Friday, March 16, 2018

फुटनोट 166 (ज्योतिष)

Shashi Bhushan Tamare कुंडली दादा जी की याद के लिए सिरक्षित रखा है, लिखावट इतनी सुंदर न होती, तब भी शायद रखता। भविष्यवाणियों में मेरा विश्वास नहीं, उनका था। कुंडली से ही मुझे ईशवी संवत की अपनी ठीक-ठीक जन्मतिथि मालुम हुई। उनके एक शिष्य ने बताया था कि ऐसी कुंडली या तो राजा की होती है या फकीर की। राजा की कभी खाहिस नहीं रही और 17 साल का होने के महीने भर पहले शादी कर दी गयी, फकीर की गुंजाइश ही नहीं रही। उनकी एक बात सही निकली कि यदि कोई बात सही लगे तो अड़ जाऊंगा जो भी हो, इसके लिए किसी नक्षत्र का नाम लेते थे। पंचांग से मेरी आस्था बहुत जल्दी खत्म हो गयी, टेस्ट करने के लिए अक्सर दिशाशूल में घर से निकलता था। 13 साल में अनावश्यक समझ जनेऊ त्याग दिया। छुट्टियों में आता तो मंत्र पढ़कर फिर पहनाते, वापस जाते हुए गांव के बाहर किसी पेड़ पर टांग देता। फिर उन्होंने अपवित्र को बार बार पवित्र करना बंद कर दिया। वैसे ही उन्होंने मेरा पागल उपनाम रख दिया था। तब भी मुझे बहुत मानते थे। आयुर्वेद भी जानते थे। अपनी अडिग आस्था के बावजूद बच्चों की भी बातें सुनते थे। न मुहूर्त बताने या कुंडली बनाने का दक्षिणा लेते थे, न नब्ज देखकर दवा बताने का पैसा। 1983 में 85 साल की उम्र में उनका निधन हो गया।

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