंडवी को श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ के उनकी कवितायें उनके न रहने पर “खुदसरी की राह परपर” चलने वाले रहनुमाओं की नींदे और हराम करें.
नीचे अदम की कुछ कविताओं के कुछ अंशों के साथ मैं दुबारा इस आमजन के खास कवि को जो स्वयं आमजन था, हार्दिक श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ.

अगर खुदसरी की राह पर चलते हों रहनुमा
कुर्सी के लिए गिरते सम्हलते हों रहनुमा
गिरगिट की तरह रंग बदलते हों रहनुमा
टुकड़ों पे जमाखोर के पलते हो रहनुमा
जनता को हक है हाथ में हथियार उठा ले.
गर खुद को कोई मुल्क तकदीर समझ ले
हर शै को ओने ख्वाब की तावीर समझ लेदम
अपणा बयान वेद की तहरीर समझले
जनगण को खानदान की जागीर समझ ले
जनता को हक है हाथ में हथियार उठा ले.


काजू भुने पलेट में, विस्की गिलास में
उतरा है रामराज विधायक निवास में
पैसे से आप चाहें तो सरकार गिरा दें
संसद बदल गयी है यहाँ की नख़ास में
जनता के पास एक ही चारा है बगावत
यह बात कह रहा हूँ मैं होशो-हवास में
...................................

जो डलहौज़ी न कर पाया वो ये हुक़्क़ाम कर देंगे
कमीशन दो तो हिन्दोस्तान को नीलाम कर देंगे
ये बन्दे-मातरम का गीत गाते हैं सुबह उठकर मगर
बाज़ार में चीज़ों का दुगुना दाम कर देंगे
सदन में घूस देकर बच गई कुर्सी तो देखोगे वो
अगली योजना में घूसखोरी आम कर देंगे
....................................

हिन्दू या मुस्लिम के अहसासात को मत छेड़िये
अपनी कुरसी के लिए जज्बात को मत छेड़िये
हममें कोई हूण, कोई शक, कोई मंगोल है
दफ़्न है जो बात, अब उस बात को मत छेड़िये
ग़र ग़लतियाँ बाबर की थीं; जुम्मन का घर फिर क्यों जले
ऐसे नाजुक वक्त में हालात को मत छेड़िये
हैं कहाँ हिटलर, हलाकू, ज़ार या चंगेज़ ख़ाँ
मिट गये सब, क़ौम की औक़ात को मत छेड़िये
छेड़िये इक जंग, मिल-जुल कर ग़रीबी के ख़िलाफ़
दोस्त, मेरे मजहबी नग्मात को मत छेड़िये
......

भटकती है हमारे गांव में गूंगी भिखारन-सी।
सुबह से फरवरी बीमार पत्नी से भी पीली है।।
सुलगते जिस्म की गर्मी का फिर एहसास वो कैसे।
मोहबत की कहानी अब जली माचिस की तीली है।।
....................................

सब्र की इक हद भी होती है तवजो दीजिए
गर्म रक्खें कब तलक नारों से दस्तरखान को
शबनमी होंठों की गर्मी दे न पाएगी सुकून
पेट के भूगोल में उलझे हुए इंसान को
....................................

अदब का आइना उन तंग गलियों से गुजऱता है
जहाँ बचपन सिसकता है लिपट कर माँ के सीने से
बहारे-बेकिराँ में ता-कय़ामत का सफऱ ठहरा
जिसे साहिल की हसरत हो उतर जाए सफ़ीने से
अदीबों की नई पीढ़ी से मेरी ये गुज़ारिश है
सँजो कर रखें 'धूमिल' की विरासत को कऱीने से.
....................................

जो उलझ कर रह गयी है फाइलों के जाल में
गाँव तक वह रौशनी आएगी कितने साल में
बूढ़ा बरगद साक्षी है किस तरह से खो गयी
राम सुधि की झौपड़ी सरपंच की चौपाल में
खेत जो सीलिंग के थे सब चक में शामिल हो गए
हम को पट्टे की सनद मिलती भी है तो ताल में
....................................

जो बदल सकती है इस दुनिया के मौसम का मिजाज़
उस युवा पीढ़ी के चेहरे की हताशा देखिये
....................................

गर चंद तवारीखी तहरीर बदल दोगे
तो इससे किसी कौम की तकदीर बदल दोगे
जो अक्स उभरता है रसखान की नज्मों में
क्या कृष्ण की वो मोहक तस्वीर बदल दोगे
जायस से वो हिन्दी की दरिया जो बह के आया
मोड़ोगे उसकी धरा या नीर बाल दोगे
तारीख बताती है तुम भी तो लुटेरे हो
क्या द्रविडों से छीनी जागीर बदल दोगे.

