मैंने प्रॉग्रेस प्रकाशन (मॉस्को) से प्रकाशित गोर्की का उपन्यास 'मदर' 1973-74 में इलाहाबाद में यूनिवर्सिटी रोड के पास पीपीएच (पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस) की दुकान से 8-10 आने (या ऐसा ही कुछ) में खरीदा था विज्ञान का विद्यार्थी था, साहित्यिक विज्ञान के बारे में जानकारी नहीं थी, 1975 दिसंबर तक पढ़ना टालता गया। जाड़े की छुट्टियों में घर जाते समय साथ ले गया और रास्ते में बस में ही पढ़ना शुरू किया, कथानक, जगहें और पात्र विदेशी होने के बावजूद अपरिचित नहीं लगे। 2016 में (40-41 साल बाद) पलटने के लिए फिर उठा लिए और आदि से अंत तक पढ़ गया तथा लगा पहली बार पढ़ रहा हूं। महान रचनाएं जितनी भी बार पढ़ी जाएं, हमेशा लगता है जैसे पहली बार पढ़ रहे हैं। सभी रचनाएं समकालिक होती हैं, महान रचनाएं सर्वकालिक (कालजयी) होती है। पढ़ना खत्म ही किया था कि रोहित बेमुला की शहादत के विरुद्ध आंदोलित जेएनयू पर सरकारी हमले के विरुद्ध आंदोलन छिड़ गया। 14 या 15 फरवरी की बात होगी घऱ के बगीचे में जेएनयू पर लेख लिखने बैठा ही था कि पता चला उस दिन जेएनयू में कैंपस पर हमले के विरुद्ध मानव श्रृंखला (ह्यूमन चेन) प्रतिरोध का आयोजन है तो एक बार लगा कि एक की संख्या का ही तो फर्क है, लेख ही पूरा कर लूं। फिर लेनिन की स्टेट एं रिवल्यूसन की पोस्ट स्क्रिप्ट याद आई, 'क्रांति में भागीदारी उसके बारे में लिखने से अधिक सुखद है तथा लैपटॉप बंद कर मोटर सािकिल में किक मारा और जेेनयूूू पहुंच गया और पाया बहुत से समकालीन जेेनयआइट्स दूर-दराज से आए हैं, लगा कि न आता तो जीवन भर पश्चाताप रहता। लेख की शुरुआत गोर्की की मां के ही संदर्भ से किया। कन्हैयाऔर उमर की मांओं में मुझे पॉवेल की मां दिखी। कालजयी मां के कालजयी लेखक गोर्की को सलाम।
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