Tuesday, April 18, 2017

फुटनोट 95 (गंगा उठाना)

यह धर्म ग्रंथ पर हाथ रख कर सपथ लेने की एक पोस्ट पर कमेंट है.

यह आंखों देखी नहीं कानों सुनी बात है और उस समय की जब गाय 100 रूपये के आस-पास मिलती थी. मेरे गांव में 2 रामफेर थे, एक यादव एक तेली. रामफेर तेली कोल्हू के अलावा और भी छोटी-मोटी दुकानदारी और शूदखोरी करते थे. रामफेर यादव ने रामफेर तेली से 100 में में गाय खरीदा और 1 रूपया अगवढ़ दे दिया. बहुत बार मांगने पर यादव जी ने कहा कि 'एक रुपया त दै देहले हई तोहार 99 रुपल्ली बाकी बा, जब होई त ऊहौ दै देब.' उनके हमनाम बोले, 'तोहार यक रुपया रुपया होइ गयल हमार 99 रुपल्ली?' उन्होंने पंचायत बुला ली. यादव जी ने कर्जदारी से इंकार कर दिया. पंचायत ने कहा दोनों लोग गंगा उठाएं. (लिपी जमीन पर खड़े होकर सर पर वर्तन में पानी रखकर दिया वक्तव्य सच मान लिया जाता था). रामफेर तेली ने गंगा उठाने से यह कह कर मना कर दिया कि 'झूठेव के पड़ैल, सच्चेव प'. रामफेर यादव ने गंगा उठाकर कह दिया, 'एकर ससुर क एक रुपया ना बाकी बा'. मामला यादव जी के पक्ष में तय हो गया. जब किसी ने पूछा कि गंगा उठाकर झूठ बोलते डर नहीं लगा? तो उन्होंने जवाब दिया, 'झूठ कहां बोलली, हम ई त ना कहली कि ओकर 99 रुपया न चाही, हम तो कहली कि ओकर एक रुपया न चाही'.

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