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जितने जमाखोर थे कुर्बो-जवार में
परधान बनके आ गए अह्गली कतार में.
दीवार फांदने में यूं जिनका रिकार्ड था
चौदहरी बने हैं उम्र के उतार में
जब दस मिनट की पूजा में घंटों गुजार दें
समझो कोइ गरीब फंसा है शिकार में.

.......................

किसी का रंग धानी है किसी का रंग पीला है
जमातों में बंटा है अपने अदीबों का कबीला है.

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नीलोफर सबनम नहीं अंगार की बातें करो
वक़्त के बदले हुए मेआर की बातें करो
भाप बन सकती पानी अहगर हो नीम गर्म
क्रान्ति लेन के लिए हथियार की बातें करो
आसमानी बाप से जब प्यार कर सकते नहीं
इस जमीं के ही किसी किरदार की बातें करो
तर्क कर तनकीद के जज्बे को मर जाती है कौम
जुर्म है ठहराव अब रफ़्तार की बातें करो

...................

जिसकी गर्मी से महकते है बगावत के गुलाब
आप के सीने में महफूज़ वह चिंगारी रहे

...................................

वेद मे जिनका जिक्र हाशिए पर भी नहीं
वे अभागे आस्था विश्वास लेकर क्या करें
लोकरंजन हो जहां संबुक वध की आड़ में
उस व्यवस्था का घृणित इतिहास लेकर क्या करें.

..................

मैं चमारों की गली तक ले चलूँगा आपको
आइए महसूस करिए ज़िन्दगी के ताप को
मैं चमारों की गली तक ले चलूँगा आपको
जिस गली में भुखमरी की यातना से ऊब कर
मर गई फुलिया बिचारी कि कुएँ में डूब कर
है सधी सिर पर बिनौली कंडियों की टोकरी
आ रही है सामने से हरखुआ की छोकरी
चल रही है छंद के आयाम को देती दिशा
मैं इसे कहता हूं सरजूपार की मोनालिसा
कैसी यह भयभीत है हिरनी-सी घबराई हुई
लग रही जैसे कली बेला की कुम्हलाई हुई
कल को यह वाचाल थी पर आज कैसी मौन है
जानते हो इसकी ख़ामोशी का कारण कौन है
थे यही सावन के दिन हरखू गया था हाट को
सो रही बूढ़ी ओसारे में बिछाए खाट को
डूबती सूरज की किरनें खेलती थीं रेत से
घास का गट्ठर लिए वह आ रही थी खेत से
आ रही थी वह चली खोई हुई जज्बात में
क्या पता उसको कि कोई भेड़िया है घात में
होनी से बेखबर कृष्ना बेख़बर राहों में थी
मोड़ पर घूमी तो देखा अजनबी बाहों में थी
चीख़ निकली भी तो होठों में ही घुट कर रह गई
छटपटाई पहले फिर ढीली पड़ी फिर ढह गई
दिन तो सरजू के कछारों में था कब का ढल गया
वासना की आग में कौमार्य उसका जल गया
और उस दिन ये हवेली हँस रही थी मौज़ में
होश में आई तो कृष्ना थी पिता की गोद में
जुड़ गई थी भीड़ जिसमें जोर था सैलाब था
जो भी था अपनी सुनाने के लिए बेताब था
बढ़ के मंगल ने कहा काका तू कैसे मौन है
पूछ तो बेटी से आख़िर वो दरिंदा कौन है
कोई हो संघर्ष से हम पाँव मोड़ेंगे नहीं
कच्चा खा जाएँगे ज़िन्दा उनको छोडेंगे नहीं
कैसे हो सकता है होनी कह के हम टाला करें
और ये दुश्मन बहू-बेटी से मुँह काला करें
बोला कृष्ना से बहन सो जा मेरे अनुरोध से
बच नहीं सकता है वो पापी मेरे प्रतिशोध से
पड़ गई इसकी भनक थी ठाकुरों के कान में
वे इकट्ठे हो गए थे सरचंप के दालान में
दृष्टि जिसकी है जमी भाले की लम्बी नोक पर
देखिए सुखराज सिंग बोले हैं खैनी ठोंक कर
क्या कहें सरपंच भाई क्या ज़माना आ गया
कल तलक जो पाँव के नीचे था रुतबा पा गया
कहती है सरकार कि आपस मिलजुल कर रहो
सुअर के बच्चों को अब कोरी नहीं हरिजन कहो
देखिए ना यह जो कृष्ना है चमारो के यहाँ
पड़ गया है सीप का मोती गँवारों के यहाँ
जैसे बरसाती नदी अल्हड़ नशे में चूर है
हाथ न पुट्ठे पे रखने देती है मगरूर है
भेजता भी है नहीं ससुराल इसको हरखुआ
फिर कोई बाँहों में इसको भींच ले तो क्या हुआ
आज सरजू पार अपने श्याम से टकरा गई
जाने-अनजाने वो लज्जत ज़िंदगी की पा गई
वो तो मंगल देखता था बात आगे बढ़ गई
वरना वह मरदूद इन बातों को कहने से रही
जानते हैं आप मंगल एक ही मक़्क़ार है
हरखू उसकी शह पे थाने जाने को तैयार है
कल सुबह गरदन अगर नपती है बेटे-बाप की
गाँव की गलियों में क्या इज़्ज़त रहे्गी आपकी
बात का लहजा था ऐसा ताव सबको आ गया
हाथ मूँछों पर गए माहौल भी सन्ना गया था
क्षणिक आवेश जिसमें हर युवा तैमूर था
हाँ, मगर होनी को तो कुछ और ही मंजूर था
रात जो आया न अब तूफ़ान वह पुर ज़ोर था
भोर होते ही वहाँ का दृश्य बिलकुल और था
सिर पे टोपी बेंत की लाठी संभाले हाथ में
एक दर्जन थे सिपाही ठाकुरों के साथ में
घेरकर बस्ती कहा हलके के थानेदार ने -
"जिसका मंगल नाम हो वह व्यक्ति आए सामने"
निकला मंगल झोपड़ी का पल्ला थोड़ा खोलकर
एक सिपाही ने तभी लाठी चलाई दौड़ कर
गिर पड़ा मंगल तो माथा बूट से टकरा गया
सुन पड़ा फिर "माल वो चोरी का तूने क्या किया"
"कैसी चोरी, माल कैसा" उसने जैसे ही कहा
एक लाठी फिर पड़ी बस होश फिर जाता रहा
होश खोकर वह पड़ा था झोपड़ी के द्वार पर
ठाकुरों से फिर दरोगा ने कहा ललकार कर -
"मेरा मुँह क्या देखते हो ! इसके मुँह में थूक दो
आग लाओ और इसकी झोपड़ी भी फूँक दो"
और फिर प्रतिशोध की आंधी वहाँ चलने लगी
बेसहारा निर्बलों की झोपड़ी जलने लगी
दुधमुँहा बच्चा व बुड्ढा जो वहाँ खेड़े में था
वह अभागा दीन हिंसक भीड़ के घेरे में था
घर को जलते देखकर वे होश को खोने लगे
कुछ तो मन ही मन मगर कुछ जोर से रोने लगे
"कह दो इन कुत्तों के पिल्लों से कि इतराएँ नहीं
हुक्म जब तक मैं न दूँ कोई कहीं जाए नहीं"
यह दरोगा जी थे मुँह से शब्द झरते फूल से
आ रहे थे ठेलते लोगों को अपने रूल से
फिर दहाड़े, "इनको डंडों से सुधारा जाएगा
ठाकुरों से जो भी टकराया वो मारा जाएगा
इक सिपाही ने कहा, "साइकिल किधर को मोड़ दें
होश में आया नहीं मंगल कहो तो छोड़ दें"
बोला थानेदार, "मुर्गे की तरह मत बांग दो
होश में आया नहीं तो लाठियों पर टांग लो
ये समझते हैं कि ठाकुर से उलझना खेल है
ऐसे पाजी का ठिकाना घर नहीं है, जेल है"

पूछते रहते हैं मुझसे लोग अकसर यह सवाल
"कैसा है कहिए न सरजू पार की कृष्ना का हाल"
उनकी उत्सुकता को शहरी नग्नता के ज्वार को
सड़ रहे जनतंत्र के मक्कार पैरोकार को
धर्म संस्कृति और नैतिकता के ठेकेदार को
प्रांत के मंत्रीगणों को केंद्र की सरकार को
मैं निमंत्रण दे रहा हूँ- आएँ मेरे गाँव में
तट पे नदियों के घनी अमराइयों की छाँव में
गाँव जिसमें आज पांचाली उघाड़ी जा रही
या अहिंसा की जहाँ पर नथ उतारी जा रही
हैं तरसते कितने ही मंगल लंगोटी के लिए
बेचती है जिस्म कितनी कृष्ना रोटी के लिए !

ईश मिश्र
१७ बी, विश्वविद्यालय मार्ग
हिंदू कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय
दिल्ली ११०००७
ईमेल: mishraish@gmail.com

4 comments:

  1. प्रस्तुति बहुत अच्छी लगी.क्या organic intellectual के लिए जैविक की जगह आवयविक ज्यादा सटीक नहीं रहेगा?

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  2. जैविक विज्ञान में स्वीकृत सा हो चुका है तो जैविक बुद्धिजीवी ज्यादा उपयुक्त है.

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  3. Nam aankho se shradhanjali. Kabeer aur Adam banaye nahi jate, vo paida hote hain.

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